प्रिंट आन डिमांड से लेखक प्रकाशक भी बने

परंपरागत प्रकाशन के दिन लदे, अब चलेगी ईबुक्स और पीओडी की तकनीक

क लेखक क्यों लिखता है? जाहिर है, तमाम दुनिया तक अपनी बात पहुँचाने के लिए। वह चाहता है कि लोग उसकी बातें उसके विचार पढ़ें, गुनें। अपनी किताबों के ज़रिये वह दुनिया को अपना अर्जित ज्ञान व अनुभव बांटता है। प्राचीन काल के भोज पत्रों व ताड़ पत्रों से लेकर आधुनिक आफसेट प्रिंटरों, डिजिटल ईबुक्स तक का सहारा वह अपनी रचनाओं को चहुँओर सर्वसुलभ बनाने में लेता आ रहा है। आधुनिक युग में लेखकों की प्रकाशित रचनायें आमजन तक पहुंचाने का परंपरागत माध्यम केवल प्रकाशक रहे हैं। परंतु उन्नत छपाई तकनीक की बदौलत अब प्रकाशन जगत में एक और नए विचार का पदार्पण भी हो गया है वह है सेल्फ़ पब्लिशिंग या स्वप्रकाशन। और सेल्फ़ पब्लिशिंग को बढ़ावा देने वाला यह प्रकल्प है प्रिंट आन डिमांड या मांग पर छपाई।

क्या है मांग पर छपाई?

प्रिंट आन डिमांड या मांग पर छपाई की अवधारणा इंटरनेट की दुनिया के लिये नई नहीं है। 2003 में प्रारंभ कैफेप्रेस जैसे जालस्थलों के माध्यम से आप कॉफी मग, पोस्टर, टी शर्ट, डेस्क कैलेंडर, जैसी विभिन्न वस्तुयें अपने मनमुताबिक डिज़ाईन में मंगा सकते हैं। ये साईटें आपको अपनी बनाई डिज़ाईन भी इस्तेमाल करने देती हैं और खरीदी की कोई न्यूनतम संख्या नहीं होती, चाहें तो केवल एक मग या टीशर्ट मंगा लें। विगत 2‍ – 3 वर्षों से मांग पर छपाई सेवा में एक नया आयाम आ जुड़ा है सेल्फ़ पब्लिशिंग या स्वप्रकाशन का जिसके अंतर्गत आप अपनी किताब के प्रकाशक स्वयं बन सकते हैं।

2006 के आसपास जब फ्लिकर जैसी फोटो शेयरिंग सेवाओं की लोकप्रियता आसमान छू रही थी तब ब्लर्ब जैसे जालस्थलों ने इन चित्रों को प्रिंट रूप में सहेजने के विचार का सृजन किया। फोटो अल्बम रखने के शौकीन लोगों के लिये यह आकर्षक प्रस्ताव था। लुलु.कॉम जैसी सेवाओं ने इसे और भी विस्तार दिया और अन्य किस्म के प्रकाशन भी स्वप्रकाशन के दायरे में शामिल होने लगें। पिछले साल लुलु के जरिए 98 हजार किताबें छापी गईं हैं। ऑनलाइन किताब बेचने वाली बड़ी कंपनी अमेजन.कॉम ने भी क्रियेट स्पेस के माध्यम से स्वप्रकाशन की सेवा पेश की है। 2007 के उत्तरार्ध से भारतीय कंपनियों ने भी इस ओर रुख किया है, फिलहाल अगस्त 2007 में प्रारंभ सिनामोन टील व जुलाई 2008 में प्रारंभ पोथी डॉट कॉम इस क्षेत्र में अग्रणी हैं। डिपो इंडिया जैसी कुछ अन्य साईटें भी हैं जो कम से कम 25 प्रतियाँ प्रकाशित करती हैं।

