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	<title>सामयिकी - हिन्दी वेबपत्रिका &#124; Samayiki - Hindi Webzine &#187; विज्ञान</title>
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	<description>बदलती दुनिया की साक्षी</description>
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		<title>प्रायोगिक भौतिकी के जनक: गैलीलियो</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/02/galileo-father-of-applied-physics/</link>
		<comments>http://www.samayiki.com/2009/02/galileo-father-of-applied-physics/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 07 Feb 2009 18:36:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पीयूष पाण्डेय</dc:creator>
				<category><![CDATA[विज्ञान]]></category>
		<category><![CDATA[Copernicus]]></category>
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		<category><![CDATA[Galileo Galilei]]></category>
		<category><![CDATA[International Year of Astronomy]]></category>
		<category><![CDATA[IYA2009]]></category>
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		<category><![CDATA[telescope]]></category>

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		<description><![CDATA[अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष 2009 पर सामयिकी की विशेष शृंखला के द्वितीय लेख में नेहरू तारामण्डल, मुंबई के निदेशक पीयूष पाण्डेय आधुनिक प्रायोगिक विज्ञान के जन्मदाता गैलीलियो गैलिली को याद कर रहे हैं।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">वर्ष 2009 को अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है &#8211; वर्ष 1609 में गैलीलियो द्वारा खगोलीय प्रेक्षण आरंभ करने की घटना की 400वीं जयंती के रूप में। इस शृंखला के दूसरे लेख में हम गैलीलियो को याद कर रहे हैं जिन्हें आधुनिक प्रायोगिक विज्ञान का जन्मदाता कहा जाता है।</div>
<p><a href="http://www.samayiki.com/tag/iya2009/"><img class="alignright" style="margin:5px;border:none" title="अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष: विशेष शृंखला " src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/iya2009-series.png" border="0" alt="IYA Special" width="200" height="159" /></a><span class="dropCap">आ</span>धुनिक इटली के पीसा नामक शहर (पीसा की टेढ़ी मीनार के लिए प्रसिद्ध) में 15 फरवरी 1564 को गैलीलियो गैलिली का जन्म हुआ। अधिकांश लोग गैलीलियो को एक खगोलविज्ञानी के रूप में याद करते हैं जिसने दूरबीन में सुधार कर उसे अधिक शक्तिशाली तथा खगोलीय प्रेक्षणों के लिए उपयुक्त बनाया और साथ ही अपने प्रेक्षणों से ऐसे चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए जिसने खगोल विज्ञान को नई दिशा दी और आधुनिक खगोल विज्ञान की नींव रखी। पर बहुत कम लोग यह जानते हैं कि खगोलविज्ञानी होने के अलावा वे एक कुशल गणितज्ञ, भौतिकीविद् और दार्शनिक भी थे जिसने यूरोप की वैज्ञानिक क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसीलिए गैलीलियो को &#8221;आधुनिक खगोल विज्ञान के जनक&#8221;, &#8221;आधुनिक भौतिकी का पिता&#8221; या &#8221;विज्ञान का पिता&#8221; के रूप में संबोधित किया जाता है।</p>
<div id="pullQuoteL">बहुत कम लोग यह जानते हैं कि खगोलविज्ञानी होने के अलावा वे एक कुशल गणितज्ञ, भौतिकीविद् और दार्शनिक भी थे जिसने यूरोप की वैज्ञानिक क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।</div>
