और फिर, वे मुझे मारने आए

श्रीलंकाई अखबार द संडे लीडर के दिवंगत संपादक का अंतिम संपादकीय जिसे उन्होंने अपनी हत्या किये जाने पर प्रकाशित करने का निर्देश दिया था

50 वर्षीय लसन्त विक्रमातुंगा श्रीलंकाई अखबार द संडे लीडर के संपादक थे, यह अखबार सत्तारुढ़ दल की नीतियों का विरोध करता रहता है। 8 जनवरी 2009 को कोलंबो के निकट विक्रमातुंगा की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उन पर इसके पहले भी जानलेवा हमले हुये थे और उन्हें अंदेशा था कि उनकी जान लेने के प्रयास फिर किये जायेंगे। प्रस्तुत लेख इस दिवंगत संपादक का अंतिम संपादकीय है जिसे उन्होंने अपनी हत्या किये जाने पर प्रकाशित करने का निर्देश दिया था। यह आलेख श्रीलंका जैसे संघर्षरत देश में पत्रकारिता करने और सच बोलने के खतरों का खुलासा तो है ही, भारत के उन पत्रकारों के लिये सबक भी जो स्वाभिमान, अन्तरात्मा, साहस, प्रतिबद्धता और बलिदान जैसे लफ्ज़ों से वाकिफ नहीं हैं।
Lasantha Vikramatunga

लसन्त विक्रमातुंगा पर पहले भी जानलेवा हमले हुये थे और उन्हें अंदेशा था कि उनकी जान लेने के प्रयास फिर किये जायेंगे। इसी लिये अपना अंतिम संपादकीय वे पहले ही लिख छोड़ गये।

सा कोई और व्यवसाय नहीं है जहाँ अपने कर्मचारियों से अपने काम के लिए जीवन न्योछावर कर देने की उम्मीद रखी जाती हो, सिवाय सैनिक बल के, और श्रीलंका में, पत्रकारिता के। पिछले कुछ वर्षों के दौरान स्वतन्त्र मीडिया पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। रेडियो-टीवी और पत्र-पत्रिकाओं के संस्थानों को जलाया गया, उन पर बम फेंके गये, उन्हें कुर्क कर दिया गया और दबाव डाला गया। अनगिनत पत्रकारों को डराया, धमकाया, और मार डाला गया है। मुझे इन सब श्रेणियों से जुड़ने का गौरव प्राप्त हुआ है, और अब विशेषकर अन्तिम श्रेणी से।

पत्रकारिता के क्षेत्र में मैं बहुत समय से हूँ। 2009 द संडे लीडर का पन्द्रहवाँ वर्ष होगा। इस दौरान श्रीलंका में बहुत कुछ बदला है, और मुझे यह बताने की आवश्यकता नहीं कि ज़्यादातर बदलावों ने हालात बदतर ही किये हैं। हम एक ऐसे गृहयुद्ध के बीच जी रहे हैं, जिसे बेरहमी से चलाने वाले कर्णधारों की खून की प्यास का कोई अन्त नहीं है। आतंक, भले वह आतंकवादियों द्वारा फैलाया जा रहा हो या सरकार द्वारा, एक रोज़मर्रा की चीज़ बन गया है। बेशक हत्या एक ऐसा प्राथमिक शस्त्र बन गया है जिसके बलबूते पर सरकार मुल्क की स्वतन्त्रता बनाये रखना चाहती है। आज पत्रकार उनके निशाने पर हैं, कल जज होंगे। दोनों के ही लिए खतरे आज सबसे अधिक हैं।

