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	<title>सामयिकी - हिन्दी वेबपत्रिका &#124; Samayiki - Hindi Webzine &#187; समाज</title>
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	<description>बदलती दुनिया की साक्षी</description>
	<lastBuildDate>Thu, 21 Jul 2011 13:38:42 +0000</lastBuildDate>
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		<title>दो नाईजीरिया</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2010/11/two-nigerias/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 10 Nov 2010 11:07:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[Nigeria]]></category>

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		<description><![CDATA[ईमेल स्कैम द्वारा दुनिया भर को उल्लू बनाने वाले देश में संक्षिप्त प्रवास के बाद डॉ सुनील दीपक को वहाँ के लोग तो शालीन लगे, लेकिन जेहन में भ्रष्टाचार और तानाशाही झेलते देश की खराब तस्वीर और भी पुख्ता हो गयी। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/11/nigeria_abuja_1.jpg" alt="" width="615" height="377" /></p>
<div class="dropCap">जे</div>
<p>नेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन में काम करने वाले एक मित्र ने नाईजीरिया में होने वाले एक सम्मेलन में आने का न्योता दिया तो मैंने तुरंत बहाना बना दिया कि उस दौरान मुझे एक अन्य काम है, अतः नहीं आ सकूँगा। असल में मुझे नाईजीरिया जाने से डर लग रहा था।</p>
<p>मेरे मन में नाईजीरिया की दो छवियाँ थीं, आज से नहीं बहुत सालों से। पहली छवि थी नाईजीरिया के विश्व में भ्रष्टाचार की राजधानी होने की। उसका कठोर और संगीन तानाशाही शासन शेल जैसी पेट्रोल बेचने वाली बहुदेशीय कम्पनियों के साथ मिल कर देश के गरीब वर्ग पर ज़ुल्म ढा रहा था, विभिन्न जन जातियों के मानव अधिकारों का दमन कर रहा था। जब 1996 में वहाँ की सरकार ने लेखक और विचारक श्री केन सारा वीवो को फ़ाँसी की सजा दे दी तो मेरे मन में उस तानाशाह शासन के प्रति बनी राय में और भी कड़वाहट फैल गयी।</p>
<p>पिछले दो दशकों में नाईजीरिया के उत्तरी भाग में रूढ़िवादी इस्लाम की जकड़ भी गहरी हो गयी है। शरीयत का कानून और &#8220;गैर पुरुष से सम्बंध&#8221; जैसे आरोप लगा कर औरतों को पत्थरों से मारने की कुछ घटनाओं के समाचारों से भी लगता था कि नाईजीरिया तो पिछड़ा हुआ रूढ़ीवादी देश बन गया है। तिस पर पिछले कुछ सालों से पहली से ही बिगड़ी इस छवि में एक नयी बात जुड़ी कि नाईजीरिया तो ईमेल के द्वारा दुनिया भर के लोगों को उल्लू बनाने का देश है। वहाँ के हेक्कर दुनिया भर के लोगों की ईमेल के पासवर्ड चुरा कर, उनके सब मित्रों और घर वालों को पैसा भेजने के संदेश भेज कर, यह पैसा हथिया लेते हैं और उनके विरुद्ध कोई कुछ नहीं कर पाता क्योंकि उन्हें अपनी सरकार का संरक्षण प्राप्त है।</p>
<p>केन सारो वीवा और छिम्मामँदा जैसे नाईजीरियाई लेखक मुझे बहुत अच्छे लगते थे। मुझे वहाँ के कलाकारों, संगीतकारों के बारे में कुछ जानकारी थी। नाईजीरिया की कई हज़ार वर्षों प्राचीन योरूबा संस्कृति का असर तो मैंने स्वयं ब्राज़ील, क्यूबा और कुछ अन्य दक्षिणी और मध्य अमरीकी देशों में देखा था, जहाँ नाईजीरिया से आने वाले गुलाम अपने साथ इस संस्कृति को भी ले कर आये थे। इसलिए नाईजीरिया की दूसरी छवि भी थी मन में, प्राचीन संस्कृति और सभ्यता वाले देश की।</p>
<p>खैर, मेरे मित्र ने मेरी एक न सुनी और अंततः में मुझे नाईजीरिया जाने के लिए हाँ कहना ही पड़ा।</p>
<p>***</p>
<p>हवाई जहाज जब अबूजा के हवाई अड्डे पर उतरने लगा तो आसपास की हरियाली और पहाड़ देख कर बहुत अच्छा लगा। कहते हैं कि नाईजीरिया अफ्रीका के सबसे ताकतवर और समृद्ध देशों में से है हालांकि उनका हवाई अड्डा इस दृष्टि से कुछ छोटा सा लगा, पर फ़िर भी सब कुछ नया और साफ़ सुथरा था।</p>
<p>पासपोर्ट की जाँच का समय आया तो वहाँ बैठी युवती ने बहुत प्रश्न पूछे कि क्यों आये हैं, किस सभा के सिलसिले में, सभा कहाँ होगी, क्या विषय है, इत्यादि। मुझे लगा कि पाँच दिन के लिए तो आया हूँ, वापस जाने का टिकट भी है, इतनी कठिनाई से इनके दूतावास ने वीज़ा दिया था, फ़िर भी इतने प्रश्न, क्यों? शायद इन्हें चिंता है कि यूरोप से लोग यहाँ आ कर बसना न शुरु कर दें।</p>
<p>रोम में नाईजीरिया के दूतावास से वीज़ा लेना सचमुच कठिन था। पहले तो इंटरनेट के माध्यम से एक फ़ार्म भरा। फ़िर एक दूसरा फ़ार्म भर कर तमाम कागजात, जैसे कि नाईजीरिया के सभा आयोजक और विश्व स्वास्थ्य संगठन के निमंत्रण पत्र, अपने दफ्तर के प्रमाणपत्र आदि, जोड़ कर सब कुछ एक माह पहले दूतावास भेजना पड़ा था। इतना झंझट तो अमरीका जाने के लिए भी नहीं करना पड़ता। दूतावास वालों ने कहा था कि अगर आवश्यकता होगी तो वे मुझे रोम में साक्षात्कार के लिए भी बुला सकते हैं, लेकिन बाद में बिना साक्षात्कार के ही वीसा जारी कर दिया गया।</p>
<p>बहरहाल, पासपोर्ट की जाँच से निकला तो कस्टम वालों ने पकड़ लिया। सामान तो मेरा थोड़ा सा ही था, पर उन्होंने भी खूब प्रश्न पूछे कि यहाँ किस लिए आये हो, किस तरह की सभा है, कितने दिन और कहाँ रुकोगे, आदि। नाईजीरिया पहुँच कर इन शुरुवाती अनुभवों से मन में तानाशाह, भ्रष्ट पुलिस के हाथों में दबे इस देश की बनी छवि और भी दृढ़ हो गयी।</p>
<p>पर असली आश्चर्य तो हवाई अड्डे से निकलने के बाद हुआ। हाथ में नाम की तख्ती लिये आगंतुकों की प्रतीक्षा करते मित्र, परिवार वाले या सहकर्मी तो बहुत थे, लेकिन उनमें से किसी भी तख्ती पर मेरा नाम नहीं था। जिसे मुझे रिसीव करना था, वह नदारद था। कोई बात नहीं, मैंने सोचा, टेक्सी ले लूँगा। लेकिन जैसे आम हवाई अड्डों पर टेक्सी वाले आने वाले यात्रियों के आगे पीछे भागते हैं, वैसा यहाँ कुछ नहीं था। मैंने पूछा तो किसी ने बताया की टेक्सी स्टैंड तो दूसरी ओर था। वहाँ पहुँचा तो वहाँ पर कोई टेक्सी यात्रियों की प्रतीक्षा नहीं कर रही थी। कुछ देर खड़ा रहा, तब जाकर एक टेक्सी वाला आया। संभवतः अबूजा में पर्यटक या बिना जानपहचान वाले लोग बहुत कम आते हैं, इसलिए टेक्सी वाले हवाई अड्डे पर यात्रियों का इंतज़ार करने में अपना समय बरबाद नहीं करते!</p>
