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	<title>सामयिकी - हिन्दी वेबपत्रिका &#124; Samayiki - Hindi Webzine &#187; अंतर्जाल</title>
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	<description>बदलती दुनिया की साक्षी</description>
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		<title>फ़ेसबुक का इंद्रासन हिलाने आया गूगल+?</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2011/07/google-plus/</link>
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		<pubDate>Fri, 01 Jul 2011 03:34:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतर्जाल]]></category>
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		<description><![CDATA[ओरकुट की विफलता के बाद गूगल की फ़ेसबुक के समानांतर एक नये सोशल प्लेटफॉर्म के निर्माण के बारे में बता रहे हैं रविशंकर श्रीवास्तव।]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="margin: 10px 5px;" title="Google Plus- Stream" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2011/07/stream.jpg" alt="Google Plus- Stream" width="610" height="339" /></p>
<p><span class="dropCap">इं</span>टरनेट पर गूगल की एक नई नवेली सोशल नेटवर्किंग सेवा <strong>गूगल+</strong> (उच्चारणः गूगल प्लस) चंद चुनिंदा आमंत्रितों के लिए प्रारंभ हो गई है। यह <a title="Google+" href="http://plus.google.com" target="_blank">http://plus.google.com</a> या <a title="Google Plus" href="http://www.google.com/+" target="_blank">http://www.google.com/+</a> पर उपलब्ध है।</p>
<p><img class="alignright" style="margin: 20px; border: 0pt none;" title="Google Plus" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2011/07/google-plus.jpg" alt="Google Plus" width="250" height="156" />माना जा रहा है कि गूगल+ को फ़ेसबुक को मात देने की नीयत से अच्छी खासी मेहनत कर प्रस्तुत किया जा रहा है। गूगल यूं भी इंटरनेट पर खोज और ईमेल से लेकर ऑफ़िस अनुप्रयोगों तक की तमाम तरह की सेवाएं और वेब अनुप्रयोग प्रदान कर उस क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व बना बैठा है। माईक्रोसॉफ्ट बिंग के प्रवेश के बाद विगत कुछ दिनों में गूगल की बादशाहत को सबसे बड़ा खतरा फ़ेसबुक से ही रहा है, जिसका प्रयोक्ता ने एक दफा रुख किया तो फिर वहीं की हो कर रह गई, ऐसा मुकाम जो आर्कुट को मयस्सर नहीं हो सका। कई क्षेत्रों में तो इंटरनेट प्रयोग के मामले में फ़ेसबुक ने गूगल को पछाड़ कर पहले स्थान पर कब्जा भी कर लिया है। अफवाह तो ये भी है कि गूगल को उसके घर में घुसकर मात देने के लिए फ़ेसबुक ने ईमेल के पश्चात अब अपना सर्च इंजन लाने की भी योजना बना ली है। संभवतः इस समीकरण को बदलने के लिए ही गूगल ने प्लस नामक यह नया सोशल शगूफ़ा छोड़ा है। अब सवाल यही है कि क्या गूगल+ की ये कोशिश कामयाब होगी?</p>
<p>गूगल+  की कुछ सेवाएँ तो हमारे इंटरनेट जीवन और फोटो-वीडियो इत्यादि साझा को करने की गरज से रीडिजाइन की गई प्रतीत होती हैं। मगर इसका असली परीक्षण तो तब होगा जब यह आम प्रयोग के लिए जारी होगा, और तभी यह पता चलेगा कि प्रयोक्ता इसे कितना हाथों हाथ लेते हैं। वैसे भी लोगों को फ़ेसबुक के इतर किसी नये सोशल प्लेटफॉर्म से जोड़ना बड़ी टेढ़ी खीर है।</p>
<div id="boxR">
<h2>गूगल की कुछ असफल सेवाएँ</h2>
<p>गूगल ने बीते दिनों कई वेब सेवाएँ जारी की जिनके बारे में शुरूआत में काफी हो हल्ला मचा था, परंतु वे जल्द ही फुस्स साबित हो गईं। जाहिर है कि इन सेवाओं को बंद करने के पीछे व्यावसायिक व रणनीतिक कारण होते हैं, आखिरकार नुकसान का व्यापार कौन करना चाहेगा, पर मौजूदा प्रयोक्ताओं और सेवाओं को पसंद करने वाले लोग तो नाराज़ होते ही हैं।</p>
<ul>