फिर हम ऐसा क्यों करते हैं?? मैं अक्सर सोचता हूँ इस बारे में। आखिरकार, मैं भी एक पति हूँ, तीन नायाब बच्चों का पिता हूँ। वकालत हो या पत्रकारिता, इन व्यवसायों से परे भी मेरी ज़िम्मेदारियाँ हैं। क्या इतना खतरा मोल लेना वाजिब है? बहुत से लोग मुझे कहते हैं कि नहीं है। दोस्त कहते हैं कि वकालत में वापस चले जाओ; और ईश्वर जानता है कि यह रोज़गार बेहतर भी है और सुरक्षित भी। दूसरे लोगों ने, जिन में दोनों ओर के राजनैतिक नेता हैं, मुझे राजनीति में घुसने को उकसाया है, यहाँ तक कि मेरी पसन्द के मन्त्रालय तक देने का वादा किया है। श्रीलंका में पत्रकारों को जिन खतरों को दोचार होना पड़ता है यह पहचानते हुए कई राजनयिकों ने मुझे अपने देशों तक सुरक्षित ले जाने और वहाँ निवास के अधिकार की पेशकश की है। अगर मैं किसी चीज़ के कारण फंसा भी हूं तो कम से कम वो चीज़ विकल्पों की कमी तो नहीं है।

स्वतन्त्र मीडिया पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। बहुत से लोग मुझे कहते हैं कि इतना खतरा मोल लेना वाजिब है। परन्तु ऊँचे पद, यश, धनधान्य और सुरक्षा की आवाज़ से भी ऊँची एक आवाज़ होती है। वह आवाज़ है अन्तरात्मा की।

परन्तु ऊँचे पद, यश, धनधान्य और सुरक्षा की आवाज़ से भी ऊँची एक आवाज़ होती है। वह आवाज़ है अन्तरात्मा की।

संडे लीडर एक विवादास्पद अखबार रहा है क्योंकि हम खरे को खरा कहते हैं और खोटे को खोटा। हम प्रियोक्ति की आड़ में नहीं छिपते। हम जो खोजी लेख छापते हैं, वह ऐसे दस्तावेज़ी प्रमाणों के बल पर खड़े होते हैं जो नागरिकों ने जान जोखिम में डाल कर हम तक पहुँचाए होते हैं। हमने सकैंडल दर स्कैंडल पर्दाफाश किया है, और पन्द्रह सालों में एक बार भी हमें न किसी ने ग़लत साबित किया है, न ही अदालतों में हमारे विरुद्ध सफलता पाई है।

स्वतन्त्र मीडिया एक ऐसा दर्पण है जिस में जनता को अपनी सही छवि दिखती है, बिना मस्करा और स्टाइलिंग जेल के। हमसे आपको अपने देश के हालात पता चलते हैं, और विशेष रूप से उसका नेतृत्व कर रहे उन लोगों का हाल जिन्हें आपने इसलिए चुना था ताकि आपके बच्चों को एक बेहतर भविष्य नसीब हो। कई बार उस दर्पण में दिखने वाली छवि आप को भली नहीं लगती। पर जहाँ आप अपनी आराम कुर्सी में बैठे झुँझला रहे होते हैं, वहीं आप को यह आईना दिखाने वाले पत्रकार खुलेआम ख़तरा मोल रहे होते हैं। यही हमारा पेशा है, और हम इस से मुँह नहीं मोड़ते।

हर अखबार का एक दृष्टिकोण होता है। हमारा भी है, और हम इस बात को छिपाते नहीं। हमारी श्रीलंका को एक पारदर्शी, धर्म निरपेक्ष व उदारवादी जनतन्त्र के रूप में देखने हेतु प्रतिबद्धता है। इन शब्दों पर ध्यान दें, क्योंकि हर शब्द का एक गहरा अर्थ है। पारदर्शी, ताकि सरकार जनता को अपने काम का खुला हिसाब दे और उनका भरोसा न तोड़े। धर्म निरपेक्ष, क्योंकि हमारे जैसे बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक समाज में केवल धर्म निरपेक्षता ही ऐसा मंच प्रदान करती है जिस पर हम सब एक हो सकते हैं। उदारवादी, क्योंकि हम इस बात को पहचानते हैं कि हर मनुष्य अलग है और हमें उसे वैसा ही स्वीकार करना है जैसा वह है, न कि वैसा जैसा हम उसे बनाना चाहते हैं। और जनतान्त्रिक… खैर, अगर मुझे आपको यह समझाना पड़े कि इसकी आवश्यकता क्यों ज़रूरी है तो बेहतर है कि आप यह अखबार खरीदना ही बन्द कर दें।

