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	<title>सामयिकी - हिन्दी वेबपत्रिका &#124; Samayiki - Hindi Webzine &#187; बातचीत</title>
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	<description>बदलती दुनिया की साक्षी</description>
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		<title>हिन्दी फ़िल्मों में बस पैसों के लिये काम किया</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2011/04/aparna-sen-interview/</link>
		<comments>http://www.samayiki.com/2011/04/aparna-sen-interview/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 13 Apr 2011 07:52:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
		<category><![CDATA[Bengali]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>

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		<description><![CDATA[फ्लोरेंस के "रिवर टू रिवर फिल्म फेस्टिवल" में डॉ सुनील दीपक को लड़कपन से पसंद अभिनेत्री से रूबरू होने का मौका मिला]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2011/04/aparna_sen_story.jpg" alt="Aparna Sen" width="610" height="180" /></p>
<div id="section-teaser">एक अभिनेत्री के रूप में मुझे लड़कपन से ही अपर्णा सेन बहुत अच्छी लगती थीं और विगत दिसम्बर में, फ्लोरेंस के &#8220;रिवर टू रिवर फिल्म फेस्टिवल&#8221; में मुझे इस प्रसिद्ध अभिनेत्री तथा निर्देशक से रूबरू होने का मौका मिला। समारोह में उनकी दो फ़िल्मों को सम्मान मिल रहा था। उनकी नयी बांग्ला फ़िल्म &#8220;इति मृणालिनी&#8221; से फ़िल्म फेस्टिवल का उद्घाटन हुआ और उनकी 2010 की सुन्दर कविता जैसी बिना कहे ही बहुत कुछ कहने वाली अंग्रेज़ी फ़िल्म &#8220;द जेवेनीज़ वाईफ़&#8221; से फेस्टिवल का समापन हुआ। दोनों फ़िल्मों को दर्शकों और आलोचकों से बहुत प्रशंसा मिली, हालाँकि अपर्णा जी के लिए प्रशंसा कोई नयी बात नहीं, करीब तीस साल पहले बनी उनकी निर्देशित पहली फ़िल्म, 36 चौरंगी लेन को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था और फ़िल्म में जेनिफ़र कैंडल के मर्मस्पर्शी अभिनय को आज तक भूलाना कठिन है। प्रस्तुत है फ़िल्म फेस्टिवल के आयोजन स्थल, फ़्लोरेंस के सौ साल से भी अधिक पुराने ओडियन सिनेमा हाल, के नज़दीक स्थित एक कैफे में की गयी बातचीत के अंश।</div>
<p><strong>सुनीलः </strong>मुझे विश्वास नहीं होता कि मैं आप के सामने बैठा बात कर रहा हूँ। आप को पहली बार मेरे विचार में अंग्रेज़ी फ़िल्म &#8220;द गुरु&#8221; में 1970 में देखा था।</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> &#8220;द गुरु&#8221; 1970 की नहीं थी, बहुत बाद की थी &#8230; नहीं, शायद आप ठीक कह रहे हैं, 1970 के आसपास की ही थी।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong> हाँ, मेरे विचार में 1970 की ही बात है। मुझे याद है कि दिल्ली के रिवोली सिनेमा हाल में देखने गया था। खैर यह तो पुरानी बात है। आज मैं आप से कुछ ऐसे प्रश्न करना चाहूँगा जिनके बारे में कम लिखा गया हो या जिन्हें कम लोग जानते हों। तो बात शुरु करना चाहूँगा आप के बचपन से। आप के पिता जाने माने फ़िल्म आलोचक थे, ऐसे वातावरण में बड़े होने का आप पर क्या प्रभाव पड़ा?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> फ़िल्म आलोचक होने के अतिरिक्त, मेरे माता पिता कलकत्ता फ़िल्म सोसाईटी को बनाने वाले सदस्यों में शुमार थे। इसका असर यह हुआ कि बचपन से ही मुझे दुनिया भर से बढ़िया सिनेमा देखने का मौका मिला। मेरी फ़िल्मों की दिलचस्पी और पसंद तभी बनी। रूसी फ़िल्में जैसे कि &#8220;बेटलशिप पोटेमकिन&#8221;, &#8220;ईवान द टेरिबल&#8221;, या फ्राँससी फ़िल्म &#8220;पैशन आफ़ जोन द आर्क&#8221; मैंने तभी देखीं। इस तरह की फ़िल्में देखते हुए मैं बड़ी हुई।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>अच्छा, मैंने कहीं पढ़ा था कि आप ने दस वर्ष की आयु में पहली बार फ़िल्म में अभिनय किया?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> यह गलत है, मैंने दस साल की उम्र में किसी फ़िल्म में काम नहीं किया।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>यानि 1961 की सत्यजित राय की फ़िल्म &#8220;तीन कन्या&#8221; ही आप की पहली फ़िल्म थी? तब क्या आप को समझ थी कि आप इतने महान फिल्मकार के साथ काम कर रही हैं?</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>बिल्कुल पूरी समझ तो नहीं थी, मुझे मालूम था कि वह बड़े निर्देशक हैं, लेकिन मेरी दृष्टि में वह फ़िल्म निर्देशक से अधिक मेरे पिता के पुराने मित्र थे। मुझे वह कहानी, रवींद्रनाथ टैगौर की &#8220;स्माप्ति&#8221; बहुत अच्छी लगी थी, मैंने उस कहानी को उन्हीं दिनो पढ़ा था, तो कहानी की मृणमयी का किरदार निभाना मुझे बहुत अच्छा लगा। उस फ़िल्म में काम करने के दिन बहुत मज़ेदार थे, लगता था कि पिकनिक हो रही हो। न स्कूल जाना पड़ता या इम्तिहान की चिंता करनी पड़ती। बहुत आनन्द आया।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>जब वह फ़िल्म आयी तो आप सोलह साल की थीं, फ़िल्म की शूटिंग के बाद वापस स्कूल जाना कैसा लगा? क्या आप उस समय प्रसिद्ध हो चुकीं थीं?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> फ़िल्म के बाद स्कूल जाना बहुत बुरा लगा। इतने मजे के दिनों के बाद स्कूल की पढ़ाई करना कठिन था, फ़िर साथ पढ़ने वाली साथियों ने भी मेरा मज़ाक उड़ाया, ताने कसे&#8230;टिप्पणियाँ की। मेरी कुछ परीक्षायें छूट भी गईं, बस दो तीन विषय के इम्तिहान ही दे पायी। मैं उस समय अंग्रेजी, इतिहास जैसे विषयों में बहुत तेज़ थी और यह इम्तिहान भी अच्छे हुए। मेरे विचार में मैं इन विषयों में अव्वल आयी, लेकिन अन्य विषयों में इम्तिहान नहीं दिये थे तो कक्षा में बाकी साथियों से काफ़ी पीछे थी। तब हमारे स्कूल में सब विद्यार्थियों की सभा में सबके परिणाम पढ़े जाते थे, जब मेरी बारी आयी तो हमारी प्रिंसिपल ने कुछ ताना कसा कि &#8220;हमें पढ़ाई से अधिक अभिनय में दिलचस्पी है&#8221;। मुझे बहुत बुरा लगा, रो भी पड़ी।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>आप ने अपने बचपन का कुछ हिस्सा हज़ारीबाग में बिताया, उसके बारे में कुछ बताईये।</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>मेरे दादा जी वहाँ रहते थे। वह ब्रह्मसमाजी थे, उनकी वहाँ चैरिटेबल डिस्पैंसरी थी जो मुझे बहुत दिलचस्प लगती थी। उनका घर बहुत सुन्दर था, सीधा सादा पर बहुत सुन्दर। हम लोग छुट्टियों में वहाँ जाते थे। हमारी सभी छुट्टियाँ हज़ारीबाग में ही निकलती थीं, विशेषकर सर्दियों की छुट्टियाँ। उस समय की यादें बहुत मुझे प्रिय हैं।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>आप ने अनेक फ़िल्मों में काम किया है। क्या कोई भूमिकायें ऐसी भी थीं, जो आप को अच्छे नहीं लगी या जिन्हें आप अपने आप से बिल्कुल भिन्न महसूस करती थीं?</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>जब अभिनय का क्षेत्र चुना हो काम के लिए तो कई बार ऐसी फ़िल्मों में भी काम करना पड़ता है जो कि आप को पसंद न हों, पर पैसा कमाना है तो करना ही पड़ेगा। मैंने बांग्ला में एक फ़िल्म की &#8220;अभिचार&#8221;, जो मैं नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैंने उनसे बहुत पैसा माँगा, लेकिन वह मान गये और वह फ़िल्म मुझे करनी पड़ी। लेकिन उसे करते हुए मुझे वह बिल्कुल पसंद नहीं थी, बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। उसके निर्देशक थे बिस्वजीत चौधरी।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>आप का अर्थ है अभिनेता बिस्वजीत, आज के अभिनेता प्रसेनजीत के पिता?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> हाँ, वही थे निर्देशक उस फ़िल्म के।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> आप की माँ के परिवार में एक बहुत प्रसिद्ध कवि हैं&#8230;</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> हाँ, जीवानन्दा दास।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> क्या आप ने भी कभी कविता लिखी?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> नहीं। यानि जैसे छोटी उम्र में सभी कुछ कविता लिखते हैं, वैसे ही मैंने भी लिखीं, लेकिन उनमें कुछ महत्वपूर्ण नहीं था। जबकि जीवानन्दा दास जी, टेगौर के बाद के बांग्ला के बड़े कवियों में गिने जाते हैं, वह मेरी माँ के दूर के कज़न भाई थे। वह मेरे माता पिता के बहुत करीब भी थे।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> क्या आप की माँ भी लिखती थीं?</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>हाँ मेरी माँ सुप्रिया दासगुप्ता कहानियाँ लिखती थीं।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>क्या आप को लगता है कि आप को हिन्दी सिनेमा में अधिक सफ़लता नहीं मिली?</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>(मुस्कराते हुए) मैंने हिन्दी सिनेमा में बहुत कोशिश भी नहीं की, शायद क्योंकि मेरा मन बंगाल में था। जितनी भी हिन्दी फ़िल्में मैंने की, सब गलत कारणों से। कभी टेक्स की किश्त भरनी होती थी या नयी गाड़ी खरीदनी थी, बस इस तरह के कारणों से मैंने हिन्दी फ़िल्में चुनी। ठीक वजह से कोई हिन्दी फ़िल्म नहीं की मैंने।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> इस बातचीत के धन्यवाद अपर्णा जी।</p>
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		<title>गुमनामी में बहुत खुश हूँ: फ़ेक आईपीएल प्लेयर</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2010/01/fip-interview/</link>
		<comments>http://www.samayiki.com/2010/01/fip-interview/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 22 Jan 2010 19:41:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सामयिकी दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
		<category><![CDATA[blogging]]></category>
		<category><![CDATA[Cricket]]></category>
		<category><![CDATA[FIP]]></category>
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		<category><![CDATA[IPL]]></category>
		<category><![CDATA[Steve Jobs]]></category>