<p>टेक्सी चालक बड़ा ही शालीन और सभ्य था। अबूजा का हवाई अड्डा शहर के करीब चालीस किलोमीटर बाहर है। मुझसे लोगों ने कहा था कि शहर जाने का किराया करीब चार हज़ार नेइरा यानि 25 डालर के करीब पड़ेगा। होटल पहुँचने पर उसने पाँच हज़ार नेइरा माँगे, लेकिन मैंने कहा कि नहीं चार हज़ार होना चाहिये तो वह तुरंत बिना बहस किये मान गया। उसके बाद जितने दिन अबूजा में रहा, टेक्सी वालों से कभी चिकचिक नहीं करनी पड़ी, बल्कि हर बार शालीनता से बात करने वाले लोग ही मिले। सड़क पर ही कभी किसी से कुछ पूछा तो लोगों ने बड़ी सभ्यता के साथ समझाया और बताया।</p>
<p>***</p>
<p>अबूजा की पुलिस से मेरा सामना तीसरे दिन हुआ। चुंकि सुबह मीटिंग प्रारम्भ होने में विलम्ब था तो सोचा कि क्यों न करीब के कैथेड्रल और अबूजा की सुनहरे गुम्बज वाली सबसे प्रमुख मस्जिद को देख आया जाये। पहले दो दिनों में शहर में इधर उधर टेक्सी से यात्रा करते हुए कुछ तस्वीरें खीची थीं, लेकिन मन था कि सैर करते हुए कैथेड्रल और मस्जिद के आसपास की खूब सारी तस्वीरें ली जायें। अबूजा शहर नया ही बना है, करीब बीस साल पहले। इससे पहले नाईजीरिया की राजधानी लागोस थी। नया शहर होने के नाते वहाँ बहुत से फ्लाई ओवर, खुली चौड़ी सड़कें, नये मकान आदि बने हैं। ये देखने में सुंदर तो हैं पर इनमें देश की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता का कोई अक्स नहीं दिखता। तस्वीरें खींचने के लिए शहर में कैथेड्रल, मस्जिद या स्टेडियम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।</p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/11/nigeria_abuja_2.jpg" alt="" width="615" height="409" /></p>
<p>कैमरा ले कर निकला तो कुछ इक्का दुक्का तस्वीरें खींचता कैथेड्रल तक जा पहुँचा। कहाँ से तस्वीर खींची जाये यह सोच ही रहा कि गुस्से में बड़बड़ाता हुआ एक आदमी मेरे पास आया। &#8220;आप के पास तस्वीरें खीचने की अनुमति है क्या? कैसे तस्वीर खींच रहे हैं आप? शर्म नहीं आती आप को? अगर हम लोग आप के देश में जा कर ऐसे तस्वीरें खीचने लगे तो आप को कैसा लगेगा?&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">विश्वास ही नहीं हुआ कि तस्वीर खींचना भी गैर कानूनी हो सकता है। किसी हवाई अड्डे या मिलेट्री की जगह की तस्वीर खींच रहा होता तो कुछ शंका मन में होती पर शहर के कैथेड्रल की तस्वीर नहीं खींच सकते?</div>
<p>पहले तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि तस्वीर खींचना भी गैर कानूनी हो सकता है। किसी हवाई अड्डे या मिलेट्री की जगह की तस्वीर खींच रहा होता तो कुछ शंका मन में होती पर शहर के कैथेड्रल की तस्वीर नहीं खींच सकते, इसका मुझे विश्वास नहीं हुआ। मैंने हँस कर कहा कि भाई पर्यटक हूँ, तुम्हारे शहर की संदर जगहों की तस्वीरें खींच रहा हूँ, इसमें क्या गलती है? मेरे उत्तर पर वह भड़क कर आग बबूला हो गया। &#8220;अभी पुलिस को बुलाता हूँ, कुछ दिन लाकअप में बिताओगे तो अक्ल ठिकाने आ जायेगी&#8221;, उसने मुझे धमकाया। कुछ लोग जो आसपास खड़े थे, सब खिसक लिये, बस मैं अकेला ही उसके साथ खड़ा रह गया। पहले तो कुछ देर तो वह बहुत बोलता रहा, मुझे डाँटता रहा, शायद इंतज़ार कर रहा था कि मैं क्षमा माँगने के लिए या पुलिस लाकअप से बचने के लिए कुछ घूस दूँगा, लेकिन उसने पैसे लेने देने की कोई बात स्पष्ट नहीं कही। मुझे भी चिंता होने लगी कि सचमुच जेल में न जाना पड़े।</p>
<p>&#8220;भाई मुझे क्या मालूम था कि यहाँ इस तरह का कानून है&#8221;, मैंने विनम्र हो कर कहा।</p>
<p>&#8220;देश के कानून न जानने से अपराध कम नहीं होता&#8221;, वह बोला।</p>
<p>तब मैंने जान पहचान वाला पत्ता चलाया, इशारा कर के कहा कि &#8220;वह जो अंतर्राष्ट्रीय कोनफ्रैंस सेंटर है, वहाँ तुम्हारी सरकार के निमंत्रण पर आया हूँ, थोड़ी देर में ही मुझे तुम्हारे राष्ट्रपति की पत्नी के सामने भाषण देना है। अगर इस तरह से जेल में बंद कर दोगे तो वहाँ मेरे भाषण का क्या होगा?&#8221; वह कुछ देर तक मुझे घूरता रहा, फ़िर बोला, &#8220;कितनी तस्वीरें खींची हैं? फ़िल्म निकाल कर उन्हें कैंसल कर दो?&#8221;</p>
<p>&#8220;यह फ़िल्म वाला कैमरा नहीं, डिजिटल कैमरा है और तस्वीर भी एक ही खींची है, कहो तो उसे हटा दूँगा&#8221;, मैंने नम्रता से कहा। &#8220;ठीक है, इस बार तो जाने देता हूँ, तुरंत वापस अपनी मीटिंग में चले जाओ, दोबारा इस तरफ़ नहीं आना&#8221;, उसने मुझे धमका कर कहा। मेरी जान में जान आयी, चुपचाप बिना कोई अन्य तस्वीर खींचे मैं वापस सम्मेलन में लौट आया और दोबारा उस शहर में कैमरा ले कर नहीं निकला।</p>
<p>सम्मेलन में राष्ट्रपति की पत्नी के आने की तैयारी चल रही थी, हर तरफ़ पुलिस थी। सोचा कि बजाय कोई अन्य परेशानी मोल लेने से पहले से पूछ लेना ठीक रहेगा कि राष्ट्रपति की पत्नी की तस्वीर खींच सकते हैं या नहीं। मेरे प्रश्न पर सुरक्षा पुलिसवाला हँस कर बोला, &#8220;क्यों नहीं सर, आप जितनी चाहें तस्वीरें खींच सकते हैं। क्या आप ने हमारा सुंदर शहर देखा? सारा दिन यहाँ होटल में बन्द न रहिये, बाहर जा कर हमारे हसीं शहर को भी देखिये।&#8221; मन में तो आया पूछूँ कि क्या उनके सुंदर शहर में तस्वीरें भी खींच सकते हैं, पर कुछ बोलना मुनासिब न लगा, बस मुस्कुरा कर हामी भर दी।</p>
<p>***</p>
<p>मीटिंग में स्त्री सशक्तिकरण मंत्रालय से मंत्री सुश्री इयोम जोसेफीन भी पधारी थीं। उनका सुंदर सौम्य व्यक्तित्व, और दूसरों की बात को ध्यान से सुन कर सोच समझ कर नपा तुला बोलने का अन्दाज़ बहुत अच्छा लगा।</p>
<p>उनके अतिरिक्त अन्य अनेक संसद सदस्यों और सेना के अधिकारियों की बीवीयाँ, आदि भी मौजूद थीं लेकिन घंटों इंतज़ार के बाद भी राष्ट्रपति की पत्नी नहीं आयीं। अंत में उस सभा का उदघाटन संसद के अध्यक्ष की पत्नि के किया, जिन्होंने अपने भाषण में कहा कि राष्ट्रपति की पत्नि श्रीमति पेशेंस गुडलक जोनाथन सुबह से हमारी सभा में आने के लिए तैयार बैठी थीं लेकिन उन्हें काउंसिल की तरफ़ से बाहर निकलने की अनुमति नहीं मिली। सुन कर बड़ा अचरज हुआ कि राष्ट्रपति की पत्नि को घर से बाहर किसी सभा में जाने के लिए किसी काउंसिल की अनुमति की दरकार होती है। पता नहीं कि अनुमति उन्हें काउंसिल से नहीं मिली थी या अपने पति से!</p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/11/nigeria_abuja_3.jpg" alt="" width="615" height="358" /></p>