Jaya-Abhay / Leonard-Quennie

पोथी डॉट कॉम का संचालन कर रही जया झा ने बताया कि भारत में प्रिंट आन डिमांड का प्रयोग तो काफी दिनों से हो रहा है, मसलन भारतीय कार्पोरेट जगत सीमित संख्या में ब्रोशर वगैरह छपवाने और सामान्यजन पोस्टर या मग जैसे उपहार देने हेतु इसका प्रयोग करते रहे हैं पर प्रकाशन जगत में यह अभी प्रयोगात्मक दौर में है। वे मानती हैं कि स्वप्रकाशन की संभावनायें तो विशाल हैं परंतु प्रकाशन की नई तकनीक का भरपूर दोहन करने हेतु परंपरागत प्रकाशन जगत के सभी साझेदारों को इसके मुताबिक खुद को ढालना होगा। सिनामोन टील के लेनार्ड फर्नान्डिस भी स्वप्रकाशन के उज्जवल भविष्य के प्रति आशावान हैं। “मुख्यधारा के भारतीय प्रकाशकों द्वारा सालाना 80 हजार से अधिक किताबें प्रकाशित की जाती हैं और यह उद्योग सालाना 10 से 12 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। अगर हम क्षेत्रिय भाषाओं में स्वप्रकाशन को मिला कर देखें तो यह बाजार बेहद बड़ा है।”, फर्नान्डिस कहते हैं।

फ़्यूचर रेडी बन रहा है प्रकाशन

Kindle
दुनिया बदल रही है, हमारे पढ़ने लिखने की आदतें भी। बदलते समय के साथ लोगों को अब परंपरागत प्रकाशन व विपणन की खामियाँ भी समझ आ रही हैं। स्टीव जॉब्स ने एक बार कहा कि लोग अब पढ़ते ही कहाँ हैं। और बात कड़वी पर सच्ची भी है। ब्रिटेन में प्रकाशित तकरीबन 50 फीसदी किताबें कभी पढ़ी ही नहीं जातीं। कमोबेश यही हाल अन्य मुल्कों का भी होगा। ये पुस्तकें वापस लुगदी बना दी जाती हैं, हालांकि बेहद कम पुस्तकें रीसाईकल्ड कागज पर छापी जाती हैं। इन अतिरिक्त पुस्तकों, जो कभी पढ़ीं नहीं जातीं, की छपाई में जितना कार्बन उत्सर्जन होता है वह एक लाख कारों द्वारा होते कार्बन उत्सर्जन के बराबर होता है। अगर हम वृक्षों की परवाह न भी करें तो भी पर्यावरण को होते इतने नुकसान को रोकना गैरवाजिब नहीं है। समय आ गया है कि मार्केटिंग के उग्र तेवर त्याग प्रकाशक केवल उतना ही छापें जितना लोग वाकई खरीदते और पढ़ते हैं।

तो यह अच्छा ही है कि ईबुक्स आहिस्ता आहिस्ता परंपरागत पुस्तकें का स्थान ले रही हैं। डिजिटल पुस्तकें सस्ती हैं, कागज बचाती हैं और महज़ आपके कंप्यूटर या मोबाईल पर ही हज़ारों किताबें समा सकती हैं। मांग पर छपाई समेत यह सारी तकनीक फ़्यूचर रेडी हैं। अमेज़ॉन द्वारा निर्मित किंडल तथा सोनी ईरीडर जैसे ईबुक रीडर यंत्रों के कारण किताबें पढ़ने का तरीका और भी बदल गया है। इनके माध्यम से ईबुक, आनलाईन अखबार और ब्लॉग किताबों की तरह पढ़े जा सकेंगे। ज़ाहिर है लेखक पाठकों के इस एक और वर्ग तक पहुंच सकते हैं।