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		<description><![CDATA[FIP वापस आ रहा है, पर क्या यह दोबारा इतिहास रचेगा या फिर बीसीसीआई या दूसरों के साथ कानूनी विवादों में गुम होकर रह जायेगा? पढ़िये 'ग्रेट बाँग' अर्नब रे द्वारा लिया साक्षात्कार।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="aligncenter size-full wp-image-180" title="fip" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/01/fip.jpg" alt="" width="425" height="218" /></p>
<div id="section-teaser">
<div class="dropCap">न</div>
<p>क़ली इंडियन प्रीमियर लीग खिलाड़ी &#8211; <strong>फ़ेक आईपीएल प्लेयर</strong> (FIP)  किसी परिचय का मोहताज नहीं है। पिछले साल, इंडियन प्रीमियर लीग के दौरान, एक ब्लॉग अचानक प्रकट हुआ जिसे यह समझा गया कि आईपीएल के सबसे लोकप्रिय फ्रेंजाइजी में से एक के गुमनाम खिलाड़ी लिख रहा था। जब FIP ने हारी हुई टीम के अंदरूनी कार्यशैली को अपनी कानी आंख से देख-परख कर सुपर खिलाड़ियों के काले कारनामों को उनके आसानी से कयास लगाए जाने वाले नामों (मसलन कान मोलू और अप्पम चू*या &#8211; जो बाद में हमारी अपनी शब्दावली में भी घुस आए) के जरिए बयान करना शुरू किया तो देखते ही देखते वे इंटरनेट पर सनसनी बन गए।</p>
<p>FIP कौन था? क्या वास्तव में वह एक खिलाड़ी था? या यह मात्र प्रचार की नौटंकी थी? इससे भी महत्वपूर्ण बात, क्या यह सारा सिलसिला सच था? या जैसा कि हम सब ने समझा, अर्ध सत्य था?</p>
<p>FIP की चर्चा हर कहीं होने लगी थी जहाँ कि क्रिकेट की बातें होती थी, और पोस्ट में असली खिलाड़ियों के नकली नामों से की गई छीछालेदर पर मजे लूटते रहे। कुछ खिलाड़ियों पर आशंका जताई गई कि इनमें से कोई FIP हो सकता है, एक समाचार पत्र ने FIP की तथाकथित पहचान को प्रकट किया पर बाद में मुकर गए। तथाकथित फ्रेंचाइजी द्वारा अपने ब्लॉग पर एक आधिकारिक बयान जारी किया गया और जब FIP के पोस्ट और भी ज्यादा सटीक होने लगे तो लोगों का भ्रम और बढ़ता गया। लोगबाग टूर्नामेंट की समाप्ति का उत्सुकता से इंतजार कर रहे थे, क्योंकि यह प्रतीक्षा न सिर्फ बेहद लंबी थी, बल्कि FIP ने भी तभी अपनी पहचान को उजागर करने का वादा किया था।</p>
<p>उसने अपना वादा निभाया। पर पूरी तरह से नहीं। <a href="http://www.youtube.com/watch?v=9NgrYqcvx1I" target="_blank">एक वीडियो</a> में जिसमें उसकी छाया दिखाई जा रही थी, FIP ने स्वीकारा कि वो कोई खिलाड़ी नहीं है। तो फिर वह कौन था? बस एक भारतीय क्रिकेट प्रशंसक, लेकिन साधारण नहीं। एक ऐसा व्यक्ति जो &#8216;जीवन की अनाम यात्रा&#8217; के दौरान क्रिकेट के संपर्क में आया। बॉलीवुड के बादशाहों से लेकर क्रिकेट के दलालों तक से इनके प्रगाढ़ परिचय ने इन्हें आंतरिक जानकारी के लिहाज से &#8220;अंधेरे का सर्वव्यापी भूत&#8221; या &#8220;हर कहीं मंडराती मक्खी बना दिया था&#8221;।</p>
<p>और, अब FIP वापस आ गया है &#8211; इतिहास को दोबारा रचने। हार्पर कॉलिन्स द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक &#8220;गेमचेंजर्स&#8221; के साथ। और इंडीब्लॉगीज़ पर दिये अपने जीवन के पहले साक्षात्कार में वो खुद हाजिर है अपने बारे में कुछ बताने के लिए। <a href="http://fakeiplplayer.blogspot.com/" target="_blank">फ़ेक आईपीएल प्लेयर</a> को 2008 इंडीब्लॉगीज़ का <a href="http://www.indibloggies.org/results-2008" target="_blank">सर्वश्रेष्ठ खेल ब्लॉग का पुरस्कार</a> मिला है। साक्षात्कार लिया इस बार के &#8220;<a href="http://www.indibloggies.org/results-2008" target="_blank">इंडीब्लॉग आफ द ईयर</a>&#8221; पुरस्कार के विजेता <a href="http://greatbong.net/" target="_blank">अर्नब रे</a> ने। इस बातचीत का हिन्दी अनुवाद किया <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> ने।</div>
<p><strong>प्रश्न: FIP ब्लॉग शुरू करने का खयाल कैसे आया? क्या कुछ ऐसा रहा था जो आप लंबे समय से ऐसा करना चाह रहे थे या यह किसी बढ़िया सुबह को अचानक उठी इच्छा थी? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> ब्लॉग लिखने की बात मन में अचानक ही उठी। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में, मैंने बोरे भर भर कर रसीली कथाएँ इकट्ठा कर रखी थीं जो मैं कभी कभी अपने करीबी दोस्तों को सुनाया करता था। जाहिर है, दोस्तों को बड़ा मजा आता था। एक सुहानी शाम को, दक्षिण अफ्रीका रवाना होने से पहले मैं और मेरे तीन दोस्त गपशप करते बैठे थे, बीयर के दौर चल रहे थे। तब उनमें से एक ने सुझाव दिया कि मैं क्यों न इन्हें एक ब्लॉग पर छापूं तो इस तरह से वे ताज़ा तरीन कहानियों का आनंद ले सकेंगे। मैंने कहा कि ये तो बहुत अच्छा विचार है। यह बस हम चारों के बीच साझा होने वाली रहस्यमय काली किताब होनी थी। मैंने इसे कभी भी &#8216;निजी&#8217; बनाने की नहीं सोची क्योंकि मुझे उम्मीद ही नहीं थी कि कभी किसी और को इसके बारे में पता चलेगा।</p>
<p>पर, मैंने यह जरूर सोचा था कि इसे मैं किस तरह से सिर्फ एक चर्चा मंच के बजाय ज्यादा दिलचस्प बनाऊं। मैंने <a title="नकली स्टीव जॉब्स का पर्दाफाश" href="http://nuktachini.debashish.com/254" target="_blank">नकली स्टीव जॉब्स</a> और &#8216;वॉर फॉर द न्यूज़&#8217; के बारे में सोचा। और, संयोग से, जोहेन्सबर्ग की एक उड़ान पर मैंने &#8216;वैग द डॉग&#8217; नाम की फ़िल्म देखी। तो, इस तरह से नकली आईपीएल खिलाड़ी &#8211; FIP का व्यक्तित्व, कुछ मायनों में, इन सभी तीनों से ही प्रभावित था।</p>
<p><strong>प्रश्न: लोग ब्लॉग लिखना शुरू करते हैं, और शोहरत पाने के लिये भयंकर संघर्ष करते हैं। आपने इतनी जल्दी इतना बड़ा पाठक वर्ग बनाने के लिए क्या जादू कर दिया? विशेष रूप से, शुरू शुरू में लोगों को ये कैसे पता लगा कि इधर FIP नाम का एक &#8220;शैतानी&#8221; ब्लॉग भी है? <img src='http://www.samayiki.com/sam/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' /> </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> ईमानदारी से कहूं तो मुझे खुद भी नहीं पता कि बात इतनी जल्दी कैसे फैली। शुरू के कुछ दिनों में तो इस ब्लॉग का मजा लेने के लिए हम चारों के अलावा वहां और कोई नहीं होता था। इसके बाद एक दिन मैंने देखा कि कोई 5 या 6 पाठक, जिन्हें मैं नहीं जानता था, अनुयायी बन चुके हैं। और बहुत से अन्य लोगों ने ब्लॉग पर टिप्पणियाँ भी की थीं। मैंने अपने दोस्तों से पूछा कि क्या उन्होंने इसके बारे में किसी को बताया था तो उन सभी ने कहा कि &#8216;नहीं&#8217;। मुझे लगता है कि कम से कम उनमें से एक ने किसी को बताया तो होगा। [उस समय मैंने इसके बारे में अलग तरह से महसूस किया, लेकिन अब मैं शिकायत नहीं कर रहा हूँ <img src='http://www.samayiki.com/sam/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';-)' class='wp-smiley' /> ]</p>
<p>उस दिन के अस्त होते तक, अनुयायियों की संख्या दुगुनी हो चुकी थी। मैं तब थोड़ा सा परेशान हो गया था। मैंने अपने समूह में सबसे समझदार व्यक्ति को संदेश भेजा और उससे पूछा कि क्या मुझे ये सिलसिला जारी रखना चाहिए। उसकी प्रतिक्रिया थी &#8211; &#8216;लगे रहो मुन्नाभाई&#8217;। तो, मैंने लिखना जारी रखा। कुछेक दिन के बाद, क्रिकइन्फ़ो ने अपने मुख पृष्ठ पर इसे डाल दिया। मुझे याद है कि मैं केकेआर 5 बनाम किंग्स इलेवन टीम का खेल देखने के लिए जाते वक्त किंग्समीड के रास्ते पर था तब मेरे दोस्त ने मुझे बताया कि ब्लॉग क्रिकइन्फ़ो के मुख पृष्ठ पर है। जब तक मैं अपने होटल पहुँचता, अनुयायियों की गिनती 150 हो चुकी थी। आखिर में तो, यह लगभग 9000 तक पहुँच गई थी। मैं हर बार हँसता था जब मुझे इस बात की याद आती था कि जब यह संख्या 15 तक पहुँच गई थी तब मैं कितना डर गया था।</p>
<p><a href="http://www.cricinfo.com/" target="_blank">क्रिकइन्फ़ो</a> को इस ब्लॉग के बारे में बहुत जल्दी पता चल गया था। मेरा अनुमान है कि या तो उन्होंने इसे संयोग से ढूंढ निकाला या किसी ने फेसबुक या कहीं और चेंप दिया होगा और लोगों को नजर आ गया। मैं नहीं जानता। फिर भी, मुझे लगता है कि पहले पहल पता चलने वालों में उनका ही नाम होना चाहिए। उन्होंने कुछ दिनों के लिए निगरानी भी की होगी इस बात की पुष्टि करने के लिए कि जो बातें लिखी जा रही हैं वे सत्य भी हैं या नहीं। जब एक बार वे संतुष्ट हो गए, तो फिर उन्होंने इसे मुख पृ्ष्ठ पर जगह दे दी। उसके बाद तो मेरे ब्लॉग ने गति पकड़ ली।</p>
<p><strong>प्रश्न: आप जो बातें लिखते थे वे काल्पनिक होते थे या तथ्यों पर आधारित? यदि वे तथ्यों पर आधारित होते थे तो क्या टीम के भीतर या प्रेस में आपका कोई खबरी था? </strong></p>
<div id="pullQuoteR">मैं इस अस्वीकरण कि &#8220;इस ब्लॉग के सभी पात्र काल्पनिक हैं&#8221; पर अब भी कायम हूँ। मैंने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि प्रबंधन के लिये पर्याप्त सुराग छोड़ूं जिससे वे जानें कि मैं कौन हो सकता हूँ, कौन नहीं।</div>
<p><strong>FIP:</strong> मैं अपने ब्लॉग में निहित इस अस्वीकरण कि &#8220;इस ब्लॉग के सभी पात्र काल्पनिक हैं&#8221; पर अब भी कायम हूँ। किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति के साथ कोई समानता, विशुद्ध रूप से संयोग है।</p>
<p><strong>प्रश्न: क्या आप कभी इस कथित &#8220;वास्तविक आईपीएल खिलाड़ी&#8221; के व्यक्तित्व को बनाए रखने के सवाल से जुड़ी नैतिकता के बारे में चिंतित हुए? क्योंकि यदि आपकी बातों को गंभीरता से लिया जाता तो टीम के भीतर मारा-मारी मचती और अंततः निर्दोष खिलाड़ियों को संदेह के घेरे में रखा जाता। या आपने यह सोचा रखा था कि अपनी बातों को &#8216;नकली आईपीएल खिलाड़ी&#8217; संबंधी अस्वीकरण के तले &#8216;नकली&#8217; शब्द के जरिए ढांप लिया जाएगा, भले ही ब्लॉग पाठकों को सारा लेखन गप्प की बजाय सचाई लगे? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> मैंने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि मैं प्रबंधन के लिये पर्याप्त सुराग छोड़ूं जिससे वे जानें कि मैं कौन हो सकता हूँ या कौन नहीं। मैं मानता हूं कि शुरुआती दिनों में, जब ब्लॉग अमूमन निजी था तो उस समय मैं इस मोर्चे पर लापरवाह सा था। लेकिन एक बार जब यह लोकप्रिय हो गया और मैंने इसे जारी रखने का फैसला किया, तो मैंने पहले के कुछ लेखों को संपादित किया और यह ध्यान रखा कि किसी विशेष खिलाड़ी को मेरे लेखन की वजह से संदेह के दायरे में नहीं आना चाहिए। वहाँ निश्चित रूप से आपसी मारा-मारी होते रहती थी और मैं इसे बारीकी से देखता था, लेकिन मुझे यकीन था कि किसी निर्दोष खिलाड़ी को मेरे ब्लॉग की वजह से कोई कीमत चुकानी नहीं पड़ेगी। मुझे टीम प्रबंधन पर भरोसा था कि वो अगर अपना चौथाई दिमाग भी इस्तेमाल करेंगे तो वे ऐसी कोई बेवकूफ़ी नहीं करेंगे।</p>