<li><strong>गूगल वेव </strong>- इसमें ढेर सारी &#8220;भविष्य की&#8221; सेवाएँ थीं &#8211; मसलन रीयल टाइम में किसी दस्तावेज़ में अक्षर-दर-अक्षर दूरस्थ संपादन पर निगाह रखना, विकि जैसी ख़ूबी, आसान फ़ाइल साझा और वर्तनी तथा व्याकरण जाँच इत्यादि। मगर यह प्रयोगकर्ताओं के बीच कोई लहर बनाने में नाकामयाब रहा।</li>
<li><strong>गूगल नॉल</strong> &#8211; मनुष्य के ज्ञान को साझा करने के उद्देश्य से इस सेवा का प्रयोग प्रारंभ किया गया था,  मगर शुरुआती जिज्ञासा के खत्म होते और विकीपीडिया को कुछ दिन डराने के बाद इसके गंभीर प्रयोक्ताओं ने एक तरह से दूरी बना ली है।</li>
<li><strong>ओरकुट </strong>- 2004 में शुरू हुई यह सोशल साइट ब्राजील और भारत के युवाओं में एक समय  बेहद लोकप्रिय हो रही थी। मगर इसमें फ़ेसबुक और माइस्पेस में मौजूद असीमित वीडियो अपलोड जैसे फीचर्स की कमी की वजह से दौड़ में पीछे छूट गई है।</li>
<li><strong>गूगल वेब एस्सेलरेटर</strong> &#8211; इस सेवा के बारे में गूगल का दावा है कि यह इंटरनेट की गति को 20 प्रतिशत तक बढ़ाने की क्षमता रखता है। परंतु शोधकर्ताओं का दावा है कि आधुनिक उच्च गति के ब्रॉडबैण्ड और ब्राउज़रों में यह कोई खास बदलाव नहीं लाता तथा इसका प्रयोग गूगल मार्केट रीसर्च टूल के रूप में करता है।</li>
<li><strong>गूगल एंसर्स</strong> &#8211; याहू! एंसर्स के बारे में तो आपने सुना होगा। गूगल एंसर्स भी कभी जीवंत था। परंतु इसके उत्तरों के लिए शुल्क की आवश्यकता ने फोकटिया वेब प्रयोक्ताओं में पैठ बनाने में यह पूरी तरह नाकामयाब रहा।</li>
<li><strong>गूगल चेकआउट</strong> &#8211; जून 2007 में इसे इंटरनेट की भरोसेमंद व बेहद लोकप्रिय भुगतान सेवा ई-बे के पेपैल के एक बेहतर विकल्प के रूप में जारी किया गया था। गूगल चेकआउट चल तो अभी भी रहा है, मगर लोकप्रिय नहीं है, और इसके प्रयोक्ताओं की संख्या भी अपेक्षाकृत कम है।</li>
<li><strong>गूगल वीडियो </strong>- गूगल की वीडियो साझा करने वाली साइट गूगल वीडियो को तो गूगल द्वारा यू-ट्यूब के अधिग्रहण के बाद बंद होना ही था। परंतु यह असफल सेवा कभी भी लोकप्रिय नहीं हो पाई क्योंकि इसका प्रयोग जरा कठिन किस्म का था तथा इसमें वीडियो को भिन्न प्लेटफ़ॉर्म में साझा करने के विकल्प भी नहीं थे।</li>
</ul>
<p>गूगल की ऐसी ही अन्य कई सेवाएँ हैं &#8211; मसलन &#8211; लाइवली, डाजबाल, जाइकु, ओपन सोशल इत्यादि जो इंटरनेट पर अपना खास मुकाम बनाने में असफल रही हैं।</p>
</div>
<h2>गूगल+ की सुविधाएँ</h2>
<p>हालांकि यह सेवा अभी रूप से उपलब्ध नहीं है और संभव है कि इसके स्वरूप में पशुरुवाती प्रयोक्ताओं की प्रतिक्रिया के जवाब में कुछ बदलाव हों पर फ़ेसबुक से परे गूगल+ में सुविधाओं की भरमार नहीं है, कुल जमा पाँच हिस्से हैं गूगल+ केः</p>
<ul>
<li><strong>सर्कल </strong>- इसमें दस्तावेज़, फ़ोटो, वीडियो, कड़ियाँ जैसी तमाम सामग्री को सही व्यक्ति के साथ साझा करने की सुविधा है। आप अपने परिवार, मित्रों या ऑफ़िस सहयोगियों के अलग अलग सर्कल या समूह बना सकते हैं और इस तरह अपनी सामग्री को इंटरनेट पर बेहतर तरीके से साझा कर सकते हैं।</li>
<li><strong>स्पार्क </strong>- यह आपकी प्रकृति के मुताबिक (आपके पिछले वेब सर्फिंग व्यवहार पर बारीक नजर रखकर) वीडियो लिंक, पठन-पाठन सामग्री की लिंक स्वयमेव सहेजता रहता है ताकि जब आप फुरसत में हों तो समय बरबाद करने के नाम पर कुछ मजेदार वीडियो देख लें या पाठ सामग्री की लिंक में जाकर अपना ज्ञानवर्धन कर सकें।</li>
<li><strong>हैंगआउट्स </strong>- फ़ेसबुक फ्रेंड्स की तरह दोस्त बनाने व उनके साथ टिप्पणी, वार्तालाप करने, लिंक टिकाने या सामग्री साझा करने के लिहाज से यह सुविधा जोड़ी गई है।</li>
<li><strong>इंस्टैंट अपलोड</strong> &#8211; डिजिटल कैमरों से फोटो खींचना तो महज एक क्लिक का काम है। परंतु उन्हें अपलोड करना व परिवार व मित्रों के बीच साझा करना बड़ा सिरदर्द होता है। इंस्टैंट अपलोड के जरिए एक बार सेटिंग कर देने मात्र से कुछ विशिष्ट उपकरणों द्वारा (जैसे कि स्मार्टफ़ोनों से) आपके द्वारा खींचे गए फ़ोटो स्वयमेव ही अपलोड होते जाएंगे। साथ ही आप अपनी पिकासा अल्बम को भी प्लस से जोड़ सकते हैं।</li>