<p>गैलीलियो को सूक्ष्म गणितीय विश्लेषण करने का कौशल संभवत: अपने पिता विन्सैन्जो गैलिली से विरासत में आनुवांशिक रूप में तथा कुछ उनकी कार्यशैली को करीब से देख कर मिला होगा। विन्सैन्जो एक जाने-माने संगीत विशेषज्ञ थे और &#8216;ल्यूट&#8217; नामक वाद्य यंत्र बजाते थे जिसने बाद में गिटार और बैन्जो का रूप ले लिया। उन्होंने भौतिकी में पहली बार ऐसे प्रयोग किए जिनसे &#8221;अरैखिक संबंध&#8221; का प्रतिपादन हुआ। तब यह ज्ञात था कि किसी वाद्य यंत्र की तनी हुई डोर (या तार) के तनाव और उससे निकलने वाली आवृत्ति में एक संबंध होता है, आवृत्ति तनाव के वर्ग के समानुपाती होती है। इस तरह संगीत के सिद्धांत में गणित की थोड़ी बहुत पैठ थी। प्रेरित हो गैलीलियो ने पिता के कार्य को आगे बढ़ाया और फिर उन्होंने बाद में पाया कि प्रकृति के नियम गणित के समीकरण होते हैं। गैलीलियो ने लिखा है &#8211; &#8221;भगवान की भाषा गणित है&#8221;।</p>
<p>गैलीलियो ने दर्शन शास्त्र का भी गहन अध्ययन किया था साथ ही वे धार्मिक प्रवृत्ति के भी थे। पर वे अपने प्रयोगों के परिणामों को कैसे नकार सकते थे जो पुरानी मान्यताओं के विरुद्ध जाते थे और वे इनकी पूरी ईमानदारी के साथ व्याख्या करते थे। उनकी चर्च के प्रति निष्ठा के बावजूद उनका ज्ञान और विवेक उन्हें किसी भी पुरानी अवधारणा को बिना प्रयोग और गणित के तराजू में तोले मानने से रोकता था। चर्च ने इसे अपनी अवज्ञा समझा। पर गैलीलियो की इस सोच ने मनुष्य की चिंतन प्रक्रिया में नया मोड़ ला दिया। स्वयं गैलीलियो अपने विचारों को बदलने को तैयार हो जाते यदि उनके प्रयोगों के परिणाम ऐसा इशारा करते। अपने प्रयोगों को करने के लिए गैलीलियो ने लंबाई और समय के मानक तैयार किए ताकि यही प्रयोग अन्यत्र जब दूसरी प्रयोगशालाओं में दुहराए जाएं तो परिणामों की पुनरावृत्ति द्वारा उनका सत्यापन किया जा सके।</p>
<p>गैलीलियो ने प्रकाश की गति नापने का भी प्रयास किया और तत्संबंधी प्रयोग किए। गैलीलियो व उनका एक सहायक दो भिन्न पर्वत शिखरों पर कपाट लगी लालटेन लेकर रात में चढ़ गए। सहायक को निर्देश दिया गया था कि जैसे ही उसे गैलीलियो की लालटेन का प्रकाश दिखे उसे अपनी लालटेन का कपाट खोल देना था। गैलीलियो को अपने कपाट खोलने व सहायक की लालटेन का प्रकाश दिखने के बीच का समय अंतराल मापना था-पहाड़ों के बीच की दूरी उन्हें ज्ञात थी। इस तरह उन्होंने प्रकाश की गति ज्ञात की।</p>
<p>पर गैलीलियो &#8211; गैलीलियो ठहरे &#8211; वे इतने से कहां संतुष्ट होने वाले थे। अपने प्रायोगिक निष्कर्ष को दुहराना जो था। इस बार उन्होंने ऐसी दो पहाड़ियों का चयन किया जिनके बीच की दूरी कहीं ज्यादा थी। पर आश्चर्य, इस बार भी समय अंतराल पहले जितना ही आया। गैलीलियो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रकाश को चलने में लग रहा समय उनके सहायक की प्रतिक्रिया के समय से बहुत कम होगा और इस प्रकार प्रकाश का वेग नापना उनकी युक्ति की संवेदनशीलता के परे था। पर गैलीलियो द्वारा बृहस्पति के चंद्रमाओं के बृहस्पति की छाया में आ जाने से उन पर पड़ने वाले ग्रहण के प्रेक्षण से <em>ओल रोमर </em>नामक हॉलैंड के खगोलविज्ञानी को एक विचार आया। उन्हें लगा कि इन प्रेक्षणों के द्वारा प्रकाश का वेग ज्ञात किया जा सकता है। सन् 1675 में उन्होंने यह प्रयोग किया जो इस तरह का प्रथम प्रयास था। इस प्रकार यांत्रिक बलों पर किए अपने मुख्य कार्य के अतिरिक्त गैलीलियो के इन अन्य कार्यों ने उनके प्रभाव क्षेत्र को कहीं अधिक विस्तृत कर दिया था जिससे लंबे काल तक प्रबुद्ध लोग प्रभावित होते रहे।</p>