<p>जब आकाश और बांगड़ को वापस भेजा गया तब मैं चिंतित हुआ था। मैंने कुछ दिनों के लिए ब्लॉगिंग बंद कर दी थी, जब तक कि मुझे यह विश्वास नहीं हो गया कि इसका कारण स्वयं आकाश के अलावा अन्य कोई नहीं है। </p>
<p>आपके प्रश्न को मैं थोड़ा सा सही करना चाहूंगा &#8211; मैं हमेशा से बड़ा भारी क्रिकेट प्रशंसक रहा हूं, और पिछले दस वर्षों से मुझे &#8216;खालिस प्रशंसक&#8217; से भी ज्यादा बनने के अवसर मिले, और मेरे विचार में यह बात उस वीडियो पोस्ट में में भी है। लेकिन, आपका कहना सही है, मैं यह ज़रूर मानता था कि ब्लॉग के नाम में &#8216;फ़ेक&#8217; यानि नकली शब्द रहने से मैं तो बरी हो जाता हूं।</p>
<p><strong>प्रश्न: आप कभी भी अपनी पहचान उजागर करेंगे?यदि नहीं, तो क्यों? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> &#8216;कभी&#8217; के बारे में तो मुझे कुछ पता नहीं है, लेकिन इस समय मैं गुमनामी में बहुत खुश हूँ। कुछेक साल पहले, पेरिस में मेरी एक दिलचस्प आदमी से मुलाकात हुई। वह बहुत पढ़ाकू और जानकार था, पर इसके अलावा वह बहुत सामान्य, मध्यम आयु का व्यक्ति था जो एक फ्रेंच फुटबॉल क्लब में नियमित नौकरी पर था। बेहद साधारण व्यक्तित्व! उसने मुझे एक सप्ताहांत अपनी पत्नी और तीन बच्चों के मेहमान के रूप में अपने घर में आमंत्रित किया। और, जब मैं वहाँ गया तब मुझे एहसास हुआ कि उसका घर तो, घर क्या एक महल है, और खुद वह एक अरबपति है, फुटबॉल क्लब के मालिकों में से एक। मैंने उनसे पूछा कि वे इस तरह लो प्रोफ़ाइल बना कर क्यों रहते हैं। उनकी प्रतिक्रिया थी &#8216;vivre cache pour vivre heureux&#8217; , जिसका अर्थ है &#8216;छुपा जीवन ही खुशगवार जीवन होता है&#8217;।</p>
<p><strong>प्रश्न: पर आप अपनी पहचान उजागर करने से सहसा पलट क्यों गए थे? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> संभव है कि मेरी पहचान जाहिर होने से कुछ खिलाड़ियों को, जिन्हें मैं जानता हूं, कुछ समस्या होती। जब मैंने इसके बारे में सोचा तो लगा कि मुझे कोई अधिकार नहीं है कि बिना किसी गलती के मैं उन्हें किसी अजीब स्थिति में डाल दूं।</p>
<p><strong>प्रश्न: क्या आप अन्य ब्लॉगों को पढ़ते हैं? यदि हाँ, तो किन्हें? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> मेरा पसंदीदा ब्लॉग <a href="http://thevigilidiot.com/" target="_blank">thevigilidiot.com</a> है। यह शख्स बेहद मजेदार है। कुरबान फ़िल्म की उसकी समीक्षा पढ़ने के बाद मैंने वास्तव में वो फ़िल्म इसलिए देखी ताकि जान सकूं कि कैसे कोई फ़िल्म दिमाग का दही कर सकने की हद तक बेहूदी हो सकती है।</p>
<p>एक अन्य ब्लॉग मुझे पसंद आता है वो है <a href="http://inclusiveplanet.wordpress.com/" target="_blank">इनक्लूजिव प्लेनेट ब्लॉग</a>। इनक्लूजिव प्लेनेट एक संगठन है जो विकलांगों को सेवाएं प्रदान करता है और उनके ब्लॉग पर दुनिया भर से शारीरिक अक्षम लोग अपने अनुभवों को साझा करते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि आप यहाँ पर शायद ही कभी कोई रोतड़ू, सहानुभूति बटोरने वाली कहानियाँ पाएँगे। यहाँ पर बुद्धिमत्तापूर्ण, विचारोत्तेजक, अच्छी और प्रेरक कथाएँ मिलती हैं। व्यक्तिगत रूप से, इस ब्लॉग के माध्यम से मैंने एक समुदाय के बारे में बहुत कुछ सीखा है जिसके बारे में मैं बहुत कम जानता था। ब्लॉग पर जब्राथ और गिडी अह्रोनोविच के पोस्ट अवश्य पढ़े।</p>
<p>मुझे यात्रा ब्लॉगों को पढ़ने में भी मजा आता है। <a title="Future Perfect" href="http://janchipchase.com/" target="_blank">Janchipchase.com</a> नोकिया के डिजाइन प्रमुख का ब्लॉग है। वे दुनिया की ऐसी बारीकी से तस्वीरें खींचते हैं, जो दूसरे आमतौर पर अनदेखा कर देते हैं। फिर, यह एक <a href="http://bottomofheart.blogspot.com/" target="_blank">दिलचस्प ब्लॉग</a> है अप्पम चू*या के क्षेत्र से आए आईटी सेल्स पर्सन का जो यूरोप में रहता है और अपने अनुभवों को अपने ब्लॉग में लिखता है। मैं क्रिकइन्फ़ो पेज 2 को भी पसंद करता हूं। उनके पैनल में कुछ मजेदार लेखक हैं। जेमी ऑल्टर, आनंद रामचंद्रन, एंड्रयू ह्यूजेस, निशी नारायण, जॉर्ज बेनाय &#8211; ये सब बहुत अच्छे हैं। प्रेम पणिक्कर का ट्विटर फ़ीड मेरा पसंदीदा है, और कभी कभी मैं &#8216;क्रिकेट विथ बॉल्स&#8217; पर भी निगाह मार लेता हूं।</p>
<p><strong>प्रश्न: आपका पसंदीदा नाइट राइडर खिलाड़ी कौन रहा है? आपके विचार से टीम में किसे नहीं होना चाहिए था? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> मेरा पसंदीदा नाइट राइडर? असल में बहुत सारे हैं! मुझे लगता है कि ईशांत को वहाँ होना चाहिए था क्योंकि, सीजन 2 के दौरान, उसकी वजह से ही &#8216;नाइट राइडर&#8217; की कुछ अलग तरह से व्याख्या बनी थी। एक तरह से वही सचमुच का &#8216;नाइट राइडर&#8217; था। उसके रहने से खेल का कोरबो-लोड़बो-जीतबो जैसा अंत नहीं होता। </p>
<p>क्रिस गेल का साथ बढ़िया है। वास्तव में, मुझे लगता है, गेल और गिब्स दुनिया में सबसे ज्यादा मजाहिया क्रिकेटर हैं। हालांकि, सबसे मजेदार व्यक्ति जिसके साथ आप एक शाम बिताना पसंद करेंगे वो हैं डेविड लॉयड। ईमानदारी से तो उसे केकेआर का कोच होना चाहिए था। ऐसे में भले ही वे अपने सभी मैच हार जाते लेकिन कम से कम वे मैदान में हँसते-हँसाते तो। </p>
<p>एक और पसंदीदा नाइट राइडर तो जॉन बुकानन का लैपटॉप होना चाहिए। पूरे महीने के लिए उसके लैपटॉप ने उसे किसी कामुक नृत्य करती बार बाला की तरह सम्मोहित कर रखा था। चूंकि वे ज्यादातर समय अपने लैपटॉप की इस उग्र यौन ऊर्जा से विचलित रहते थे, खिलाड़ियों को राहत की सांस लेने का समय मिलता रहता था।</p>
<p>टीम में किसे नहीं होना चाहिए था? अमां, हम सब जानते हैं कि सड़न और बदबू की शुरूआत मछली के सिर से ही होती है।</p>
<p><strong>प्रश्न: FIP की आगे की राह क्या है? क्या वह इस आईपीएल सीजन में वापस आएगा? हमें अपनी पुस्तक के बारे में भी बताएँ। </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> ब्लॉग के बारे में, ठीक है, मुझे अभी भी नहीं पता कि मैं सीजन 3 के एक्शन में मैं कहाँ और कितने करीब रहूंगा। इसलिए, इस मोर्चे पर मामला अभी थोड़ा धुंधला है। मेरी किताब &#8216;गेमचेंजर्स&#8217; फरवरी 2010 में जारी हो रही है जिसे मैं पिछले छह महीनों से लिख रहा हूँ। इसमें वह सब कुछ है जो ब्लॉग में नहीं है, या नहीं हो सकता था। इसके बारे में मैं बहुत उत्साहित हूँ।</p>
<p><strong>प्रश्न: क्या आपको लगता है कि आपकी किताब ब्लॉग के हल्ला-गुल्ला/विवादास्पद होने के कारण बेस्टसेलर रहेगी? किताब के लोकार्पण के समय क्या आपको बीसीसीआई या दूसरों द्वारा किसी तरह की कोई कानूनी कार्रवाई (मानहानि आदि) का अंदेशा है? </strong></p>
<div id=pullQuoteR>पता नहीं कि ब्लॉग की वजह से किताब की बिक्री में इजाफ़ा होगा या नहीं, लेकिन यह सच है कि अगर ब्लॉग नहीं होता तो ये किताब भी नहीं होती।</div>
<p><strong>FIP:</strong> मुझे नहीं पता है कि ब्लॉग की वजह से किताब की बिक्री में इजाफ़ा होगा या नहीं, लेकिन यह सच है कि अगर ब्लॉग नहीं होता तो ये किताब भी नहीं होती। यह भी सच है कि यदि यह ब्लॉग नहीं होता तो हार्पर कॉलिन्स मुझे किसी घोड़े के पिछवाड़े से ज्यादा कुछ नहीं समझते।</p>
<p><strong>प्रश्न: अपने प्रशंसकों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे? </strong></p>
<p><strong>FIP:</strong> मेरे ब्लॉग के अनुयायियों और उस पर टिप्पणी करने वालों को दिली शुक्रिया। आप सब ने मुझे ताक़त दी। ब्लॉगिंग के अनुभव के दौरान, मैंने यह अनुभव किया कि किसी के चरित्र में सार्वजनिक लोकप्रियता का कितना दुष्प्रभाव हो सकता है। &#8216;जबर्दस्त&#8217;, &#8216;शानदार&#8217;, &#8216;बेहतरीन&#8217; जैसे शब्द आपको भीतर से थोथा, अहंकारी बना सकते हैं। और इसका नतीजा होता है एक भद्दी पोस्ट, फिर वही लोग पिन चुभाकर आपका गुब्बारा पिचका देते हैं और आपके सही आकार में वापस ले आते हैं। मुझे लगता है कि ब्लॉग के अनुयायी फूल और पत्थर संतुलित तरीके से फेंकते हैं, और इसलिए उन्हें मेरा दिली धन्यवाद। मुझे आशा है कि वे मेरी किताब को भी पसंद करेंगे। इसके अलावा, ब्लॉग की सफलता का 50% हिस्सा तो टिप्पणियों की वजह से ही आया है। ऐसे कई लोग हैं जो ब्लॉग पर सिर्फ टिप्पणियाँ पढ़ने के लिए आते थे। उनमें से कुछ तो बहुत मज़ेदार थे।</p>
<p class="note">इस बातचीत का हिन्दी अनुवाद किया रविशंकर श्रीवास्तव ने।</p>
<img src="http://www.samayiki.com/sam/?ak_action=api_record_view&id=179&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>सलमान के कारण मेरा नाम याद रखते हैं</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/03/salman-khan-interview/</link>
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		<pubDate>Sat, 14 Mar 2009 17:19:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[Mathematics]]></category>
		<category><![CDATA[salman khan]]></category>
		<category><![CDATA[teaching]]></category>
		<category><![CDATA[youtube]]></category>

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		<description><![CDATA[कैलीफोर्निया निवासी बैंकर सलमान खान अपनी संस्था खान अकेडमी से इंटरनेट द्वारा मुफ्त शिक्षण उपलब्ध कराते हैं। सामयिकी के लिये डॉ सुनील दीपक ने उनसे बातचीत की।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">
<div class="dropCap">ग</div>
<p>ये दिन खाना खाने के बाद सुस्ता रहा था तो बात पढ़ाई की निकली। &#8220;गणित में तो अपना बुरा हाल था, कितनी बार ही फेल होते होते बचा&#8221;, मैंने कहा, तो सुपुत्र बोले, &#8220;तब तो <strong>सलमान खान</strong> की तरह कोई शिक्षक आप को भी मिल जाता तो ज़रूर समझ जाते।&#8221;</p>
<p><img style="margin:3px;" title="Salman Khan" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/salman_khan.jpg" alt="Salman Khan" width="300" height="201" align="right" />मुझे थोड़ी हैरानी हुई, सलमान खान और गणित के शिक्षक? आपकी ही तरह मैं भी सोच रहा था हिंदी फिल्म जगत के स्टार सलमान के बारे में, जबकि बेटा बात कर रहा था अमरीका में रहने वाले गणित, एलजेब्रा, केलकुलस आदि विषय आसानी से समझाने वाले एक अन्य सलमान खान के बारे में।</p>