<p>सब औरतों को उनकी रंग बिरंगी पोशाकों में देख कर लगा रहा था मानो किसी स्त्री क्लब की किटी पार्टी में आ गये हों। लेकिन सम्मेलन में नाईजीरिया के विभिन्न भागों से आये डाक्टरों, विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों आदि से भी मिलने का मौका मिला। अफ्रीका के विकास के बारे में अपनी दृष्टि बना रहे ये लोग, जिनके अपने मौलिक विचार हैं, शोध है, बहुत दिलचस्प लगे।</p>
<p>जिस शाम वापस जाना था, उसी शाम को मंत्री के साथ विशेष भोज का आयोजन किया गया था। उन्हें जब मालूम चला कि हमें हवाई अड्डा जाना है तो उन्होंने ज़ोर दिया कि हम उनकी मंत्री वाली गाड़ी में ही जायें। आगे पीछे सायरन बजाती, चमचमाती बत्तियों वाली गाड़ी से निकले तो बहुत अज़ीब लगा। मेरे लिए इस तरह की गाड़ी में बैठने का यह पहला अनुभव था, मन में लगा कि खामख्वाह तमाशा किया जा रहा है। पर शहर से बाहर निकलते ही खुली चौड़ी सड़क पर जब कारों का जमावड़ा देखा तो मंत्री की गाड़ी में बैठे होने का फायदा समझ में आया। सड़क के दोनों ओर अनगिनत पटरीवाली दुकानें, खोमचे वाले, आदि अटे पड़े थे, और कारें इसी चक्कर में ट्रैफिक रोके खड़ी थीं। खैर सायरनों के बजने से हमें निकलने का रास्ता मिल ही गया। हवाई अड्डे पहुंचते पहुंचते रास्ते में इस तरह की बहुत रुकावटें आयीं, पर आखिरकार ठीक समय पर वहाँ पहुँच ही गये। अगर मंत्री जी की गाड़ी नहीं होती तो वहाँ समय पर पहुँचना नामुमकिन था।</p>
<p>यह एक छोटा सा अनुभव था नाईजीरिया के एक शहर का। शायद राजधानी से बाहर का जीवन, गाँवों में रहने वाले आम नाईजीरियन का जीवन, अधिक अच्छा होता हो। इस छोटी सी यात्रा में वहाँ के शालीन, सभ्य लोग अच्छे लगे, लेकिन भ्रष्टाचार और तानाशाही झेलते देश की तस्वीर जेहन में थी, वह और भी पुख्ता हो गयी। सच कहूं तो कभी नाईजीरिया लौट कर जाने का मौका मिले भी तो भी नहीं जाना चाहूँगा। मेरे विचार में उनके साहित्य और कला को दूर से जानना और सराहना ही बेहतर होगा।
<p class="note">सभी चित्रः डॉ सुनील दीपक</p>
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		<title>ग्रामीण भारत की बदलती नारी</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/12/sarpanch-sahib-review/</link>
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		<pubDate>Mon, 28 Dec 2009 16:00:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[Panchayat]]></category>

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		<description><![CDATA[बीते 20 सालों में कुछ ग्रामीण औरतों ने घर के दायरे से बाहर निकल, पंचायती राजनीति में कदम रख ग्रामीण भारत को बदलने की कोशिश की है। उन्हीं की कथायें है "सरपंच साहिब" में। पढ़िये <b>डॉ सुनील दीपक</b> की समीक्षा।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>&#8220;दीपांजलि बात करती है कि धीरे धीरे पंचायत और पंचायत समिति के पुरुष सदस्य उससे कटते जा रहे हैं, विषेशकर धनुर्जय पटेल जो कि सरकारी नौकरी में हैं, जिसकी वजह से उनके पास बहुत ताकत है। जब किसी बात पर उनके विचार नहीं मिलते तो धनुर्जय पटेल उसका कड़ा विरोध करते हैं। पटेल के अपने विचार हैं, वह कहते हैं &#8211; पुरुष सरपंच बेहतर होते हैं क्योंकि उन्हें मालूम होता कि किस तरह से काम किया जाये। महिला सरपंचों को कुछ अधिक नहीं आता। हमें उन्हें सिखाना पड़ता है। कभी कभी वह चालाकी दिखाती हैं और कैसे काम किया जाये इस बात के निर्देश ही भूल जाती हैं।</p>
<p>&#8230;वह लोग अफवाह फ़ैला रहे हें कि दीपांजलि का नये बीडीओ के साथ चक्कर है, क्योंकि वह उसकी बात सुनता है, औरों की नहीं। उसके पति को मालूम है कि लोग बातें कर रहे हैं। वह कहते हैं कि उसका चक्कर है&#8230;! इस नये शोषण का अर्थ दीपांजलि अच्छी तरह समझती है। उसके घावों में घुसा कर चाकू घुमाने वाली बात है। वह सरपंच है पर साथ ही पत्नी, माँ, स्त्री भी तो है &#8211; शरीर, सेक्स और लिंग।&#8221;</p></blockquote>
<div id="pullQuoteR">गरीब, जन जातिय, दलित परिवारों से आयी बहुत सी महिलाएँ अनगिनत कठिनाईयों के बीच भी सदियों से परम्पराओं की रूढ़ियों में जकड़े ग्रामीण भारत को धीरे धीरे बदल रहीं हैं।</div>
<div class="dropCap">भा</div>
<p>रतीय समाज में नारी के स्थान की बात हो तो अक्सर गार्गी, दुर्गा, शक्ति से ले कर विज्ञान, तकनीकी, शौध, गणिकी जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली युवतियों से हो कर, इंदिरा गाँधी, मायावती जैसी नेताओं के उदाहरण दे कर हम अपना गर्व व्यक्त करते हैं कि भारत ने इस दिशा में कितनी तरक्की की है, कैसे हर क्षेत्र में नारियाँ पुरुषों से कदम से कदम मिला कर बढ़ रही हैं। इस बदलते भारत में जहाँ एक ओर नारी विकास और प्रगति की बात होती है, वहीं दूसरी ओर दहेज के लिए पीड़ित होने वाली या जला दी जाने वाली औरतों की बात भी होती है। <em>अल्ट्रासाउंड </em>जैसी आधुनिक तकनीकों की मदद से होने वाली भ्रूण हत्याओं की बात भी होती है। लेकिन यह सब बातें अधिकांश छोटे बड़े शहरों में रहने वाली औरतों की होती है। भारत के गाँव कितना बदल रहे हैं और गांवों में रहने वाली औरतों की स्थिति क्या है, इस पर बात या तो कम होती है या फिर बिल्कुल नहीं होती।</p>
<p>गाँवों में रहने वाली इन्हीं औरतों की बात करती है 2009 में हार्पर कॉलिंस द्वारा प्रकाशित व मंजिमा भट्टाचार्य द्वारा संपादित पुस्तक &#8220;सरपंच साहिब ‍ चेंजिंग द फेस आफ इंडिया&#8221;। पिछले दो दशकों में कुछ औरतों ने घर के दायरे से बाहर निकल कर पंचायती राजनीति में कदम रखा है और चुनावों में सफलता भी पायी है, और सरपंच बन कर ग्रामीण भारत को बदलने की कोशिश कर रही हैं। उन्हीं औरतों की कुछ जीवन कथाएँ हैं इस किताब में।</p>
<p><img class="size-full wp-image-175 alignleft" style="margin: 8px;" title="sarpanch_sahib" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/12/sarpanch_sahib.jpg" alt="sarpanch_sahib" width="350" height="317" />1993 में भारतीय संसद ने राष्ट्रीय संविधान में 73वाँ सँशोधन किया जिसमें पंचायती राज के लिए चुनावों की बात थी और इन चुनावों में एक तिहाई सीटें स्त्रियों के लिए आरक्षित की गयी थीं। इस बदलाव को &#8220;मौन क्रांति&#8221;, &#8220;हमारे समय का सबसे बड़ा सामाजिक प्रयोग&#8221; और &#8220;जनता के स्तर पर होने वाले जनतंत्र का दुनिया का सबसे बेहतरीन नवप्रयोग&#8221; आदि कहा गया है। इस कानून की वजह से 30 लाख महिलाएँ राजनीति में आयी हैं जिसमें से करीब दस लाख से अधिक महिलाएँ चुनाव में जीत कर पंचायती राज का हिस्सा बनी हैं। दूसरी ओर, इस प्रयोग को &#8220;दिखावा&#8221; भी कहा गया है और आरोप लगाया गया है कि असली ताकत तो पतियों, पिताओं व ससुरों के हाथों में है जिनके हाथों में यह चुनी हुई महिलाएँ केवल कठपुतलियाँ भर होती हैं।</p>