<div class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><img style="border: 0pt none; margin: 5px;" title="&quot;ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं न कि पृथ्वी की&quot;,  कॉपरनिकस के इस सिद्धांत का गैलीलियो ने समर्थन किया। पर इस &quot;भूल&quot; के लिये चर्च ने उन्हें दिया कारावास। 1992 में वैटिकन यह स्वीकार किया कि गैलीलियो के मामले में उनसे गलती हुई थी। " src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/02/galileo_galilei.jpg" border="0" alt="IYA Special" width="300" height="316" /><p class="wp-caption-text">&quot;ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं न कि पृथ्वी की&quot;,  कॉपरनिकस के इस सिद्धांत का गैलीलियो ने समर्थन किया। पर इस &quot;भूल&quot; के लिये चर्च ने उन्हें दिया कारावास। 1992 में वैटिकन ने यह स्वीकार किया कि गैलीलियो के मामले में उनसे गलती हुई थी। </p></div>
<p>गैलीलियो ने आज से बहुत पहले गणित, सैद्धांतिक भौतिकी और प्रायोगिक भौतिकी के परस्पर संबंध को समझ लिया था। परवलय या पैराबोला का अध्ययन करते हुए वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि एक समान त्वरण (uniform acceleration) की अवस्था में पृथ्वी पर फेंका कोई पिंड एक परवलयाकार मार्ग पर चल कर वापस पृथ्वी पर आ गिरेगा &#8211; बशर्ते हवा के घर्षण का बल उपेक्षणीय हो। यही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि उनका यह सिद्धांत जरूरी नहीं कि किसी ग्रह जैसे पिंड पर भी लागू हो। उन्हें इस बात का ध्यान था कि उनके मापन में घर्षण (friction) तथा अन्य बलों के कारण अवश्य त्रुटियां आई होंगी जो उनके सिद्धांत की सही गणितीय व्याख्या में बाधा उत्पन्न कर रहीं थीं। उनकी इसी अंतर्दृष्टि के लिए प्रसिद्ध भौतिकीविद् आइंस्टाइन ने उन्हें &#8221;आधुनिक विज्ञान का पिता&#8221; की पदवी दे डाली। कथन में कितनी सचाई है पता नहीं &#8211; पर माना जाता है कि गैलीलियो ने पीसा की टेढ़ी मीनार से अलग-अलग संहति (mass) की गेंदें गिराने का प्रयोग किया और यह पाया उनके द्वारा गिरने में लगे समय का उनकी संहति से कोई सम्बन्ध नहीं था &#8211; सब समान समय ले रहीं थीं। ये बात तब तक छाई अरस्तू की विचारधारा के एकदम विपरीत थी &#8211; क्योंकि अरस्तू के अनुसार अधिक भारी वस्तुएं तेजी से गिरनी चाहिए। बाद में उन्होंने यही प्रयोग गेदों को अवनत तलों पर लुढ़का कर दुहराए तथा पुन: उसी निष्कर्ष पर पहुंचे।</p>
<p>गैलीलियो ने त्वरण के लिए सही गणितीय समीकरण खोजा। उन्होंने कहा कि अगर कोई स्थिर पिंड समान त्वरण के कारण गतिशील होता है तो उसकी चलित दूरी समय अंतराल के वर्ग के समानुपाती होगी।</p>
<p><code>S = ut + &frac12;ft<sup>2</sup>, if u = 0 then S = &frac12;ft<sup>2</sup> or S ∝ t<sup>2</sup></code></p>
<p>गैलीलियो ने ही जड़त्व का सिद्धांत हमें दिया जिसके अनुसार &#8221;किसी समतल पर चलायमान पिंड तब तक उसी दिशा व वेग से गति करेगा जब तक उसे छेड़ा न जाए&#8221;। बाद में यह जाकर न्यूटन के गति के सिद्धांतों का पहला सिद्धांत बना। पीसा के विशाल कैथेड्रल (चर्च) में झूलते झूमर को देख कर उन्हें ख्याल आया क्यों न इसका दोलन काल नापा जाए &#8211; उन्होंने अपनी नब्ज की धप-धप की मदद से यह कार्य किया &#8211; और इस प्रकार सरल लोलक का सिद्धांत बाहर आया &#8211; कि लोलक का आवर्त्तकाल उसके आयाम (amplitude) पर निर्भर नहीं करता (यह बात केवल छोटे आयाम पर लागू होती है &#8211; पर एक घड़ी का निर्माण करने के लिए इतनी परिशुद्धता काफी है)। सन् 1632 में उन्होंने ज्वार-भाटे की व्याख्या पृथ्वी की गति द्वारा की। इसमें उन्होंने समुद्र की तलहटी की बनावट, इसके ज्वार की तरंगों की ऊंचाई तथा आने के समय में संबंध की चर्चा की &#8211; हालांकि यह सिद्धांत सही नहीं पाया गया। बाद में केपलर व अन्य वैज्ञानिकों ने इसे सुधारा और सही कारण &#8211; चंद्रमा को बताया।</p>