संडे लीडर ने कभी भी सुरक्षा पाने की खातिर बिना सवाल उठाए बहुमत के मत को बढ़ावा नहीं दिया है। आप और मैं जानते हैं कि अखबार बेचने का तरीका ही यही है। पर इसके उलट, जैसा कि इतने सालों से छपे हमारे संपादकीय दर्शाते हैं, हम अक्सर ऐसे विचारों को व्यक्त करते हैं जो लोगों को कड़वे लगते हैं। उदाहरण के लिए हमने इस मत को बढ़ावा दिया है कि जहाँ अलगाववादी आतंक का खात्मा होना ज़रुरी है, वहीं उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है आतंक के मूल कारणों की ओर ध्यान देना। हमने सरकार पर दबाव डाला है कि वे श्रीलंका के जातीय संघर्ष को इतिहास के परिपेक्ष्य में देखें, न कि आतंकवाद की दूरबीन से। हमने तथाकथित आतंक के खिलाफ जंग में सरकारी आतंकवाद की भी भर्त्सना की है, और अपने इस भय को भी छिपाया नहीं है कि श्रीलंका विश्व का इकलौता देश है जो आए दिन अपने ही नागरिकों पर बम बरसाता है। ऐसे विचारों के लिए हमें गद्दार भी कहा गया है, और यदि यह गद्दारी है तो हमें गद्दार कहलाने में गर्व है।

कई लोगों को सन्देह है कि संडे लीडर का कोई राजनीतिक एजेंडा है, यह सच नहीं है। यदि हम विपक्ष से ज़्यादा सरकार की आलोचना करते हैं, तो वह केवल इसलिए कि, क्रिकेट की भाषा इस्तेमाल करने के लिये क्षमा करें, फील्डिंग करने वाली टीम को गेंदबाजी करने से क्या फायदा। हमारे अस्तित्व के उन वर्षों को याद करें जब यूएनपी का शासन था, हम उनके गले की सबसे बड़ी फांस बने रहे, और हमने जहाँ जहाँ ज़्यादती और भ्रष्टाचार देखा वहाँ वहाँ उसकी कलई खोली। संभव है कि हमारे द्वारा छापे गए निरन्तर भंडाफोड़ उस सरकार के धाराशायी होने के कारणों में शामिल रहे हों।

न ही हमारी यु्द्ध की नापसन्दगी से यह अर्थ निकाला जाना चाहिए कि हम टाइगर्स का समर्थन करते हैं। लिट्टे इस ग्रह पर नमूदार होने वाले सब से निर्मम और नृशंस संगठनों में से एक है। इस में कोई दो राय नहीं कि इस का खात्मा होना चाहिए। पर ऐसा करने के लिए तमिल नागरिकों के अधिकारों को छीनना, उन को बेरहमी से बमों और गोलियों का शिकार बनाना न केवल ग़लत है, बल्कि सिंहलियों के लिए शर्म की बात है, जिनके धम्म के संरक्षक होने के दावे पर उनकी बर्बरता से प्रश्न चिह्न लग जाता है – ऐसी बर्बरता जिसका अधिकांश ज़िक्र सेंसरशिप के कारण आम लोगों तक नहीं पहुँचा।

लिट्टे इस ग्रह पर नमूदार सबसे नृशंस संगठनों में से एक है। इस का खात्मा होना चाहिए। पर ऐसा करने के लिए तमिल नागरिकों के अधिकारों को छीनना, उनको बमों और गोलियों का शिकार बनाना न केवल ग़लत है, बल्कि सिंहलियों के लिए शर्म की बात है।

