दो नाईजीरिया

तानाशाही व भ्रष्टाचार से त्रस्त देश के साहित्य व कला को दूर से सराहना ही बेहतर

जे

नेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन में काम करने वाले एक मित्र ने नाईजीरिया में होने वाले एक सम्मेलन में आने का न्योता दिया तो मैंने तुरंत बहाना बना दिया कि उस दौरान मुझे एक अन्य काम है, अतः नहीं आ सकूँगा। असल में मुझे नाईजीरिया जाने से डर लग रहा था।

मेरे मन में नाईजीरिया की दो छवियाँ थीं, आज से नहीं बहुत सालों से। पहली छवि थी नाईजीरिया के विश्व में भ्रष्टाचार की राजधानी होने की। उसका कठोर और संगीन तानाशाही शासन शेल जैसी पेट्रोल बेचने वाली बहुदेशीय कम्पनियों के साथ मिल कर देश के गरीब वर्ग पर ज़ुल्म ढा रहा था, विभिन्न जन जातियों के मानव अधिकारों का दमन कर रहा था। जब 1996 में वहाँ की सरकार ने लेखक और विचारक श्री केन सारा वीवो को फ़ाँसी की सजा दे दी तो मेरे मन में उस तानाशाह शासन के प्रति बनी राय में और भी कड़वाहट फैल गयी।

पिछले दो दशकों में नाईजीरिया के उत्तरी भाग में रूढ़िवादी इस्लाम की जकड़ भी गहरी हो गयी है। शरीयत का कानून और “गैर पुरुष से सम्बंध” जैसे आरोप लगा कर औरतों को पत्थरों से मारने की कुछ घटनाओं के समाचारों से भी लगता था कि नाईजीरिया तो पिछड़ा हुआ रूढ़ीवादी देश बन गया है। तिस पर पिछले कुछ सालों से पहली से ही बिगड़ी इस छवि में एक नयी बात जुड़ी कि नाईजीरिया तो ईमेल के द्वारा दुनिया भर के लोगों को उल्लू बनाने का देश है। वहाँ के हेक्कर दुनिया भर के लोगों की ईमेल के पासवर्ड चुरा कर, उनके सब मित्रों और घर वालों को पैसा भेजने के संदेश भेज कर, यह पैसा हथिया लेते हैं और उनके विरुद्ध कोई कुछ नहीं कर पाता क्योंकि उन्हें अपनी सरकार का संरक्षण प्राप्त है।

केन सारो वीवा और छिम्मामँदा जैसे नाईजीरियाई लेखक मुझे बहुत अच्छे लगते थे। मुझे वहाँ के कलाकारों, संगीतकारों के बारे में कुछ जानकारी थी। नाईजीरिया की कई हज़ार वर्षों प्राचीन योरूबा संस्कृति का असर तो मैंने स्वयं ब्राज़ील, क्यूबा और कुछ अन्य दक्षिणी और मध्य अमरीकी देशों में देखा था, जहाँ नाईजीरिया से आने वाले गुलाम अपने साथ इस संस्कृति को भी ले कर आये थे। इसलिए नाईजीरिया की दूसरी छवि भी थी मन में, प्राचीन संस्कृति और सभ्यता वाले देश की।

खैर, मेरे मित्र ने मेरी एक न सुनी और अंततः में मुझे नाईजीरिया जाने के लिए हाँ कहना ही पड़ा।

***

हवाई जहाज जब अबूजा के हवाई अड्डे पर उतरने लगा तो आसपास की हरियाली और पहाड़ देख कर बहुत अच्छा लगा। कहते हैं कि नाईजीरिया अफ्रीका के सबसे ताकतवर और समृद्ध देशों में से है हालांकि उनका हवाई अड्डा इस दृष्टि से कुछ छोटा सा लगा, पर फ़िर भी सब कुछ नया और साफ़ सुथरा था।

पासपोर्ट की जाँच का समय आया तो वहाँ बैठी युवती ने बहुत प्रश्न पूछे कि क्यों आये हैं, किस सभा के सिलसिले में, सभा कहाँ होगी, क्या विषय है, इत्यादि। मुझे लगा कि पाँच दिन के लिए तो आया हूँ, वापस जाने का टिकट भी है, इतनी कठिनाई से इनके दूतावास ने वीज़ा दिया था, फ़िर भी इतने प्रश्न, क्यों? शायद इन्हें चिंता है कि यूरोप से लोग यहाँ आ कर बसना न शुरु कर दें।