<p>जिसे आज हम आपेक्षिकता (Relativity) का सिद्धांत कहते हैं उसकी नींव भी गैलीलियो ने ही डाली थी। उन्होंने कहा है &#8221;भौतिकी के नियम वही रहते हैं चाहे कोई पिंड स्थिर हो या समान वेग से एक सरल रेखा में गतिमान। कोई भी अवस्था न परम स्थिर या परम चल अवस्था हो सकती है&#8221;। इसी ने बाद में न्यूटन के नियमों का आधारगत ढांचा दिया। सन् 1609 में गैलीलियो को दूरबीन के बारे में पता चला जिसका हालैंड में आविष्कार हो चुका था। केवल उसका विवरण सुनकर उन्होंने उससे भी कहीं अधिक परिष्कृत और शक्तिशाली दूरबीन स्वयं बना ली। फिर शुरू हुआ खगोलीय खोजों का एक अद्भुत अध्याय। गैलीलियो ने चांद को देखा उसके ऊबड़-खाबड़ गङ्ढे देखे। फिर उन्होंने दूरबीन चमकीले शुक्र ग्रह पर साधी &#8211; एक और नई खोज &#8211; शुक्र ग्रह भी (चंद्रमा की तरह) कला (phases) का प्रदर्शन करता है। जब उन्होंने बृहस्पति ग्रह को अपनी दूरबीन से निहारा, फिर जो देखा और उससे उन्होंने जो निष्कर्ष निकाला उसने सौरमंडल को ठीक-ठीक समझने में बड़ी मदद की। गैलीलियो ने देखा की बृहस्पति ग्रह के पास तीन छोटे-छोटे &#8221;तारे&#8221; जैसे दिखाई दे रहे हैं। कुछ घंटे बाद जब दुबारा उसे देखा तो वहां तीन नहीं बल्कि चार &#8221;तारे&#8221; दिखाई दिए। गैलीलियो समझ गए कि बृहस्पति ग्रह का अपना एक अलग संसार है। उसके गिर्द घूम रहे ये पिंड अन्य ग्रहों की तरह पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए बाध्य नहीं हैं। (तब तक यह माना जाता था कि ग्रह और सूर्य सभी पिंड पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। हालांकि निकोलस कॉपरनिकस गैलीलियो से पहले ही यह कह चुके थे कि ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं न कि पृथ्वी की &#8211; पर इसे मानने वाले बहुत कम थे। गैलीलियो की इस खोज से सौरमडंल के सूर्य केंद्रित सिद्धांत को बहुत बल मिला।)</p>
<div id="pullQuoteL">1609 में गैलीलियो को दूरबीन के बारे में पता चला जिसका हालैंड में आविष्कार हो चुका था। केवल उसका विवरण सुनकर उन्होंने कहीं अधिक परिष्कृत व शक्तिशाली दूरबीन स्वयं बना ली।</div>
<p>इसके साथ ही गैलीलियो ने कॉपरनिकस के सिद्धांत को खुला समर्थन देना शुरू कर दिया। ये बात तत्कालीन वैज्ञानिक और धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध जाती थी। गैलीलियो के जीवनकाल में इसे उनकी भूल ही समझा गया। सन् 1633 में चर्च ने गैलीलियो को आदेश दिया कि वे सार्वजनिक रूप से कहें कि ये उनकी बड़ी भूल है। उन्होंने ऐसा किया भी। फिर भी गैलीलियो को कारावास भेज दिया गया। बाद में उनके बिगड़ते स्वास्थ्य के मद्देनजर सजा को गृह-कैद में तब्दील कर दिया गया। अपने जीवन का अंतिम दिन भी उन्होंने इसी कैद में गुज़ारा। कहीं वर्ष 1992 में जाकर वैटिकन शहर स्थित ईसाई धर्म की सर्वोच्च संस्था ने यह स्वीकारा कि गैलीलियो के मामले में उनसे गलती हुई थी। यानी उन्हें तीन सौ से अधिक साल लग गए असलियत को समझने और स्वीकारने में।</p>
<p>जब गैलीलियो पीसा के विश्वविद्यालय में खगोल विज्ञान के प्राध्यापक थे तो उन्हें अपने शिष्यों को यह पढ़ाना पढ़ता था कि ग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। बाद में जब वे पदुवा नामक विश्वविद्यालय में गए तब उन्हें जाकर निकोलस कॉपरनिकस के नए सिद्धांत का पता चला था। खुद अपनी दूरबीन द्वारा किए गए प्रेक्षणों से (विशेषकर बृहस्पति के चंद्रमा देख कर) वे अब पूरी तरह आश्वस्त हो चुके थे कि कॉपरनिकस का सूर्य-केंद्रित सिद्धांत ही सौरमंडल की सही व्याख्या करता है। बहत्तर साल की अवस्था को पहुंचते-पहुंचते गैलीलियो अपनी आंखों की रोशनी पूरी तरह खो चुके थे। बहुत से लोग यह मानते हैं कि उनका अंधापन अपनी दूरबीन द्वारा सन् 1613 में सूर्य को देखने (जिसके द्वारा उन्होंने सौर-कलंक या सनस्पॉट्स भी खोजे थे) के कारण उत्पन्न हुआ होगा। पर जांच करने पर पता चला कि ऐसा मोतियाबिंद के आ जाने और आंख की ग्लौकोमा नामक बीमारी के कारण हुआ होगा।</p>
