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	<title>सामयिकी - हिन्दी वेबपत्रिका &#124; Samayiki - Hindi Webzine &#187; राजनीति</title>
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	<description>बदलती दुनिया की साक्षी</description>
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		<title>कश्मीर बहुत छोटा है आज़ादी के लिए</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2010/09/kashmir-too-small-to-be-independent/</link>
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		<pubDate>Tue, 21 Sep 2010 20:21:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[Kashmir]]></category>

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		<description><![CDATA[कश्मीरी मुसलमानों के हित में यही है कि वे यथापूर्व स्थिति को प्राप्त करने का प्रयत्न करें क्योंकि टालमटोल वाली राजनीतिक नीति के रहते यह नामुमकिन है कि "आर या पार" जैसा कोई रवैया भारत सरकार अख्तियार करे।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">क</div>
<p>श्मीर की भौगोलिक स्थिति के विषय में बड़े बड़े लोग, बड़े बड़े अखबार ग़लत लिख जाते हैं। कुछ उदाहरण</p>
<blockquote><p><em><a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/08/100811_leh_update_psa.shtml" target="_new">बीबीसी साइट पर समाचार</a> :</em> भारत प्रशासित कश्मीर में अधिकारियों का कहना है कि लेह में अचानक आई बाढ़ के बाद मरने वालों की संख्या बढ़कर 185 हो गई है.</p></blockquote>
<p><em>त्रुटि :</em> लेह कश्मीर में नहीं है। कश्मीर में तो बाढ़ आई ही नहीं।</p>
<blockquote><p><em>वैष्णो-देवी से लौटे एक श्रद्धालु :</em> मैं अभी कश्मीर होकर आया हूँ। हालात ठीक हैं वहाँ।</p></blockquote>
<p><em>त्रुटि :</em> वैष्णो-देवी जम्मू में है भाई, कश्मीर में नहीं। जम्मू में थोड़े ही जिहाद छिड़ा हुआ है।</p>
<blockquote><p><em><a href="http://www.livehindustan.com/news/1/1/1-1-8471.html" target="_new">दैनिक हिन्दुस्तान की साइट पर समाचार</a> :</em> कश्मीर के द्रास में तापमान शून्य से 14 डिग्री नीचे।</p></blockquote>
<p><em>त्रुटि :</em> द्रास करगिल में है, कश्मीर से सैंकडों मील दूर।</p>
<p>कश्मीरियों की यह आम शिकायत रहती है कि शेष भारत वाले कश्मीर और कश्मीरियों को सही से समझते नहीं। किसी हद तक यह सही भी है। कश्मीर के विषय में कई मिथकों में से एक मिथक यह तोड़ने की आवश्यकता है कि कश्मीर भारत का एक उत्तरी राज्य है। जी नहीं, कश्मीर एक राज्य नहीं बल्कि जम्मू कश्मीर राज्य का एक छोटा सा हिस्सा है &#8211; 6.98 प्रतिशत हिस्सा। यहाँ तक कि यह कहना भी ग़लत है कि &#8220;कश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक है&#8221;, क्योंकि कश्मीर तो भारत का सब से उत्तरी भाग है ही नहीं। वह श्रेय लद्दाख सूबे को जाता है। और यदि भारत का आधिकारिक मानचित्र देखा जाए तो गिलगित और अक्साइ-चिन उससे भी उत्तर में हैं। न लद्दाख, न गिलगित, न अक्साइ चिन कश्मीर का हिस्सा हैं। जिस क्षेत्र को पाकिस्तान आज़ाद कश्मीर कहता है, और हम पाक-अधिकृत कश्मीर, वह क्षेत्र भी दरअसल कश्मीर नहीं है। यह लेख प्रयास है यह बतलाने कि इन अंतरों को समझना क्यों ज़रूरी है, विशेषकर जब कश्मीर घाटी में इतना हंगामा हो रहा है।</p>
<p style="text-align: center"><img class="aligncenter size-full wp-image-201" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/09/kashmir.jpg" alt="" width="509" height="322" /></p>
<p>राजनीतिक शतरंज के खिलाड़ियों ने कश्मीर की भौगौलिक स्थिति और सीमाओं को लेकर हमेशा एक भ्रामक स्थिति बनाए रखी। आम तौर पर जब लोगों से पूछा जाता है कि कश्मीर कहाँ है, तो वे कहते हैं, &#8220;यह रहा&#8221; और भारत के मानचित्र के &#8220;सिर&#8221; की ओर इशारा करते हैं, जैसा कि ऊपर दिये मानचित्र में काले बाणचिह्न से दिखाया गया है। पर वास्तव में वे सचाई से कोसों दूर हैं। इसी नक्शे में लाल बाणचिह्नों के द्वारा लेखक ने कश्मीर की सही स्थिति और सीमा दिखाई है।</p>
<p>ऊपर दिए नक्शे में भारत की सरकारी रूप से मान्य सीमाएँ दिखाई गई हैं, और कश्मीर क्षेत्र को लाल रेखाओं द्वारा रेखांकित किया गया है। यदि आप <a href="http://kaulonline.com/images/kmap4.jpg" target="_blank"><img class="alignright" style="margin: 10px 5px" src="http://kaulonline.com/images/kmap3.jpg" alt="" hspace="5" width="220" height="174" align="right" /></a> एक &#8220;बाहर वाले&#8221; के नज़रिए से देखना चाहें तो विकिपीडिया का दाएँ दिया नक्शा देखें &#8212; इसे क्लिक कर बड़े आकार में देखा जा सकता है। कश्मीर घाटी की सीमाएँ इस नक्शे में भी लाल रेखाओं द्वारा दिखाई गई हैं।</p>
<p>आप पूछेंगे कि कश्मीर और जम्मू-कश्मीर राज्य में भला क्या अन्तर है? यूँ समझें कि सारा झगड़ा कश्मीर का है जम्मू-कश्मीर का नहीं। कश्मीर सुन्नी-मुस्लिम बहुल है, राज्य के अन्य भाग नहीं। कश्मीर में &#8220;गो इंडिया गो&#8221; का नारा लग रहा है, जबकि राज्य के अन्य भाग भारतीय होने में खुश हैं। कश्मीर जम्मू-कश्मीर का एक छोटा सा हिस्सा है।</p>
<p>आप स्वयं ही इन क्षेत्रफलों की तुलना कीजिए :</p>
<table border="1">
<tbody>
<tr>
<td><em>कश्मीर का क्षेत्रफल :</em></td>
<td>15,520.3 वर्ग किमी (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jammu_and_Kashmir" target="_new">विकिपीडिया</a>)</td>
</tr>
<tr>
<td><em>भारत के नियन्त्रण में जम्मू-कश्मीर का क्षेत्रफल :</em></td>
<td>~101,400 वर्ग किमी (<a href="http://www.fsi.nic.in/sfr2003/jk.pdf" target="_new">वन सर्वेक्षण की साइट</a>)</td>
</tr>
<tr>
<td><em>अविभाजित जम्मू-कश्मीर का कुल क्षेत्रफल :</em></td>
<td>222,236 वर्ग किमी (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jammu_and_Kashmir" target="_new">विकिपीडिया</a>)</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p>यानी कश्मीर अविभाजित जम्मू-कश्मीर राज्य का लगभग 7% है, और भारत के अन्तर्गत जम्मू-कश्मीर का लगभग 15%।</p>
<p>पर कश्मीर की परिभाषा क्या है? अच्छा हो कि कश्मीरियों से ही पूछा जाए। कश्मीरी भाषा में घाटी से बाहर के क्षेत्र को &#8220;न्यबर&#8221; कहा जाता है, यानी बाहर या परदेस। कश्मीर उस जम्मू-कश्मीर राज्य का एक छोटा सा हिस्सा है, जो जम्मू, लद्दाख और कश्मीर को मिला कर बना है। राज्य के तीन सूबे हैं जिनमें कश्मीर सूबा सब से छोटा है। और इस छोटू ने ही सब की नाक में दम कर रखा है। इस क्षेत्र में केवल तीन जिले थे &#8212; अनन्तनाग, बारामुल्ला और श्रीनगर, जिन्हें अब दस छोटे जिलों में बाँट दिया गया है। इसी छोटे से क्षेत्र ने पिछले 63 वर्षों में इस इलाके की राजनीति पर अपना बोलबाला कायम किया है।</p>