<li><strong>हडल </strong>- आज की युवा पीढ़ी एसएमएस और चैट की दीवानी है। टैक्स्टिंग उसका न सिर्फ सूचना आदान-प्रदान का बल्कि मनोरंजन का भी एक बड़ा साधन है। हडल के जरिए टैक्स्टिंग को एक पायदान और ऊपर पहुँचाया गया है जहाँ एक से अधिक दोस्त समूह बनाकर इस सेवा का लाभ ले सकेंगे।</li>
</ul>
<h2>हिंदी में भी उपलब्ध</h2>
<p>गूगल+ हिंदी समेत कोई 44 भाषाओं में उपलब्ध है। मगर कई स्थलों पर इसका हिंदी अनुवाद बेहद ही कच्चा किस्म का है। सीधा शब्द-दर-शब्द और वाक्य दर वाक्य अनुवाद है। जो कई जगह खीझ उत्पन्न करता है तो कई जगह समझने में मुश्किल पैदा करता है। उदाहरण स्वरूप एक जगह लिखा है -मजेदार के बिलकुल विपरीत कार्य। इस तरह के वाक्यांशों से मंतव्य समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है।</p>
<p>वैसे, कुल मिलाकर गूगल+ एक मजेदार, काम की सेवा लगती है जिसमें विशिष्ट किस्म की नए फ्लैवर की सेवाएँ हैं जिनमें कुछ दम तो नजर आता है। हो सकता है आपको लगे कि कुछ सेवाओं से तो आ वाकिफ हैं, मसलन गूगल चैट, या गूगल प्रोफाईल की जानकारी, तो इसे गूगल की इन सब सेवाओं के मिश्रण जुटा कर एक नयी रेसिपी बनाने की जुगत भी समझा जा सकता है।</p>
<p>गूगल+ अभी सिर्फ आमंत्रितों के लिए उपलब्ध है, पर जल्द ही यह हम सभी के आम प्रयोग के लिए, वह भी बिलकुल मुफ़्त उपलब्ध होगा। ऐसे में, इंटरनेट के सिंहासन पर दावेदारी के बड़े लोगों के झगड़ों में हम-आप जैसे आम वेब प्रयोक्ताओं के लिए तो चाँदी ही चाँदी है।
<p class="note">गूगल+ का आमंत्रण आपको भी चाहिए? अभी <a href="https://services.google.com/fb/forms/googleplusenuk">https://services.google.com/fb/forms/googleplusenuk</a> पर पंजीकरण करें या फिर प्लस पर मौजूद अपने दोस्तों से इन्वाइट की गुजारिश करें।</p>
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		<title>रॉकमेल्ट ब्राउज़र : फ़ेसबुकिया वेब की पराकाष्ठा?</title>
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		<pubDate>Tue, 18 Jan 2011 23:05:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतर्जाल]]></category>
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		<description><![CDATA[सोशियल ब्राउज़र की शुरूआत मोजिल्ला आधारित फ्लॉक ब्राउज़र से हुई थी जिसमें ब्राउज़र में ही ब्लॉगिंग की तमाम सुविधाएँ मौजूद थी। सामयिकी संपादक रविशंकर श्रीवास्तव मानते हैं कि रॉकमेल्ट ब्राउज़र उससे भी एक कदम आगे है।]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2011/01/rockmelt.jpg" alt="Rockmelt Social Browser" width="610" height="243" /></p>
<div class="dropCap">ल</div>
<p>गता है जैसे कि पूरा का पूरा इंटरनेट फ़ेसबुक-मय हो गया हो। सालेक भर पहले दुनिया गूगल-गूगल और ओरकुट-ओरकुट कहते पगलाती थी और साल बीतते न बीतते इंटरनेटिय जनसंख्या पूरी फ़ेसबुकिया गई सी लगती है। और, कोढ़ में खाज यह कि अब तो ब्राउज़र भी फेसबुक-मय हो गया है!</p>
<p>रॉकमेल्ट एक ऐसा नया, ताज़ा, बीटा स्वरूप में जारी किया गया ब्राउज़र है जिसे सोशियल ब्राउज़र श्रेणी में रखा गया है। सामाजिक ब्राउज़र की शुरूआत मोजिल्ला आधारित फ्लॉक ब्राउज़र से हुई थी जिसमें ब्राउज़र में ही ब्लॉगिंग की तमाम सुविधाएँ मौजूद थी। रॉकमेल्ट ब्राउज़र एक कदम आगे है। यह गूगल क्रोम ब्राउज़र के आधार पर बनाया गया है, और – जी, हाँ, आपने ठीक समझा – इसमें फ़ेसबुक को सम्मिलित कर दिया गया है।</p>
<p>रॉकमेल्ट अभी बीटा संस्करण में  जारी किया गया है, परंतु इसे सार्वजनिक प्रयोग के लिए जारी नहीं किया गया है। आपको याद होगा, जब गूगल ने अपना जीमेल जारी किया था तो निमंत्रण के जरिए खाता खोलने का विकल्प दिया गया था। इसी तरह से रॉकमेल्ट का प्रयोग करने के लिए भी आपको एक अदद निमंत्रण की आवश्यकता होगी – जिसके जरिए आप रॉकमेल्ट का इंस्टालर डाउनलोड कर सकेंगे और इसका प्रयोग कर सकेंगे।</p>