पारंपरिक छपाई, जहाँ प्रकाशित किताबों को अनुमानित मांग के अनुसार निश्चित संख्या में छाप कर भंडारित कर लिया जाता है, के विपरीत मांग पर छपाई तकनीक में पुस्तक की डिजाइन, लेआउट, सामग्री इत्यादि डिजिटल रूप में तैयार कर कम्प्यूटर में सहेज ली जाती है और जब भी कभी मांग होती है, तो उसे निश्चित संख्या में छाप उनकी आपूर्ति कर दी जाती हैं। इस विधि द्वारा 1 किताब भी छापी जा सकती है और 1 लाख भी। अनोखी बात यह है कि न तो आपको या प्रकाशक को भारी भरकम राशि का निवेश करना होता हैं, ना ही छपी किताबों की इनवेंटरी प्रबंधित करना होता है, और न लॉजिस्टिक्स का खरचा वहन करना होता है। साथ ही अनबिकी किताबों को ठिकाने लगाने की समस्या से भी दो-चार नहीं होना पड़ता। सेल्फ़ पब्लिशिंग के प्रति रुझान के पीछे अंधाधुंध छपाई से होती पर्यावरणीय क्षति और पारंपरिक पुस्तकों मे प्रति घटती व ईबुक्स जैसे विकल्पों की बढ़ती लोकप्रियता भी है (देखें बॉक्सः फ़्यूचर रेडी बन रहा है प्रकाशन)।

लेखक भी आप और प्रकाशक भी आप

यदि आप लेखक हैं, और आप अपनी किताब छपवाना चाहते हैं, तो आपको ऐसे प्रकाशक को खोजना होगा, जो आपकी किताब छापे भी और विक्रय पर रॉयल्टी भी दे। हिन्दी के लेखक आमतौर पर इतने भाग्यशाली नहीं होते। नतीजतन अधिसंख्य हिन्दी लेखक अपनी किताबें स्वयं छपवाते हैं जिनके लिए उन्हें स्वयं खर्च करना होता है और यह राशि न्यूनतम 15 हजार रुपयों से असीमित हो सकती है। यूं प्रकाशित किताबों के विपणन के बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता, क्योंकि अमूमन 500-700 प्रतियों में छपी किताबें साभार भेंट स्वरूप सिर्फ चंद चुनिंदा मित्रों-परिचितों व समीक्षकों के हाथों तक ही पहुँच पाती हैं। पर स्वप्रकाशन तकनीक से यह काम बहुत ही कम लागत में किया जा सकता है। यदि लेखक स्वयं कम्प्यूटर का प्रयोग जानता है, या पाठ डिजिटल सामग्री में उपलब्ध करवाता है तो उसे टाइपिंग-कम्पोजिंग का खर्च भी यहाँ वहन नहीं करना होता है। साथ ही न्यूयार्क हो या बस्तर कहीं से भी कोई इस पुस्तक को मंगवा सकता है, किताबों का आउट आफ स्टॉक हो जाने का कोई भय नहीं। स्वप्रकाशन जालस्थलों के माध्यम से आप बिकी किताबों की संख्या और अपनी रॉयल्टी पर नजर रखी जा सकती है।

पर क्या स्वप्रकाशन अन्ततः शान दिखाने वाली वैनिटी पब्लिशिंग ही नहीं है, छपास पीड़ितों के लिये अपने पैसे से अपने रचना कौशल का दावा करने का प्रयास? लेनार्ड फर्नान्डिस इस बात से सहमत नहीं हैं। “हम अपने ग्राहकों से कभी भी 500 किताबें आर्डर कर उनकी मार्कटिंग करने के लिये नहीं कहते। अलबत्ता हम यह ज़रूर सुझाव देते हैं कि 5 या कम प्रतियाँ छपवाकर समीक्षकों को भेजें और फिर बाजार के निर्णय की प्रतीक्षा करें। हालांकि हम कुछ वितरकों से संपर्क कर रहे हैं पर मुख्यतः हम इंडियाप्लाज़ा और अपने आनलाईन स्टोर से किताबें बेचते हैं।” पर जया झा स्पष्ट कहती हैं कि स्वप्रकाशन आम प्रकाशनों के लिये नहीं है, “यह बाकी बाजारों जैसा ही है, जो मार्केटिंग कर सकें वह बेचने में भी सफल रहते हैं। पर यह समझना ज़रूरी है कि स्वप्रकाशन मास मार्केट के लिये नहीं है, यह niche यानि आला प्रकाशनों के लिये सही माध्यम है।”