<p>कश्मीर और जम्मू-कश्मीर के इस अन्तर को हमेशा छुपाया क्यों गया है, और इस अन्तर को उजागर करना क्यों आवश्यक है? दरअसल राज्य का यही छोटा हिस्सा भारत के लिए दर्दे-सर बना हुआ है, क्योंकि इस मुस्लिम बहुल क्षेत्र ने पूरे राज्य को और पूरे क्षेत्र को अपहृत कर रखा है। राज्य का यह भाग जो राज्य का केवल 7% है, स्वयं को एक गैर मुस्लिम देश का भाग मानने में आनाकानी करता है। राज्य के दक्षिण में जम्मू है, जो हिन्दू-बहुल है, जहाँ के लोग पंजाब-हिमाचल जैसे हैं, और उत्तर में लद्दाख है जहाँ बौद्ध और शिया मुस्लिम रहते हैं, कुछ कुछ तिब्बत से मिलता जुलता। दोनों क्षेत्रों को भारत का भाग होने में कोई दिक्कत नहीं है। केवल कश्मीर है, जहाँ गैर-मुस्लिमों के पलायन के बाद अब 97% आबादी मुसलमानों की है। यही वह हिस्सा है जो आग का गोला बना हुआ है। वह खूबसूरत वादी, जिसे कभी जन्नत कहा जाता था, और जिसे अलगाववाद ने जहन्नुम में तब्दील कर दिया गया है। इसी क्षेत्र के अधिकांश वासी इस छोटे से क्षेत्र के लिए आज़ादी की माँग कर रहे हैं। इस राज्य की विविधता, भारत की विविधता में तो घुलमिल जाएगी, पर हरे-झंडे ले लेकर पत्थर बरसाते अलगाववादियों के कश्मीर में कैसे चलेगी?</p>
<div>पाक अधिकृत &#8220;कश्मीर&#8221; में न कश्मीरी रहते हैं, न वहाँ कश्मीरी बोली जाती है। वहाँ बोली जाने वाली भाषाओं में से एक भी भाषा कश्मीरी से नहीं मिलती जुलती। जाहिर है कि नियन्त्रण रेखा ने किसी परिवार को विभाजित नहीं किया।</div>
<p>इस खेल के हर खिलाड़ी के लिए महाराजा हरिसिंह की इस रियासत के ईंट-रोड़े को इकट्ठा रखना एक राजनैतिक मजबूरी रही है &#8212; चाहे वह कहीं की ईंट हो कहीं का रोड़ा। जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में कुछ भी एक सा नहीं है, सिवाय इसके कि यह तीनों सूबे एक ही राजा के अन्तर्गत थे। हर क्षेत्र की अपनी वांशिकता है, अपना मज़हब, अपनी भौगोलिक स्थिति और प्रवृति, अपनी जलवायु, अपनी संस्कृति और अपनी भाषा। देश में किसी भी राज्य में इतनी विविधता नहीं है। यहाँ तक कि 1950 के दशक में देश का भाषाई पुनर्गठन तो हुआ पर इस राज्य को नहीं छुआ गया, क्योंकि इसे विशेष स्टेटस हासिल था। भारत शायद इस राज्य को इसलिए इकट्ठा रखना चाहता है कि जम्मू और लद्दाख कश्मीर और शेष भारत के बीच गोंद का काम करें। भारत को लगता है कि राज्य का विभाजन किया तो देश का विभाजन दूर नहीं होगा। पाकिस्तान भी जम्मू-कश्मीर का नाम एक साथ लेता है ताकि वह पूरे राज्य पर अपना दावा ठोक सके और नौबत पड़ने पर शायद हिन्दू क्षेत्रों की सौदेबाजी कर सके। शायद इसी कारण वे अपने हथियाए हुए इलाके को AJK (आज़ाद जम्मू कश्मीर) कहते हैं, जो न आज़ाद है, न जम्मू है, न कश्मीर है। पाक अधिकृत &#8220;कश्मीर&#8221; में न कश्मीरी रहते हैं, न वहाँ कश्मीरी बोली जाती है। वहाँ बोली जाने वाली भाषाएँ हैं &#8211; पहाड़ी, मीरपुरी, गुज्जरी, हिन्दको, पंजाबी और पश्तो (विकिपीडिया के अनुसार)। इन में से एक भी भाषा कश्मीरी से नहीं मिलती जुलती। इस का अर्थ यह भी है कि नियन्त्रण रेखा ने किसी परिवार को विभाजित नहीं किया है।</p>
<p>पर कश्मीरी अलगाववादियों की क्या मजबूरी है कि वे जम्मू-कश्मीर राज्य की बात कर रहे हैं, जबकि उन्हें केवल कश्मीर क्षेत्र से ही सरोकार है? जब कश्मीरी मुसलमान भारत का हिस्सा होने के विरुद्ध तर्क देते हैं तो कहते हैं कि वे भारतीयों से वांशिक रूप से अलग हैं, उनका धर्म अलग है। उन में से अधिकांश स्वयं को भारतीय नहीं मानते। कश्मीर के मुसलमान डोगरा राजा हरिसिंह के खिलाफ तो 1947 से भी पहले लड़ रहे थे। तो अब वे जम्मू-कश्मीर की बात कैसे कर रहे हैं? वे महाराजा के जीते अन्य क्षेत्रों पर कैसे दावा ठोक सकते हैं, जब वह महाराजा ही उनके लिए पराया था? लद्दाख, बल्तिस्तान और गिलगित तो उस समय रियासत का हिस्सा भी नहीं थे, जब डोगरा राजाओं ने जम्मू कश्मीर को अंग्रेज़ों से खरीदा। लेखक के विचार में कश्मीरियों के इस रवैये के दो कारण हैं &#8212; पहला तो यह कि इस तरह वे कह सकेंगे कि हमें इस्लामी पाकिस्तान नहीं चाहिए बल्कि एक धर्मनिरपेक्ष जम्मू-कश्मीर चाहिए, इससे उन्हें विश्व में सुनवाई मिलेगी &#8212; क्योंकि पाकिस्तान और इस्लामी आतंकवाद दुनिया भर में बदनाम हो चुके हैं। दूसरा, इससे उन्हें सौदेबाजी भी करने के लिए जगह मिल जाती है।</p>
<p>कश्मीर का जम्मू-कश्मीर का एक छोटा सा अंश होना एक ऐसा तथ्य है जिस के और भी कई अर्थ निकलते हैं। अब चूँकि जम्मू और लद्दाख भारत के साथ खुश हैं, उनके ऊपर तो तथाकथित &#8220;आज़ादी&#8221; नहीं थोपी जा सकती। बाकी रहा कश्मीर का 6000 वर्ग मील का क्षेत्रफल। यदि इसे एक अलग देश बनाया जाता है, तो यह विश्व के सब से छोटे &#8220;लैंड लाक्ड&#8221; (ऐसे देश जिनकी कोई सीमा समुद्र से नहीं मिलती) देशों में से होगा &#8211; वैकिटन सिटी, लक्समबर्ग और एकाध ही देश इससे छोटे होंगे। अब आप ही सोचिये कि भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच फंसे इस देश की &#8220;आज़ादी&#8221; कितने दिन चलेगी? भारत से छुटकारा पाएँगे तो पाकिस्तान निगल जाएगा। दरअसल कश्मीर के कुछ नेता और बेशक पाकिस्तान भी तो मूलतः यही चाहते हैं, पर क्या कश्मीर की आम जनता इसी अंजाम के लिए लड़ रही है? क्या पाकिस्तान उन्हें धारा 370 जैसे विशेषाधिकार देगा? क्या वहाँ भी तालिबानी हुकूमत न चलने लगेगी? इतने छोटे से भूमि क्षेत्र में क्या इतने प्राकृतिक संसाधन हैं कि यह एक देश बना रहे? जाड़े के महीनों में कश्मीर बर्फ से घिरा रहता है। समुद्र की बात छोड़ें, सड़क से भी वहाँ पहुँचना दूभर हो जाता है। जम्मू श्रीनगर राजमार्ग बन्द हो जाता है तो कश्मीर में खाने के लाले पड़ जाते हैं। बीबीसी का <a href="http://news.bbc.co.uk/2/shared/spl/hi/south_asia/03/kashmir_future/html/6.stm" target="_new">यह पृष्ठ देखें</a> जिस में बताया गया है कि वादिए-कश्मीर आज़ाद की गई तो केवल 1800 वर्ग मील होगी, यानी भूटान का दसवाँ हिस्सा। यह क्षेत्रफल विकिपीडिया पर दिए क्षेत्रफल से काफी कम है, पर जो भी है इस छोटे से क्षेत्र के देश बनने की कल्पना, वह भी ऐसे माहौल में, किसी का भी भला नहीं करेगा।</p>
<div>लोकतन्त्र में बहुमत की चलती है, तो राज्य के 7-15% क्षेत्रफल में बसी जनसंख्या पूरे राज्य की बाबत फैसला क्यों करे? कठुआ के किसी डोगरी भाषी या लेह के किसी बौद्ध को तो निज़ामे-मुस्तफा की चाहत नहीं है।</div>