<p>सन 2006-07 की पंचायती राज की स्थिति की रिपोर्ट में पाया गया था कि विभिन्न राज्यों में पंचायत सदस्यों में महिलाओं की संख्या आरक्षित सीटों को पार कर चुकी है, पंचायतो़ में 37 से 54 प्रतिशत सदस्य महिलाएँ हैं। 2008 में लिखी एक अन्य जाँच में पाया गया कि इनमें से अधिकतर महिलाएँ निर्णय लेने के लिए अपने पति या अन्य पुरुषों पर निर्भर नहीं हैं, अपने निर्णय स्वयं लेती हैं। लेकिन इन रिपोर्टों के बारे में जनसामान्य में कुछ न कुछ शंका ही रहती है, न जाने सरकारी जाँच कितना सच बताती हैं और कितना झूठ।</p>
<p>मंजिमा की किताब में ऐसी ही कुछ महिला सरपंचों की कहानियाँ है जिन्हें लिखा है जानी मानी लेखक, पत्रकार या अन्य क्षेत्रों से प्रमुख महिलाओं ने, जिनमें शामिल हैं इंदिरा माया गणेश, तिशानी दोषी, मंजु कपूर, अभिलाषा ओझा, <a href="http://soniafaleiro.blogspot.com/" target="_blank">सोनिया फलेरो</a> और कल्पना शर्मा। यह जीवन कथाएँ उड़ीसा, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, असम, बिहार, कर्नाटक आदि विभिन्न राज्यों में संविधान के 73वें संशोधन के असर की जटिलता को समझने में सहायता करती हैं। साथ ही यह कहानियाँ यह भी बताती हैं कि ग्रामीण सामाजिक बदलाव इतना आसान नहीं है, लेकिन हो सकता है।</p>
<p>तमिलनाडू की चिन्नप्पा की जीवन कथा को तिशानी दोषी ने लिखा है। इस कहानी से महिला सरपंचों की कुछ कठिनाईयों को समझ सकते हैं:</p>
<blockquote><p>&#8220;नम्बर चिन्नप्पा की कमजोरी हैं। अनपढ़ होने की वजह से उसके मन में गणित विषय के लिए भय है। जब ललिता ने उससे पूछा कि पंचायत के बजट में कितने पैसे हैं तो वह बता नहीं पायी, बोली, &#8216;रजिस्टर में लिखा होगा&#8217;। नरसिंहा, पंचायत का कलर्क बताने लगा कि छः लाख रुपये थे बजट में, कितना खर्च हुआ और किस चीज़ पर, और किस बात पर कितना खर्च होगा।</p>
<p>ललिता ने डाँटा कि &#8216;तुम्हें यह सब बातें पता होनी चाहिये। और तुम शीला, तुम्हारा अधिकार है कि तुम इन सब बातों के बारे में पूछो और जानो। तुम जब चाहो इन रजिस्टरों को जाँच सकती हो, क्या तुम्हें समझ नहीं आता?&#8217;</p>
<p>जब वापस चिन्नप्पा के घर की ओर जा रहे थे तो विदा लेने से पहले ललिता हताश हो कर बोली, &#8216;यह बहुत निराशा की बात है। इनको यह जानकारी ही नहीं है। यह कैसे हो सकता है कि यह सरपंच हो कर भी पैसे के बारे में न जाने? यही परेशानी है कि आखिरकार, बड़े फैसले यह अभी भी पुरुषों के हाथ छोड़ देती हैं।&#8217;&#8221;</p></blockquote>
<p>सरपंच होने की क्या ज़म्मेदारी होती है, कैसे काम करना चाहिये, क्या इसकी जानकारी देना आवश्यक नहीं था, इन नये सरपंचों को? कल्पना शर्मा द्वारा लिखी बिहार की वीणा देवी की जीवन कथा में इस प्रश्न का उत्तर मिलता हैः</p>
<blockquote><p>&#8220;क्या राज्य सरकार ने कोई ट्रेनिंग का आयोजन नहीं किया उन महिलाओं के लिए जो ग्राम स्वराज्य की राजनीति में पहली बार चुनी गयी थीं? किया क्यों नहीं, लेकिन दस मिनट की ट्रेनिंग में क्या समझते? उन्हें एक दिन के लिए पटना बुलाया गया था, बस का किराया दिया गया और रजिस्टर में दस्तख्त कराये गये कि वे लोग ट्रेनिंग के लिए आयी थीं। लेकिन हकीकत में उन्हें कुछ सिखाया बताया नहीं गया।&#8221;</p></blockquote>
<p>वीणा को मुखिया के काम बारे में जानकारी मिली एक संवयंसेवी संस्था की सहायता से। उनका साथ दिया पुलिस सुप्रिंटेंडेंट और स्थानीय जिला मजिस्ट्रेट श्रीमति विजय लक्ष्मी नेः</p>
<blockquote><p>&#8220;वह कहती थीं कि जब सब पुरुष बोल  रहे हैं तो किसी महिला को भी बोलना चाहिये। मैं मना कर देती थी, लेकिन वह ज़ोर देती थीं कि मैं कुछ बोलूँ। उन्होंने मुझे सिखाया कि धन दौलत तो कभी तुम्हारे साथ होती है कभी नहीं होती, लेकिन विचारधारा असली चीज़ है। मेरे पास पैसा नहीं है, एक भिखारन, विधवा औरत हूँ लेकिन मैं दो बार चुनाव जीती हूँ, और जिसने एक लाख का खर्चा किया वह नहीं जीत पाया। मैं बस घर घर हाथ जोड़े हुए गयी। तो कौन बड़ा है, पैसा या विचारधारा?&#8221;</p></blockquote>
<p>यह कहानियाँ बताती हैं कि गरीब, जन जातिय, दलित परिवारों से आयी बहुत सी महिलाएँ अनगिनत कठिनाईयों के बीच भी सदियों से परम्पराओं की रूढ़ियों में जकड़े ग्रामीण भारत को धीरे धीरे बदल रहीं हैं। कभी उनकी चेष्ठाएँ सफ़ल होती हैं, कभी असफ़ल। केवल प्रशिक्षण और जानकारी से भ्रष्टाचार और पैशेवर राजनीतिज्ञों के फन्दों को नहीं तोड़ा जा सकता। कई औरतों नें बदलते समाज की हिंसा की कीमत अपनी जान से चुकाई है। लेकिन एक बार यह बदलाव शुरु हुआ है जो किसी नदी की तरह अपना रास्ता निकाल ही लेगा, यही आशा की जा सकती है:</p>
<blockquote><p>&#8220;सिकंदरा के लोगों के पास अपने मुखिया के लिए केवल प्रशंसा के शब्द ही हैं। गाँव के चौक में खड़े हुए तो लोगों नें पक्की सड़क और नालियों की ओर इशारा किया। अब उनके घर पानी से नहीं भरते। मुखिया ने तालाब बनवाया है और नदी से पानी लाने के लिए छोटी सी नहर भी जिससे गाँव में पानी आता है। पहले पानी के लिए दूर जाना पड़ता था। और बिना बिजली के गाँव में अब सूर्य की प्रकाश शक्ति से जलने वाली चार बत्तियाँ लगायी हैं जिससे अँधेरे के बाद सड़कों पर औरतों के लिए चलना आसान हो गया है। दलित बस्ती में भी इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत नये घर बन रहे हैं। गाँव में किसी से कोई शिकायत नहीं सुनने को मिली।&#8221;</p></blockquote>
<p>मैं इस किताब को हर उस भारतीय से पढ़ने को कहुंगा जो यह समझते हैं कि वे भारत को जानते हैं और नये प्रगतिशील भारत का निर्माण कर रहे हैं। उनके मन में उन कंचमाओं और चिन्नप्पाओं के प्रति सम्मान जागेगा जो सुदूर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में, कई बार ऐसे खतरे उठाकर भी जिनसे शायद हम डर जायें, छोटे छोटे बदलाव ला रही हैं।</p>
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		<title>गैस आंदोलन ने दी अपारंपरिक शिक्षा</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/12/bhopal-movement-as-a-school/</link>