बड़े प्रकाशक अब पुरानी किताबों के प्रकाशन के लिये तो नये प्रकाशक पारंपरिक प्रकाशन की ऊंची कीमतों से निजात पाने के लिये प्रिंट आन डिमांड तकनीक की शरण ले रहे हैं।

प्रिंट आन डिमांड के वैनिटी पब्लिशिंग की धारा से निकलकर मुख्यधारा के प्रकाशन में पदार्पण के अन्य सबूत भी मिल रहे हैं। कैंब्रिज युनिवर्सिटी प्रेस ने हाल ही में 10,000 पुस्तकें लाइटनिंग सोर्स द्वारा बेची हैं। बड़े प्रकाशक अब पुरानी, आउट आफ प्रिंट किताबों के प्रकाशन के लिये तो नये प्रकाशक पारंपरिक प्रकाशन, वेयरहाउसिंग और लौटाई गईं किताबों की ऊंची कीमतों से निजात पाने के लिये प्रिंट आन डिमांड तकनीक की शरण ले रहे हैं।

किनके लिये सही है स्वप्रकाशन

अगर स्वप्रकाशन वैनिटी पब्लिशिंग नहीं है तो फिर यह किन लेखकों व प्रकाशकों के लिये उपयुक्त होगा? जया बताती हैं कि स्वप्रकाशन का उपयोग थोक प्रकाशन के पहले बाज़ार का जायज़ा लेने के लिये बखूबी किया जा सकता है। और कई प्रकाशक ऐसा कर भी रहे हैं।

प्रिंट आन डिमांड के अनूठे प्रयोग

पब्लिकडोमेन रीप्रिंट्स के माध्यम से आप ऐसी किताबों को खास अपने लिये छपवा सकते हैं जो कहीं और नहीं मिलतीं। इस जालस्थल पर इंटरनेट आर्काईव और गूगल बुक्स में सार्वजनिक रूप से मुफ्त उपलब्ध 20 लाख से ज्यादा किताबें मुहैया हैं। आर्डर करने पर यह उन्हें सही प्रारुप में बदल कर प्रकाशित कर देता है।

फ़ाबर फाईंड्स पर भी आप आउट आफ प्रिंट पुरानी किताबें मंगा सकते हैं।

Book Mobile

बुकमोबाईल सेवा के अंतर्गत एक वैन में सैटैलाईट संपर्क, लैपटॉप, लेज़र प्रिंटर और बुक बाईंडिंग मशीन के द्वारा इंटरनेट आर्काईव पर मुफ्त उपलब्ध हज़ारों उपलब्ध प्रकाशनों को सिर्फ एक डॉलर प्रति पुस्तक की दर से उपलब्ध कराया जाता है। यह गाड़ी अमरीका के स्कूलों में घुमती रहती है और इसे हाल ही में युगांडा भी भेजा गया। इस प्रकल्प को भारत में भी आजमाया गया है। भारत सरकार द्वारा प्रायोजित व सीडैक द्वारा क्रियांवित यह परियोजना अंग्रेजी व हिन्दी की किताबों को इंटरनेट से पुस्तक आकार में उपलब्ध कराती है। सितंबर 2003 की इस खबर के अनुसार इस परियोजना को वृहद होना था पर इसकी वर्तमान स्थिति के बारे में सामयिकी अनभिज्ञ है। परियोजना का जालस्थल भी बंद पड़ा है।

“मूलतः यह उन लोगों के लिये है जो प्रकाशन के बारे में कुछ भी नहीं जानते। पर हमारी साईट पर इस बाबत काफी सामग्री है जो उन्हें जानकारी देती है। जो पहले इस सेवा का उपयोग कर चुके हैं और जो उसके लाभ समझते हैं वो हमारे नियमित ग्राहक होते हैं। इसके अलावा उपहार के तौर पर या अपने माता पिता, किसी संबंधी या मित्र की याद में स्मरणीय प्रकाशन के रूप में इसका उपयोग करते हैं। रचना संकलन की पुस्तकें भी काफी लोकप्रिय हैं”, जया ने बताया।