<p><img class="alignright" style="margin: 20px;" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2011/01/rockmelt_logo.jpg" alt="Rockmelt Logo" width="180" height="190" />जब आप रॉकमेल्ट का इंस्टालर चलाते हैं, तो पहले पहल चालू होने से पहले रॉकमेल्ट आपके फेसबुक खाते से जुड़ने के लिए कहता है। यदि नहीं जुड़े हैं तो आपको एक फेसबुक खाता खोलने  के लिए कहता है। है न किसी ब्राउज़र की फेसबुकिया इंतिहा?</p>
<p>रॉकमेल्ट को इंटरनेटी इतिहास के सबसे पुराने और प्रसिद्ध ब्राउजरों में से एक नेटस्केप नेविगेटर के निर्माता मार्क एंड्रीसन का समर्थन हासिल है। और रॉकमेल्ट के डेवलपरों में से एक, टिम होव्स का कहना है कि पिछले वर्षों में 50 करोड़ प्रयोक्ताओं ने अपने ब्राउज़र बदले। तो, यदि आप बेहतर उत्पाद देंगे तो लोग अपनी आदतें – यानी ब्राउज़र बदलने में देरी नहीं करेंगे। यानी इसके डेवलपर मुतमईन हैं कि रॉकमेल्ट जारी होते ही एक बड़ा प्रयोक्ता वर्ग खींचने में कामयाब होगा – और क्यों न हो – इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या के लिहाज से फेसबुक पहले ही अमरीका में गूगल को पछाड़ कर पहले नंबर पर कब्जा जो कर चुका है।</p>
<h2>नया क्या है रॉकमेल्ट ब्राउज़र में?</h2>
<p>रॉकमेल्ट चालू करते समय आपको अनिवार्य रूप से फेसबुक और वैकल्पिक रूप से ट्विटर खाते में  लॉगइन करना पड़ता है। जैसे ही आप फ़ेसबुक में लॉगिन करते हैं, रॉकमेल्ट सामाजिक ब्राउज़र का विशिष्ट रूप से डिजाइन किया विंडो खुल जाता है जहाँ आप पारंपरिक ब्राउज़र की जगह रंगबिरंगा, फ़ेसबुकिया ब्राउज़र पाते हैं।</p>
<p>रॉकमेल्ट के दाएँ बाजू पट्टी में आपके फेसबुकिया मित्र मंडली  कब्जा जमाए मिलेंगे, और उनका स्टेटस वहाँ बदस्तूर दिखता रहेगा कि वे लॉगिन हैं या नहीं और वे फेसबुक में क्या कारस्तानियाँ करते फिर रहे हैं। उनकी कारस्तानियों की लाइव स्टेटस रिपोर्ट आपको वहाँ से मिलती रहेगी। जब भी आपका कोई फेसबुकिया मित्र कोई स्टेटस मैसेज देता है अथवा अपने या किसी दोस्त के वाल पर पोस्ट करता है अथवा कोई चित्र लोड करता है, वो तमाम चीजें पॉपअप के रूप में रॉकमेल्ट आपके सामने प्रस्तुत करता रहता है। आप चाहें तो रॉकमेल्ट को फ़ेसबुक में अपने मित्र-मंडली की खोजबीन के लिए भी बढ़िया तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं। रॉकमेल्ट में सर्च को ज्यादा आकर्षक, ज्यादा रेलेवेंट और ज्यादा तेज बनाया गया है – जैसे कि आप किसी पत्रिका के पन्ने पलट रहे हों। हिंदी में रचनाकार के लिए सर्च किया गया तो परिणाम बेहद सटीक तो रहे ही, फ़ालतू की चीजें भी नहीं दिखीं।</p>
<p>वैसे तो बहुतों का मानना है कि रॉकमेल्ट को फेसबुक के लिए ही विशेष रूप से डिजाइन किया गया है। मगर ऐसा भी नहीं है कि रॉकमेल्ट सिर्फ फेसबुक के भरोसे जिंदा है या रहेगा। इसमें बहुत सी दूसरी सुविधाएँ भी जोड़ी जा रही हैं जो आपके ऑनलाइन सोशल नेटवर्क को ज्यादा जीवंत बनाने की क्षमता रखती हैं। उदाहरणार्थ, रॉकमेल्ट का आरएसएस फ़ीड पाठक आपको लाइव फ़ीड पठन की सुविधा ब्राउज़र के भीतर ही देता है। आपके पसंदीदा फ़ीड के इंटरनेट पर प्रकाशित होने की सूचना प्राप्त होते ही रॉकमेल्ट आपको उसे प्रस्तुत कर देता है।</p>
<h2>भविष्य का ब्राउज़र?</h2>
<p>सवाल ये है कि क्या रॉकमेल्ट को भविष्य का ब्राउज़र कह सकते हैं? फ़ायरफ़ॉक्स में जब एक्सटेंशन और एडऑन जैसी नई विशिष्टताओं को लाया गया था तब उसे भी भविष्य का ब्राउज़र कहा गया था। पर अब सभी जानते हैं कि फ़ायरफ़ॉक्स भारी भरकम हो गया है और उसके नए संस्करणों में पुराने एक्सटेंशनों के समर्थन की समस्या और तमाम दीगर असुविधाओं के चलते प्रयोक्ता उसका दामन छोड़ क्रोम व ऑपेरा ब्राउज़र की ओर बढ़ने लगे हैं।</p>
<div id="pullQuoteL">रॉकमेल्ट में अंतर्निर्मित सोशल नेटवर्किंग सुविधाओं के नेपथ्य में गूगल क्रोम ब्राउज़र का ठोस आधार भी है।</div>