<p>सन् 1642 में गृह-कैद झेल रहे गैलीलियो की 8 जनवरी को मृत्यु हो गई। कुछ मास बाद उसी वर्ष न्यूटन का जन्म हुआ। इस तरह कह सकते हैं कि तब एक युग का अंत और एक और नए क्रांतिकारी युग का शुभारंभ हुआ।
<p class="note"><a href="http://www.nrdcindia.com/pub.htm#Awishkar" target="_blank">आविष्कार पत्रिका</a> से साभार</p>
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		<title>खगोल विज्ञान से बढ़ेगी प्रगति</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/01/astronomy-can-foster-development/</link>
		<comments>http://www.samayiki.com/2009/01/astronomy-can-foster-development/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 26 Jan 2009 18:04:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>केविन गोवेनदर</dc:creator>
				<category><![CDATA[विज्ञान]]></category>
		<category><![CDATA[Galileo]]></category>
		<category><![CDATA[HESS]]></category>
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		<description><![CDATA[अंतर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञान वर्ष 2009 के उपलक्ष्य में सामयिकी की विशेष श्रृंखला के पहले लेख में दक्षिण अफ्रीकी अंतरिक्ष वैज्ञानिक केविन्द्रन गोवेन्देर बता रहे हैं कि किस तरह खगोल विज्ञान का निर्धन राष्ट्रों में विकास एवं प्रसार उनकी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के विकास में सहायक सिद्ध हो सकता है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष 2009 के उपलक्ष्य में सामयिकी की विशेष श्रृंखला के पहले लेख में दक्षिण अफ्रीकी अंतरिक्ष वैज्ञानिक केविन्द्रन गोवेन्देर बता रहे हैं कि किस तरह खगोल विज्ञान का निर्धन राष्ट्रों में विकास एवं प्रसार उनकी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के विकास में सहायक सिद्ध हो सकता है।</div>
<p><span class="dropCap">2</span>009 को अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष घोषित किया गया है। ठीक चार सौ साल पूर्व प्रसिद्ध खगोलशास्त्री गैलिलियो गैलीली ने दूरबीन द्वारा अपनी जिज्ञासु आंखों से अंतरिक्ष की टोह ली थी।</p>
<p><img style="border:none;margin:5px" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/iya2009-series.png" alt="International year of Astronomy 2009: Special Series" align="right" />आज खगोल विज्ञान ने हमारे ब्रह्मांड के बहुत से रहस्यों को हमारे लिए समझना आसान कर दिया है, लेकिन क्या सिर्फ इतना ही पर्याप्त है? अक्सर लोग खगोल विज्ञान को गोपनीय विज्ञान मानते हैं जिसकी विज्ञान के विकास में कोई बड़ी भूमिका नहीं हो सकती। जहाँ दुनिया के इतने सारे देशों में असंख्य लोग गरीबी में अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं वहाँ दूरबीनों, वेधशालाओं एवं खगोलीय अनुसंधान में भारी निवेश को न्यायोचित कैसे ठहराया जाये?</p>
<h2>धनोपार्जन</h2>
<p>खगोल विज्ञान में भारी निवेश को सिर्फ आर्थिक आधार पर तोला जाए तो बहुत से यदि विकासशील देशों (और शायद अन्य मुल्कों से भी) से यह गायब ही हो जाए। लेकिन सौभाग्यवश इस मामले में दक्षिण अफ्रीका का अनुभव हमें यह दिखाता है कि खगोल विज्ञान में निवेश न सिर्फ हमें बड़ा आर्थिक लाभ पहुँचा सकता है बल्कि इसके बहुत से सामाजिक लाभ भी संभव हैं।</p>