<p>कश्मीर का जम्मू-कश्मीर का एक छोटा सा अंश होना इस बात को भी झुठलाता है कि लोकतन्त्र होने के नाते बहुमत की बात मानी जानी चाहिए। बिल्कुल सही है, लोकतन्त्र में बहुमत की ही चलती है, पर राज्य के 7-15% क्षेत्रफल में  बसी जनसंख्या क्या पूरे राज्य की बाबत फैसला करेगी? क्या यह लोकतन्त्र के खिलाफ नहीं होगा? कठुआ में रह रहे एक डोगरी भाषी या लेह में रह रहे किसी बौद्ध को तो निज़ामे-मुस्तफा (इस्लामी शासन) की चाहत नहीं है। कश्मीर तीन ओर से उन क्षेत्रों से घिरा है जो बेशक भारतवादी हैं, और चौथा यानी पश्चिमी सिरा पाकिस्तान ने हथिया रखा है। एक संप्रभु लोकतांत्रिक देश के लिए कोई इलाका कितना बड़ा होना चाहिए जिस के आधार पर इसके निवासियों को आत्मनिर्णय का अधिकार दिया जाए? लोकतन्त्र के नाते, क्या अब इसके बाद हैदराबाद या मेरठ के किसी मुस्लिम बहुल क्षेत्र में रायशुमारी करनी पड़ेगी? कश्मीरी हिन्दुओं की माँग है कि यदि कश्मीरी मुसलमानों उन्हें अपने साथ नहीं रहने देते तो उन्हें &#8220;पनुन कश्मीर&#8221; (अपना कश्मीर) के नाम से कश्मीर के एक हिस्से में बसाया जाए जो भारत का अभिन्न अंग हो। यदि इस बात को बल दिया जाता है तो कश्मीरी अलगाववादियों के पास &#8220;देश&#8221; के नाम पर और भी कम क्षेत्र बचता है।</p>
<p>यदि इतिहास की घड़ी को पीछे धकेला जा सकता तो शायद यह सही रहता कि महाराजा हरिसिंह ने कश्मीर घाटी को अलग कर पाकिस्तान को सौंप दिया होता। पर राज्य की घुलमुल संरचना के कारण ऐसा नहीं हो सका। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न आकांक्षाएँ थीं, सो उन्होंने राज्य को भारत पाकिस्तान दोनों से अलग रखा। उसके बाद पाकिस्तानी कबाइलियों ने जो किया वह सर्वज्ञात है। पर हाँ उस समय यदि वादी पाकिस्तान के हवाले कर दी जाती तो शायद सब के लिए बेहतर होता। कश्मीरी हिन्दू तभी भारत का हिस्सा बन गये हो, पाकिस्तान से आसे अन्य हिन्दूओं की तरह। कश्मीरी मुसलमान खुश होते या नहीं, यह अंदाज लगाना मुश्किल है। पर बेशक कोई &#8220;आज़ादी की लड़ाई&#8221; तो नहीं चल रही होती।</p>
<p>अलगाववादियों को धर्मनिरपेक्षता, आज़ादी और जम्मू-लद्दाख की चिन्ता का ढ़ोंग तो छोड़ देना चाहिये। कश्मीर घाटी का मर्ज़ एक कैंसर का रूप धारण कर चुका है। घातक मर्ज़ के लिए दवा भी घातक चाहिए। कोई भी चरम उपाय होगा तो पूरे शरीर को तकलीफ तो होगी ही। या तो बीमारी का उपचार किया जाय या विष ग्रसित अंग को ही शरीर से पृथक कर दिया जाय। दर्दनाक बात है पर वाकई कश्मीर का आकार इतना छोटा है कि इसके ना होने पर भारत के मानचित्र में कोई बहुत ज़्यादा अन्तर नहीं पड़ेगा।  घाटी को या तो देश में पूरी तरह समाहित करना चाहिये (दफा 370 हटाकर) या फिर पूरी तौर से दफा।</p>
<p>किसी भी देशभक्त भारतीय की तरह लेखक को भी कश्मीर में लोगों की तकलीफें, और कत्लो-गारत देख कर तकलीफ होती है। पर वहाँ लोग क्यों मारे जा रहे हैं? वहाँ जो अलगाववादी हिंसा हो रही है, उसके कारण वहाँ सेना है, या सेना होने के कारण अलगाववादी हिंसा है? 1989 से पहले तो सब ठीक था। आप ही बतायें, यदि यह जिहाद आज ही समाप्त हो जाए, तो क्या कुछ ही समय में वहाँ से सेना नहीं हटे जायेगी? कश्मीरी अलगाववादियों को इस प्रश्न का उत्तर मालूम है। उन्हें और उनके नेताओं को यह पता है कि वे जिस दिन चाहेंगे उस दिन निर्दोष लोगों की मौतों को रोक सकते हैं। पर अलगाववादियों की सोच यही है कि जब तक असहाय लोग कुरबान नहीं होंगे तब तक निज़ामे-मुस्तफा नहीं मिलेगा।</p>
<p>इतिहास कहता है कि टालमटोल राजनीतिक शक्ति के रहते यह नामुमकिन है कि &#8220;आर या पार&#8221; जैसा कोई रवैया भारत सरकार अख्तियार करे। शायद इसलिए कश्मीरी मुसलमानों के हित में यही है कि वे यथापूर्व स्थिति को प्राप्त करने का प्रयत्न करें &#8212; लड़ाई झगड़ा छोड़ें, भारत के विरुद्ध छिड़ा जेहाद समाप्त करें, स्कूलों, दफ्तरों, सिनेमाओं, खेलगाहों, यहाँ तक कि मैखानों में जाना शुरू करें। जो हिन्दू घाटी छोड़ कर जा चुके हैं, वे तो संभवतः लौटेंगे नहीं। 1989 से पहले जो था, उसे हासिल करें। पर शुरुवात पत्थर-बाज़ी बंद होने से ही हो सकती है।<br />
&#8211;<br />
<a href="http://kaulonline.com/blog/2010/09/kashmir-is-too-small-for-azadi/" target="_new">मूल अंग्रेज़ी लेख</a> से लेखक द्वारा स्वयं अनूदित।</p>
<img src="http://www.samayiki.com/sam/?ak_action=api_record_view&id=185&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		</item>
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		<title>निष्कर्षों में फटकार, सिफारिशों में पुचकार</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/11/liberhan-commission-report/</link>
		<comments>http://www.samayiki.com/2009/11/liberhan-commission-report/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 16:00:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सिद्धार्थ वरदराजन</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[Advani]]></category>
		<category><![CDATA[Ayodhya]]></category>
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		<category><![CDATA[Shiv Sena]]></category>
		<category><![CDATA[Tadic judgment]]></category>

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		<description><![CDATA[बाबरी मस्जिद मामले की तफ़्तीश कर रही लिब्रहान आयोग की 17 साल बाद जारी रपट ने साजिश का पर्दाफाश तो किया पर देश को साम्प्रदायिक प्रलय की ओर ढकलने के लिए दोषी पाये गये 68 व्यक्तियों को सजा देने की बात पर चुप्पी साध ली।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="aligncenter size-full wp-image-164" title="baabri_masjid_story" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/baabri_masjid_story.jpg" alt="baabri_masjid_story" width="565" height="300" /></p>
<div class="dropCap">हि</div>
<p>न्दुस्तानी में एक कहावत है &#8211; खोदा पहाड़ निकली चुहिया &#8211; लम्बे तथा कठिन रियाज के बाद जब नतीजा अपेक्षाकृत बहुत कम निकलता हो, उन हालात में इस मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है।</p>
<p>न्यायमूर्ती एम.एस.लिब्रहान ने 17 साल अथक परिश्रम किया जिस दरमियान शुरुआती तीन माह की नियुक्ति के उनके कार्यकाल को 40 बार बढ़ाया गया, उन्होंने 1029 पृष्टों की एक रिपोर्ट तैयार की जो उन तमाम हकीकतों और हालात का तफ़सील से ब्यौरा देती है जिनके के कारण 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाया गया। उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले नहीं है बल्कि स्पष्ट तथा बुलन्द हैं: यह विध्वंस एक सोची समझी साजिश का नतीजा था &#8211; एक  &#8220;संयुक्त सामान्य उद्यम&#8221; &#8211; जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, शिव सेना तथा भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा रचा गया था, इनमें से अन्त में उल्लिखित संगठन को रिपोर्ट ने जायज तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का &#8220;मोहरा&#8221; बताया है।</p>
<p>दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन निर्भीक तथ्यान्वेषणों के बावजूद जो सिफारिशें दी गई हुई हैं वे इतनी कायराना हैं कि उनकी रपट के प्रारंभ में दिये स्पष्टवादी निष्कर्षों से कोई समानता ही नहीं है। देश को साम्प्रदायिक महाविपदा के मुहाने पर ढकलने के लिए 68 व्यक्तियों को दोषी पाए जाने के बावजूद श्री लिब्रहान न तो विध्वंस-मामले में अब तक आरोपित होने से बच रहे लोगों के खिलाफ़ आरोप दाखिल करने की संस्तुति करते हैं, ना ही वे आपराधिक कार्रवाई को तेजी से निपटाने की बात करते हैं।</p>