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		<pubDate>Wed, 02 Dec 2009 03:30:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>यूरिग स्कैनद्रेत</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[Bhopal]]></category>
		<category><![CDATA[Gas Tragedy]]></category>
		<category><![CDATA[Union Carbide]]></category>

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		<description><![CDATA[भोपाल गैस त्रासदी के 25 वर्ष पर यूरिग सैनदरेट बता रहे हैं कि किस तरह से गरीब और निरीह जनता ने नित्य प्रति जीवन में दमन के प्रति पहले लचीलापन दिखाया और इसे प्रतिरोध तथा राजनैतिक प्रतिवाद में कैसे बदला।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">पि</div>
<p>छले 25 वर्षों से भोपाल के गैस पीड़ित न्याय के लिए आंदोलनरत हैं। यह आंदोलन अपने आप में विशिष्ट है सिर्फ इस लिए नहीं कि इसमें बहुत से मुद्दों जैसे कि मुआवजा, रोजगार, राशन, पेंशन, स्वास्थ्य सेवा, जल संदूषण तथा वातावरण सुधार को शामिल किया गया है। यह इसलिए भी विशिष्ट है कि इस आंदोलन में प्रमुख तौर पर अल्पशिक्षित गरीब स्त्रियाँ शामिल हैं जो रसायन अभियांत्रिकी, वातावरण प्रदूषण, कानूनी तर्कों तथा चिकित्सा विज्ञान जैसे जटिल मुद्दे उठाए हुए हैं।</p>
<p>द भोपाल सर्वाइवर्स मूवमेंट स्टडी द्वारा इस संघर्ष का दस्तावेजीकरण इस आंदोलन के उत्तरजीवित-कार्यकर्ताओं तथा उनके समर्थकों के साक्षात्कारों के जरिए किया जा रहा है। इस शोध की एक बड़ी मंशा यह भी है कि इस बात की पड़ताल की जाए कि अति अल्प शिक्षित जनता ने इस संघर्ष में किस तरह जुड़ना सीखा।</p>
<div id="pullQuoteR">यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री शहर के उत्तरी दिशा में था। गैस त्रासदी का एक बड़ा प्रभाव गरीब, दिहाड़ी कामगारों तथा अत्यल्प शिक्षित लोगों पर पड़ा था।</div>
<p>1984 में जब गैस त्रासदी हुई, साक्षरता अत्यंत निम्न थी। 1981 की जनगणना के हिसाब से मध्यप्रदेश की साक्षरता 34% थी जिसमें महिलाओं की साक्षरता मात्र 19% थी। यहाँ तक कि स्कूल जाने वाली महिलाओं की सामाजिक रूढ़िवादिता उनके शिक्षा के स्तर पर सीमित थी। भोपाल एक अत्यंत तीव्रगति से फैलता शहर था जिसमें मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन का दर अपेक्षाकृत ऊँचा था। यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री शहर के उत्तरी दिशा में था। गैस त्रासदी का एक बड़ा प्रभाव गरीब, दिहाड़ी कामगारों तथा अत्यल्प शिक्षित लोगों पर पड़ा था।</p>
<p>त्रासदी के समय की अपनी अज्ञानता का बयान बहुत से उत्तरजीवित कार्यकर्ता करते हैं। ट्रेड यूनियन भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन की शुरूआती कार्यकर्ता रेहाना बेगम जिसने त्रासदी से पहले अपनी स्कूली शिक्षा पूर्ण कर ली थी, शिक्षा के भिन्न स्तरों के उत्तरजीवितों के दृष्टिकोण को कुछ इस तरह से बयान करती हैं:</p>
<blockquote><p>“हमें यूनियन, राज्य या फिर राज्य के मुख्यमंत्री इत्यादि की अवधारणा के बारे में कुछ भी नहीं पता था… आमतौर पर हम मुसलमान घरेलू महिलाएँ थीं, जिनके पास बातचीत या प्रचार या किसी भी अन्य बातों का कोई भान ही नहीं था।”</p></blockquote>
<p>बहुत सी ऐसी महिलाएं जो अल्प शिक्षित हैं या अशिक्षित हैं उनकी कहानियाँ बड़ी प्रभावशाली रही हैं जिन्होंने राज्य तथा मल्टीनेशनल कार्पोरेशन के सामने अपनी बातें रखनी सीखीं।</p>
<p>संघर्ष के समय सीखने की पहली तथा संभवत: प्रमुख बात जेम्स सी स्काट ने बताया है &#8211; “कमजोर का शस्त्र” &#8211; उत्पीड़न को दिन पर दिन लचीला रुख बनाकर सह लेना। राबिया बी बताती हैं कि कैसे उन्होंने खुद सीखा और अपने साथी कामगारों को सिखाया कि आर्थिक पुनर्वास के लिए बनाए गए स्वावलंबन ड्रेस निर्माण केंद्रों में फैले भ्रष्टाचार से कैसे फायदा उठाया जाए:</p>
<blockquote><p>“केंद्र का पूरा तंत्र भ्रष्ट था। शीर्ष क्रम के लोग हर तरफ से पैसा बना रहे थे। वे हर स्तर से कमीशन पा रहे थे। जब भी सामानों के लिए टेंडर होते थे तो अराजकता मचती थी, लोगों को बटन जैसे छोटी से छोटी चीज पर भी कमीशन हासिल होती थी। तो मैंने वहाँ काम कर रही महिलाओं के लिए अतिरिक्त कमाई के तरीके जुगाड़े। मैंने उन्हें बताया कि वे किस तरह से अतिरिक्त आय के लिए कपड़े के चिंदों की बचत कर सकती हैं। उस समय ढेरों घोटाले होते थे &#8211; केंद्र के लिए जारी कपड़े के थान रास्ते में ही चोरी हो जाते थे। जब ऊपर बैठे सभी लोग पैसा बना रहे थे तो फिर हम भी क्यों न कुछ पैसे बना लें?”</p></blockquote>
<p>परंतु रोज का यह लचीलापन शोषण के मुकाबले पूरी तरह अपर्याप्त था। लचीलापन अंतत: प्रतिरोध में परिवर्तित होता चला गया। राजनैतिक विरोध के लिए कौशल और रणनीति को सामान्य ज्ञान, ट्रायल एंड एरर, दोस्ताना सलाह, भरोसेमंद समर्थकों के मार्गदर्शन और थोड़ी सी अक्लमंदी से प्राप्त किया गया।</p>
<p>हमीदा बी, जिसकी शादी 11 वर्ष की उम्र में ही कर दी गई थी, और जो 14 वर्ष की उम्र में मां बन गई थी, पारंपरिक रूप से अत्यल्प शिक्षित थी। परंतु भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन में उनकी अपनी सक्रियता के चलते उनके लिए ज्ञान के अनेक कपाट खुलते गए। वे जोर देती हैं -</p>
<blockquote><p>“हम अपनी बैठकों में स्त्रियों के अधिकारों से जुड़ी समस्याओं जैसे कि दहेज प्रथा, उत्पीड़न इत्यादि मुद्दे उठाते थे। हमने अन्य आंदोलन जैसे कि नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) का भी समर्थन किया है। शंकर गुहा नियोगी के भिलाई आंदोलन को बीजीपीएमयूएस से समर्थन मिला”</p></blockquote>
<p>कुछ समूहों के लिए आंदोलन में सीखना एक तरह से अंतरराष्ट्रीय आंदोलनों के संपर्क में जुड़ना रहा है। भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी यूनियन की रशीदा बी अंतरराष्ट्रीय समूहों जैसे कि ग्रीनपीस के साथ काम कर चुकी हैं। वे कहती हैं:</p>
<blockquote><p>“यूनियन कार्बाइड की दीवार के आसपास बहुत से लोग थे जो बीमार हो गए थे। वे क्यों बीमार हो रहे थे? 1999 की रपट के बाद यह साबित हो गया कि पानी संदूषित है। जल संदूषण के बारे में सुन सुनकर इतने वर्षों में जो मैंने जाना और सीखा उससे मैंने पाया कि यह तो दुनिया को बचाने जैसा काम है। मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि जो संदूषण फैलाते हैं, कानूनन उन्हें इसका मुआवजा देना ही चाहिए।”</p></blockquote>