<div id="pullQuoteL">लोग खगोल विज्ञान को गोपनीय विज्ञान मानते हैं। जब असंख्य लोग गरीबी में अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं वहाँ दूरबीनों, वेधशालाओं एवं अनुसंधान में भारी निवेश को कैसे न्यायोचित  ठहराया जाये?</div>
<p>साउथ अफ्रीकन लार्ज टेलिस्कोप (SALT) में दक्षिण अफ़्रीका के निवेश ने देश की अर्थव्यवस्था में एक बड़े उत्प्रेरक की भूमिका निभाई है जहाँ स्थानीय उद्योग ने ही दूरबीन के साठ प्रतिशत से ज्यादा कल-पुर्जों का उत्पादन किया है।</p>
<p>इस निवेश ने न केवल रोजगार पैदा किये बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा दिया है। SALT के खुलने के पहले साल में ही सदरलैंड जैसे छोटे शहर, जहाँ यह दूरबीन स्थापित की गई है, में आने वाले पर्यटकों की संख्या कुछ सौ लोगों से बढ़कर 13,000 हो गयी। परिणामस्वरूप, अतिथि-गृह, कैफे, और पर्यटन संबंधी अन्य व्यवसायों में काफी वृद्धि दर्ज की गयी। SALT कोलैटरल बेनीफिट्स प्रोग्राम (SCBP), ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर खगोल-पर्यटन कार्यक्रम का विकास किया। अब तो बड़ी संख्या में दक्षिण अफ्रीकी कंपनियाँ भी खगोल विज्ञान में रुचि को भुनाने में व्यस्त हैं और शौकिया दूरबीनों की मदद से देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित कर रही हैं।</p>
<p>नामीबिया में भी स्थानीय लोगों अंतरिक्ष विज्ञान में नयी रुचि का लाभ उठा रहे हैं जो गाम्सबर्ग दर्रे में लगाए गये हाई एनर्जी स्टीरियोस्कोपिक सिस्टम (HESS) से जागृत हुई। यह उच्च क्षमता वाली दूरबीनों की एक प्रणाली है जिससे गामा-किरणों की जाँच की जाती है। उदाहरण स्वरूप इस क्षेत्र के कुछ किसानों ने भी पर्यटकों के लिए अपने बागानों में शौकिया खगोलविदों के लिये छोटी दूरबीनों की स्थापना की है। खगोल विज्ञान का विकास और प्रसार औद्योगिक और वैज्ञानिक विकास की भी शुरुआत करता है – HESS परियोजना के लिए बनाये गये बहुत से जटिल फास्ट स्विचिंग यंत्रों का व्यवसायिक स्टेरेलाईज़ेशन प्रणालियों के लिये भी इस्तेमाल हो रहा है क्योंकि इनसे ओजोन बनता है जो एक तेज़ निस्संक्रामक (disinfectant) है।</p>
<div id="boxR" style="width: 355px;">
<h3>SALT: दक्षिणी गोलार्द्ध की सबसे विशाल ऑप्टिकल दूरबीन</h3>
<p><img title="SALT-article.jpg" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/SALT-article.jpg" alt="SALT: दक्षिणी गोलार्द्ध की सबसे विशाल ऑप्टिकल दूरबीन" align="middle/" /></p>
<p>दक्षिण अफ्रीका के अर्ध रेगिस्तानी क्षेत्र कारू में स्थित साउथ अफ्रीकी लार्ज टेलिस्कोप (<a title="The Southern African Large Telescope" href="http://www.salt.ac.za/" target="_blank">SALT</a>) लगभग दस मीटर (~33 फीट) व्यास की आप्टिकल दूरबीन है। SALT दक्षिणी गोलार्द्ध में सबसे बड़ी ऑप्टिकल दूरबीन है। यह उत्तरी गोलार्द्ध स्थित दूरबीनों की पहुँच से बाहर खगोलीय पिंडों से होते विकिरण का विश्लेषण कर सकती है। 10 नवंबर 2005 को राष्ट्रपति थाबो मबेकी ने आधिकारिक रूप से दूरबीन का उद्घाटन किया था। SALT के पहले दस साल के खर्च के लिये दक्षिण अफ्रीका से कुल 360 लाख डॉलर का लगभग एक तिहाई पैसे दिये हैं, शेष राशि जर्मनी, अमरीका, ब्रिटेन व न्यूजीलैंड जैसे सहयोगी देशों ने वहन की है।</div>
<h2>जनसामान्य की भागीदारी</h2>