और तो और, देश के उत्तर और पूर्व के सैन्य अधिग्रहण का अर्थ है कि इस क्षेत्रों के तमिल लोग, आत्मसम्मान गंवा कर, सदा द्वितीय श्रेणी के नागरिक बने रहेंगे। यह मत सोचिए कि आप युद्ध के पश्चात उन पर “विकास” और “पुनर्निर्माण” की वर्षा कर के उन्हें प्रसन्न कर पाएँगे। युद्ध के घाव उन्हें सदा के लिए दाग़दार कर देंगे, और आप का सामना एक ऐसी पीढ़ी से होगा जो पहले से भी कड़वी और घृणापूर्ण होगी। इस तरह एक ऐसी समस्या जिसका राजनीतिक हल संभव है, एक नासूर बन जाएगा और आगामी युगों के लिए बस संघर्ष की राहें खोलेगा। यदि मैं क्रुद्ध और कुंठित लग रहा हूँ, तो केवल इसलिए कि मेरे अधिकतर हमवतन – और सारी सरकार – दीवार पर साफ साफ लिखी इबारत पढ़ नहीं पा रहे हैं।

यह सर्वविदित है कि दो बार मेरे ऊपर जानलेवा हमला हुआ, और एक बार मेरे घर पर मशीनगनों से गोलियाँ बरसाई गई। सरकार के पाखंडी आश्वासनों के बावजूद इन आक्रमणों को अंजाम देने वालों की कभी गंभीर रूप से पुलिस जाँच नहीं हुई और हमलावरों को कभी पकड़ा नहीं गया। इन सब मामलों में, मेरे पास यह सोचने की वजह है कि हमले सरकार द्वारा कराए गए थे। आखिरकार जब मुझे मारा जाएगा, तो मुझे मारने वाली भी सरकार ही होगी।

इसमें विडंबना यह है की बात यह है कि महिन्दा और मैं 25 वर्षों से भी अधिक समय से मित्र हैं, अधिकतर लोगों को यह बात मालूम नहीं है। मुझे लगता है कि मैं उन कुछ ही बचे खुचे लोगों में से हूँ जो उसे उसके प्रथम नाम से बुलाते हैं, और उससे बात करते समय चिरपरिचित सिंहली शैली में ओया कह कर संबोधित करते हैं। हालाँकि मैं उनके द्वारा समाचार संपादकों के लिए रखी गई नियमित बैठकों में भाग नहीं लेता, शायद ही कोई महीना होता होता जब हम, निजी रूप से या कुछ निकट मित्रों के साथ देर रात राष्ट्रपति भवन में, मिलते न हों। हम गप्पे हाँकते हैं, सियासत छाँटते हैं और पुराने दिनों के बारे में हंसी ठट्ठा करते हैं। इस लिए उनके लिए कुछ संदेश देना तो यहाँ बनता ही है।

महिन्दा, जब तुमने 2005 में एसएलएफपी के राष्ट्रपति नामांकन की जंग अंततः जीत ली, तो इस स्तंभ से अधिक स्वागत तुम्हारा कहीं नहीं हुआ। बेशक, हमने तुम्हें तुम्हारे प्रथम नाम से पुकार कर अपनी एक दशक पुरानी परम्परा को तोड़ा। मानवाधिकारों और उदारवादी मूल्यों की ओर तुम्हारी प्रतिबद्धता के लिए तुम इतने जाने जाते थे कि हमने तुम्हारा स्वागत ताज़ी हवा के एक झोंके की तरह किया। फिर, अपने एक मूर्खतापूर्ण काम के कारण, तुमने खुद को हंबातोता सहायता घोटाले में फंसा पाया। बहुत आत्मचिन्तन करने के बाद ही हमने वह समाचार सार्वजनिक किया, और साथ ही तुमसे पैसा लौटाने का भी अनुरोध किया। तुमने कई सप्ताह बाद ऐसा किया तो सही, पर तब तक तुम्हारी प्रतिष्ठा पर दाग लग चुका था। तुम अभी भी उसी का दाग़ धोने की कोशिश कर रहे हो।