<p>अनौपचारिक शिक्षा संकीर्ण नहीं है। यह सिर्फ संघर्ष के लिए लागू नहीं है, और न ही इस बात के लिए कि इसके लिए क्या सर्वोत्तम है, बल्कि इस लिए भी कि अन्य मुद्दे भी उत्तरजीवितों के मन में हैं। हमारे साक्षात्कारों से कुछ दिलचस्प बहसें उजागर हुईं। हिन्दू और मुसलिम दोनों ही अपने धार्मिक कर्मकाण्डों को नए सिरे से पारिभाषित करते नजर आए जिसमें दमनकारी तत्वों को नकारने का भाव रहा था।</p>
<p>उदाहरण के लिए राबिया बी बुरका पहनने की प्रथा की आलोचना कुछ इस तरह करती हैं:</p>
<blockquote><p>“मैं संगठन में बुरका पहनकर ही पहली मर्तबा शामिल हुई क्योंकि मेरे पति एक मौलवी थे, और मैं बहुत ही रूढ़िवादी परिवार से थी। जल्द ही मैंने बुरका पहनना छोड़ दिया क्योंकि समाज में बुरकानशीं औरतों को बहुत ही निम्न नजरों से देखा जाता है। उन्हें मूर्ख, अनपढ़ और अशिष्ट माना जाता है। जब हम बुरका पहनकर शासकीय कार्यालयों में जाते थे तो अफसर हमसे बहुत ही बुरी तरह से पेश आते थे। जबकि साड़ी पहन कर जाने पर वे सम्मान पूर्वक व्यवहार करते थे। यह कोई सांप्रदायिक बात नहीं है, बल्कि यह सामाजिक अनुकूलन जैसा है।”</p></blockquote>
<p>आईसीजेबी की हाजरा बी धार्मिक प्रथा के पीछे इन नवसुधार पर विचार करती हैं:</p>
<blockquote><p>“बुरका का उद्देश्य है पर्दा। किसी औरत के लिए जो बुरका ओढ़ती है, उसके लिए बुरका एक पर्दा है। बुरका का अर्थ ये है कि चेहरे पर घूँघट डाल लिया जाए जिसे अपरिचित पुरुषों के सामने नहीं उठाया जाए। इस संसार में हर किस्म की पर्दा प्रथा है और कई मुश्किल परिस्थितियों में पर्दानशीं महिलाओं को बेहद कठिनाई का सामना करना पड़ता है। बहुत सी महिलाएँ कामगार हैं जो सिलाई, कढ़ाई, बुनाई का काम करती हैं या दिहाड़ी काम करती हैं या घरों में झाड़ू-बर्तन-पोंछा का काम करती हैं। वो अपने घर से बुरके में निकलती है, काम पर बुरका फेंक निकालती है, और जब वो अपना काम खत्म कर फिर वापस घर के लिए निकलती है तो बुरका ओढ़ लेती है।</p>
<p>तो मुझे लगता है कि यदि कोई महिला अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है, या वो अपने परिवार का भरण पोषण करती है या वो अपने बच्चों की देखभाल करती होती है तो उसे बुरका पहनने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। जब वो कमाने धमाने के लिए बाहर निकलती है तो फिर बुरके का प्रश्न ही पैदा नहीं होना चाहिए। मुझे इस तरह के बुरके में कोई विश्वास नहीं है। बुरका या पर्दा वहीं ठीक है जहाँ औरत अपने पति पर निर्भर है और घर की चारदीवारी के भीतर होती है।”</p></blockquote>
<p>कार्यकर्ता जिस तरीके से राजनैतिक संघर्ष में शामिल होकर अपारंपरिक शिक्षा प्राप्त करते हैं, वह हम सब के लिए, जो कि पेशेवराना जिम्मेदारियों में पारंपरिक शिक्षित होते हैं, एक महत्वपूर्ण पाठ है। उनके संघर्ष को समर्थन देने के लिए शैक्षणिक ज्ञान व प्रशिक्षण लाने के लिए सामाजिक आंदोलनों में जुटने के लिए पारंपरिक बुद्धिजीवियों के लिए भूमिकाएँ हैं।</p>
<div id="pullQuoteR">अंग्रेज़ों के समय बुद्धिजीवी महत्वपूर्ण पदों पर होने के कारण स्वतंत्रता आंदोलन के खिलाफ थे। ऐसा ही फ्रांसीसी व रूसी क्रांति के समय हुआ था। बुद्धिजीवी हमेशा शासकों का साथ देते हैं।</div>
<p>हालांकि राबिया बी चेताती हैं,</p>
<blockquote><p>“मैंने जाना है कि अनपढ़ व्यक्ति किसी शिक्षित व्यक्ति के मुकाबले बड़ा खतरा है। शिक्षित सोचते हैं कि वे अपनी विद्वता का प्रयोग दूसरों को उल्लू बनाने में कर सकते हैं।”</p></blockquote>
<p>अब्दुल जब्बार के लिए, पारंपरिक रूप से शिक्षित लोगों से सीखने में बड़ा जोखिम है।</p>
<blockquote><p>“आंदोलन के प्रथम 10 वर्षों में ऐसा लगा था कि नर्मदा बचाओ आंदोलन के तर्ज पर सक्रिय बुद्धिजीवियों को जोड़ा जाना उत्तम विचार है। पर अब ऐसे लोग भोपाल गैस आंदोलन को नकार रहे हैं और वे इसे उपद्रव के रूप में देखने लगे हैं। उनमें इसके संघर्ष का माद्दा ही नहीं है। मुझे लगता है कि वे एक आम आदमी की समस्या से जुड़ नहीं पा रहे चूंकि उनका अनुभव पूरी तरह से किताबी है&#8230;अंग्रेज़ों के राज में आमतौर पर बुद्धिजीवी सिस्टम में महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थ थे और वे स्वतंत्रता आंदोलन की राह में प्रमुख रोड़े थे। ठीक ऐसा ही फ्रांसीसी क्रांति और रूसी क्रांति के समय हुआ था। बुद्धिजीवी हमेशा शासकों का साथ देते हैं। तो मैं यह कह सकता हूं कि अशिक्षित जनता जिसके पास ‘साहित्यिक’ ज्ञान नहीं होता, वही शिक्षित जनता की अपेक्षा ज्यादा न्याय ला सकती है।</p>
<p>मैंने यह महत्वपूर्ण बात अपने गुरु शंकर गुहा नियोगी (छत्तीसगढ़ के भिलाई संगठन आंदोलन के नेता जिसकी हत्या कर दी गई थी) से सीखी थी। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि विश्व की सभी बड़ी समस्याएँ शिक्षित वर्गों द्वारा ही सृजित हैं।”</p></blockquote>
<p class="note"><a href="http://infochangeindia.org" target="_blank">इंफोचेंज इंडिया</a> से पूर्वानुमति से प्रकाशित। हिन्दी अनुवाद के लिये <a href="http://raviratlami.blogspot.com" target="_blank">रवि रतलामी जी</a> का शुक्रिया! यह आलेख प्रकाशित होने वाली पुस्तक &#8211; <em>भोपाल सर्वाइवर्स स्पीक : इमर्जेंट वाइसेस फ्रॉम ए पीपुल्स मूवमेंट</em> के अंश हैं।</p>
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		<title>बालिका वधु: नाटक द्वारा सच का सामना</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/09/balika-vadhu-showcasing-reality-through-drama-and-text/</link>
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		<pubDate>Wed, 09 Sep 2009 14:57:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय रानाडे</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[Balika Vadhu]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[literacy]]></category>
		<category><![CDATA[Rajasthan]]></category>
		<category><![CDATA[Television]]></category>