<div id="attachment_172" class="wp-caption alignright" style="width: 260px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/liberhan.jpg"><img class="size-full wp-image-172" title="liberhan" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/liberhan.jpg" alt="न्यायमूर्ती एम.एस.लिब्रहान ने 17 साल के परिश्रम से 1029 पृष्टों की रिपोर्ट तैयार की जो 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाये जाने की घटना का पूर्ण विवेचन करती है।" width="250" height="165" /></a><p class="wp-caption-text">न्यायमूर्ती एम.एस.लिब्रहान ने 17 साल के परिश्रम से 1029 पृष्टों की रिपोर्ट तैयार की जो 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाये जाने की घटना का पूर्ण विवेचन करती है।</p></div>
<p>यह बात इसलिये भी चौंकाने वाली लगती है क्योंकि उन्होंने षड़यंत्र का विवरण देने के लिये बार बार ’संयुक्त सामान्य उद्यम’ (joint common enterprise) का जुमला दोहराया है। 1999 में तत्कालीन युगोस्लाविया की बाबत <a title="1999 Tadic judgment of the International Criminal Tribunal for the former Yugoslavia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bosnian_Genocide" target="_blank">टैडिक फैसले</a> के बाद से सीधी भागीदारी न होने के बावजूद जिन लोगों ने जानबूझकर इन कृत्यों को बढ़ावा दिया हो तथा जो लोग इन कृत्यों में लिप्त संगठनों के शीर्ष पर होते हैं उन पर दायित्व डालने की अन्तर्राष्ट्रीय फौजदारी कानून में सामूहिक अपराधों के ऐसे मामलों की बाबत बाद के वर्षों में एक धारणा विकसित हुई है।</p>
<p>यदि श्री लिब्रहान ने अपनी सिफारिशों में उपरोक्त विचार को लागू किया होता तथा इस बात पर जोर दिया होता कि राजनेता, पुलिस अफ़सर और नौकरशाह जिस व्यापक दण्डाभाव का लाभ लेते आए हैं उस का अन्त हो तो यह मुल्क उनका एहसान मानता। परन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है। धर्म तथा राजनीति को अलग रखने तथा अन्य कुछ अन्य ढीले ढाले सुझाव देने के अतिरिक्त, इस रिपोर्ट ने विध्वंस मामले में तात्कालिक न्याय सुनिश्चित करने अथवा देश को इस त्रासदी की पुनरावृत्ति से बचाने के लिए संस्तुति देने से पल्ला झाड़ लिया है।</p>
<p>शायद श्री लिब्रहान अथवा उनके कमीशन की यह इतनी कमी नहीं है जितनी हमारी पुलिस तथा न्याय प्रणाली द्वारा उन्हीं नतीजों पर पहुंच कर फिर त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करने की अक्षमता का दोष है।</p>
<div id="pullQuoteL">&#8220;कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उनके दामन पर दाग न लगे और भविष्य में राजनैतिक इस्तेमाल हेतु उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखा जा सके।&#8221;</div>
<p>दसवें अध्याय में न्यायमूर्ति लिब्रहान अभियोज्यता की बाबत एक स्पष्ट बयान देते हैं:  &#8220;इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं कि  &#8216;संयुक्त-सामान्य-उद्यम&#8217; विध्वंस की पूर्व नियोजित कार्रवाई थी जिसकी तात्कालिक रहनुमाई विनय कटियार, परमहंस रामचन्द्र दास, अशोक सिंघल, चम्पत राय, स्वामी चिन्म्यानंद, एस.सी. दीक्षित, बी.पी.सिंघल तथा आचार्य गिरिराज कर रहे थे। ये मौके पर मौजूद वह स्थानीय नेता थे जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघएस द्वारा बनाई गई योजना को क्रियान्वित करना था। अन्य नेता [लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी तथा अन्य] उनके प्रतिनिधिरूप दायित्व के कारण दोषमुक्त नहीं माने जा सकते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा सौंपी भूमिका को स्वेच्छा से निभाया। अयोध्या अभियान को उनका निश्चित समर्थन तथा दीर्घकाल तक चले अभियान के निर्णायक चरण में उनकी सशरीर मौजूदगी से यह तथ्य अकाट्य रूप से स्थापित हो चुका है। मेरा यह निष्कर्ष है कि इस रपट में नामित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा, विहिप, शिव सेना तथा उनके पदाधिकारियों ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के साथ आपराधिक गठजोड़ स्थापित कर विवादित जगह पर मन्दिर निर्माण के लिए एक  &#8216;संयुक्त-समान-उद्यम&#8217; स्थापित कर लिया था। लोकतंत्र को नष्ट करने की सोची समझी कार्रवाई के तहत उन्होंने धर्म और राजनीति के घालमेल करने का काम किया।“</p>
<p>मस्जिद गिराया जाना, &#8220;एक ठोस और सुनियोजित योजना का चरम बिन्दु था जिसमें धार्मिक, राजनैतिक तथा उपद्रवियों का नेतृत्व करने वाला एक पूरा प्रतिष्ठित कुनबा शामिल था&#8221;। न्यायमूर्ति लिब्रहान यह सही कहा कि, &#8220;कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उनके दामन पर दाग न लगे और भविष्य में राजनैतिक इस्तेमाल हेतु उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखा जा सके।&#8221;  इस प्रकार आडवाणी और जोशी, भले ही वे इस &#8216;संयुक्त-सामान्य-उद्यम&#8217; में दूसरे स्तर पर भागीदार रहे हों और संघ परिवार द्वारा प्रदत्त ढाल से लैस हों, राजनैतिक तथा कानूनी दायित्व से नहीं बच सकते।</p>
<p>सत्रह साल बीत जाने के बाद, इस &#8216;संयुक्त-सामान्य-उद्यम&#8217; के भागीदार रहे कई अपराधी मर चुके हैं। परन्तु इनमें से कई इस बिना पर फलते फूलते रहे कि वे कानून के ऊपर थे। भले ही यह देश ढीली ढाली सिफ़ारिशों के कारण न्यायमूर्ति लिब्रहान की निंदा करे,  इस रपट के मर्म में इतनी महत्वपूर्ण जानकारियाँ तो हैं जिनकी मदद से कोई भी दमदार जाँच एजेन्सी षड़यन्त्र का अचूक मामला बना सके। ऐसे कई किरदार जिनकी स्मृति इस आयोग के समक्ष धूमिल हो गयी थी,  हमारी पुलिस की अजकल की पारंगत पूछताछ, जिसमें नार्को परीक्षण शामिल होता है, के समक्ष ज्यादा देर न टिक पायेंगें। इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार यदि वाकई गंभीर हैं तो पूरक आरोप पत्र दाखिल कर सकती है तथा बाबरी मस्जिद ध्वंस किए जाने के मामले को <em>फास्ट-ट्रैक</em> तरीके से नियति तक पहुंचा सकती है ताकि आखिरकार न्याय हो सके।</p>
<p class="note">हिन्दी अनुवाद के लिये <a href="http://samatavadi.wordpress.com" target="_blank">अफलातून जी</a> का शुक्रिया</p>
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		<title>और फिर, वे मुझे मारने आए</title>
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		<pubDate>Sat, 31 Jan 2009 16:56:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सामयिकी दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[Lasantha Wickramatunga]]></category>