<p>रॉकमेल्ट अपने अंतर्निर्मित सोशल नेटवर्किंग सुविधाओं के साथ नया क्या दे रहा है जो इसे विशिष्ट  बनाता है जबकि अन्य दूसरे सभी ब्राउज़रों में ब्राउजर एडऑन और प्लगइन के जरिए ऐसी सुविधाएँ बखूबी प्राप्त की जा सकती हैं?</p>
<p>इस सवाल का सही जवाब तो यही होगा कि यह तो समय ही बताएगा कि प्रयोक्ता रॉकमेल्ट को हाथों हाथ लेते हैं या नहीं। मगर यह अपने बीटा स्वरूप में खास  निमंत्रण मिलने पर इंस्टाल हो सकने की सीमितता के उपरांत भी इंटरनेट पर कुछ हलचल मचाने की शक्ति दिखा रहा है तो कहा जा सकता है कि इस नए विचार युक्त ब्राउज़र में कुछ बात तो है। और, रॉकमेल्ट के नीचे ठोस गूगल क्रोम ब्राउज़र का आधार तो वैसे भी है।</p>
<p>कुल मिलाकर, फेसबुक के निवासी जिनका खाना-पीना-उठना-बैठना फेसबुक में ही होता है, रॉकमेल्ट का दिली तौर पर स्वागत करेंगे यह तो तय है। मगर रॉकमेल्ट के आधे घंटे के प्रयोग के दौरान मेरे 500 से अधिक फेसबुक-मित्रों के संदेश, स्टेटस रपट, वाल-पोस्टें, चित्र अपलोड करने की खबर और न जाने क्या-क्या हर दूसरे क्षण पॉप अप के रूप में ब्राउज़र के दाएँ निचले कोने में प्रकट होते रहे जो मुझे भारी डिस्टर्ब करते रहे। इस लिहाज से मैं तो रॉकमेल्ट के बगैर ही ठीक हूं – मुझे तो पारंपरिक, सादा ब्राउज़र ही सुहाएगा। पर यदि आप फेसबुक के गंभीर प्रयोक्ता हैं, फ़ार्मविले में आपका बहुत सा वक्त बढ़िया गुजरता है, तब तो रॉकमेल्ट आपके लिए सचमुच रॉकिंग है! आपका क्या कहना है?</p>
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		<title>फेसबुक और एमएस आफिस बने दोस्त</title>
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		<pubDate>Wed, 24 Nov 2010 23:08:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
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		<description><![CDATA[डॉक्स.कॉम एमएस ऑफ़िस सूट 2010 के तहत उपलब्ध ऑफ़िस लाइव वेब एप्स की तरह ही है, मगर इसे बेहद लोकप्रिय सामाजिक नेटवर्क साइट फ़ेसबुक से जोड़ने के लिहाज से डिजाइन किया गया है। ]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="margin: 10px;" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/11/docs-dot-com-story.jpg" alt="Docs.com" width="610" height="235" /></p>
<div class="dropCap">ह</div>
<p>मारी कंप्यूटिंग की दुनिया तेजी से क्लाउड की ओर अग्रसर है &#8211; मतलब ये कि वो पूरी तरह ऑनलाइन होने जा रही है। इसके प्रत्यक्ष प्रमाण रूप में जब माइक्रोसॉफ़्ट ने अपने ऑफ़िस सूट 2010 (जिसमें तमाम आफिस तंत्राँश जैसे कि वर्ड, एक्सेल, पॉवर प्वाइंट आदि शामिल होते हैं) को जारी किया तो उसमें न केवल ऑनलाइन दस्तावेज़ों के संपादन व साझा करने की सुविधा मुहैया कराई बल्कि ऐसे प्रयोक्ताओं के लिए जो ऑफ़िस सूट ख़रीद कर प्रयोग करने की कतई श्रद्धा नहीं रखते थे, डॉक्स.कॉम-बीटा नाम से ऑफ़िस सूट 2010 का ऑनलाइन संस्करण भी फ़ेसबुक के रास्ते जारी किया।</p>
<p>हालांकि माइक्रोसॉफ़्ट फ्यूज लैब्स द्वारा जारी <strong>डॉक्स.कॉम</strong> अब अभी अपने बीटा संस्करण में ही है और इसमें संपूर्ण ऑफ़िस सूट की सुविधाएँ शामिल नहीं की गई हैं, मगर इस पर त्वरित नजर डालने से इसकी संभावनाओं सुविधाओं के बारे में मालूमात किए जा सकते हैं और ये भी कयास लगाए जा सकते हैं कि भविष्य में क्लाउड कंप्यूटिंग का बिज़नेस मॉडल किस तरह आकार ग्रहण करेगा। यकीनन व्यक्तिगत या घरेलू प्रयोग करने वाला प्रयोक्ता आने वाले समय में बेहद फायदे में रहेगा क्योंकि उसे भारी भरकम राशि खर्च कर महंगे सॉफ़्टवेयर उत्पाद खरीदने नहीं पड़ेंगे। आमतौर पर सभी प्रमुख ऑनलाइन उत्पाद उसे मुफ़्त या अत्यंत किफायती कीमतों में और पूर्णतः कानूनी तरीके से हासिल होंगे। पर्सनल कंप्यूटिंग के संदर्भ में यह बहुत महत्वपूर्ण बात होगी।</p>
<div id="pullQuoteL">यदि आपने ऑफ़िस 2007 या 2010 पर काम किया हुआ है तो डॉक्स.कॉम पर काम करना बेहद आसान है। हालांकि ऑनलाइन प्रयोग के लिहाज से सिर्फ बेहद उपयोगी मेन्यू को ही रखा गया है। </div>