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		<description><![CDATA[कुछ नेताओं की सोच के विपरीत संजय रानाडे मानते हैं कि यह दुर्लभ धारावाहिक बाल विवाह को "बढ़ावा" नहीं बल्कि मनोरंजन द्वारा दर्शकों को सामाजिक संघर्ष का बौद्धिक रूप से सामना करने की प्रेरणा दे रहा है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="aligncenter size-full wp-image-146" title="बालिका वधु" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/09/balika_vadhu_01.jpg" alt="बालिका वधु" width="400" height="267"></p>
<div class="dropCap">ग्रा</div>
<p>मीण राजस्थान की पृष्ठभूमि में निर्मित धारावाहिक &#8220;बालिका वधु&#8221;, बालवधु आनंदी की कहानी बयां करती है। आठ साल की कच्ची उम्र में अपनी हमउम्र जगदीश से विवाहोपरांत आनंदी एक ऐसी नई दुनिया में प्रवेश करती है जो भ्रामक और दुत्कार भरी है। बचपन और परिवार के बेफ्रिकी भरे आनंद से वंचित आनंदी को एक अजनबी परिवार और नए रिश्तों के मुताबिक खुद को ढालना है और दोस्त, प्रेमिका, पत्नी और माँ के रूप में अपनी भूमिका को स्वीकारना है।</p>
<p>यह कार्यक्रम स्फ़ीयर ओरिजिन द्वारा निर्मित है और <em>कलर्स चैनल</em> पर सोमवार से शुक्रवार रात आठ बजे प्रसारित किया जाता है।</p>
<p>पर बालिका वधु ने मेरा ध्यान इस सीरियल द्वारा प्रयुक्त एक युक्ति के कारण आकर्षित किया। धारावाहिक के प्रत्येक एपिसोड के अंत में, यह एपिसोड में प्रस्तुत द्वन्द के बारे में कोई सवाल या बयान पेश करता है। सवाल या बयान सुनाया जाता है और पाठ रूप में स्क्रीन के नीचे भी दिखाई देता है। संघर्ष को दर्शाने के लिये पाठ के उपयोग ने मुझे आकर्षित किया क्योंकि इसने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि आखिर यह किस किस्म का संघर्ष है जिसे एक प्रासंगिक धारावाहिक के सामान्य मनोरंजन प्रारूप के माध्यम से पहुंचाया नहीं जा सकता।</p>
<p>दरअसल टेलीविजन के हर प्रसंग की कहानी का संपूर्ण उद्देश्य दर्शकों की बुद्धि की बजाए भावनाओं को छेड़ना है। दर्शकों को <em>महसूस </em>करना है, सोचना नहीं है। यह धारावाहिक एक भावुक वातायनी है जो कमोबेश एक द्विपदीय प्रारूप में संचालित होती है, जहाँ सिक्के के दो लोकसिद्ध पक्ष हैं &#8211; एक अच्छा, दूसरा खराब। सरलीकरण ही कुंजी है। हर एपिसोड के अंत में प्रस्तुत पाठ से यह एक मुद्दे पर कई दृष्टिकोण पेश कर पाता है। सवाल यह है कि क्या यह बस इस धारावाहिक को &#8216;बौद्धिक&#8217; दर्शाने की युक्ति है?</p>
<p>मैं इस धारावाहिक को दो मीडिया संबंधित घटनाओं के संदर्भ में देखता हूँ। पहला यह है कि लगभग सभी मीडिया सामग्री पर मनोरंजन मंच का भारी प्रभुत्व है, यहाँ तक कि समाचार और समसामयिक कार्यक्रम भी <em>रियेलिटी शो</em> की तरह लगने लगे हैं। दूसरी ओर, धारावाहिक और ओछे होते जा रहे हैं। ऐसे में यह एक धारावाहिक है जो नाटक और साहित्यिक पाठ द्वारा भारत की सामाजिक वास्तविकताओं को ज़ाहिर कर रहा है।</p>
<p>दूसरी खास बात यह है कि गंभीर और आधुनिक संदेश देने के लिये पारंपरिक नाट्य का प्रयोग ऐसे दर्शकवर्ग हेतु किया जा रहा है जो मुख्यतः विशुद्ध मनोरंजन के लिए टीवी देखते हैं। मराठी भाषा के दो कार्यक्रम यहाँ अपनी जगह बनाते हैं। एक है<em> टिकल ते पॉलिटिकल </em>और दूसरा<em> दार उधाड़ा न गडे</em>। दोनों पारंपरिक <em>वाग </em>और <em>तमाशा </em>प्रारूपों का गंभीर सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों का प्रस्तुतिकरण करने के लिये का प्रयोग करते हैं। बालिका वधु पारंपरिक नाटक प्रारूप का बहुत प्रभावी ढंग से उपयोग करता है, पर ज्यादा दिलचस्प बात है पाठ यानि टेक्स्ट का प्रयोग।</p>
<p>गंभीर और आधुनिक संघर्षों से जुड़े मनोरंजन कार्यक्रमों के लोक मीडिया स्वरूप में टेक्सट के प्रयोग को दर्शकों की मिली स्वीकृति से संकेत मिलता है कि दर्शक बौद्धिक सामाजिक संघर्षों के साथ नाता जोड़ना चाहते हैं, अलबत्ता सरोकार का यह मंच मनोरंजन का होना चाहिये। यह कोई नई बात नहीं है। हमें हमारे मूल्य, नैतिकता और आचार दार्शनिकों और विचारकों के मुकाबले कथावाचकों से ज़्यादा मिले हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय वास्तविकताओं के साथ सामंजस्य बिठाने के लिये मास मीडिया अब कार्यक्रम के प्रारूप में परिवर्तन ला रहे हैं।</p>
<p>इस लेख को लिखे जाते समय, परिवार के एक किशोर ने (धारावाहिक में) एक कंप्यूटर गेम खरीदने के लिये पैसे चुराये हैं। वह एक अन्य किशोर के प्रभाव में है जिसे उसके आवारापन के कारण शहर से गांव वापस भेजा गया है। बयान: &#8216;अक्सर ऐसा होता है कि एक किशोर यह तय नहीं कर पाता कि क्या सही है और क्या गलत&#8217;।</p>
<div id="pullQuoteR">दर्शक बौद्धिक सामाजिक संघर्षों की बात सुनना चाहते हैं, अलबत्ता सरोकार का यह मंच मनोरंजन का ही हो तो बेहतर। रात 8 बजे, जब पति काम से वापस आ गये हों और रोटियाँ बेलनी बाकी हों, तो टीवी पर कोई भी नैतिकता पर प्रवचन नहीं सुनना चाहेगा।</div>
<p>आप कहेंगे कि यह कोई कहने की बात है भला। हालांकि, महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बयान से आगामी संघर्ष के कारणों का भान हो जाता है। इस तरह का बयान देने के बाद धारावाहिक के मनोरंजन मूल्यों और उसकी शिक्षाप्रद क्षमता के बीच संतुलन बनाये रखना एक चुनौती भरा काम है। एक गलत कदम कहानी को उपदेशात्मक बना सकता है और दर्शकों को खो सकता है। नैतिक अंत सुबह सुबह देखना सुखद रहता है, जब बच्चे स्कूल चले गए हों, किशोर अब तक सो रहे हों, और पति चाय की चुस्कियों के बीच अखबार बाँच रहे हों। लेकिन रात 8 बजे, जब पति काम से वापस आ गये हों, गैस पर प्रेशर कुकर चढ़ाया हो, और रोटियाँ बेलनी बाकी हों, तो कोई भी नैतिकता पर प्रवचन नहीं सुनना चाहेगा। तो क्या यह धारावाहिक केवल महिलाएं देख रही हैं? हो सकता है कि दर्शकवर्ग में अधिकांश महिलायें शामिल हों।</p>
<p>मैंने कई किशोरियों को इस धारावाहिक की चर्चा करते सुना है। किशोरियों, और किशोरों की भी, उनके माता पिता काफी फिक्र करते हैं और उनकी हरकतों को बेहद संदेह की नजर से देखते हैं। मैं जानबूझ कर &#8216;मुंबई जैसे शहर में&#8217; या &#8216;आज भी&#8217; जैसे जुमलों का प्रयोग नहीं कर रहा क्योंकि मैं इस परिकल्पना का हिमायती हूं कि लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और संघवाद जैसी परिकल्पनायें भारतीय परिवार की दहलीज के बाहर ही होती हैं। परिवार में शिक्षा या कमाई का स्तर चाहे कुछ भी हो दहलीज़ के अंदर का जीवन ग्रामीण, सामंती, पितृसत्तात्मक, जातिवाद से भरा और सांप्रदायिक ही होता है। इससे यह समझा जा सकता है कि इस धारावाहिक को देखने वालों में किशोरियाँ क्यों शामिल हैं क्योंकि जब यह धारावाहिक प्रसारित होता है तब वे घर पर होती हैं, और उनकी मातायें भी यह सीरियल देखती हैं।</p>