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		<description><![CDATA[श्रीलंका जैसे संघर्षरत देश में सच बोलने के खतरे जानते हुये भी कुछ पत्रकार अन्तरात्मा की पुकार पर कलम थामे हुये हैं। प्रस्तुत लेख द संडे लीडर के दिवंगत संपादक का अंतिम संपादकीय है जिसे उन्होंने अपनी हत्या किये जाने पर प्रकाशित करने का निर्देश दिया था।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">50 वर्षीय <strong>लसन्त विक्रमातुंगा</strong> श्रीलंकाई अखबार <strong><a href="http://www.thesundayleader.lk/" target="_blank">द संडे लीडर</a></strong> के संपादक थे, यह अखबार सत्तारुढ़ दल की नीतियों का विरोध करता रहता है। 8 जनवरी 2009 को कोलंबो के निकट विक्रमातुंगा की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उन पर इसके पहले भी जानलेवा हमले हुये थे और उन्हें अंदेशा था कि उनकी जान लेने के प्रयास फिर किये जायेंगे। प्रस्तुत लेख इस दिवंगत संपादक का अंतिम संपादकीय है जिसे उन्होंने अपनी हत्या किये जाने पर प्रकाशित करने का निर्देश दिया था। यह आलेख श्रीलंका जैसे संघर्षरत देश में पत्रकारिता करने और सच बोलने के खतरों का खुलासा तो है ही, भारत के उन पत्रकारों के लिये सबक भी जो स्वाभिमान, अन्तरात्मा, साहस, प्रतिबद्धता और बलिदान जैसे लफ्ज़ों से वाकिफ नहीं हैं।</div>
<div class="wp-caption alignright" style="width: 160px"><img title="लसन्त विक्रमातुंगा" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/lasantha_wickramatunga,.jpg" alt="Lasantha Vikramatunga" width="150" height="190" /><p class="wp-caption-text">लसन्त विक्रमातुंगा पर पहले भी जानलेवा हमले हुये थे और उन्हें अंदेशा था कि उनकी जान लेने के प्रयास फिर किये जायेंगे। इसी लिये अपना अंतिम संपादकीय वे पहले ही लिख छोड़ गये।</p></div>
<p><span class="dropCap">ऐ</span>सा कोई और व्यवसाय नहीं है जहाँ अपने कर्मचारियों से अपने काम के लिए जीवन न्योछावर कर देने की उम्मीद रखी जाती हो, सिवाय सैनिक बल के, और श्रीलंका में, पत्रकारिता के। पिछले कुछ वर्षों के दौरान स्वतन्त्र मीडिया पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। रेडियो-टीवी और पत्र-पत्रिकाओं के संस्थानों को जलाया गया, उन पर बम फेंके गये, उन्हें कुर्क कर दिया गया और दबाव डाला गया। अनगिनत पत्रकारों को डराया, धमकाया, और मार डाला गया है। मुझे इन सब श्रेणियों से जुड़ने का गौरव प्राप्त हुआ है, और अब विशेषकर अन्तिम श्रेणी से।</p>
<p>पत्रकारिता के क्षेत्र में मैं बहुत समय से हूँ। 2009 द संडे लीडर का पन्द्रहवाँ वर्ष होगा। इस दौरान श्रीलंका में बहुत कुछ बदला है, और मुझे यह बताने की आवश्यकता नहीं कि ज़्यादातर बदलावों ने हालात बदतर ही किये हैं। हम एक ऐसे गृहयुद्ध के बीच जी रहे हैं, जिसे बेरहमी से चलाने वाले कर्णधारों की खून की प्यास का कोई अन्त नहीं है। आतंक, भले वह आतंकवादियों द्वारा फैलाया जा रहा हो या सरकार द्वारा, एक रोज़मर्रा की चीज़ बन गया है। बेशक हत्या एक ऐसा प्राथमिक शस्त्र बन गया है जिसके बलबूते पर सरकार मुल्क की स्वतन्त्रता बनाये रखना चाहती है। आज पत्रकार उनके निशाने पर हैं, कल जज होंगे। दोनों के ही लिए खतरे आज सबसे अधिक हैं।</p>
<p>फिर हम ऐसा क्यों करते हैं?? मैं अक्सर सोचता हूँ इस बारे में। आखिरकार, मैं भी एक पति हूँ, तीन नायाब बच्चों का पिता हूँ। वकालत हो या पत्रकारिता, इन व्यवसायों से परे भी मेरी ज़िम्मेदारियाँ हैं। क्या इतना खतरा मोल लेना वाजिब है? बहुत से लोग मुझे कहते हैं कि नहीं है। दोस्त कहते हैं कि वकालत में वापस चले जाओ; और ईश्वर जानता है कि यह रोज़गार बेहतर भी है और सुरक्षित भी। दूसरे लोगों ने, जिन में दोनों ओर के राजनैतिक नेता हैं, मुझे राजनीति में घुसने को उकसाया है, यहाँ तक कि मेरी पसन्द के मन्त्रालय तक देने का वादा किया है। श्रीलंका में पत्रकारों को जिन खतरों को दोचार होना पड़ता है यह पहचानते हुए कई राजनयिकों ने मुझे अपने देशों तक सुरक्षित ले जाने और वहाँ निवास के अधिकार की पेशकश की है। अगर मैं किसी चीज़ के कारण फंसा भी हूं तो कम से कम वो चीज़ विकल्पों की कमी तो नहीं है।</p>
<div id="pullQuoteL">स्वतन्त्र मीडिया पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। बहुत से लोग मुझे कहते हैं कि इतना खतरा मोल लेना वाजिब है। परन्तु ऊँचे पद, यश, धनधान्य और सुरक्षा की आवाज़ से भी ऊँची एक आवाज़ होती है। वह आवाज़ है अन्तरात्मा की।</div>
<p>परन्तु ऊँचे पद, यश, धनधान्य और सुरक्षा की आवाज़ से भी ऊँची एक आवाज़ होती है। वह आवाज़ है अन्तरात्मा की।</p>
<p>संडे लीडर एक विवादास्पद अखबार रहा है क्योंकि हम खरे को खरा कहते हैं और खोटे को खोटा। हम प्रियोक्ति की आड़ में नहीं छिपते। हम जो खोजी लेख छापते हैं, वह ऐसे दस्तावेज़ी प्रमाणों के बल पर खड़े होते हैं जो नागरिकों ने जान जोखिम में डाल कर हम तक पहुँचाए होते हैं। हमने सकैंडल दर स्कैंडल पर्दाफाश किया है, और पन्द्रह सालों में एक बार भी हमें न किसी ने ग़लत साबित किया है, न ही अदालतों में हमारे विरुद्ध सफलता पाई है।</p>
<p>स्वतन्त्र मीडिया एक ऐसा दर्पण है जिस में जनता को अपनी सही छवि दिखती है, बिना मस्करा और स्टाइलिंग जेल के। हमसे आपको अपने देश के हालात पता चलते हैं, और विशेष रूप से उसका नेतृत्व कर रहे उन लोगों का हाल जिन्हें आपने इसलिए चुना था ताकि आपके बच्चों को एक बेहतर भविष्य नसीब हो। कई बार उस दर्पण में दिखने वाली छवि आप को भली नहीं लगती। पर जहाँ आप अपनी आराम कुर्सी में बैठे झुँझला रहे होते हैं, वहीं आप को यह आईना दिखाने वाले पत्रकार खुलेआम ख़तरा मोल रहे होते हैं। यही हमारा पेशा है, और हम इस से मुँह नहीं मोड़ते।</p>
<p>हर अखबार का एक दृष्टिकोण होता है। हमारा भी है, और हम इस बात को छिपाते नहीं। हमारी श्रीलंका को एक पारदर्शी, धर्म निरपेक्ष व उदारवादी जनतन्त्र के रूप में देखने हेतु प्रतिबद्धता है। इन शब्दों पर ध्यान दें, क्योंकि हर शब्द का एक गहरा अर्थ है। पारदर्शी, ताकि सरकार जनता को अपने काम का खुला हिसाब दे और उनका भरोसा न तोड़े। धर्म निरपेक्ष, क्योंकि हमारे जैसे बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक समाज में केवल धर्म निरपेक्षता ही ऐसा मंच प्रदान करती है जिस पर हम सब एक हो सकते हैं। उदारवादी, क्योंकि हम इस बात को पहचानते हैं कि हर मनुष्य अलग है और हमें उसे वैसा ही स्वीकार करना है जैसा वह है, न कि वैसा जैसा हम उसे बनाना चाहते हैं। और जनतान्त्रिक&#8230; खैर, अगर मुझे आपको यह समझाना पड़े कि इसकी आवश्यकता क्यों ज़रूरी है तो बेहतर है कि आप यह अखबार खरीदना ही बन्द कर दें।</p>