तुमने स्वयं मुझे बताया कि तुम्हें राष्ट्रपति पद का लोभ नहीं है। तुम्हें उसकी तलाश में भटकना भी न पड़ा: वह तुम्हें बैठे बिठाए मिल गया। तुमने मुझे बताया है कि तुम्हारे बेटे ही तुम्हारे लिए सब से बड़ी खुशी हैं, और तुम्हें उन के साथ समय बिताना इतना अच्छा लगता है की सरकारी मशीनरी चलाने का काम तुमने अपने भाइयों के भरोसे छो़ड़ दिया है। अब सब को स्पष्ट दिख रहा है कि वह मशीनरी इतनी अच्छी तरह काम कर रही है कि मेरे बेटी और बेटों के सिर से ही पिता का साया उठ गया है।

मुझे पता है कि मेरी मृत्यु के पश्चात तुम वही पाखंड भरी बातें करोगे और पुलिस से जल्द और सघन जाँच करने का अनुरोध करोगे। पर जैसा कि तुम्हारे आदेश पर हुई पिछली सभी जाँचों में हुआ है, इस जाँच से भी कुछ नहीं निकलेगा। क्योंकि सच यही है कि हम दोनों को मालूम है मेरी मौत के पीछे कौन है, पर उसका नाम लेने का साहस नहीं कर सकते। मेरा ही नहीं, तुम्हारि साँस भी इसी बात पर टिकी है।

दुख की बात है कि, तुमने युवावस्था में तो इस देश के लिए बहुत सपने देखे थे, पर केवल तीन साल में तुमने इनको ख़ाक में मिला दिया है। देशभक्ति के नाम पर तुमने मानवाधिकारों को रौंदा है, बेलगाम भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है, और जनता के धन को ऐसे लुटाया है जैसे तुमसे पहले किसी राष्ट्रपति ने नहीं लुटाया। बेशक तुमने उस छोटे से बच्चे जैसा व्यवहार किया है, जिसे एक खिलौनों की दुकान में अचानक खुला छोड़ दिया गया हो। न, यह तुलना शायद सही नहीं है क्योंकि कोई भी बच्चा इस भूमि पर इतना रक्त नहीं बहा सकता था, जितना तुमने बहाया, न ही नागरिकों के अधिकारों का इतना हनन कर सकता था जितना तुमने किया। तुम्हें इस समय सत्ता के नशे में तो दिखाई नहीं दे रहा होगा, पर तुम अपने बच्चों के लिए छोड़ी इस रक्तरंजित विरासत के लिए पछताओगे। इस का परिणाम त्रासदी भरा ही होगा। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं एक स्वच्छ अन्तरात्मा ले कर अपने सृष्टिकर्त्ता से मिलने जा रहा हूँ। काश जब आखिर तुम्हारा समय आए, तुम भी ऐसा कर सको। काश।

जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मुझे यह सन्तुष्टि है कि मैं सीना तान कर चला और किसी के सामने झुका नहीं। और इस सफर पर मैं अकेला नहीं चला। मीडिया की अन्य शाखाओं में मेरे सह-पत्रकार मेरे साथ चले हैं – उन में से अधिकांश अब या तो मृत है, बिना मुकदमे के कारावास में हैं, या कहीं दूर देश-निकाले पर हैं। कुछ और हैं जो मौत की उस छाया में जी रहे हैं जो तुम्हारी हुकूमत ने उन आज़ादियों पर डाली है जिन के लिए कभी तुम स्वयं लड़े थे। तुम्हें यह भूलने नहीं दिया जाएगा कि मेरी मौत तुम्हारे रहते हुई। मुझे मालूम है तुम्हें दुख तो होगा, पर यह भी मालूम है कि तुम्हारे पास मेरे हत्यारों को बचाने के इलावा कोई चारा नहीं होगा – तुम ख्याल रखोगे कि उस दोषी को कभी दंड न मिले। तुम्हारे पास कोई विकल्प नहीं है। मुझे तुम पर दया आती है, और शिरान्ति जब अगली बार कन्फ़ेशन के लिए जाएगी तो उसे बहुत देर घुटनों के बल रहना पड़ेगा, क्योंकि उसे न सिर्फ अपने पाप स्वीकारने होंगे बल्कि अपने उस विस्तृत परिवार के भी जो तुम्हें राजगद्दी पर बैठाए हुए हैं।