<p>इस दूसरे सलमान के माता पिता बंगलादेश के प्रवासी थे। सलमान 1976 में अमरीका के न्यू ओरलिअंस शहर में पैदा हुए। उन्होंने इंजीनियरिंग और एमबीए की डिग्री प्राप्त की है और कैलीफोर्निया के मेनलो पार्क में एक बैंक में काम करते हैं। अपने खाली समय में वह इंटरनेट के माध्यम से कठिन विषयों को आसान बना कर पढ़ाते हैं। उनकी वेबसाईट <a href="http://www.khanacademy.org"><strong>खान अकेडमी डॉट ओर्ग</strong></a> पर विभिन्न विषयों पर करीब 800 पाठ हैं जिन्हें हर रोज़ करीब 15,000 लोग पढ़ते हैं।</p>
<p>प्रस्तुत है सलमान खान से एक ईमेल साक्षात्कार।</p></div>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> सलमान, &#8220;खान अकेडमी&#8221; के बारे में बताओ। कैसे यह विचार तुम्हारे मन में आया कि इस तरह सरल वीडियो बना कर उनसे कठिन विषयों को समझाया और पढ़ाया जाये?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> खान अकेडमी का ध्येय है लोगों को पूर्ण और मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराना। इस पर वह सब विषय हैं जिन्हें उच्चतर विद्यालय के अंतिम वर्षों और विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाया जाता है। इसकी शुरुआत 2006 में हुई जब मैंने अपनी ममेरी बहन को समझाने के लिए गणित का पाठ रिकार्ड करके उसे यूट्यूब पर रखा, जिसे अन्य लोगों ने देखा और मुझे लिखा कि वह पाठ उन्हें अच्छा लगा था और कहा कि अन्य पाठ बनाऊँ। बस वहीं से मेरा यह शौक शुरु हुआ कि सरल, छोटे वीडियो पाठ बनाओ और उन्हें <a href="http://www.youtube.com/khanacademy" target="_blank">यूट्यूब पर</a> डाल दो। खान अकेडमी की वेबसाईट अप्रैल 2008 में बनायी गई।</p>
<div id="boxR" style="width: 342px;">
<h2>नये युग की पाठशालाः यूट्यूब</h2>
<p>आधुनिक युग में यूट्यूब जैसी विडियो शेयरिंग वेबसाईट से शिक्षा का क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा है। शायद इसी काबलियत पर ऩज़र रख गूगल ने दो साल पहले यूट्यूब को 17.6 लाख डॉलर में खरीदा था। कहते हैं कि एक चित्र हज़ारों शब्दों से बेहतर होता है, पर शायद एक विडियो और भी बेहतर होता है। विडियो का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इन्हें अपनी सुविधानुसार देखा जा सकता है और जितनी बार चाहें उतनी बार देखा जा सकता है। और सबसे अहम बात, यह मुफ्त में उपलब्ध हैं।</p>
<div class="wp-caption aligncenter" style="width: 340px"><img title="Khan Academy" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/salman_khan_story.jpg" alt="Khan Academy" width="330" height="235" align="middle" /><p class="wp-caption-text">सलमान माईक्रोसॉफ्ट पेंट पर पाठ समझाते हैं, उनके कंप्यूटर के स्क्रीन की छवि पार्श्व में उनकी आवाज़ के साथ कैमरे द्वारा रिकार्ड कर ली जाती है। फिर आठ मिनट के यह विडियो यूट्यूब पर अपलोड कर दिया जाते है और कड़ियाँ खान अकेडमी के जालस्थल पर डाल दी जाती हैं।</p></div>
<p>खान अकेडमी के विडियो उटपटांग हरकतें करते लोगों के घरेलू विडियो जितने लोकप्रिय भले न हो पर वे छात्रों के बड़े काम आते हैं। इसका सबूत हैं, &#8220;मैं तो फिज़िक्स का कोर्स छोड़ने ही वाला था। आपने बचा लिया&#8221; और यह &#8220;आप तो गणित के भगवान हो!!!&#8221; जैसी टिप्पणियाँ। और यह सब तब, जब सलमान के विडियो बेहद कमतर तकनलाजी से बने होते हैं और जिनमें सलमान खुद दिखते भी नहीं। मियामी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक वॉल्टर सेकाडा जैसे <a href="http://www.msnbc.msn.com/id/28200197" target="_blank">विशेषज्ञों ने माना है</a> कि ये विडियो त्रुटिहीन हैं। उनकी शिकायत बस यह है कि परिभाषा समझाने के बजाय खान उदाहरण से शब्दों को समझाते हैं। पर आठ मिनट के विडियो में इससे ज्यादा और किया भी क्या जा सकता है।</p>
<p>खान का कदम विकाशशील राष्ट्रों के लिये नये द्वार खोलता है। शिक्षाविदों के लिये इस उदाहरण को दोहराना आसान भी है। <a href="http://sites.google.com/" target="_blank">गूगल साईट्स</a> जैसे जालसथल पर मुफ्त साईट बना सकते हैं, <a href="http://zaidlearn.blogspot.com/2008/10/8-free-screencasting-tools-for-tony.html" target="_blank">सेंकड़ों मुफ़्त के स्क्रीन रिकार्डिंग सॉफ्टवेयर</a> उपलबध हैं और सामग्री <a href="http://www.youtube.com/" target="_blank">यूट्यूब</a> या <a href="http://www.slideshare.net/" target="_blank">स्लाईडशेयर</a> पर डाली जा सकती है।</p>
<h3>खान अकेडेमी के बारे में जानकारी देता विडियो</h3>
<p><object width="340" height="285"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/dP6Op2jCcJc&#038;hl=en&#038;fs=1&#038;rel=0&#038;border=1"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/dP6Op2jCcJc&#038;hl=en&#038;fs=1&#038;rel=0&#038;border=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="340" height="285"></embed></object>
</div>
<p>मेरे पास अच्छी नौकरी है, मुझे पैसा नहीं चाहिये। मुझे गणित और विज्ञान के विषय बहुत अच्छे लगते हैं, और मुझे पढ़ाने का भी शौक है। इस तरह से वह बच्चे जो पढ़ना चाहते हैं पर जिनके सामने पैसे की या अन्य रुकावटें हैं, वह पढ़ सकते हैं। जब लोग मुझे ईमेल लिखते हैं कि इन पाठों से वे भारत, इथिओपिया या यूगाँडा जैसे देशों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। इंटरनेट फ़ैलेगा तो एक दिन दूर गाँवों में बैठे बच्चे शिक्षक न होने पर भी पढ़ पायेंगे।</p>
<div id="pullQuoteL" style="margin-bottom:10px">इन पाठों से लोग भारत, इथिओपिया या यूगाँडा जैसे देशों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं। इंटरनेट फ़ैलेगा तो एक दिन दूर गाँवों में बैठे बच्चे शिक्षक न होने पर भी पढ़ पायेंगे।</div>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> तुम्हारे पाठ केवल दस मिनट के ही क्यों होते हैं, और उनमें तुम क्यों नहीं दिखते, केवल तुम्हारी आवाज़ ही सुनायी देती है?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> यह सब यूट्यूब की वजह से है, वहाँ पर दस मिनट से अधिक लम्बे वीडियो नहीं चढ़ा सकते थे तो मैंने अपने सारे पाठ दस दस मिनट की अवधि के ही बनाये। बाद में लोग कहने लगे कि पाठ छोटा हो तो उससे समझ अच्छी आती है, तो वही दस मिनट का नियम अब भी चल रहा है। शुरु में मेरे पास वीडियो कैमरा नहीं था, पेंट के प्रोग्राम से लिख कर पाठ बनाता और माईक से साथ में समझाता तो आवाज रिकार्ड हो जाती, इसलिए वीडियो में मेरा चेहरा नहीं दिखता। पर इस बात को भी पढ़ने वाले पसंद करते हैं, कहते हैं कि लगता है कि उनके साथ बैठा कोई साथी ही समझा रहा है।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> तुम्हारा परिवार बांग्लादेश से है पर तुम अमरीका में पैदा हुए, यहीं पले और बड़े हुए। तो तुम्हारी संस्कृति की यह दो जड़े, बंगाली और न्यू ओरलिअंस की अमरीकी जड़ें, इनका आपस में किस तरह से समन्वय होता है?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> जब मैं छोटा था तो न्यू ओरलिअंस में गिने चुने बंगाली परिवार थे (अब तो बहुत हैं) लेकिन तब भी वह परिवार सामाजिक दृष्टि से बहुत सक्रिय थे जिससे मेरी अपनी बंगाली पहचान बनी। यह मेरी पहचान धार्मिक और राजनीतिक भेदों से ऊपर थी। मैं दस या ग्यारह साल का हुआ था जब मुझे समझ आया कि मैं हिंदू नहीं और तभी मुझे पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश का अंतर भी समझ में आया। तो इस तरह जब छोटी उम्र में आप दूसरे धर्म के साथ इतना गहरा सम्बंध रखते हैं तो एक धर्म के दायरे में स्वयं को बँधा महसूस करना कठिन लगता है।</p>
<p>मैं घर में मज़ाक करता हूँ कि हम लोग इस लिए न्यू ओरलियोनस में बसे क्योंकि यह बंगाल से मिलता जुलता है &#8211; खाने के लिए भरपूर मछली और सीफूड, तेज़ उमस वाला वातावरण, बड़े बड़े तिलचट्टे, बहुत सारे अजीब अजीब लोग, सब कुछ बंगाल से मिलता जुलता। दरअसल यहाँ बसने का कारण था कि मेरे पिता जो डाक्टर थे, उन्हें अस्पताल में रेज़िडेंसी की जगह यहीं मिली थी। मुझे यह भी अच्छा लगता है कि न्यू ओरलिअंस की अपनी गहरी संस्कृति और सभ्यता है। मेरे माँ के परिवार से उनके पाँच भाई और एक फुफेरा भाई भी यहीं आ कर बसे, और उन सब लोगों ने यहाँ की न्यू ओरलिअंस की सभ्यता को खुले मन से स्वीकार और आत्मसात किया है। अपने बचपन होने के दिनों में मुझे व मेरी बहन को लगता था कि हम दुनिया की सबसे अच्छी जगह पर रहते हैं।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> क्या तुम बांग्ला बोल और लिख पढ़ सकते हो?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> मैं बांग्ला बोल समझ तो सकता हूँ पर मेरे बोलने के तरीके पर बंगाली लोग थोड़ा हँसते हैं। लेकिन मुझे बांग्ला लिखना या पढ़ना नहीं आता। मुझे कुछ कुछ हिंदी और उर्दू भी समझ आती हैं पर बोलने में थोड़ी कठिनाई है, हाँ अगर कोई एमरजेंसी हो तो काम चला लेता हूँ।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> काम के अलावा तुम्हारे क्या शौक हैं? क्या कोई भारतीय या बंगाली लेखक तुम्हें पसंद है?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> मुझे चित्रकारी और गिटार का शौक है। भारतीय लेखकों में से मैं केवल सलमान रश्दी को जानता हूँ, जिनकी किताब &#8220;मिडनाईटस चिल्डर्न&#8221; मेरी पसंदीदा किताबों में से है। मुझे बॉलीवुड की फ़िल्मों का भी बहुत शौक है। बहुत से लोग सोचते हैं कि यह मेरी पत्नी उमाइमा का प्रभाव है क्योंकि वह बचपन में कराची में रहती थी, लेकिन यह बात सच नहीं, हिदी फ़िल्में मुझे पसंद हैं और मैं उस पर ज़ोर डालता हूँ कि चलो हिंदी फ़िल्म देखें।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> किस तरह की हिंदी फ़िल्में तुम्हें पसंद हैं? और तुम्हारा सबसे प्रिय अभिनेता या अभिनेत्री? क्या सलमान खान की फ़िल्में पसंद हैं? &#8220;द नेमसेक&#8221; और &#8220;स्लमडॉग मिलियनेयर&#8221; देखी?</em></p>