<p>संडे लीडर ने कभी भी सुरक्षा पाने की खातिर बिना सवाल उठाए बहुमत के मत को बढ़ावा नहीं दिया है। आप और मैं जानते हैं कि अखबार बेचने का तरीका ही यही है। पर इसके उलट, जैसा कि इतने सालों से छपे हमारे संपादकीय दर्शाते हैं, हम अक्सर ऐसे विचारों को व्यक्त करते हैं जो लोगों को कड़वे लगते हैं। उदाहरण के लिए हमने इस मत को बढ़ावा दिया है कि जहाँ अलगाववादी आतंक का खात्मा होना ज़रुरी है, वहीं उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है आतंक के मूल कारणों की ओर ध्यान देना। हमने सरकार पर दबाव डाला है कि वे श्रीलंका के जातीय संघर्ष को इतिहास के परिपेक्ष्य में देखें, न कि आतंकवाद की दूरबीन से। हमने तथाकथित आतंक के खिलाफ जंग में सरकारी आतंकवाद की भी भर्त्सना की है, और अपने इस भय को भी छिपाया नहीं है कि श्रीलंका विश्व का इकलौता देश है जो आए दिन अपने ही नागरिकों पर बम बरसाता है। ऐसे विचारों के लिए हमें गद्दार भी कहा गया है, और यदि यह गद्दारी है तो हमें गद्दार कहलाने में गर्व है।</p>
<p>कई लोगों को सन्देह है कि संडे लीडर का कोई राजनीतिक एजेंडा है, यह सच नहीं है। यदि हम विपक्ष से ज़्यादा सरकार की आलोचना करते हैं, तो वह केवल इसलिए कि, क्रिकेट की भाषा इस्तेमाल करने के लिये क्षमा करें, फील्डिंग करने वाली टीम को गेंदबाजी करने से क्या फायदा। हमारे अस्तित्व के उन वर्षों को याद करें जब यूएनपी का शासन था, हम उनके गले की सबसे बड़ी फांस बने रहे, और हमने जहाँ जहाँ ज़्यादती और भ्रष्टाचार देखा वहाँ वहाँ उसकी कलई खोली। संभव है कि हमारे द्वारा छापे गए निरन्तर भंडाफोड़ उस सरकार के धाराशायी होने के कारणों में शामिल रहे हों।</p>
<p>न ही हमारी यु्द्ध की नापसन्दगी से यह अर्थ निकाला जाना चाहिए कि हम टाइगर्स का समर्थन करते हैं। लिट्टे इस ग्रह पर नमूदार होने वाले सब से निर्मम और नृशंस संगठनों में से एक है। इस में कोई दो राय नहीं कि इस का खात्मा होना चाहिए। पर ऐसा करने के लिए तमिल नागरिकों के अधिकारों को छीनना, उन को बेरहमी से बमों और गोलियों का शिकार बनाना न केवल ग़लत है, बल्कि सिंहलियों के लिए शर्म की बात है, जिनके धम्म के संरक्षक होने के दावे पर उनकी बर्बरता से प्रश्न चिह्न लग जाता है &#8211; ऐसी बर्बरता जिसका अधिकांश ज़िक्र सेंसरशिप के कारण आम लोगों तक नहीं पहुँचा।</p>
<div id="pullQuoteR">लिट्टे इस ग्रह पर नमूदार सबसे नृशंस संगठनों में से एक है। इस का खात्मा होना चाहिए। पर ऐसा करने के लिए तमिल नागरिकों के अधिकारों को छीनना, उनको बमों और गोलियों का शिकार बनाना न केवल ग़लत है, बल्कि सिंहलियों के लिए शर्म की बात है।</div>
<p>और तो और, देश के उत्तर और पूर्व के सैन्य अधिग्रहण का अर्थ है कि इस क्षेत्रों के तमिल लोग, आत्मसम्मान गंवा कर, सदा द्वितीय श्रेणी के नागरिक बने रहेंगे। यह मत सोचिए कि आप युद्ध के पश्चात उन पर “विकास” और “पुनर्निर्माण” की वर्षा कर के उन्हें प्रसन्न कर पाएँगे। युद्ध के घाव उन्हें सदा के लिए दाग़दार कर देंगे, और आप का सामना एक ऐसी पीढ़ी से होगा जो पहले से भी कड़वी और घृणापूर्ण होगी। इस तरह एक ऐसी समस्या जिसका राजनीतिक हल संभव है, एक नासूर बन जाएगा और आगामी युगों के लिए बस संघर्ष की राहें खोलेगा। यदि मैं क्रुद्ध और कुंठित लग रहा हूँ, तो केवल इसलिए कि मेरे अधिकतर हमवतन &#8211; और सारी सरकार &#8211; दीवार पर साफ साफ लिखी इबारत पढ़ नहीं पा रहे हैं।</p>
<p>यह सर्वविदित है कि दो बार मेरे ऊपर जानलेवा हमला हुआ, और एक बार मेरे घर पर मशीनगनों से गोलियाँ बरसाई गई। सरकार के पाखंडी आश्वासनों के बावजूद इन आक्रमणों को अंजाम देने वालों की कभी गंभीर रूप से पुलिस जाँच नहीं हुई और हमलावरों को कभी पकड़ा नहीं गया। इन सब मामलों में, मेरे पास यह सोचने की वजह है कि हमले सरकार द्वारा कराए गए थे। आखिरकार जब मुझे मारा जाएगा, तो मुझे मारने वाली भी सरकार ही होगी।</p>
<p>इसमें विडंबना यह है की बात यह है कि महिन्दा और मैं 25 वर्षों से भी अधिक समय से मित्र हैं, अधिकतर लोगों को यह बात मालूम नहीं है। मुझे लगता है कि मैं उन कुछ ही बचे खुचे लोगों में से हूँ जो उसे उसके प्रथम नाम से बुलाते हैं, और उससे बात करते समय चिरपरिचित सिंहली शैली में ओया कह कर संबोधित करते हैं। हालाँकि मैं उनके द्वारा समाचार संपादकों के लिए रखी गई नियमित बैठकों में भाग नहीं लेता, शायद ही कोई महीना होता होता जब हम, निजी रूप से या कुछ निकट मित्रों के साथ देर रात राष्ट्रपति भवन में, मिलते न हों। हम गप्पे हाँकते हैं, सियासत छाँटते हैं और पुराने दिनों के बारे में हंसी ठट्ठा करते हैं। इस लिए उनके लिए कुछ संदेश देना तो यहाँ बनता ही है।</p>
<p>महिन्दा, जब तुमने 2005 में एसएलएफपी के राष्ट्रपति नामांकन की जंग अंततः जीत ली, तो इस स्तंभ से अधिक स्वागत तुम्हारा कहीं नहीं हुआ। बेशक, हमने तुम्हें तुम्हारे प्रथम नाम से पुकार कर अपनी एक दशक पुरानी परम्परा को तोड़ा। मानवाधिकारों और उदारवादी मूल्यों की ओर तुम्हारी प्रतिबद्धता के लिए तुम इतने जाने जाते थे कि हमने तुम्हारा स्वागत ताज़ी हवा के एक झोंके की तरह किया। फिर, अपने एक मूर्खतापूर्ण काम के कारण, तुमने खुद को हंबातोता सहायता घोटाले में फंसा पाया। बहुत आत्मचिन्तन करने के बाद ही हमने वह समाचार सार्वजनिक किया, और साथ ही तुमसे पैसा लौटाने का भी अनुरोध किया। तुमने कई सप्ताह बाद ऐसा किया तो सही, पर तब तक तुम्हारी प्रतिष्ठा पर दाग लग चुका था। तुम अभी भी उसी का दाग़ धोने की कोशिश कर रहे हो।</p>
<p>तुमने स्वयं मुझे बताया कि तुम्हें राष्ट्रपति पद का लोभ नहीं है। तुम्हें उसकी तलाश में भटकना भी न पड़ा: वह तुम्हें बैठे बिठाए मिल गया। तुमने मुझे बताया है कि तुम्हारे बेटे ही तुम्हारे लिए सब से बड़ी खुशी हैं, और तुम्हें उन के साथ समय बिताना इतना अच्छा लगता है की सरकारी मशीनरी चलाने का काम तुमने अपने भाइयों के भरोसे छो़ड़ दिया है। अब सब को स्पष्ट दिख रहा है कि वह मशीनरी इतनी अच्छी तरह काम कर रही है कि मेरे बेटी और बेटों के सिर से ही पिता का साया उठ गया है।</p>
<p>मुझे पता है कि मेरी मृत्यु के पश्चात तुम वही पाखंड भरी बातें करोगे और पुलिस से जल्द और सघन जाँच करने का अनुरोध करोगे। पर जैसा कि तुम्हारे आदेश पर हुई पिछली सभी जाँचों में हुआ है, इस जाँच से भी कुछ नहीं निकलेगा। क्योंकि सच यही है कि हम दोनों को मालूम है मेरी मौत के पीछे कौन है, पर उसका नाम लेने का साहस नहीं कर सकते। मेरा ही नहीं, तुम्हारि साँस भी इसी बात पर टिकी है।</p>
<p>दुख की बात है कि, तुमने युवावस्था में तो इस देश के लिए बहुत सपने देखे थे, पर केवल तीन साल में तुमने इनको ख़ाक में मिला दिया है। देशभक्ति के नाम पर तुमने मानवाधिकारों को रौंदा है, बेलगाम भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है, और जनता के धन को ऐसे लुटाया है जैसे तुमसे पहले किसी राष्ट्रपति ने नहीं लुटाया। बेशक तुमने उस छोटे से बच्चे जैसा व्यवहार किया है, जिसे एक खिलौनों की दुकान में अचानक खुला छोड़ दिया गया हो। न, यह तुलना शायद सही नहीं है क्योंकि कोई भी बच्चा इस भूमि पर इतना रक्त नहीं बहा सकता था, जितना तुमने बहाया, न ही नागरिकों के अधिकारों का इतना हनन कर सकता था जितना तुमने किया। तुम्हें इस समय सत्ता के नशे में तो दिखाई नहीं दे रहा होगा, पर तुम अपने बच्चों के लिए छोड़ी इस रक्तरंजित विरासत के लिए पछताओगे। इस का परिणाम त्रासदी भरा ही होगा। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं एक स्वच्छ अन्तरात्मा ले कर अपने सृष्टिकर्त्ता से मिलने जा रहा हूँ। काश जब आखिर तुम्हारा समय आए, तुम भी ऐसा कर सको। काश।</p>