मार्टिन नीमोइलर अपने यौवन में यहूदी-विरोधी था और हिटलर का प्रशंसक। पर जब नाज़ीवाद ने जर्मनी में जड़ें पकड़ीं, तो उस ने नाज़ीवाद की असलियत देखी – हिटलर केवल यहूदियों का ही विनाश नहीं करना चाहता था, बल्कि उन सबका जिनका दृष्टिकोण भिन्न हो।

जहाँ तक संडे रीडर के पाठकों का प्रश्न है, मैं उन्हें हमारे लक्ष्य का समर्थन करने के लिए धन्यवाद कहने के अतिरिक्त क्या कह सकता हूँ। हमने अलोकप्रिय उद्देश्यों के लिए आवाज़ उठाई है। ऐसे लोगों के लिए खड़े रहे हैं जो स्वयं इतने निर्बल है कि खड़े नहीं रह सकते। ऐसे ऊँचे और बलशाली लोगों से भिड़े हैं जो सत्ता के नशे में चूर हो कर अपनी जड़ों को भूल गए हैं। भ्रष्टाचार का, और आप की खून पसीने के कमाई के टैक्स-रुपयों को व्यर्थ गवाँए जाने का पर्दाफाश किया है, और इस बात को सुनिश्चित किया है कि सरकारी प्रचार कुछ भी रहा हो, आप को एक विपरीत विचार भी सुनने को मिले। इस के लिए मैंने, और मेरे परिवार ने, वह कीमत चुकाई है जो मुझे बहुत समय से मालूम था कि मुझे एक दिन चुकानी है। मैं उस के लिए तैयार हूँ, और सदा था। मैंने इस परिणाम को टालने के लिए कुछ नहीं किया है – कोई सुरक्षा नहीं, कोई एहतियात नहीं। मैं चाहता हूँ कि मेरा हत्यारा जान ले कि मैं उस की तरह कायर नहीं हूँ, जो इन्सानी ढ़ालों की आड़ में छिपकर हज़ारों निर्दोषों को मौत की सज़ा देता है। यह तो पहले से लिखा है कि मेरा जीवन छीना जाएगा, और कौन छीनेगा। बस यह लिखना रह गया है कि कब।

संडे लीडर सच की लड़ाई लड़ता रहेगा, यह भी तय है। क्योंकि मैंने यह जंग अकेले नहीं लड़ी। संडे लीडर को खत्म किया जाए, उससे पहले हम में से कई मारने होंगे, और मारे जाएँगे। मुझे आशा है कि मेरी हत्या स्वतन्त्रता की पराजय के रूप में न देखी जाए, पर प्रयत्नों को तेज़ करने वाले बचे हुए लोगों के लिए प्रेरणा के रूप में देखी जाए। बेशक मुझे उम्मीद है कि इस से ऐसी शक्तियाँ को बल मिलेगा जो हमारी प्रिय मातृभूमि में मानवीय स्वतन्त्रता का एक नया युग आरंभ करेंगी। मुझे यह भी आशा है कि इस से आपके राष्ट्रपति की आँखें इस तथ्य की ओर खुल जाएँगी कि देशभक्ति के नाम पर कितना भी नरसंहार हो, मानवीय उत्साह जीवित रहेगा और फलेगा फूलेगा। सारे राजपक्ष मिलकर भी उसे नहीं मार सकते।