रोम में नाईजीरिया के दूतावास से वीज़ा लेना सचमुच कठिन था। पहले तो इंटरनेट के माध्यम से एक फ़ार्म भरा। फ़िर एक दूसरा फ़ार्म भर कर तमाम कागजात, जैसे कि नाईजीरिया के सभा आयोजक और विश्व स्वास्थ्य संगठन के निमंत्रण पत्र, अपने दफ्तर के प्रमाणपत्र आदि, जोड़ कर सब कुछ एक माह पहले दूतावास भेजना पड़ा था। इतना झंझट तो अमरीका जाने के लिए भी नहीं करना पड़ता। दूतावास वालों ने कहा था कि अगर आवश्यकता होगी तो वे मुझे रोम में साक्षात्कार के लिए भी बुला सकते हैं, लेकिन बाद में बिना साक्षात्कार के ही वीसा जारी कर दिया गया।

बहरहाल, पासपोर्ट की जाँच से निकला तो कस्टम वालों ने पकड़ लिया। सामान तो मेरा थोड़ा सा ही था, पर उन्होंने भी खूब प्रश्न पूछे कि यहाँ किस लिए आये हो, किस तरह की सभा है, कितने दिन और कहाँ रुकोगे, आदि। नाईजीरिया पहुँच कर इन शुरुवाती अनुभवों से मन में तानाशाह, भ्रष्ट पुलिस के हाथों में दबे इस देश की बनी छवि और भी दृढ़ हो गयी।

पर असली आश्चर्य तो हवाई अड्डे से निकलने के बाद हुआ। हाथ में नाम की तख्ती लिये आगंतुकों की प्रतीक्षा करते मित्र, परिवार वाले या सहकर्मी तो बहुत थे, लेकिन उनमें से किसी भी तख्ती पर मेरा नाम नहीं था। जिसे मुझे रिसीव करना था, वह नदारद था। कोई बात नहीं, मैंने सोचा, टेक्सी ले लूँगा। लेकिन जैसे आम हवाई अड्डों पर टेक्सी वाले आने वाले यात्रियों के आगे पीछे भागते हैं, वैसा यहाँ कुछ नहीं था। मैंने पूछा तो किसी ने बताया की टेक्सी स्टैंड तो दूसरी ओर था। वहाँ पहुँचा तो वहाँ पर कोई टेक्सी यात्रियों की प्रतीक्षा नहीं कर रही थी। कुछ देर खड़ा रहा, तब जाकर एक टेक्सी वाला आया। संभवतः अबूजा में पर्यटक या बिना जानपहचान वाले लोग बहुत कम आते हैं, इसलिए टेक्सी वाले हवाई अड्डे पर यात्रियों का इंतज़ार करने में अपना समय बरबाद नहीं करते!

टेक्सी चालक बड़ा ही शालीन और सभ्य था। अबूजा का हवाई अड्डा शहर के करीब चालीस किलोमीटर बाहर है। मुझसे लोगों ने कहा था कि शहर जाने का किराया करीब चार हज़ार नेइरा यानि 25 डालर के करीब पड़ेगा। होटल पहुँचने पर उसने पाँच हज़ार नेइरा माँगे, लेकिन मैंने कहा कि नहीं चार हज़ार होना चाहिये तो वह तुरंत बिना बहस किये मान गया। उसके बाद जितने दिन अबूजा में रहा, टेक्सी वालों से कभी चिकचिक नहीं करनी पड़ी, बल्कि हर बार शालीनता से बात करने वाले लोग ही मिले। सड़क पर ही कभी किसी से कुछ पूछा तो लोगों ने बड़ी सभ्यता के साथ समझाया और बताया।

***

अबूजा की पुलिस से मेरा सामना तीसरे दिन हुआ। चुंकि सुबह मीटिंग प्रारम्भ होने में विलम्ब था तो सोचा कि क्यों न करीब के कैथेड्रल और अबूजा की सुनहरे गुम्बज वाली सबसे प्रमुख मस्जिद को देख आया जाये। पहले दो दिनों में शहर में इधर उधर टेक्सी से यात्रा करते हुए कुछ तस्वीरें खीची थीं, लेकिन मन था कि सैर करते हुए कैथेड्रल और मस्जिद के आसपास की खूब सारी तस्वीरें ली जायें। अबूजा शहर नया ही बना है, करीब बीस साल पहले। इससे पहले नाईजीरिया की राजधानी लागोस थी। नया शहर होने के नाते वहाँ बहुत से फ्लाई ओवर, खुली चौड़ी सड़कें, नये मकान आदि बने हैं। ये देखने में सुंदर तो हैं पर इनमें देश की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता का कोई अक्स नहीं दिखता। तस्वीरें खींचने के लिए शहर में कैथेड्रल, मस्जिद या स्टेडियम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।

कैमरा ले कर निकला तो कुछ इक्का दुक्का तस्वीरें खींचता कैथेड्रल तक जा पहुँचा। कहाँ से तस्वीर खींची जाये यह सोच ही रहा कि गुस्से में बड़बड़ाता हुआ एक आदमी मेरे पास आया। “आप के पास तस्वीरें खीचने की अनुमति है क्या? कैसे तस्वीर खींच रहे हैं आप? शर्म नहीं आती आप को? अगर हम लोग आप के देश में जा कर ऐसे तस्वीरें खीचने लगे तो आप को कैसा लगेगा?”