<p><strong>सलमानः</strong> &#8220;खोसला का घोसला&#8221; मुझे बहुत अच्छी लगी थी, बोमन ईरानी मुझे बहुत पंसद है। मुझे मसाला फ़िल्में भी अच्छी लगती हैं, जैसे कि &#8220;ओम शाँति ओम&#8221; मुझे बहुत अच्छी लगी थी। सलमान खान की फ़िल्में ठीक ठाक लगती हैं, कुछ खास नहीं। लेकिन उनकी वजह से लोग मेरा नाम ज़रूर याद रखते हैं। &#8220;द नेमसेक&#8221; के गोगोल में मुझे अपनी छवि दिखी थी, वैसा ही परिवारिक वातावरण, वैसे ही बाल, वैसे ही अपनी पहचान न समझ पाने का दिल पर बोझ। मैं भी लड़कपन में न्यू ओरलिअंस के एक हैवी मैटल बैंड का प्रमुख गायक था। जैसे ही मेरी बहन ने &#8220;द नेमसेक&#8221; देखी, उसने मुझे टेलीफ़ोन किया यही बताने के लिए कि फ़िल्म का गोगोल बिल्कुल मेरे जैसा था।</p>
<p>&#8220;स्लमडॉग&#8221; भी मुझे अच्छी लगी, मैंने इसे शुरु शुरु में एक फेस्टीवल में देखा जब यह फ़िल्म इतनी मशहूर नहीं हुई थी।</p>
<p><em><strong>सुनीलः</strong> इस बातचीत के लिए धन्यवाद सलमान। उम्मीद है कि तुमसे प्रेरणा लेकर कोई इस तरह के पाठ हिंदी व बांग्ला जैसी भाषाओं में भी बनाये तो यह भारत और बांग्लादेश के गाँवों के बच्चों तक भी पहुँच सकते हैं।</em></p>
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		</item>
		<item>
		<title>भाषा पर इतिहास का बोझ ना डालें</title>
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		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 17:02:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
		<category><![CDATA[Anita Nair]]></category>
		<category><![CDATA[Bangalore]]></category>

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		<description><![CDATA[अँग्रेज़ी में लिखने वाली बंगलौर निवासी लोकप्रिय भारतीय उपन्यासकार व लेखिका अनीता नायर से डॉ सुनील दीपक की बातचीत]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">जनवरी 2008 में मुझे अँग्रेज़ी में लिखने वाली भारतीय लेखिका सुश्री <strong>अनीता नायर</strong> से मिलने का और बात करने का मौका मिला था। केरल में जन्मीं अनीता ने 1997 में अपनी पहली पुस्तक तब लिखी जब वे बंगलौर की एक विज्ञापन एजेंसी में कार्यरत थीं। अब तक उनके <a href="http://anitanair.net/novels/index.htm" target="_blank">ग्यारह उपन्यास</a> प्रकाशित हो चुके हैं। प्रस्तुत है अनीता से हई बातचीत से कुछ अंश।</div>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> अनीता आपकी हिन्दी इतनी अच्छी है पर आप लिखती अंग्रेज़ी में है?</em></p>
<p><img class="alignright" style="margin: 10px;" title="Anita Nair" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/02/anita_nair_story.jpg" alt="Anita Nair" width="300" height="358" /><strong>अनीताः </strong>मैं चेन्नई के पास अवडि नाम की छोटी सी जगह पर बड़ी हुई। अवडि कुछ अविश्वस्नीय सी जगह है। यहाँ भारतीय फौज के टैंक बनाये जाते हैं, देश के विभिन्न भागों के लोग वहाँ मिलजुल कर रहते हैं, जिसमें कोई एक गुट अन्य गुटों पर भारी नहीं पड़ता। मैंने आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई हिंदी माध्यम के विद्यालय में की है और हिंदी पर मेरा अच्छा अधिकार है। मैंने हिंदी साहित्य बहुत पढ़ा है, प्रेमचंद से ले कर मोहन राकेश तक, सभी जाने माने हिंदी लेखकों को पढ़ा है। शायद इसीलिए मेरे लेखन पर पश्चिमी नहीं भारतीय साहित्य का प्रभाव है।</p>
<p>मैं बड़ी तो हुई चेन्नई में पर मेरे अधिकतर साथी थे उत्तर भारतीय, इसलिए कुछ अजीब सी जगह थी। शेष भारतीय भाषाओं के मुकाबले अँग्रेजी में पढ़ना कम ही होता था। कुछ भाषाओं से मैंने अनुवाद भी पढ़े पर सबसे अधिक हिंदी में ही पढ़ा। इस तरह चेन्नई के उस समय में मेरा पढ़ना लिखना कुछ अजीब सा था। मेरी माँ मुझे मलयालम और तमिल भाषा में पढ़ कर सुनाती थीं, विद्यालय में मैं अधिकतर हिंदी में पढ़ती थी।</p>
<p>फ़िर अचानक ही किताबों के माध्यम से अँग्रेजी से मेरी मुलाकात हुई और मुझे इस भाषा से प्यार हो गया। इसीलिए मैंने अँग्रेजी में लिखने को चुना। लोग मुझसे अक्सर पूछते रहते हैं कि मैं अँग्रेजी में क्यों लिखती हूँ, जबकि मैं आम हिंदी भाषीयों से अच्छी हिंदी बोल लेती हूँ? यह सच है कि मैं अन्य बहुत से हिंदी लिखने बोलने वालों से अच्छी हिंदी लिख बोल लेती हूँ, पर मैं अच्छी मलयालम भी बोलती हूँ और अच्छी तमिल और कन्नड़ भी। </p>
<div id="pullQuoteL">मैंने प्रेमचंद से लेकर मोहन राकेश तक, सभी जानेमाने हिंदी लेखकों को पढ़ा है। शायद इसीलिए मेरे लेखन पर पश्चिमी नहीं भारतीय साहित्य का प्रभाव है।</div>
<p>तो यह बात नहीं कि मैं भारतीय भाषाएँ नहीं जानती पर मैंने स्वयं ही अँग्रेजी में लिखने को चुना। शायद अरबी या फ्रेंच या किसी अन्य भाषा से इस तरह प्यार हो जाता तो उस भाषा में लिखती। मुझे अँग्रेजी अच्छी लगती है इसलिए मैंने अँग्रेजी को चुना। इससे क्या फर्क पड़ता है? भाषा तो भाषा ही होती है, उस पर इतिहास का बोझ क्यों डालें?</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> मैं आप से सहमत हूँ, कई बार भाषा की बहस में बहुत अजीब अजीब से तर्क दिये जाते हैं कि कौन किस भाषा में लिखे।</em></p>
<p><strong>अनीताः </strong>मुझे इस तरह की बहस से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब मेरी किताब &#8220;<em>लेडीस कूपे</em>&#8221; का हिंदी में अनुवाद किया गया तो अनुवाद मुझे भेजा गया ताकि मैं जाँच लूं कि अनुवाद ठीक है या नहीं। मुझे पूरा उपन्यास नहीं पढ़ना पड़ा, पहले दो तीन अध्याय पढ़ कर ही मुझे महसूस हो गया कि हाँ अनुवादक ने ठीक काम किया है। मैं स्वयं अपने हिंदी अनुवाद को जाँच सकती हूँ, इतना ही मेरी लिए काफ़ी है। बाकी बहस से मुझे कुछ सरोकार नहीं। मेरे विचार में तो यह मेरा ही फायदा है कि मैं अँग्रेजी में लिख सकती हूँ।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> अच्छा यहाँ विदेश में इस बात पर विमर्श किया जाता है कि प्रवासी होने का एक लेखक के लिए क्या अर्थ है। हम लोग भारत से बाहर रहने वाले प्रवासी लेखकों के बारे में बहस करते हैं। पर भारत में रह कर भी, अपनी भाषा और संस्कृति से दूर रह कर प्रवासी अनुभव होते हैं। आप का परिवार भी तो भारत में प्रवासी था।  आप का परिवार केरल से है पर आप केरल के बाहर पली बड़ी हैं। आप इस बारे में क्या सोचती हैं?</em></p>
<p><strong>अनीताः </strong>अब मेरे माता पिता केरल में ही रहते हैं।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> लेकिन जब आप बड़ी हो रहीं थीं तब वे लोग केरल में नहीं थे। </em></p>
<p><strong>अनीताः </strong>एक बात तो यह है कि चेन्नई में केरल के लोगों के बारे में बहुत बुरी तरह से बात की जाती है, उनके बारे में जाने क्या क्या कहते हैं। जब तक अवडि में रहे तो आसपास उत्तर भारतीय, महाराष्ट्र के, आँध्र के लोग थे। वहाँ रहने पर यह नहीं सोचते थे कि हम किस राज्य से हैं, सोचते थे कि हम भारतीय हैं। विवाह के बाद अवडि से बाहर निकलने पर पाया कि बाहर का संसार अवडि के संसार से भिन्न था, जहाँ पर हम अजनबी या &#8220;बाहर वाले&#8221; थे क्यों कि हमें ठीक से बोलना नहीं आता था या हमारी खाने पीने की आदतें भिन्न थीं। मेरे लिए सौभाग्य की बात हुई कि उन्हीं दिनों मेरे माता पिता ने वापस केरल जाने की सोची। तब से अक्सर मन ही मन मैं स्वयं से कहती हूँ कि &#8220;यह सब जगह थोड़े से दिनों के लिए ही हैं, बाद में हम लोग केरल वापस चले जायेंगे।&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">चाहूँ तो वेनिस में घर ले कर रह सकती हूँ, पर जितनी बार यूरोप आती हूँ मुझे बताना पड़ता है कि मैं यहाँ क्यों आ रही हूँ। भारत से कदम बाहर रखने पर इस तरह के सवाल हमेशा उठते हैं।</div>
<p>फ़िर हम लोग कर्नाटक में आ गये। हमने बंगलौर में अपना घर बनवाया है पर मन में कहीं गहराई में यह बात छुपी है यह मेरा घर बँगलौर में है पर मैं अपनी जड़े यहाँ नहीं जमा सकती। इसलिए मैंने केरल में अपने लिए एक कॉटेज भी बनवाया, यह सोचकर कि चलो वहाँ पर अपना कुछ तो रहे। मैं सोचती हूँ कि यह मेरी अंदरूनी ज़रूरत है कि मैं वहाँ रहूँ जहाँ अपनापन मिले और यही वजह है कि मैं भारत में रहती हूँ, कहीं और नहीं।</p>
<p>आज मेरे लिए अपने रहने की जगह चुनना आसान है पर अपनापन खोजना, जड़ें खोजना, यह मेरी गहरी चाह है। चाहूँ तो वेनिस में घर ले कर रह सकती हूँ पर जितनी बार यूरोप आती हूँ मुझे बताना पड़ता है कि मैं यहाँ क्यों आ रही हूँ, कितने दिन रुकूगीं, आदि। मुझे इस तरह के सवाल अच्छे नहीं लगते। जब मैं भारत में यात्रा करती हूँ तो कोई मुझसे यह सवाल नहीं करता कि कितने दिन रुकोगी, क्यों आयी हो, वगैरह। पर भारत से कदम बाहर रखो तो इस तरह के प्रश्न हमेशा उठते हैं।</p>
<p>कई बार लोग सोचते हैं कि मैं स्पैनिश हूँ या दक्षिण इटली से क्लाबरिया जैसी जगह से हूँ, मुझसे स्पेनिश या इतालवी भाषा में बात करने लगते हैं। हो सकता है मैं स्पैनिश या इतालवी दिखती हूँ, कारण कुछ भी हो भीतर से मुझे लगता है कि मैं यहाँ की नहीं, यह मेरी जगह नहीं। भारत में चाहे लोग मुझे देख कर यह न बता पायें कि मैं कौन से राज्य से हूँ, पर कोई इस तरह के सवाल तो नहीं पूछता मुझसे।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> आप के पति कहाँ से हैं?</em></p>
<p><strong>अनीताः </strong>वह भी केरल के ही हैं।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> तो क्या आप के बच्चों को लगता है कि उनकी जड़ें केरल में हैं?</em></p>
<p><strong>अनीताः </strong><em>(हँस कर) </em>मेरा बेटा तो कुछ कुछ इतालवी भाषा भी बोलता है, फ्राँचेस्का की वजह से, जो मेरी किताबों का इतालवी में अनुवाद करती है।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> अच्छा अपने लिखने के बारे में बताईये। यह निर्णय कैसे लेती हैं कि आप किस विषय पर लिखेंगी?</em></p>
<p><strong>अनीताः </strong>यह निर्णय करना कि अगली किताब कौन सी होगी, इसमें मुझे दो साल तक लग जाते हैं। लिखने का विचार मेरे अंदर लम्बे समय तक घूमता रहता है। अगर दो साल बाद भी मुझे लगे कि हाँ उस विचार में दम है तो मैं उस पर लिखूँगी। सोचने से लिखने तक दो तीन साल लग जाते हैं, और उसके बाद में उस विचार पर ठीक तरह से काम शुरु करती हूँ।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> अच्छा आप किताब को सोच विचार कर बनाती हैं या फ़िर एक बार शुरु हो तो उसे अपने आप भावनाओं के बल पर बढ़ने देती हैं?</em></p>
<p><strong>अनीताः </strong>दोनों ही तरह से। शुरु शुरु में तो बहुत सोच विचार कर पूरी योजना बनाती हूँ, पर कई बार कहानी और पात्रों की भावनाएँ सब कुछ अपने काबू में कर लेती हैं। और  जब ऐसा हो तो मैं उसे रोकने या बदलने की कोशिश नहीं करती।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> अनीता इस बातचीत के लिए धन्यवाद।</em></p>