<p>यूं तो डॉक्स.कॉम एमएस ऑफ़िस सूट 2010 के तहत उपलब्ध ऑफ़िस लाइव वेब एप्स की तरह ही है, मगर इसे बेहद लोकप्रिय सामाजिक नेटवर्क साइट फ़ेसबुक से जोड़ने के लिहाज से डिजाइन किया गया है। वस्तुतः आपको डॉक्स.कॉम का प्रयोग करने के लिए माइक्रोसॉफ़्ट लाइव आईडी खाते से नहीं बल्कि फ़ेसबुक खाते से ही लॉगइन करना होता है। प्रथम पंक्ति के व्यावसायिक सॉफ़्टवेयर निर्माताओं के ये कदम चौंकाने वाले हैं कि वे अपने उत्पादों के मुफ़्त संस्करण जारी कर रहे हैं और उसका प्रचार प्रसार करने के लिए फ़ेसबुक जैसे लोकप्रिय प्लेटफ़ॉर्मों के कंधे पर सवार हो रहे हैं। हालांकि इन आनलाइन अनुप्रयोगों में तमाम सुविधाओं का होना लगभग नामुमकिन ही होता है ओर एक तरह से यह ग्राहक को असली उत्पाद बेचने की परोक्ष विपणन नीति का ही नतीजा होते हैं।</p>
<h2>डॉक्स.कॉम में आप क्या कर सकते हैं?</h2>
<p>फ़ेसबुक खाते से लॉगिन (जी हाँ यदि आपके पास फ़ेसबुक खाता नहीं है तो आप डॉक्स.कॉम का प्रयोग नहीं कर सकते) करने के बाद डॉक्स.कॉम को ऑनलाइन माइक्रोसॉफ़्ट ऑफिस की तरह प्रयोग कर सकते हैं। आप नए दस्तावेज़ बना सकते हैं, अपने कंप्यूटर से दस्तावेज़ों (वर्ड, एक्सेल, पॉवर प्वाइंट, पीडीएफ़ इत्यादि) अपलोड कर सकते हैं और साथ ही अपने फ़ेसबुक मित्रों द्वारा साझा किये दस्तावेज़ देख सकते हैं,  ओर यदि अनुमति रही तो उनमें संपादन इत्यादि भी कर सकते हैं।</p>
<p>वस्तुतः डॉक्स.कॉम पर काम करना बेहद आसान है। यदि आपने ऑफ़िस 2007 या 2010 पर काम किया हुआ है तो डॉक्स.कॉम का कलेवर भी बहुत कुछ उसी तरह का रिबन इंटरफ़ेस युक्त है। हालांकि ऑनलाइन प्रयोग के लिहाज से सिर्फ बेहद उपयोगी मेन्यू को ही रखा गया है, अन्य मेन्यू विकल्पों को हटा दिया गया है। मेन्यू में क्लिक करने पर कुछ फ़ीचर्स पॉप-अप के रूप में प्रकट होते हैं जो कि बहुत से नए ब्राउज़रों में पॉप-अप ब्लॉकर द्वारा रोके गए होते हैं, ऐसे में डॉक्स.कॉम को प्रयोग करने में परेशानी हो सकती है।</p>
<p>इसी प्रकार, चूंकि डॉक्स.कॉम को ऑनलाइन प्रयोग के लिए डिजाइन किया गया है इसीलिए आपको अपने दस्तावेज़ों में पृष्ठ हाशिए, क्रमांकन इत्यादि की सेटिंग के लिए भी सुविधाएँ नहीं मिलेंगी जो कि प्रिंट माध्यम में आवश्यक होती हैं। कुछ ऐसा ही हाल पॉवर प्वाइंट का है जहाँ आप किस भी तरह की मौजूदा फाईल तो अपलोड कर देख सकते हैं पर उन्हें संपादित करते समय चित्र जोड़ना या रिसाईज़ करना मुमकिन नहीं, हालांकि स्लाईडों के क्रम बदलने जैसे साधारण काम संभव हैं।</p>
<div id="boxR">
<h2>कौन बेहतर, डॉक्स.कॉम या गूगल डॉक्स?</h2>
<p>डॉक्स.कॉम को एक परिपूर्ण ऑनलाइन ऑफ़िस सूट की तरह डिजाइन नहीं किया गया है, जैसा कि गूगल डॉक्स है। इसीलिए दोनों में तुलना करना दरअसल बेमानी होगी, क्योंकि सुविधा और संपन्नता में गूगल डॉक्स कहीं आगे है। डॉक्स.कॉम को सामाजिक नेटवर्क साइटों में सामान्य किस्म के दस्तावेज़ों के साझा करने के लिहाज से बनाया गया है। इसलिए यदि आप कोई दस्तावेज़ डॉक्स.कॉम में बनाते हैं तो वह तत्काल ही आपके मित्रों को उपलब्ध हो जाता है। आपक मित्रों की सूची तथा दस्तावेज़ में देखने/बदलने/संपादन इत्यादि को भी सेट कर सकते हैं। डॉक्स.कॉम अभी बीटा स्तर पर है इसलिए अभी इसमें बहुत सारे बग भी हैं और बहुत सी सुविधाएँ ढंग से काम ही नहीं करतीं। पर हाँ रूप रंग के मामले में डॉक्स.कॉम शायद बाज़ी मार ले जाये।</p></div>
<p>डॉक्स.कॉम पर कुछ और हल्के फुल्के जुगाड़ भी हैं जो शायद हर तरह के प्रयोक्ताओं के लिये कुछ न कुछ बनाने की नीति से रखे गये हैं। मसलन फेसबुक पर दी जानकारी के आधार पर रेज्यूमे बना सकने, या फेसबुक के चित्रों से फोटो शो या उनकी जानकारी के आधार पर फ्रेंड चार्ट (दरअसल यह दोस्तों की उम्र, लिंग, गृहनगर आदि जानकारी के आधार पर बने एक्सेल ग्राफ भर होते हैं) बना सकने के जुगाड़।</p>
<h2>डॉक्स.कॉम पर भारतीय भाषाओं का प्रयोग</h2>