<p>गौरतलब है कि सीरियल के दो मुख्य किरदार उन श्रेणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसका दर्शकवर्ग सबसे बड़ा है। एक है बालवधु आनंदी और दूसरी विधवा कुलमाता दादीसा। आनंदी ने शादी के बाद यौवन में प्रवेश किया। उसकी शादी के लिये उसके पिता को परिवार की भूमि गिरवी रखनी पड़ी थी। शिक्षा पाने के लिये उसका संघर्ष अब तक जारी है। आनंदी का पति जगदीश लगभग उसी का हमउम्र किशोर है।</p>
<p>आनंदी का पति अभी तक एक &#8216;पुरुष&#8217; नहीं है &#8211; यह एक ऐसा अंतर है जिसे कॉलेज जाने वाली लगभग हर किशोरी स्वाभाविक रुप से समझती है लेकिन स्पष्ट रूप से कह नहीं पाती। इस तरह का रिश्ता सेक्स और उसमें अंतर्निहित विकर्षण को तस्वीर से बाहर तो रखता है ही, इससे कथानक में लैंगिक संघर्ष को मुखर करने की खासी गुंजाईश रहती है। इस तरह जहाँ हमें यौनिक और लैंगिक संघर्ष के भावनात्मक और बौद्धिक पहलू अन्य लोगों के जीवन में दिखते रहते हैं, वहीं इस मासूम दंपती के बहाने भावनात्मक और बौद्धिक खुलाव भी मिल जाता है। दर्शक इस जोड़े की तरह मासूम बन जाता है; इससे अलग और अक्सर विरोधाभासी दुनिया में बड़े हो रहे पुरुष और महिलाओं की जटिल वास्तविकता से सामना करना आसान हो जाता है।</p>
<p>दादीसा पुराने ख्यालों की अनपढ़ औरत हैं। वह घर में सब पर पूर्ण नियंत्रण रखती है पर फिर भी हम देख सकते हैं कि परिवार के भीतर की राजनीतिक शक्ति के मामले में उसकी सत्ता को पुरुषों से चुनौती मिलती रहती है भले वो उसके प्रौढ़ बेटे क्यों न हो। इस संघर्ष को एक बुजुर्ग और उसके पुत्रों की बजाय एक कुल-माता और उसके बेटों के संदर्भ में देखना लेखक और दर्शक दोनों के लिये आसान होता है क्योंकि यहाँ हिंसा शारीरिक स्तर पर नहीं वरन &#8216;शब्दों&#8217; और &#8216;भावनाओं&#8217; के माध्यम से व्यक्त होती है। सीरियल में शारीरिक हिंसा अन्य परिवारों में होती दिखाई जाती है जिससे कथा का केंद्रीय परिवार अधिक नैतिक और प्रगतिशील लगे।</p>
<p>दादीसा पारम्परिक भारतीय परिवार की माँ, सास और कुल‍माता का प्रतिरूप है जो हमेशा अज्ञात, अपरिभाषित लोगों या समाज के दबाव में रहती है और सोचती रहती है कि वे क्या कहेंगे, उसके परिवार और उसके साथ कैसा व्यवहार करेंगे या कोई घटना किस प्रकार परिवार में उसकी स्थिति और उसके परिवार की समाज में स्थिति को प्रभावित करेगी।</p>
<p>यह धारावाहिक अब तक बाल विवाह, लैंगिक पक्षपात, नैतिकता, कामुकता, विधवा पुनर्विवाह, जाति, वर्ग, ग्रामीण और शहरी संघर्ष, बाल अपराध, साहूकारी, भारतीय परिवारों में नैतिकता की पदावनति, विवाह की संस्था, और शिक्षा जैसे मुद्दों को संबोधित कर चुका है। जैसा कि हमने पहले चर्चा की, धारावाहिक के निर्माताओं ने हर नाटकीय विधा का प्रयोग कर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि जिम्मेवारी का अनावश्यक बोझ लादे बिना दर्शकों तक ये मुद्दे सीधे पहुंचाये जा सके। टेक्सट यानि पाठ द्वारा दर्शकों को इस मुद्दे से भावनात्मक रूप से अलग कर उन्हें इस पर बौद्धिक तौर पर विचार करने को प्रेरित किया जाता है।</p>
<p>तो आखिरकार इस धारावाहिक पर कुछ नेताओं को आपत्ति क्यों है? आपत्ति का कारण शायद धारावाहिक में हुआ बाल विवाह है। धारावाहिक में दिखाया गया था कि कैसे एक जटिल सामाजिक और पारिवारिक प्रक्रिया के माध्यम से यह शादी तय की गई थी, कैसे विभिन्न समूहों ने एक दूसरे के फायदा उठाया और खुद भी दूसरों के शिकार बने। क्या इस धारावाहिक पर बाल विवाह को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जा सकता है? निश्चित रूप से, नहीं। बाल विवाह के खिलाफ कानून लागू करने का हमारा रिकॉर्ड वैसे भी संदिग्ध है। दरअसल, किसी भी मुद्दे पर है धारावाहिक की राय, विशेष रूप से प्रकरण के अंत में दिखाये जाने वाले साहित्यिक पाठ में, एक समाचार पत्र की सुर्खियों की तरह है। यह पाठ संघर्ष को सही संदर्भ में प्रस्तुत करता।</p>
<p>एक युवा विधवा गर्भवती महिला की एक युवक से शादी से संबंधित एपीसोड में भावनात्मक और नाटकीय संवाद और कड़ी के अंत में प्रस्तुत गंभीर बौद्धिक साहित्यिक पाठ के बीच संतुलन बनाये रखना बेहद मुश्किल था। इस मामले में लड़की के परिवार में घटना के प्रति नकारात्मक प्रतिक्रियाओं से लड़के के परिवार में हिंसात्मक और नाटकीय दृश्य रूपी प्रतिक्रिया मिली। पूरी संभावना थी कि यहाँ धारावाहिक खून के बदले खून जैसा माहौल चित्रित कर देता जिसमें लड़के के परिवार वाले लड़की के परिवार पर धोखाधड़ी और उनके एकलौते बेटे को हथिया लेने का आरोप लगाते और बदले की यह दास्तां दोनों परिवारों के बीच चलती रहती।लेकिन धारावाहिक इस हिंसा और घृणा को दोनों परिवारों की एक गर्भवती विधवा औरत और एक युवक की उससे शादी की इच्छा की वास्तविकता को स्वीकारने में असमर्थता के संदर्भ में प्रस्तुत करने में सफल रहा। धारावाहिक ने यहाँ एक बेहद दिलचस्प युक्ति का उपयोग किया &#8211; लड़का अपने परिवार को यह नहीं बताता कि महिला गर्भवती है, बस यह कहता है वह उसे प्यार करता है। अंतर्निहित पाठ में कहा जाता है: &#8216;अक्सर एक झूठ को छिपाने के लिए बार बार झूठ बोलना पड़ता है&#8217;।</p>
<p>बालिका वधु अब तक मुद्दों को एक सूत्र में जोड़ता रहा है जिसमें शुरुवात द्वंद्व को स्पष्ट करने से होती है, किरदारों की प्रतिक्रियाओं के माध्यम से इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा, फिर साहित्यिक पाठ द्वारा उभरते सवाल और बहस के मुद्दों पर बौद्धिक चर्चा, और अंत में, समाधान।</p>
<p>जाहिर है, बालिका वधु भारतीय वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करता है। जो कहते हैं कि भारत में समस्याएं नहीं है मुगालते में हैं। यह कहना वैसा ही होगा कि हमारे देश में औरतों के साथ अत्याचार नहीं होता जब कि हमें अब भी दहेज विरोधी और महिला से अत्याचार के खिलाफ अधिनियमों की ज़रूरत पड़ती है।
<p class="note"><a href="http://infochangeindia.org" target="_blank">इंफ़ोचेंज इंडिया</a> से साभार, पूर्वानुमति से प्रकाशित। मूल अंग्रेजी लेख से हिन्दी अनुवादः देबाशीष।</p>
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