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		<title>सब तक बात पहुंचाने का माध्यम है हिन्दी</title>
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		<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 18:27:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सामयिकी दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
		<category><![CDATA[font]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Railways]]></category>
		<category><![CDATA[susha]]></category>
		<category><![CDATA[TTF]]></category>
		<category><![CDATA[Unicode]]></category>
		<category><![CDATA[Vakil]]></category>

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		<description><![CDATA[भारतीय रेल में कार्यरत अधिकारी हर्ष कुमार द्वारा निर्मित निःशुल्क ट्रू टाईप फाँट शुषा खासा लोकप्रिय फाँट है जिसने भारतीय भाषाओं को इंटरनेट व डेस्कटॉप प्रकाशन तक पहुंचाने में योगदान दिया। हर्ष से सामयिकी की बातचीत।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser"><span class="dropCap">इं</span>टरनेट का संसार बड़ा अनोखा है। यहाँ असंख्य स्वयंसेवियों द्वारा निःस्वार्थ भाव से हौले हौले संचित ज्ञान का अकूत व मुफ्त भंडार तो है ही, इंटरनेट को समाज से जोड़ते अनेकों औजारों का भी सृजन यहाँ हुआ है। ऐसे ही एक स्वयंसेवी हैं भारतीय रेल में कार्यरत अधिकारी <strong>हर्ष कुमार</strong> जिन्होंने एक निःशुल्क ट्रू टाईप फाँट उपलब्ध करा कर भारतीय भाषाओं को इंटरनेट तक पहुंचाने व डेस्कटॉप प्रकाशन सहज बनाने में महती योगदान दिया।</p>
<p><img class="alignright" style="margin:5px" title="हर्ष कुमार" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/harsh-kumar-pp.jpg" alt="Harsh Kumar" width="200" height="240" />इंटरनेट से जुड़े पुराने लोग &#8216;<strong>सुशा</strong>&#8216; नाम से अपरीचित न होंगे। 1997 में हर्ष द्वारा निर्मित इस फाँट की सहायता से हिंदी, मराठी, गुजराती, गुरुमुखी व बांग्ला भाषाओं में कंप्यूटर पर आसानी से कार्य किया जा सकता था। इसका कुंजीपटल विन्यास बेहद आसान था, जिसे हम आजकल फोनेटिक विधि के नाम से जानते हैं। सुशा का प्रयोग कर इन भाषाओं में तंत्रांश भी बनाये जा सकते थे, जिनका एक प्रूफ आफ कंसेप्ट तंत्रांश हर्ष मुहैया भी कराते थे। यूनीकोड के पदार्पण के बाद सुशा जैसे फाँट की उपयोगिता भले कम हो गई हो पर शुरुवाती दौर में भारतीय भाषाओं के प्रादुर्भाव में इसकी भूमिका सदा प्रशंसनीय रहेगी।</p>
<p>हरियाणा के मूल रहवासी हर्ष सूचना प्रोद्योगिकी से संबद्ध रहे हैं, उन्होंने हंबरसाईड विश्वविद्यालय, ब्रिटेन से मास्टर्स उपाधि प्राप्त की है। वे कोंकण रेलवे जैसी परियोजनाओं से जुड़े रहे व संप्रति मंत्रालय में कार्यकारी निदेशक (वित्त व्यय) के पद पर आसीन हैं।  वे कवि भी हैं और उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।</p>
<p>प्रस्तुत है हर्ष कुमार से सामयिकी की बातचीत के अंश।</p></div>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>हर्ष अपने बारे में कुछ बतायें। आपके परिवार में कौन कौन हैं?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> मैं भारतीय रेल में काम करता हूँ। आजकल मंत्रालय में कार्यकारी निदेशक (वित्त व्यय) के पद पर हूँ। मैं मूलतः हरियाणा का रहने वाला हूँ। मैंने उत्तर प्रदेश में स्कूली शिक्षा प्राप्त की तथा कॉलेज की पढ़ाई दिल्ली से की। मेरे परिवार में मेरी माँ, पत्नी, दो पुत्रियां (सुभाषिनी व शाश्वती) व मेरी सास हैं।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>सुशा फाँट की रचना की बात आपने क्यों सोची? वो क्या समस्या या प्रेरणा थी जिसने आपको सुशा श्रेणी के फाँट डिजाइन करने व उसे आमजन के लिए मुफ़्त जारी करने को प्रेरित किया?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> आपने देखा होगा कि लगभग सभी फाँट का प्रयोग करने के लिये उसी कम्पनी के सॉफ्टवेयर को लेना पड़ता है। मेरा प्रयास था कि यह दिक्कत हटाई जाये और यह सभी के लिये हमेशा मुफ़्त उपलब्ध रहे। वैसे जब हम अंग्रेज़ी के अलग-अलग फाँट इस्तेमाल करते हैं तो कोई अलग से पैसे नहीं देते, फिर हिन्दी के लिये क्यों? बस यही सोच थी! मेरी जरूरतें भी कम हैं &#8211; तनख्वाह व पेंशन का जुगाड़ सरकारी नौकर होने के नाते हो ही रहेगा। अत: यह सुविधा मुफ्त ही उपलब्ध करायी व इसकी निहित डिजाइन में इस बात का ख्याल रखा गया कि कोई इस पर अधिकार कर कोई इस पर न रोक लगा सके न बेच सके।  हाँ, इसका प्रयोग कर यदि कोई अपना सॉफ्टवेयर बनाकर बेचे और अपनी मेहनत के एवज में पैसे कमाये तो इस पर कोई जागिरदारी नहीं है।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>सुशा की निर्माण प्रक्रिया के बारे में बतायें। इस फाँट के डिजाइन में क्या तकनीकी समस्याएं रहीं? </em></p>
<p><span id="pullQuoteR">फाँट के डिजाइन की तकनीकी जानकारी माइक्रोसॉफ्ट की साईट पर सभी के लिये उपलब्ध है, बस शौक व जनून चाहिये।</span><strong>हर्षः</strong> फाँट के डिजाइन की तकनीकी जानकारी माइक्रोसॉफ्ट की साईट पर सभी के लिये उपलब्ध है, बस शौक व जनून चाहिये। सुशा यूनीकोड फाँट नहीं है। वास्तव में यह केवल फाँट नहीं है अपितु कम्पयूटर पर काम करने का तरीका है जिसमें आपको कोई अलग सॉफ्टवेयर नहीं लगाना पड़ता और आप आसानी से काम कर सकते हैं जैसे कि आप अंग्रेज़ी में काम करते हैं और उसका कीबोर्ड भी आसान है। मुझे बहुत खुशी है कि आज सभी भारतीय भाषाओं के सॉफ्टवेयर में सुशा कुंजीपट उपलब्ध है। उस समय यह सुविधा किसी में भी नहीं थी। यह इंटरनेट <em>रेडी </em>भी था। यही बातें इसकी मुख्य पहचान थीं व लोकप्रियता का कारण भी।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>सुशा के शुरुवाती प्रयोग व प्रयोक्ताओं के बारे में कुछ बतायें। क्या उनके प्रतिक्रिया से इसमें बदलाव किये गये?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> एक वास्तविक किस्सा बताता हूँ। मैने गुजराती श्री वकील से सीखी थी और यही कारण है कि सुशा परिवार के गुजराती फाँट का नाम वकील है। उनकी बेटी अपनी पढ़ाई के लिये अमरीका चली गयी। तो उनकी माँ और बेटी के बीच में पत्र व्यवहार व बातचीत बंद हो गयी। उन दिनों फोन <em>कॉल</em> इतने सस्ते नहीं थे और न उनका इतना प्रचलन था। बस पत्र या ईमेल लिखना ही एक मात्र मध्यम था। बेटी को गुजराती मे लिखना नहीं आता था और दादी को हिन्दी पढ़ना नहीं आता था। तो श्री वकील अपनी बेटी के हिन्दी या अंग्रेज़ी के पत्र को गुजराती में माँ को बता देते थे और माँ की बात बेटी को हिन्दी या अंग्रेज़ी में। जब सुशा का गुजराती में &#8216;वकील01&#8242; आया तो बेटी हिन्दी में ईमेल भेज देती थी जिसे श्री वकील गुजराती में &#8216;वकील01&#8242; फान्ट में डाल कर प्रिन्ट कर देते थे। यनी दादी पोती में सीधा संबन्ध फिर से बन गया।</p>
<p>शुरू में तो मेरी पत्नी व कुछ दोस्तों की प्रतिक्रिया से काम चलाया गया बाद में जब अन्य लोगों की प्रतिक्रिया भी मिली तो उसका भी ध्यान रखा गया। एक बात मैंने ध्यान में रखी कि जब एक key यानी कुंजी किसी अक्षर के लिये आवंटित कर दी गयी तो फिर उसकी जगह नहीं बदली गयी, ठीक वैसे ही जैसे कि यूनीकोड में ध्यान रखते हैं।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>क्या आपको उम्मीद थी कि यह फाँट हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय फाँटों में से एक बन जाएगा? खासकर जालस्थलों के लिए?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> क्योंकि यह मुफ्त में था और आसानी से उपलब्ध था, काम करना आसान था, कीबोर्ड को याद रखने में आसानी थी। शायद यही कारण था कि जालस्थलों में यह फाँट हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय फाँटों में से एक बन पाया। मैं इसके लिये जालस्थलों के चलाने वालों का आभारी रहुंगा &#8211; विशेषकर <em>अभिव्यक्ति </em>व <em>काव्यालय </em>वेब पत्रिकाओं का। यहाँ पर इसके प्रयोग से अधिक से अधिक लोगों को इसकी जानकारी मिली।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>सुना है कि दिल्ली के किसी तकनीकी मेले में पहली दफ़ा सुशा फाँट का प्रदर्शन किया गया तो लोग इसकी प्रति प्राप्त करने के लिए लोग फ्लॉपियाँ लेकर टूट पड़े थे। आपके ऐसे पहले पहले के अनुभवों को जानना चाहेंगे।</em></p>
<div class="wp-caption alignleft" style="width: 310px"><img title="प्रगति मैदान, दिल्ली में आई टी एशिया मेले 1997 में भारत भाषा के स्टॉल का दृश्य" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/harsh-kumar-fair.jpg" alt="IT Asia fair at Pragati Maidan, Delhi" width="300" height="203" /><p class="wp-caption-text">प्रगति मैदान, दिल्ली में आई टी एशिया मेले 1997 में भारत भाषा के स्टॉल का दृश्य</p></div>
<p><strong>हर्षः</strong> जी यह सही है। दिल्ली में 1997 में प्रगति मैदान में चल रहे &#8216;आई टी एशिया&#8217; मेले में MAIT तथा NASCOM के सौजन्य से एक स्टॉल मिल गया था जहाँ पर इसका मुफ्त में वितरण किया जा रहा था। लोग फ्लॉपी लेकर आते थे और इसकी कॉपी ले जाते थे। हमारे पास फ्लॉपी तो नहीं थीं, लोगों को एक फ्लॉपी भी बमुश्किल मिलती थी तब प्रश्न आया कि क्या करें। लोगों ने सुझाव दिया कि 220 रु में 10 फ्लॉपी का डिब्बा मिलता है तो 22 या 25 रु लेकर बाँटो। मैंने कहा कि मैं इसके पैसे को हाथ नहीं लगाऊंगा। तब कुछ लोगों ने पूरा डिब्बा खरीदा और अपनी 1 या 2 फ्लॉपी रख कर बाकी वहीं खड़े-खड़े बेच दी या लोगों को मुफ्त में बांट दी। भीड़ इतनी थी कि किसी किसी दिन तो खाना खाने की फुर्सत भी नहीं मिल पाती थी। उन दिनों इंटरनेट से डाउनलोड करने में कभी-कभी दिक्कत आती थी, अत: लोग मौका नहीं गंवाना चाहते थे।</p>