<p>डॉक्स.कॉम में भारतीय भाषाओं का बढ़िया समर्थन है। हिंदी में काम करने में कोई विशिष्ट समस्या नजर नहीं आई। इसके वर्तनी जाँचक मेन्यू में चुनिंदा भारतीय भाषाओं जैसे कि हिंदी, गुजराती, मलयालम, तमिल इत्यादि में वर्तनी जाँच की सुविधा भी उपलब्ध है, हालांकि हिंदी वर्तनी जाँच में अभी दिक्कतें हैं, यह अभी काफी बगी है &#8211; यानी हिंदी वर्तनी जाँच को अभी डॉक्स.कॉम सही तरीके से अंजाम नहीं दे पाता। डॉक्स.कॉम को भारतीय भाषाओं के लिहाज से परिष्कृत करने की आवश्यकता है, क्योंकि किसी खास भाषा के लिहाज से कोई भी ऑफ़िस सूट एक बढ़िया और उन्नत किस्म के वर्तनी जाँचक के बगैर सदैव बेकार और अनुपयोगी ही बनी रहेगा।</p>
<p>कुल मिलाकर <a href="http://docs.com/">डॉक्स.कॉम</a> काम का प्रकल्प है। यदि आप पहले से ही फ़ेसबुक खाताधारी हैं, तो छोटे-मोटे दस्तावेज़ बनाने (जैसे कि कोई छोटी सी कुकिंग रेसिपि, किसी इवेंट की तैयारी व हिसाब किताब के लिये बनी एक्सेल स्प्रेडशीट या किसी सभा में आपकी प्रस्तुति के स्लाइड) व उसे मित्रों में तुरत-फुरत साझा करने के लिए डॉक्स.कॉम का प्रयोग कर सकते हैं। यदि आपके फ़ेसबुक खाताधारी नहीं हैं, या आपको व्यावसायिक स्तर की या एमएस आफिस के डेस्कटॉप अनुप्रयोग जैसी सुविधाएँ व दस्तावेज़ चाहिये, तो डॉक्स.कॉम में आपके लिए वैसे भी कुछ नहीं है। ऐसे में ऑनलाइन ऑफ़िस सूट के लिए आपके पास अन्य उत्तम विकल्प हैं &#8211; <a href="http://docs.google.com">गूगल डॉक्स</a> या <a href="http://www.zoho.com">जोहो</a>।</p>
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		<title>रोजगार पोर्टल पहुंचे गाँव देहात</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/11/rural-job-portals/</link>
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		<pubDate>Mon, 23 Nov 2009 13:44:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सामयिकी दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतर्जाल]]></category>
		<category><![CDATA[Job]]></category>
		<category><![CDATA[NREGA]]></category>
		<category><![CDATA[Portal]]></category>
		<category><![CDATA[Rural]]></category>
		<category><![CDATA[SEZ]]></category>

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		<description><![CDATA[भले यह बात अकल्पनीय लगे पर खास ग्रामीण भारत के लिए रोजगार जुटाने वाले जॉब पोर्टल न केवल सफलतापूर्वक चल रहे हैं बल्कि मुनाफा भी कमा रहे हैं।]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/ruraljobportal_story.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-158" title="Rural Job Portals" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/ruraljobportal_story.jpg" alt="Rural Job Portals" width="450" height="271" /></a></p>
<div class="dropCap">कु</div>
<p>छ साल पहले तक, खास ग्रामीण भारत के लिए एक जॉब पोर्टल की बात अकल्पनीय होती। इंटरनेट की पहुंच बहुत कम थी &#8211; आज भी, इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसार, देश के 1.2 अरब लोगों के बीच इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या केवल 1 करोड़ 28 लाख है। यहाँ तक कि बाजार अनुसंधान फर्म IMRB इंटरनेशनल ने अपने एक अध्ययन में पाया कि सितम्बर 2008 तक हमारे यहाँ 4 करोड़ 53 लाख सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ता थे, जिनमें से 4 करोड़ 20 लाख शहरी थे। 30% की वृद्धि दर के बावजूद, ग्रामीण प्रयोक्ताओं की संख्या आज की तारीख में संतोषजनक नहीं कही जा सकती।</p>
<p>इसके बावजूद हाल के वर्षों में कई ग्रामीण रोजगार पोर्टलों को शुरू किया गया है। इनमें अग्रणी थी <a href="http://ruralnaukri.com">रूरल नौकरी डॉट कॉम</a>, जिसने 2001 में ग्रामीण क्षेत्रों में कार्पोरेट और गैर सरकारी संगठनों में रोजगार के अवसरों के विज्ञापनों द्वारा शुरूवात की थी। इसके संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी अजय गुप्ता ने हाल ही में शहरी क्षेत्रों में रोजगार की तलाश करते ग्रामीण युवाओं के लिए <a href="http://villagenaukri.com">विलेज नौकरी डॉट कॉम</a> का प्रारंभ किया है।</p>