<p>खगोल विज्ञान को विकास के लिए उत्प्रेरक बनाने में सबसे महत्वपूर्ण है जनसामान्य में विज्ञान के प्रति रुचि का विकास एवं उसमें लोगों की भागीदारी को प्रोत्साहन देना। विश्व की बहुत सी संस्कृतियों में खगोल विज्ञान का एक लंबा स्थानीय इतिहास रहा है जिससे हमें लोगों के बीच ब्रह्मांड की आधुनिक समझ को पहुँचाने का रास्ता और भी सुगम हो जाता है।</p>
<p>दक्षिण अफ्रीका की वेधशालाओं ने हमेशा से लोगों के बीच वैज्ञानिक समझ पैदा करने में सक्रिय भूमिका निभाई है। SCBP के कार्यक्रमों ने — तारों के अवलोकन से लेकर व्याख्यान एवं भाषणों के आयोजन तक — सदरलैंड के निवासियों के साथ संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नियमित प्रेस विज्ञप्तियाँ इसे राष्ट्रीय समाचारपत्रों की सुर्खियों में बनाये रखने का महत्वपूर्ण काम करती है, जबकि पोस्टर एवं स्मारक चिन्ह इत्यादि लोगों की दिलचस्पी बनाये रखते हैं तथा उनका ज्ञानवर्धन करते हैं।</p>
<p>इस तरह की प्रमुख परियोजना वास्तव में एक प्रेरणा-स्रोत का काम करती हैं। दक्षिण अफ्रीका के बहुत से युवक युवतियां अब SALT परियोजना का हिस्सा बनना चाहते हैं जो देश के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। SALT अब विद्यालयों के पाठ्यक्रम का हिस्सा है जिससे गणित, विज्ञान एवं अन्य तकनीकी विषयों की महत्वपूर्ण अवधारणाओं को समझने में सहायक सिद्ध हो रही है। जो खगोल विज्ञान हमेशा से एक उत्सुकता एवं जिज्ञासा का विषय रहा है उसी को माध्यम बनाकर हम अपनी संस्कृति में सीखने-सिखाने का प्रभावी माहौल तैयार कर सकते हैं।</p>
<p>बड़े बजट वाली खगोलीय परियोजनाएँ शिक्षा के लिए धन जुटाने का एक बड़ा माध्यम सिद्ध हो सकती हैं। SCBP द्वारा शिक्षकों एवं अन्य लोगों के लिए नियमित कार्यशालाओं का आयोजन करती रहती है। इनमें दूरबीन, स्पेक्ट्रोस्कोप इत्यादि बनाने के प्रशिक्षण से लेकर मौसम, चंद्र एवं सूर्यग्रहण इत्यादि जैसे खगोलीय अवधारणाओं की व्याख्या की जाती है। संस्था द्वारा विज्ञान क्लब चलाना, शैक्षणिक सामग्री का वितरण एवं खगोल विज्ञान तथा भौतिकी के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति का संयोजन करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य किये जाते हैं।</p>
<p>अंतर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञान वर्ष में हम वंचित क्षेत्रों में शिक्षकों एवं छात्रों को अभ्यास पुस्तिकाओं, पोस्टरों खेल-सामग्री, एवं कार्टून आदि का वितरण कर एवं विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन कर हम लोगों के बीच और जागरूकता पैदा कर सकते हैं। एक अफ्रीकी संगठन के लिये खगोल विज्ञान के माध्यम से शिक्षा के विस्तार की यह शुरुवाती सीढ़ी सिद्ध हो सकती है।</p>
<h2>कौशल का निर्माण</h2>
<p>विज्ञान के क्षेत्र में जनसामान्य की भागीदारी बढ़ाने और वैज्ञानिक शिक्षा में सुधार द्वारा अधिक कुशल श्रमशक्ति के विकास में मदद मिलती है।</p>
<div id="pullQuoteL">खगोल विज्ञान वैज्ञानिक शोध में वैचारिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करता है। इस ज्ञान को मौसम, कम्प्यूटर विज्ञान, एवं संचार व्यवस्था जैसे प्रायोगिक विज्ञान के क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है।</div>
<p>खगोल विज्ञान वैज्ञानिक शोध में वैचारिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करता है। इससे अर्जित ज्ञान को मौसम विज्ञान, कम्प्यूटर विज्ञान, एवं संचार व्यवस्था जैसे प्रायोगिक विज्ञान के क्षेत्रों में आसानी से लागू किया जा सकता है। यह करने हेतु जिन उपकरणों की हमें आवश्यकता है वे महंगी भी नहीं है। यदि हम दूरसंवेदी डेटा से तुलना करें तो खगोल विज्ञान संबंधी डाटाबेस सस्ती भी हैं और सहज रूप से उपलब्ध भी हैं। तथापि आंकड़ों की प्रसंस्करण तकनीकें (मसलन, इमेज प्रोसेसिंग) दोनों ही मामलों में एक जैसी हैं।</p>