<p>बहुत खुशी होती थी तथा थकान भी &#8211; सारा दिन प्रेजेंटेशन करो, हर बार एक नया समूह। उन्हें फिर समझाओ और फ्लॉपी की प्रतिलिपी वितरित करो। पर बहुत खुशी थी कि लोगों को यह इतना पसन्द आया। बहुत खुशी होती थी जब कोई स्वयंसेवी मिल जाता था और कहता था, &#8220;आप थक गये होंगे। कहें तो मैं प्रेजेंटेशन करूँ और लोगों को समझाऊँ?&#8221;, या कोई कहता, &#8220;लाइये मैं फ्लॉपी की कापी कर देता हूँ&#8221; और अगले तीन-चार घन्टे तक काम करता रहता। प्रेस के लोग भी मेहरबान थे। मैं सबके नाम तो याद नहीं रख पाया पर अक्सर सोचता हूँ तो सूरतें आँखों के सामने आती हैं और मन ही मन मैं उनका शुक्रिया अदा करता हूँ।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>सरकारी नौकरी में आमतौर पर नियमबद्ध कार्य होते हैं। क्या आपको अब लगता है कि सुशा &#8211; का रूप रंग कुछ अलहदा होता यदि यह नियमबद्धता नहीं होती? सुशा के अलावा आपने अन्य कोई तकनीकी ईजाद किये हों तो उनके बारे में हमारे पाठकों को बतायें।</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> सरकारी नौकरी के अपने नियम हैं और हम सब उनको मानते हैं और उनका पालन करते हैं। हाँ सरकारी नौकरी नहीं होती तो शायद इसे मुफ्त में बाँटना मुश्किल होता। सरकारी नौकरी में बंधन तो होता है पर साथ ही यह सुविधा भी होती है कि जनहित में काम करो तो कोई परेशानी नहीं होगी। किसी समस्या के या काम के नये नये तरीके या हल निकालना मुझे अच्छा लगता है। जब कोई हल या नया तरीका सटीक बैठता है तो बहुत अच्छा लगता है। लीनक्स पर हिन्दी लाने में मुझे विशेष खुशी मिली। हाँ पर्याप्त धन व साधन नहीं जुटा पाया कि पूरा लीनक्स ही हिन्दी में हो, इसका मलाल भी रहता है। शायद मैं अगर काम के पैसे लेता तो धन इकठ्ठा कर पाता या किसी वैंचर कैपिटल कंपनी से या साझे में यह कर पाता। एक बार मुझे ऐसा व्यक्ति मिला जिसने मेरी मुफ्त सलाह लेने से इन्कार किया और कहा &#8211; मैं आपकी सलाह पर काम कर के पैसे कमाऊँगा पर यदि आप उसमें से हिस्सा नहीं लेंगे तो मेरे लिये वह चोरी होगी जो मैं नहीं करना चाहता। अत: मैं आपसे सलाह नहीं ले सकता।</p>
<div class="wp-caption alignleft" style="width: 260px"><img title="महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री को मराठी में टंकण के गुर सिखाते हर्ष" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/harsh-kumar-cm.jpg" alt="IT Asia fair at Pragati Maidan, Delhi" width="250" height="228" /><p class="wp-caption-text">महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री को मराठी में टंकण के गुर सिखाते हर्ष</p></div>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>आपकी राय में मंगल जैसे और यूनीकोड हिंदी फॉन्‍ट के विकास व व्यापन में क्‍या समस्‍याएं रही हैं? और इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कार्य क्‍यों नहीं हुआ?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> टीटीएफ फॉन्‍टस बनाना और बात थी तथा यूनीकोड फॉन्‍ट बनाना अलग तरीके का काम है। यदि यूनीकोड या माइक्रोसॉफ्ट की साइट पर जायें और यूनीकोड फॉन्‍ट बनाने के तरीके देखें तो यह आसानी से समझ में आयेगी। और अब तो &#8216;कोडिंग&#8217; का विश्व स्तरीय मानक है। हमें आशा हैं कि कुछ दिन में हिन्दी के बहुत सुन्दर यूनीकोड फॉन्‍ट आने लगेंगे।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>इंटरनेट पर हिन्दी के बढ़ाव को आप कैसे देखते हैं? इस प्रसार को बढ़ाने के लिये और क्या किया जाना चाहिये?</em></p>
<p>हिन्दी का प्रचार बढाने के लिये हम सबको एक परिवर्तन लाना पड़ेगा। वह यह है कि हम भी विदेशियों की तरह अपना अनुभव लिखना शुरू कर दें, अपने-अपने ब्लॉग पर या अन्य माध्यमों से अपनी बात दूसरों तक पहुँचाना शुरू कर दें। भारतवर्ष में अगर अपनी बात सभी तक ले जानी है तो हिन्दी ही माध्यम है, जैसा कि टीवी चैनल समझ चुके हैं।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>आप लिखते भी हैं। साहित्‍य और तकनीक की जुगलबंदी कुछ अनोखी लगती है। तकनीक ने साहित्‍य को प्रेरित किया अथवा साहित्‍य ने तकनीक को?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> दोनों का अपना &#8211; अपना स्थान है। मुझे तो दोनों से प्यार है।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>आपको किस तरह का लेखन पसंद है? अपने लेखन व प्रकाशित रचनाओं के बारे में कुछ बतायें।</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> मैं कविता लिखता हूँ । एक छोटी कोशिश कहानी या लेख की भी की है। मेरे दो कविता संग्रह छप चुके हैं और दो की तैयारी है। मैं इन्हें <a href="http://poemsofharshkumar.blogspot.com" target="_blank">एक ब्लॉग</a> में भी डाल रहा हूँ।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>टीवी के दौर में आज कवि व साहित्यकार स्वयम् को कहाँ खड़ा पाते हैं?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> टीवी तो 2 मिनट नूडल्स की तरह है या यह कहिये कि फास्ट फूड की तरह है। हम उसका स्वाद तो चखते हैं और साथ में पूरा खाना भी खाते हैं। विजुअल मीडिया का अपना स्थान है प्रिंट मिडिया का अपना। दोनों साथ में हैं, एक दूसरे के पूरक हैं।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>अपनी कोई पसंदीदा कविता सुनाना चाहेंगे?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> यह सबसे मुश्किल सवाल है। मुझे तो सभी अच्छी लगती हैं। हाँ एक कविता एक बहुत अहम विषय पर है &#8211; बालिका भ्रूण हत्या पर। आपको भेज रहा हूँ।</p>
<blockquote><p><strong>बालिका भ्रूणहत्या</strong></p>
<p>देखो तुम ये छोटी बच्ची, है कितनी अच्छी<br />
प्यारी-प्यारी बातें इसकी, हैं कितनी अच्छी।<br />
प्यार करूं कितना भी, कम ही कम लगता है<br />
लाड़ लड़ाऊं जितना, पर मन नहीं भरता है ।</p>
<p>मैं सोचता रहता हूं काम इसे कितने हैं<br />
आने वाला कल इस पर ही निर्भर है ।<br />
नई-नई पीढ़ी को दुनिया में ये ही लाएगी<br />
हम इसको जो देंगे दस गुना उन्हें यह देगी ।</p>
<p>सब सीख उन्हें ये देगी, पालेगी-पोसेगी<br />
तकलीफ अगर होगी, तो रात-रात जागेगी ।<br />
इसके दम से ही, हम दम भरते हैं दुनिया में<br />
इसके दम से ही, तुम दम भरते हो दुनिया में ।</p>
<p>पर दुर्भाग्य हमारा देखो, अकल के कुछ अंधे हैं<br />
दुनिया में आने से पहले ही, जो मार इसे देते हैं ।<br />
वो भी क्या कम हैं, जो तंग इसे करते हैं<br />
दहेज की वेदी पर, जो बलि इसकी देते हैं ।</p>
<p>अगर नहीं यह होगी, तो कल भोर नहीं होगी<br />
यह संसार नहीं होगा, यह सृष्टि नहीं होगी ।<br />
हम भी नहीं होंगे, तुम भी नहीं होगे<br />
विश्वास मुझे है तब वो भी नहीं होगा ।</p>
<p>जिसके दम से हम दम लेते हैं दुनिया में ।<br />
जिसके दम से तुम दम लेते हो दुनिया में<br />
तब वो भी नहीं होगा<br />
तब वो भी नहीं होगा।</p></blockquote>
<p><em>[साक्षात्कार के सवाल जुटाने में मदद के लिये सामयिकी संजय करीर, अतुल जैन, शशि, तरुण व रविशंकर की शुक्रगुज़ार है।]</em></p>
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		<title>मैं चौबीसों घंटे लेखक ही होता हूँ</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2008/12/altaf-tyrewala-interview/</link>
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		<pubDate>Sun, 28 Dec 2008 02:30:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
		<category><![CDATA[Agota Kristof]]></category>
		<category><![CDATA[Altaf Tyrewala]]></category>
		<category><![CDATA[Italy]]></category>
		<category><![CDATA[Muslim]]></category>
		<category><![CDATA[No God In Sight]]></category>
		<category><![CDATA[Turin]]></category>

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		<description><![CDATA[भारतीय अंग्रेज़ी लेखक अल्ताफ टायरवाला से सामयिकी के संपादक मंडल के सदस्य डॉ सुनील दीपक की बातचीत]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_170" class="wp-caption aligncenter" style="width: 625px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2008/12/turin_conf_pic.jpg"><img class="size-full wp-image-170" title="From left: Shashi Tharoor, Altaf Tyrewala, Prof. San Pietro, Lavanya Shankaran &amp; Nirpal Singh Dhauliwal, Turin, January 2008" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2008/12/turin_conf_pic.jpg" alt="तुरिन की गोष्टी का चित्र। बायें से शशि थरुर, अल्ताफ़ टायरवाला, प्रो सैन पिएत्रो, लाव्णया शंकरम तथा निरपाल सिंह धौलीवाल।" width="615" height="326" /></a><p class="wp-caption-text">तुरिन की गोष्टी का चित्र। बायें से शशि थरुर, अल्ताफ़ टायरवाला, प्रो सैन पिएत्रो, लाव्णया शंकरम तथा निरपाल सिंह धौलीवाल।</p></div>
<div id="section-teaser"><span class="dropCap">ज</span>नवरी 2008 की बात है। हम इटली के उत्तर स्थित शहर तुरिन में इतालवी साहित्यिक संस्था द्वारा आयोजित एक गोष्टी में शामिल होने गये थे। अँग्रेजी में लिखने वाले भारतीय लेखक अल्ताफ़ टायरवाला से मैंने इंटरव्यू का आग्रह किया था और अंततः दोपहर के भोजन के लिये जाते समय एक बस में यह बातचीत संभव हो सकी। बातचीत में लावण्या शंकरम भी शामिल थीं पर उन्हें पता ना था कि मैं बातचीत रिकार्ड कर रहा हूँ। मैं बड़ा खुश था क्योंकि चर्चा बड़ी अच्छी हुई थी। बाद में पता चला कि रिकार्डिंग उतनी अच्छी नहीं हो पाई थी, लावण्या की आवाज़ ठीक से दर्ज नहीं हो पाई और मुझे भी पूरी तरह उनकी बातें याद नहीं थी कि मैं इस लेख में उन्हें शामिल कर पाता, इसका मुझे खेद रहेगा।</p>
<p>जब मैं रिकार्डिंग की तैयारी कर रहा था तो अल्ताफ़ ने कहा कि उन्हें अच्छा नहीं लगा कि आयोजकों ने उनका परिचय &#8220;भारत से एक मुस्लिम लेखक&#8221; कह कर दिया है। &#8220;और तो किसी लेखक के धर्म के बारे में नहीं कहा गया, तो मेरे ही बारे में उन्होंने इस तरह क्यों कहा?&#8221; मैं उनसे सहमत था, कोई यह कह कर मेरा परिचय दे कि &#8220;इनसे मिलिये, ये भारत से एक हिंदू लेखक हैं&#8221; तो मुझे भी बहुत बुरा लगता। हालाँकि मेरी आयोजकों से चर्चा हुई थी और मुझे पता था कि वे बस यह जतलाना चाहते थे कि समारोह में भारतीय अल्पसंख्यकों को दरकिनार नहीं किया गया।</p>
<p>खैर, इसके बाद रिकार्डिंग शुरु हुई और नीचे उसी का विवरण हैः</p></div>
<p><strong>सुनीलः</strong><em> अल्ताफ़, तुम्हें किस तरह के लेखक और लेखन पसंद हैं?</em></p>