विश्वास ही नहीं हुआ कि तस्वीर खींचना भी गैर कानूनी हो सकता है। किसी हवाई अड्डे या मिलेट्री की जगह की तस्वीर खींच रहा होता तो कुछ शंका मन में होती पर शहर के कैथेड्रल की तस्वीर नहीं खींच सकते?

पहले तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि तस्वीर खींचना भी गैर कानूनी हो सकता है। किसी हवाई अड्डे या मिलेट्री की जगह की तस्वीर खींच रहा होता तो कुछ शंका मन में होती पर शहर के कैथेड्रल की तस्वीर नहीं खींच सकते, इसका मुझे विश्वास नहीं हुआ। मैंने हँस कर कहा कि भाई पर्यटक हूँ, तुम्हारे शहर की संदर जगहों की तस्वीरें खींच रहा हूँ, इसमें क्या गलती है? मेरे उत्तर पर वह भड़क कर आग बबूला हो गया। “अभी पुलिस को बुलाता हूँ, कुछ दिन लाकअप में बिताओगे तो अक्ल ठिकाने आ जायेगी”, उसने मुझे धमकाया। कुछ लोग जो आसपास खड़े थे, सब खिसक लिये, बस मैं अकेला ही उसके साथ खड़ा रह गया। पहले तो कुछ देर तो वह बहुत बोलता रहा, मुझे डाँटता रहा, शायद इंतज़ार कर रहा था कि मैं क्षमा माँगने के लिए या पुलिस लाकअप से बचने के लिए कुछ घूस दूँगा, लेकिन उसने पैसे लेने देने की कोई बात स्पष्ट नहीं कही। मुझे भी चिंता होने लगी कि सचमुच जेल में न जाना पड़े।

“भाई मुझे क्या मालूम था कि यहाँ इस तरह का कानून है”, मैंने विनम्र हो कर कहा।

“देश के कानून न जानने से अपराध कम नहीं होता”, वह बोला।

तब मैंने जान पहचान वाला पत्ता चलाया, इशारा कर के कहा कि “वह जो अंतर्राष्ट्रीय कोनफ्रैंस सेंटर है, वहाँ तुम्हारी सरकार के निमंत्रण पर आया हूँ, थोड़ी देर में ही मुझे तुम्हारे राष्ट्रपति की पत्नी के सामने भाषण देना है। अगर इस तरह से जेल में बंद कर दोगे तो वहाँ मेरे भाषण का क्या होगा?” वह कुछ देर तक मुझे घूरता रहा, फ़िर बोला, “कितनी तस्वीरें खींची हैं? फ़िल्म निकाल कर उन्हें कैंसल कर दो?”

“यह फ़िल्म वाला कैमरा नहीं, डिजिटल कैमरा है और तस्वीर भी एक ही खींची है, कहो तो उसे हटा दूँगा”, मैंने नम्रता से कहा। “ठीक है, इस बार तो जाने देता हूँ, तुरंत वापस अपनी मीटिंग में चले जाओ, दोबारा इस तरफ़ नहीं आना”, उसने मुझे धमका कर कहा। मेरी जान में जान आयी, चुपचाप बिना कोई अन्य तस्वीर खींचे मैं वापस सम्मेलन में लौट आया और दोबारा उस शहर में कैमरा ले कर नहीं निकला।

सम्मेलन में राष्ट्रपति की पत्नी के आने की तैयारी चल रही थी, हर तरफ़ पुलिस थी। सोचा कि बजाय कोई अन्य परेशानी मोल लेने से पहले से पूछ लेना ठीक रहेगा कि राष्ट्रपति की पत्नी की तस्वीर खींच सकते हैं या नहीं। मेरे प्रश्न पर सुरक्षा पुलिसवाला हँस कर बोला, “क्यों नहीं सर, आप जितनी चाहें तस्वीरें खींच सकते हैं। क्या आप ने हमारा सुंदर शहर देखा? सारा दिन यहाँ होटल में बन्द न रहिये, बाहर जा कर हमारे हसीं शहर को भी देखिये।” मन में तो आया पूछूँ कि क्या उनके सुंदर शहर में तस्वीरें भी खींच सकते हैं, पर कुछ बोलना मुनासिब न लगा, बस मुस्कुरा कर हामी भर दी।