<p>जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मुझे यह सन्तुष्टि है कि मैं सीना तान कर चला और किसी के सामने झुका नहीं। और इस सफर पर मैं अकेला नहीं चला। मीडिया की अन्य शाखाओं में मेरे सह-पत्रकार मेरे साथ चले हैं &#8211; उन में से अधिकांश अब या तो मृत है, बिना मुकदमे के कारावास में हैं, या कहीं दूर देश-निकाले पर हैं। कुछ और हैं जो मौत की उस छाया में जी रहे हैं जो तुम्हारी हुकूमत ने उन आज़ादियों पर डाली है जिन के लिए कभी तुम स्वयं लड़े थे। तुम्हें यह भूलने नहीं दिया जाएगा कि मेरी मौत तुम्हारे रहते हुई। मुझे मालूम है तुम्हें दुख तो होगा, पर यह भी मालूम है कि तुम्हारे पास मेरे हत्यारों को बचाने के इलावा कोई चारा नहीं होगा &#8211; तुम ख्याल रखोगे कि उस दोषी को कभी दंड न मिले। तुम्हारे पास कोई विकल्प नहीं है। मुझे तुम पर दया आती है, और शिरान्ति जब अगली बार कन्फ़ेशन के लिए जाएगी तो उसे बहुत देर घुटनों के बल रहना पड़ेगा, क्योंकि उसे न सिर्फ अपने पाप स्वीकारने होंगे बल्कि अपने उस विस्तृत परिवार के भी जो तुम्हें राजगद्दी पर बैठाए हुए हैं।</p>
<div id="pullQuoteL">मार्टिन नीमोइलर अपने यौवन में यहूदी-विरोधी था और हिटलर का प्रशंसक। पर जब नाज़ीवाद ने जर्मनी में जड़ें पकड़ीं, तो उस ने नाज़ीवाद की असलियत देखी &#8211; हिटलर केवल यहूदियों का ही विनाश नहीं करना चाहता था, बल्कि उन सबका जिनका दृष्टिकोण भिन्न हो।</div>
<p>जहाँ तक संडे रीडर के पाठकों का प्रश्न है, मैं उन्हें हमारे लक्ष्य का समर्थन करने के लिए धन्यवाद कहने के अतिरिक्त क्या कह सकता हूँ। हमने अलोकप्रिय उद्देश्यों के लिए आवाज़ उठाई है। ऐसे लोगों के लिए खड़े रहे हैं जो स्वयं इतने निर्बल है कि खड़े नहीं रह सकते। ऐसे ऊँचे और बलशाली लोगों से भिड़े हैं जो सत्ता के नशे में चूर हो कर अपनी जड़ों को भूल गए हैं। भ्रष्टाचार का, और आप की खून पसीने के कमाई के टैक्स-रुपयों को व्यर्थ गवाँए जाने का पर्दाफाश किया है, और इस बात को सुनिश्चित किया है कि सरकारी प्रचार कुछ भी रहा हो, आप को एक विपरीत विचार भी सुनने को मिले। इस के लिए मैंने, और मेरे परिवार ने, वह कीमत चुकाई है जो मुझे बहुत समय से मालूम था कि मुझे एक दिन चुकानी है। मैं उस के लिए तैयार हूँ, और सदा था। मैंने इस परिणाम को टालने के लिए कुछ नहीं किया है &#8211; कोई सुरक्षा नहीं, कोई एहतियात नहीं। मैं चाहता हूँ कि मेरा हत्यारा जान ले कि मैं उस की तरह कायर नहीं हूँ, जो इन्सानी ढ़ालों की आड़ में छिपकर हज़ारों निर्दोषों को मौत की सज़ा देता है। यह तो पहले से लिखा है कि मेरा जीवन छीना जाएगा, और कौन छीनेगा। बस यह लिखना रह गया है कि कब।</p>
<p>संडे लीडर सच की लड़ाई लड़ता रहेगा, यह भी तय है। क्योंकि मैंने यह जंग अकेले नहीं लड़ी। संडे लीडर को खत्म किया जाए, उससे पहले हम में से कई मारने होंगे, और मारे जाएँगे। मुझे आशा है कि मेरी हत्या स्वतन्त्रता की पराजय के रूप में न देखी जाए, पर प्रयत्नों को तेज़ करने वाले बचे हुए लोगों के लिए प्रेरणा के रूप में देखी जाए। बेशक मुझे उम्मीद है कि इस से ऐसी शक्तियाँ को बल मिलेगा जो हमारी प्रिय मातृभूमि में मानवीय स्वतन्त्रता का एक नया युग आरंभ करेंगी। मुझे यह भी आशा है कि इस से आपके राष्ट्रपति की आँखें इस तथ्य की ओर खुल जाएँगी कि देशभक्ति के नाम पर कितना भी नरसंहार हो, मानवीय उत्साह जीवित रहेगा और फलेगा फूलेगा। सारे राजपक्ष मिलकर भी उसे नहीं मार सकते।</p>
<p>लोग मुझ से प्रायः पूछते हैं कि मैं इस तरह के जोखिम क्यों उठाता हूँ और मुझे बताते हैं कि किसी न किसी दिन मुझे उड़ा दिया जाएगा। मुझे भी मालूम है &#8211; यह तो अटल है। पर यदि हम अब नहीं बोलेंगे, तो बेआवाज़ों के लिए आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं बचेगा, चाहे वे जातीय अल्पसंख्यक हों, पिछड़े हों या सताए हुए लोग। एक ऐसा उदाहरण है जिस ने मुझे अपने पत्रकारिता के पूरे कार्यकाल में प्रेरित किया है, और वह है जर्मन धर्मशास्त्री मार्टिन नीमोइलर का। अपने यौवन में वह यहूदी-विरोधी था और हिटलर का प्रशंसक। पर जब नाज़ीवाद ने जर्मनी में जड़ें पकड़ीं, तो उस ने नाज़ीवाद की असलियत देखी &#8211; हिटलर केवल यहूदियों का ही विनाश नहीं करना चाहता था, बल्कि उन सब का जिनका दृष्टिकोण भिन्न हो। नीमोइलर ने आवाज़ उठाई, और इस तकलीफ के लिए उसे 1937 से 1945 तक साक्सेनहाउज़ेन और दख़ाउ के कैदी कैंपों में रखा गया, और उसे लगभग कत्ल कर दिया गया। जब वो कारावास में था, तो नीमोइलर ने एक कविता लिखी जो मेरे मन में तब से अटकी हुई है जबसे मैंने उसे किशोरावस्था में पहली बार पढ़ा था:</p>
<p><strong>वे पहले यहूदियों को मारने आए<br />
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था।<br />
फिर वे साम्यवादियों को मारने आए<br />
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था।<br />
फिर वे श्रमिकसंघियों को मारने आए<br />
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं श्रमिकसंघी नहीं था।<br />
फिर वे <em>मुझे</em> मारने आए<br />
और मेरे लिए बोलने वाला कोई रह नहीं गया था।</strong></p>
<p>यदि आप को कुछ न याद रहे, यह याद रख लीजिए: संडे लीडर आपके लिए रहेगा &#8211; चाहे आप सिंहली हैं, तमिल, मुसलमान, शूद्र, समलैंगिक, भिन्न-विचारक, या विकलांग। इसके कर्मचारी लड़ते रहेंगे, बिना झुके और बिना डरे, उसी साहस के साथ जिस के आप आदी हो चुके हैं। पर उनकी इस प्रतिबद्धता का मोल न भूलें। इस बात में कोई सन्देह नहीं कि हम पत्रकार जो भी बलिदान देते हैं, अपने यश या संवर्धन के लिए नहीं देते, बल्कि आपके लिए देते हैं। आप इस बलिदान के हकदार हैं या नहीं, वह अलग बात है। जहाँ तक मेरी बात है, ईश्वर जानता है मैंने कोशिश तो की।</p>
<p class="note">इस लेख का अनुवाद करने के लिये सामयिकी दल के सदस्य <strong><a href="http://kaulonline.com/">रमण कौल</a></strong> का शुक्रिया!</p>
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		<title>भइया नक्को, बहिनजी पाहिजे</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/01/bsp-in-maharashtra/</link>
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		<pubDate>Wed, 07 Jan 2009 11:11:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शशि सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[BJP]]></category>
		<category><![CDATA[Brahmin]]></category>
		<category><![CDATA[BSP]]></category>
		<category><![CDATA[maharashtra]]></category>
		<category><![CDATA[Mayawati]]></category>
		<category><![CDATA[ncp]]></category>
		<category><![CDATA[Shiv Sena]]></category>