<p>अच्छी बात यह है कि विश्व में खगोल विज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाले वैज्ञानिकों की सामुदायिक भावना ज्यादा मजबूत हैं एवं उनकी वैज्ञानिक दक्षताएँ ज्यादा हस्तांतरणीय हैं। उदाहरण के तौर पर होल अर्थ टेलीस्कोप (जो आंकड़ों का आदान-प्रदान एवं उनका विश्लेषण करने वाले अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का एक अंतरराष्ट्रीय सहयोगी मंच है) विकासशील देशों के वैज्ञानिकों को अमरीका आमंत्रित करता है ताकि वे  इस परियोजना के संस्थापकों के साथ काम कर सकें व उनसे सीख सकें।</p>
<p>ऐसी परियोजनाओं में विकासशील देशों के शोधकर्ता विश्व के कुछ चुनिंदा एवं सबसे उन्नत वैज्ञानिक अध्ययन का हिस्सा बन सकते हैं और ऐसा करके विश्व के श्रेष्ठ शोधकर्ताओं के एक साझे मंच का विकास होता है। दरअसल वैश्विक सहयोग व नेटवर्किंग की संभावना खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है।</p>
<p>दक्षिण अफ्रीका का राष्ट्रीय परा-भौतिकी एवं खगोल विज्ञान कार्यक्रम (जो 11 विश्वविद्यालयों एवं 4 उन्नत शोध संस्थाओं का एक संयुक्त भागीदारी वाला मंच है जिसमें पीएचडी स्तर तक शिक्षार्थियों का प्रशिक्षित किया जाता है) पूरे देश का एक साझा कार्यक्रम है। इसके तहत पूरे अफ्रीकी महादेश के छात्र केपटाउन विश्वविद्यालय में प्रशिक्षित होते हैं और इनमें से बहुत से वापस अपने देश में ऐसे खगोल विज्ञान संबंधी प्रशिक्षण कार्यक्रमों की बुनियाद रखते हैं।</p>
<h2>ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था</h2>
<p>हाल फिलहाल उन्नत विज्ञान पर औद्योगिक विश्व का एकाधिकार रहा है, परंतु खगोल विज्ञान उस ओर नई राहें बना रहा है।</p>
<p>ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था एवं वैज्ञानिक रूप से शिक्षित वैश्विक समुदाय के निर्माण के लिए विकासशील देशों की सरकारों का विज्ञान के मूलभूत विषयों पर कुछ हद तक निवेश करना आवश्यक है। दक्षिण अफ्रीका ने इसकी काफी पहले ही पहचान कर ली है। वहाँ की सरकार द्वारा 1996 में जारी एक श्वेतपत्र कहता है,</p>
<blockquote><p>&#8220;पूरी दुनिया में जिज्ञासा आधारित विषयों पर शोध को आगे बढाने की एक प्रवृत्ति देखी गयी है जिसका सीधा फायदा होता है कि देश में प्रतिव्यक्ति आय की वृद्धि होती है…इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि मूलभूत विषयों पर शोध को अव्यावहारिक न समझा जाए, क्योंकि यह उन यह मानकों के परिरक्षण करता है जिनके बिना प्रायोगिक विज्ञान का भी जीवन असंभव है।&#8221;</p></blockquote>
<p>किसी भी देश द्वारा खगोल विज्ञान के क्षेत्र में निवेश को सुनिश्चित करने के लिए सबसे अच्छा तरीका है कि विकास हेतु उसके फ़ायदों को समझा जाए। दक्षिण अफ्रीका ने यह दिखा दिया है कि ऐसा करना संभव है। पूरे विश्व में फैले वेधशालाओं एवं खगोल विज्ञान से संबंधित संस्थाओं को चाहिए कि वे SCBP की तरह संस्थानों का विकास एवं समर्थन करें। खगोल विज्ञान से जुड़े समुदायों को मजबूती प्रदान कर विकासशील देश अपने विकास संबंधी लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा सकते हैं।
<p class="note"><em>साई-डेव</em> पत्रिका में पूर्वप्रकाशित <a href="http://www.scidev.net/en/opinions/astronomy-can-foster-development-1.html" target="_blank">इस अंग्रेज़ी लेख</a> का हिन्दी अनुवाद  किया मिशिगन विश्वविद्यालय में प्राध्यापक व हिन्दी चिट्ठाकार <a href="http://tatkaal.blogspot.com/" target="_blank"><strong>विजय ठाकुर</strong></a> ने। शुक्रिया विजय! अनुमति देने के लिये साई-डेव पत्रिका का भी आभार।</p>
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