***

मीटिंग में स्त्री सशक्तिकरण मंत्रालय से मंत्री सुश्री इयोम जोसेफीन भी पधारी थीं। उनका सुंदर सौम्य व्यक्तित्व, और दूसरों की बात को ध्यान से सुन कर सोच समझ कर नपा तुला बोलने का अन्दाज़ बहुत अच्छा लगा।

उनके अतिरिक्त अन्य अनेक संसद सदस्यों और सेना के अधिकारियों की बीवीयाँ, आदि भी मौजूद थीं लेकिन घंटों इंतज़ार के बाद भी राष्ट्रपति की पत्नी नहीं आयीं। अंत में उस सभा का उदघाटन संसद के अध्यक्ष की पत्नि के किया, जिन्होंने अपने भाषण में कहा कि राष्ट्रपति की पत्नि श्रीमति पेशेंस गुडलक जोनाथन सुबह से हमारी सभा में आने के लिए तैयार बैठी थीं लेकिन उन्हें काउंसिल की तरफ़ से बाहर निकलने की अनुमति नहीं मिली। सुन कर बड़ा अचरज हुआ कि राष्ट्रपति की पत्नि को घर से बाहर किसी सभा में जाने के लिए किसी काउंसिल की अनुमति की दरकार होती है। पता नहीं कि अनुमति उन्हें काउंसिल से नहीं मिली थी या अपने पति से!

सब औरतों को उनकी रंग बिरंगी पोशाकों में देख कर लगा रहा था मानो किसी स्त्री क्लब की किटी पार्टी में आ गये हों। लेकिन सम्मेलन में नाईजीरिया के विभिन्न भागों से आये डाक्टरों, विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों आदि से भी मिलने का मौका मिला। अफ्रीका के विकास के बारे में अपनी दृष्टि बना रहे ये लोग, जिनके अपने मौलिक विचार हैं, शोध है, बहुत दिलचस्प लगे।

जिस शाम वापस जाना था, उसी शाम को मंत्री के साथ विशेष भोज का आयोजन किया गया था। उन्हें जब मालूम चला कि हमें हवाई अड्डा जाना है तो उन्होंने ज़ोर दिया कि हम उनकी मंत्री वाली गाड़ी में ही जायें। आगे पीछे सायरन बजाती, चमचमाती बत्तियों वाली गाड़ी से निकले तो बहुत अज़ीब लगा। मेरे लिए इस तरह की गाड़ी में बैठने का यह पहला अनुभव था, मन में लगा कि खामख्वाह तमाशा किया जा रहा है। पर शहर से बाहर निकलते ही खुली चौड़ी सड़क पर जब कारों का जमावड़ा देखा तो मंत्री की गाड़ी में बैठे होने का फायदा समझ में आया। सड़क के दोनों ओर अनगिनत पटरीवाली दुकानें, खोमचे वाले, आदि अटे पड़े थे, और कारें इसी चक्कर में ट्रैफिक रोके खड़ी थीं। खैर सायरनों के बजने से हमें निकलने का रास्ता मिल ही गया। हवाई अड्डे पहुंचते पहुंचते रास्ते में इस तरह की बहुत रुकावटें आयीं, पर आखिरकार ठीक समय पर वहाँ पहुँच ही गये। अगर मंत्री जी की गाड़ी नहीं होती तो वहाँ समय पर पहुँचना नामुमकिन था।

यह एक छोटा सा अनुभव था नाईजीरिया के एक शहर का। शायद राजधानी से बाहर का जीवन, गाँवों में रहने वाले आम नाईजीरियन का जीवन, अधिक अच्छा होता हो। इस छोटी सी यात्रा में वहाँ के शालीन, सभ्य लोग अच्छे लगे, लेकिन भ्रष्टाचार और तानाशाही झेलते देश की तस्वीर जेहन में थी, वह और भी पुख्ता हो गयी। सच कहूं तो कभी नाईजीरिया लौट कर जाने का मौका मिले भी तो भी नहीं जाना चाहूँगा। मेरे विचार में उनके साहित्य और कला को दूर से जानना और सराहना ही बेहतर होगा।

सभी चित्रः डॉ सुनील दीपक

आपको ये लेख भी पसंद आयेंगे:

बालिका वधु: नाटक द्वारा सच का सामना
गैस आंदोलन ने दी अपारंपरिक शिक्षा
ग्रामीण भारत की बदलती नारी
टैग:

एक प्रतिक्रिया

  1. शहर साफ सुथरा लगा. शेष अनुभव पढ़ कर लगा वर्मा के बारे में भी एक मित्र ने कुछ कुछ ऐसा ही हाल सुनाया था.