स्वप्रकाशन के अनेक और अनूठे प्रयोग भी संभव हैं (देखें बॉक्स: प्रिंट आन डिमांड के अनूठे प्रयोग)। लेनार्ड बताते हैं कि पुणे के एक कॉलेज ने कम छात्र संख्या और बदलते पाठ्यक्रम से निबटने के लिये पाठ्यपुस्तकें स्वप्रकाशन द्वारा छपवाईं। इसी तरह बंगलौर के एक सज्जन ने अपने दादा की कविताओं का संकलन प्रकाशित कर अपने परिवार में ही वितरण किया। जब पाठकवर्ग सीमित हो तो स्वप्रकाशन उपयुक्त माध्यम होता है।

स्वप्रकाशन और विपणन

जब प्रकाशक भी आप हों तो स्पष्टतः अपने प्रकाशन की मार्केटिंग की ज़िम्मेवारी भी आप के ही कंधों पर रहती है। लेनार्ड बताते हैं, “किताब का विपणन पाठकवर्ग के मुताबिक ही किया जा सकता है। जैसे कि हमने एक शिक्षण संस्थान के पूर्व छात्रों की स्मारिका का प्रकाशन किया। ज़ाहिर तौर पर यह समारिका उन पूर्व छात्रों के अलावा किसी और को बेच पाना असंभव होगा।” जया का मानना है कि प्रिंट आन डिमांड पुस्तकों को बेचने का स्वाभाविक स्थान आनलाइन है। “पुस्तक का विपणन उसके लेखक की आनलाईन उपस्थिति का ही विस्तार होता है। वह अपने ब्लॉग, सोशियल नेटवर्क जैसे माध्यमों का प्रयोग कर पुस्तक के बारे में उत्सुकता बढ़ा सकता है। विपणन का एक मूल सिद्घांत हैः सही पाठक या श्रोता वर्ग तक पहुंचना। यह न हो कि लो एक और किताब बाजार में आ गई। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह स्पष्ट किया जाय कि इस नई किताब में ऐसा क्या है जो पूर्व प्रकाशनों में नहीं था।”

हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा – मांग पर छपाई की सुविधा के संबंध में यह कहावत सटीक बैठती है। यह तकनीक आकर्षित करती है, और अंग्रेजी भाषी लेखकों में यह खासी लोकप्रिय भी होने लगी है। और लगता है कि इस विचार को हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों के बीच प्रचलन में आने में अधिक समय नहीं लगेगा। तो फिर देर किस बात की? छाप डालिए अब तक की अपनी सारी की सारी अप्रकाशित पुस्तकें, या फिर लिख डालिए दर्जनों किताबें सांय सांय जिन्हें आप प्रकाशक के इंतजार में अपने मन में तैयार किए बैठे हैं।

अतिरिक्त सामग्री व साक्षात्कार: देबाशीष चक्रवर्ती। रवि रतलामी की कुछ पुस्तकें पोथी डॉट कॉम पर क्रय हेतु उपलब्ध हैं। विवरण हेतु यहाँ देखें। सामयिकी का जनवरी 2009 का प्रिंट अंक भी पोथी डॉट कॉम पर उपलब्ध है।

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3 प्रतिक्रियाएं
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  1. यह सब फ़िर से पढ़ा! अच्छा लगा। बहुत अच्छी तरह लिखा है। बधाई!

  2. […] PODvantage by Debashish Chakrabarty on May 25, 2009 • 11:56 am No Comments Thanks to the Print on demand technology, self-publishing is changing the way books have been published traditionally This article was published in the June 2009 issue of the Data quest magazine . A Hindi version of the article can be read at the webzine Samayiki. […]

  3. एक बेहतर शुरुआत है यहाँ. लेख की प्रस्तुति अच्छी है.

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