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		<description><![CDATA[महाराष्ट्र की राजनीति में दलित मुद्दे का मराठी-गैर मराठी मुद्दे से महत्त्व कम नहीं है। बसपा यहाँ पवार, ठाकरे, चव्हाण जैसों का दबदबा खत्म कर सकती है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span class="dropCap">भ</span>इया नहीं चाहिये मगर बहिनजी का स्वागत है। महाराष्ट्र में कुछ इसी तर्ज़ पर शिवसेना अपनी राजनीति की बिसात बिछाती दिख रही है। विश्लेषकों की मानें तो कांग्रेस और एनसीपी ने राज ठाकरे को आगे कर जो बाउंसर शिवसेना की तरफ फेंका था उसके जवाब में शिवसेना मायावती से दोस्ती गांठकर गुगली डाल सकती है।</p>
<p>महाराष्ट्र की राजनीति की तनिक भी समझ रखने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि दलित राजनीति के लिए महाराष्ट्र की धरती देश के किसी अन्य राज्य के मुकाबले कम उर्वर नहीं है। दलित मुद्दे का यहां की राजनीति में मराठी-गैर मराठी मुद्दे से महत्त्व कतई कम नहीं है। या यूं कहें कि दोनों मुद्दों का आपस में गहरा जुड़ाव है तो गलत नहीं होगा।</p>
<div id="pullQuoteL">महाराष्ट्र की राजनीति में दलित मुद्दे का मराठी-गैर मराठी मुद्दे से महत्त्व कतई कम नहीं है।</div>
<p>इसे समझने के लिए आइये समय से थोड़ा पीछे चलते हैं। बाबा साहेब अंबेडकर के प्रभाव के कारण इस प्रदेश का दलित किसी और प्रदेश के दलितों के मुकाबले अधिक शिक्षित है। इस शिक्षा ने इनके जीवन में काफी गुणात्मक प्रभाव डाला, इनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति में बेहतरी हुई है। सामर्थ्य और संख्याबल में वे यहां के किसी भी दूसरे प्रभावशाली समुदाय के लगभग बराबरी पर ठहरते हैं। कांग्रेस हमेशा से इसका फायदा अपने हित में करती आई है। दलितों के बीच मजबूत नेतृत्व भी उभरता रहा मगर एक सीमा के बाद कांग्रेस उसका बधिया कर दिया करती है, या तो उस नेतृत्व को कांग्रेस में मिला लिया जाता या फिर उसकी ऐसी घेराबंदी कर दी जाती जिससे वो खुद ही कांग्रेस की गोद में जा बैठता। नतीजतन मराठी दलित यहां की राजनीति में अपने वाजिब हक से हमेशा महरूम रहे।</p>
<div class="wp-caption alignright" style="width: 260px"><img style="padding: 5px;" title="कार्टून: कीर्तिश भट्ट" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/mayawati-article.jpg" alt="Mayawati: PM in waiting?" width="250" height="209" align="right" /><p class="wp-caption-text">कार्टून: कीर्तिश भट्ट (http://bamulahija.blogspot.com)</p></div>
<p>महाराष्ट्र की राजनीति में शीर्ष पर हमेशा से पाटिल, पवार, भोंसले, ठाकरे, चव्हाण जैसों का ही दबदबा बना रहा है। इस दबदबे को खत्म करने के लिये दलितों यह भलीभांति समझ चुके हैं कि उन्हें एकजुट होना है। जमीनी स्तर पर आये दिन होने वाले आपसी टकराव इसका सबूत हैं। पिछले दशक में ये टकराव ज्यादा तेजी से बढ़ें हैं। उधर उत्तर भारत में हो रहे बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के विस्तार ने इनमें आत्मविश्वास फूंकने का काम किया।</p>
<p>इस बनी बनाई जमीन को बसपा ने पहचान लिया और पिछले आम चुनावों में खासे आक्रमक रूप के साथ मैदान में उतरी। हालांकि पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली मगर उसके खाते में गये चार प्रतिशत वोट ने सबको सकते में डाल दिया। खासकर कांग्रेस के लिए ये बड़े खतरे की घंटी थी।</p>
<p><a href="http://www.rediff.com/news/2007/nov/23maya.htm" target="_blank">याद कीजिये</a>, नवम्बर 2007 में मुम्बई में आयोजित मायावती की रैली में पांच लाख से ज्यादा की भीड़ इकट्ठा हुई थी जिसने कांग्रेस को यह अहसास करा दिया था कि वे अब सिर्फ उत्तर प्रदेश की नेता की रैली नहीं है। इस रैली ने कांग्रेस और एनसीपी में मानो भूचाल ला दिया था। तब आनन फानन इस तूफान को रोकने के लिए हाल में अपने चाचा से अलग हुये राज ठाकरे को कांग्रेस और एनसीपी ने इस्तेमाल करने का निर्णय लिया। इसके पीछे गणित यह था कि कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो रही भीम शक्ति को मराठी-गैर मराठी मुद्दे पर मायावती से जुड़ने से रोका जाय साथ ही राज ठाकरे को मजबूत कर शिवसेना को कमजोर किया जाये।</p>
<div id="pullQuoteL">हो सकता है कि मायावती अपनी दलित ब्राह्मण भाईचारा नीति पर आगे बढ़ भाजपा के बैंक में ही सेंघ लगा बैठें</div>
<p>लेकिन कांग्रेस का ये दाँव उस पर ही उल्टा पड़ सकता है। राज ठाकरे के मुद्दे पर कार्रवाही करने में पार्टी ने जितनी शर्मनाक देरी दिखाई उससे उत्तर भारतीय समुदाय पूरी तरह से कांग्रेस एनसीपी गठबंधन से बिफर गया है। गौर करने वाली बात है कि कम-से-कम मुम्बई के कुछ इलाकों में उत्तर भारतीय समुदाय निर्णायक स्थिति में हैं। लेकिन उनके सामने विकल्प हीनता की स्थिति है। ऐसे में शिवसेना मायावाती से हाथ मिलाकर एकजुट दलितों को अपने पाले में करने की पुरजोर कोशिश करेगी।</p>
<p>विकल्प तो कई हैं। हो सकता है कि उत्तर भारतीयों की नाराजगी को पूरी तरह राज ठाकरे की ओर कर दिया जाय। इस काम में इसकी मदद कर सकती है, उत्तर प्रदेश में बसपा की विपक्षी, भाजपा, जिसे सिद्धांत रूप में कभी बसपा से परहेज नहीं रहा है। ऐसा होने पर भाजपा को बिहार में भी यहां की शिवसेना से अपनी दोस्ती का बचाव मौका मिल जायेगा। यह भी हो सकता है कि मायावती अपनी दलित ब्राह्मण भाईचारा नीति पर आगे बढ़ भाजपा के बैंक में ही <a href="http://timesofindia.indiatimes.com/India/Mayawati_pins_hopes_on_Brahmin-dalit_combo_for_LS_polls/articleshow/3939204.cms" target="_blank">सेंघ लगा बैठें</a>, आगामी 24 जनवरी को तय बहु भाषिक ब्राह्मण महा अधिवेशन में आडवाणी,  शरद पवार, कलमाडी के अलावा मायावती भी ब्राह्मणों को <a href="http://www.expressindia.com/latest-news/getting-ready-to-woo-brahmins/407436/" target="_blank">रिझाने आ सकती हैं</a>।</p>
<p>तरीका जो भी हो, उत्तर प्रदेश से बाहर निकलने को आतुर मायावती के लिए भी यह एक बढ़िया मौका साबित हो सकता है, लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के बाद काँग्रेस के कायम रहने से भाजपा सन्न तो रह ही गई थी, बहनजी का भी लेफ्ट और भाजपा के सहयोग के बल पर दलित प्रधानमंत्री का <a href="http://www.hindu.com/thehindu/holnus/000200812241021.htm" target="_blank">सपना सच होते होते रह गया था</a>। वे यह मंसूबा पूरा ज़रूर करना चाहेंगी, भले इस बार उन्हें पीएम इन वेटिंग की सूची में आडवाणी के <a href="http://www.indianexpress.com/news/advani-marches-into-09-eyes-set-on-pol.../405082/" target="_blank">पीछे खड़े होना पड़े</a>। मगर एक की अधिक और दूसरे के कम उम्र को देखते हुये इस इंतजार से मायावती को शायद ही कोई परेशानी हो।</p>
<p>आप तो जानते ही हैं, राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं। लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने तक देखते जाइये कौन किसके साथ खड़ा होता है।</p>
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