लोग मुझ से प्रायः पूछते हैं कि मैं इस तरह के जोखिम क्यों उठाता हूँ और मुझे बताते हैं कि किसी न किसी दिन मुझे उड़ा दिया जाएगा। मुझे भी मालूम है – यह तो अटल है। पर यदि हम अब नहीं बोलेंगे, तो बेआवाज़ों के लिए आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं बचेगा, चाहे वे जातीय अल्पसंख्यक हों, पिछड़े हों या सताए हुए लोग। एक ऐसा उदाहरण है जिस ने मुझे अपने पत्रकारिता के पूरे कार्यकाल में प्रेरित किया है, और वह है जर्मन धर्मशास्त्री मार्टिन नीमोइलर का। अपने यौवन में वह यहूदी-विरोधी था और हिटलर का प्रशंसक। पर जब नाज़ीवाद ने जर्मनी में जड़ें पकड़ीं, तो उस ने नाज़ीवाद की असलियत देखी – हिटलर केवल यहूदियों का ही विनाश नहीं करना चाहता था, बल्कि उन सब का जिनका दृष्टिकोण भिन्न हो। नीमोइलर ने आवाज़ उठाई, और इस तकलीफ के लिए उसे 1937 से 1945 तक साक्सेनहाउज़ेन और दख़ाउ के कैदी कैंपों में रखा गया, और उसे लगभग कत्ल कर दिया गया। जब वो कारावास में था, तो नीमोइलर ने एक कविता लिखी जो मेरे मन में तब से अटकी हुई है जबसे मैंने उसे किशोरावस्था में पहली बार पढ़ा था:

वे पहले यहूदियों को मारने आए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था।
फिर वे साम्यवादियों को मारने आए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था।
फिर वे श्रमिकसंघियों को मारने आए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं श्रमिकसंघी नहीं था।
फिर वे मुझे मारने आए
और मेरे लिए बोलने वाला कोई रह नहीं गया था।

यदि आप को कुछ न याद रहे, यह याद रख लीजिए: संडे लीडर आपके लिए रहेगा – चाहे आप सिंहली हैं, तमिल, मुसलमान, शूद्र, समलैंगिक, भिन्न-विचारक, या विकलांग। इसके कर्मचारी लड़ते रहेंगे, बिना झुके और बिना डरे, उसी साहस के साथ जिस के आप आदी हो चुके हैं। पर उनकी इस प्रतिबद्धता का मोल न भूलें। इस बात में कोई सन्देह नहीं कि हम पत्रकार जो भी बलिदान देते हैं, अपने यश या संवर्धन के लिए नहीं देते, बल्कि आपके लिए देते हैं। आप इस बलिदान के हकदार हैं या नहीं, वह अलग बात है। जहाँ तक मेरी बात है, ईश्वर जानता है मैंने कोशिश तो की।

इस लेख का अनुवाद करने के लिये सामयिकी दल के सदस्य रमण कौल का शुक्रिया!

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3 प्रतिक्रियाएं

  1. बेहतरीन लेख। बेहतरीन अनुवाद। बहुत खुशी होती है रमण-देबू की जोड़ी को अपनी उत्कॄष्टता से सक्रिय होते देखकर। यह लेख /अनुवाद मेरी समझ में हिंदी में बहुत पढ़ा जायेगा। इसकेचुनाव के लिये सामयिकी टीम बधाई की पात्र है।

  2. ईश्वर लसन्त विक्रमातुंगा की आत्मा को शांति दें। उनके देश में अमन कायम हो। विक्रमातुंगा ने पत्रकारिता का मान बढ़ाया है।

  3. […] किया गया। उन के इस संपादकीय का मेरा अनुवाद सामयिकी पर अवश्य […]