<p><strong>अल्ताफ़ः</strong> मुझे वह लेखन अच्छा लगता है जिसमें बेकार की सब बातों को काट कर निकाल दिया गया हो और लेखन में बिल्कुल गिनेचुने आवश्यक शब्द हों। मुझसे लम्बे विवरण सहन नहीं होते। ऐसा लेखन जो यह मानकर चले कि मुझे फलां बात मालूम ही नहीं होगी&#8230; भई मैं इंटरनेट पर पढ़ता हूँ, कोशिश करता हूँ कि पता रहे दुनिया में क्या हो रहा है। तो मैं वही पढ़ना चाहता हूँ जो मुझे किसी अन्य जगह से नहीं मिल सकती।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong><em>क्या तुमने अगोटा क्रिस्टोफ की कोई किताब पढ़ी है, मसलन उनकी &#8220;सिटि आफ के&#8221; की त्रयी? जब मैंने तुम्हारी किताब &#8220;नो गॉड इन साईट&#8221; पढ़ी थी तो पहले अध्याय के बाद ही मुझे अगोटा की याद आयी। वह हँगरी से हैं और स्विटज़रलैंड में रहती हैं। अब वह बूढ़ी हो गयीं हैं। उनकी किताबें भी छोटी होती हैं जिनमें तुम्हारी किताब की तरह के ही छोटे छोटे अध्याय होते हैं। इनी गिनी पंक्तियाँ, नपे-तुले शब्द। पर इसके बावजूद उनके लेखन का भावनात्मक असर ज़ोरदार होता है।</em></p>
<p><strong>अल्ताफ़ः</strong> नहीं, मैंने उन्हें नहीं पढ़ा। पर जिस तरह की जालिय दुनिया में हम रह रहे हैं, मेरा आधे से भी अधिक पढ़ना तो इंटरनेट पर होता है, तो संक्षिप्तता अत्यंत महत्वपूर्ण है। अपनी रोजमर्रा की दुनिया में, कोई किताब या पत्रिका पढ़ूं तो भी चाहता हूँ कि बात संक्षेप में और जितनी आवश्यक हो बस वहाँ तक की जाये। मुझे मालूम है कि तफ़सीलवार लिखने में भी फायदा है, बात में गहराई आ जाती है, तो मैं उसे स्वीकार कर सकता हूँ।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong><em>तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हारी बात में कुछ विरोधाभास है, कि तुम लिखना चाहते हो पर साथ ही &#8220;कम से कम शब्दों में&#8221; लिखना चाहते हो?</em></p>
<p><img class="alignright size-full wp-image-156" style="border:none;border-left:3px solid #cccccc;margin-left:10px;padding:10px" title="altaf_quote" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2008/12/altaf_quote.jpg" alt="Altaf Quote" width="239" height="300" /><strong>अल्ताफ़ः</strong> (हँस पड़ते हैं) हाँ, बिल्कुल! इससे मेरी आजीविका को बहुत नुकसान पहुँचता है। मैं हर साल नयी किताब नहीं निकाल सकता। लेखक के तौर पर यह एक मुश्किल है जिससे मुझे जूझना है। मेरे अंदर ये दो परस्पर विरोधी आवेग हैं, एक लिखने का और दूसरा अपनी बात को न्यूनतम शब्दों में कहने का आवेग। कभी लगता है कि चुप रहना बेहतर है क्योंकि सब कुछ लिखा कहा जा चुका है और दूसरी ओर चुप रहने की इच्छा के बावजूद लिखने की कोशिश है।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong><em>लेखन एक सृजनात्मक विधा है पर कला की अन्य भी बहुत सी सृजनात्मक विधाएँ हैं। क्या तुम्हें अन्य सृजनात्मक विधाओं में भी रुचि थी और तुमने लेखन को चुना? या तुम्हें केवल लेखन में ही दिलचस्पी थी?</em></p>
<p><strong>अल्ताफ़ः</strong> मैंने कई बार सोचा है कि चित्रकार होना या संगीतकार होना कैसा होगा, पर लेखन सृजनात्मक अभिव्यक्ति से भी कहीं आगे जाता है। यह मेरे जीवन का हिस्सा बन गया है। यह सृजनात्मक शक्ति के विस्फोट जैसा नहीं है बल्कि यह मेरी जीवनशैली को ढाल देता है। मैं जब लिख रहा होता हूँ केवल तभी लेखक नहीं होता, मैं चौबीस घँटे लेखक ही होता हूँ। कम से कम मुझे तो यही लगता है। हर समय मन में यह बात रहती है कि मैं लेखक हूँ, आसपास की सच्चाई को समझना है तो बस कुछ भी हो यही वार्तालाप सा मन में चलता रहता है कि समझूँ, सोचूं। लेखक होने में सबसे पहले पागलपन जैसे ऊर्जा आती है कि बनाऊँ, निर्माण करूँ, पर धीरे धीरे यह ऊर्जा अपना रास्ता बनाने लगती है, केंद्रित होने लगती है, तब सोचने विचारने का काम प्रारम्भ होता है और लेखन परिपक्व बनता है।</p>
<p>जब शुरु शुरु में लिखने लगा तो पाया कि मेरी कहानियाँ मेरे अपने बारे में ही होती थीं, मेरे अपने सांसारिक अनुभवों के बारे में। पर बहुत कहानियाँ लिखने के बाद समझ में आया कि इस पूरे संसार का मैं तो एक छोटा सा हिस्सा भर हूँ। तब यही मेरा काम है कि विभिन्न परिस्थितियों को अपने भीतर जियूँ, खुद से पूछूँ कि यूँ हो तो या वैसा हो तो कैसा लगेगा, खुद को विभिन्न परिस्थितियों में रख कर समझ सकूँ, यह महसूस कर सकूँ कि कोई और होना सचमुच कैसा होता है। केवल सतही या बनावटी नहीं, सचमुच भीतर से अपने अंदर दूसरा कोई होना महसूस करना।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> <em>तुम्हारी एक किताब छपी है पर तुम्हारे मन में तुमने अन्य बहुत सी किताबें भी लिखी होंगी या वे जो अभी केवल तुम्हारे दिमाग में हैं। तुम यह निर्णय कैसे लेते हो कि किस कहानी को लिखोगे और इस तरह सोचने से करने में कितना समय लगता है?</em></p>
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<h3>&#8220;मुंबई और बॉम्बे&#8221; के निवासी अल्ताफ़</h3>
<div id="attachment_167" class="wp-caption alignright" style="width: 111px"><a href="http://www.amazon.com/gp/product/1596921943?ie=UTF8&amp;tag=nirantar-20&amp;linkCode=as2&amp;camp=1789&amp;creative=390957&amp;creativeASIN=1596921943"><img class="size-full wp-image-167" title="No God in Sight" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2008/12/no_god_in_sight.jpg" alt="No God in Sight cover (Click to visit the Amazon page)" width="101" height="160" /></a><img style="border:none !important; margin:0px !important;" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=nirantar-20&amp;l=as2&amp;o=1&amp;a=1596921943" border="0" alt="" width="1" height="1" /><p class="wp-caption-text">No God in Sight cover (Click to visit the Amazon page)</p></div>
<p>32 वर्षीय <strong>अल्ताफ़ टायरवाला</strong> अंग्रेज़ी उपन्यासकार हैं, &#8220;मुंबई और बॉम्बे&#8221; के निवासी हैं। उनका पहला नॉवल 2005 में प्रकाशित हुआ। &#8220;नो गॉड इन साईट&#8221; की कहानी समकालीन मुंबई में निम्न और मध्यम वर्गीय मुसलमानों के जीवन के इर्द गिर्द घूमती है। अमरीका में उन्होंने बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन व लेखन की शिक्षा ली पर न्यूयॉर्क उन्हें अपने बचपन के भायखला से ज़्यादा दूर नहीं रख पाया। पर लेखन में ई-लर्निंग सॉफ्टवेयर बनाने के अनुभव ने मदद ज़रूर दी है। इसके अलावा अल्ताफ़ की जिंदगी के बारे में अंतर्जाल पर और कुछ खोजे नहीं मिलता, उनके बारे में अंग्रेज़ी विकीपीडिया पर पृष्ठ तक नहीं है। हो सकता है वे खुद संक्षिप्त ही बने रहना चाहते हैं, अपनी किताब पर छपे अपने तीन लाईना परिचय की तरह।</div>
<p><strong>अल्ताफ़ः</strong> (हंसते हैं) मेरा पहला उपन्यास तो पूरा बना बनाया ही निकल आया। मेरे अंदर लिखने का आवेग था, गहरी इच्छा थी और लिखना मेरी अंदरूनी ज़रूरत थी। मैं सोच रहा था कि किस तरह आम तौर पर लिखे जाने वाले उपन्यास उस समाज और उस सच्चाई को दिखा पायेंगे जिसमें मैं बड़ा हुआ और जिसमें मैं रहता हूँ। तब मुझे लगा कि उपन्यास का जो आम ढाँचा होता है वह मेरे कथानक से न्याय नहीं कर पायेगा और उसे लिखने के लिए मुझे एक नया तरीका चाहिये, एक ऐसा ढाँचा जिसका पहले किसी ने पहले कभी प्रयोग न किया हो। इस बात का मन में डर भी था कि इस तरीके का लिखा जिसे मैंने पहले नहीं देखा, मालूम नहीं था कि कैसा होगा।</p>
<p>आपका प्रश्न क्या था? कि कितना समय लगता है? यह कहना कठिन है। महीने भी लग सकते हैं। जैसे कि मेरे दूसरे उपन्यास को शुरु होने में दो साल भी अधिक लगे हैं। पहले उपन्यास में मुझसे तुरंत रास्ता मिल गया था, एक बार रास्ता मिल जाये तो सब आसान है, तब हर दो हफ्तों में एक अध्याय पूरा कर लेता था और उससे बहुत संतोष मिलता था। पर मैं सोचता हूँ कि यह सोचने का समय जब उपन्यास मन में तैयार हो रहा है, वह भी बहुत महत्वपूर्ण है। प्रतीक्षा करनी चाहिये जब तक यह पक्का विश्वास न हो कि हाँ यह बात ठीक है और इसे लिखना चाहता हूँ, बजाय कि जल्दबाजी की जाये किसी झूठे काम के लिए। तो मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब सही बात आयेगी तब अंगुलियों को स्वयं मालूम चल जायेगा है कि इसी बात की तलाश कर रहा था।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> <em>क्या तुम अपनी पत्नी से लेखक के रूप में मिले या उसे लेखक बनने से पहले से जानते थे?</em></p>
<p><strong>अल्ताफ़ः</strong> जब हम मिले थे उस दौरान मैं अमरीका में एक बेचारा कॉलेज विद्यार्थी था। हम दोनों साथ पढ़ते थे। वह कहती है कि मैंने उसे अपना ठीक से परिचय नहीं दिया (हंसते हैं) और यह तो वह बाद में समझीं कि मैं लेखक था। क्योंकि वह मुझे लेखक बनने से पहले से जानती है, उसकी वजह से मेरे पाँव धरती पर जमे रहते हैं। इन लेखकों की दुनिया में ऊपर उड़ने लगने का बहुत खतरा है, वह मुझे याद दिलाती है कि मैं यह भूल न जाउँ&#8230;</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> <em>&#8220;मुझे लेखक बनना है&#8221;, आज की दुनिया में युवाओं के लिए इसका बात का क्या अर्थ है? शायद आज भी एक युवती के लिए यह बात भिन्न हो पर जब एक नवयुवक घर में कहता है कि वह लेखक बनना चाहता है तो समाज की प्रतिक्रिया कैसी होती है? यहाँ इटली में लोग एक दूसरे की ज़िंदगी में इतना दखल नहीं देते। पर भारत में आज लेखक बनने के सपने को किस तरह से देखा जाता है?</em></p>
<p><strong>अल्ताफ़ः</strong> मेरे विचार से मुझमे इतनी समझ थी कि अगर मुझे लेखक ही बनना है तो मुझे यह जल्दी ही करना होगा, मैं अधिक इंतज़ार नहीं कर सकता। बस मैंने नौकरी छोड़ दी और पूरे समय के लिए लेखक बन गया। उस समय मेरे माता पिता की ओर से थोड़ा सा सहारा मिला कि अगर विफल भी हो गया तो 25-26 साल की उम्र तक वापस नौकरी कर लेगा।  इस तरह मुझे यह प्रयोग करने का मौका मिल गया। अगर इस किताब को सफलता न मिली होती तो मैं वापस नौकरी पर ही होता, 9 से 5 वाली नौकरी। और हाँ, लिखने के लिए मैंने बैंक से कर्ज लिया था।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> <em>अरे (ठहाका लगाते हैं), कैसे? और बैंक वालों की क्या प्रतिक्रिया रही</em>?</p>
<p><strong>अल्ताफ़ः</strong> उनको यह नहीं बताया कि मैं लेखक बनने के लिए कर्ज माँग रहा हूँ, कहा कि मैं इंटरनेट पर ई-बिज़नेस शुरु करना चाहता हूँ जिसके लिए पैसा चाहिये। उस पैसे से मैंने तीन चार साल तक काम चलाया, मेरे छोटे मोटे खर्चों के लिए। मुझे मालूम था कि यह कुछ समय की बात है। अगर अपने मन में आप जानते हैं कि आप को क्या चाहिये तो बस उसी आकांक्षा को पूरा करना चाहिये।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> <em>सही कहा अल्ताफ़। इस बातचीत के लिए बहुत धन्यवाद।</em></p>
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