<p>इन वेबसाइटों को अब उपभोक्ता वस्तुओं की दिग्गज कंपनी आईटीसी जैसी स्थापित कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। आईटीसी ने वैश्विक ऑनलाइन रोजगार फर्म <a title="Monster.com" href="http://Monster.com" target="_blank">मॉन्सटर</a> के साथ भागीदारी कर <a href="http://www.rozgarduniya.com/?lang=hi" target="_blank">रोज़गार दुनिया डॉट कॉम</a> की स्थापना की है। रोज़गार दुनिया का संचालन कर रहे आईटीसी के कृषि व्यापार विभाग के प्रमुख एस. शिवकुमार कहते हैं, &#8220;मेरा मानना है कि कुछ सालों में इस बाजार में विस्फोटक बढ़त होगी&#8221;। भारत, मध्य पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया में मॉन्सटर के प्रबंध निदेशक संजय मोदी कहते हैं, &#8220;रोज़गार दुनिया एक उत्प्रेरक के रूप में काम करेगा और भारत में समग्र विकास की सरकार की योजना में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा&#8221;।</p>
<p>एक और प्रतियोगी है SREI इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस की सहायक संस्था SREI सहज ई-विलेज, जिसने हाल ही में <a href="http://chaakri.in">चाकरी डॉट इन</a> शुरू की। &#8220;हमें ग्रामीण भारत की क्षमता में विश्वास है। इसका सही समय आ गया है&#8221;, इस पोर्टल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, सबाहत अज़ीम कहते हैं।</p>
<h2>पहली बार, बात मुनाफे की</h2>
<p>ग्रामीण रोजगार कुछ समय से चर्चा के केंद्र में रहा है। वर्ष 2006 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) के तहत एक वृहद कार्यक्रम की शुरुवात की जिसके अंतर्गत ग्रामीण परिवारों को प्रति वर्ष कम से कम 100 दिन के रोजगार का वायदा किया गया था। इस कार्यक्रम को 200 जिलों में शुरू किया गया था और धीरे धीरे पूरे देश में लागू किया गया है। हालिया केंद्रीय बजट में NREGA के तहत खर्च में 144 प्रतिशत वृद्धि कर इसे 320 करोड़ रुपये कर दिया गया और न्यूनतम दैनिक वेतन लगभग अस्सी रुपये तय किया गया। ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम कार्यक्रम के तहत 3 करोड़ परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराया जा चुका है।</p>
<div id="pullQuoteR">रोज़गार दुनिया और SREI सहज ई-विलेज के रूप में कॉर्पोरेट क्षेत्र पहली बार ऐसे क्षेत्र में मुनाफा कमाने के उद्देश्य से मैदान में उतरा है।</div>
<p>इसके अलावा गैर सरकारी संगठनों की भागीदारी वाले अन्य प्रयास भी हुये हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि रोज़गार दुनिया और SREI सहज ई-विलेज के रूप में कॉर्पोरेट क्षेत्र पहली बार ऐसे क्षेत्र में मुनाफा कमाने के उद्देश्य से मैदान में उतरा है। SREI सहज के अज़ीम कहते हैं, &#8220;परोपकार की भावना यहाँ काम नहीं करती है। मुफ्त में मिली चीज का लोग सही मोल नहीं समझ पाते।&#8221; &#8220;यह लाभ के लिए बना उद्यम है&#8221;, आईटीसी के शिवकुमार कहते हैं। &#8220;हमें व्यापार के ज़रिये मुनाफे का एक हिस्सा मिलता है। फिलहाल, नौकरी के विज्ञापन पोस्ट करने और हमारे डेटाबेस के इस्तेमाल के एवज में नियोक्ता ही पैसा देते हैं। मॉन्सटर का यही पारंपरिक तरीका रहा है। कालक्रम में हम नौकरी खोजने वालों को कुछ अन्य वैल्यू एडेड सेवायें देने पर विचार करेंगे जिसके लिये उनसे शुल्क वसूला जायेगा।&#8221;</p>
<p>इसके साथ ही आईटीसी और SREI बुनियादी सुविधाएं भी ला रहे हैं। आईटीसी अपनी ई चौपालों के विशाल नेटवर्क का लाभ उठायेगा। 2000 में शुरू किये गये ई चौपाल गांवों में स्थित इंटरनेट खोखे हैं जो जमीनी स्तर पर स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन के एक प्रमुख घटक बन गए हैं। शिवकुमार कहते हैं, &#8220;हमारे पास 10 राज्यों के 100 जिलों में फैले 6500 से अधिक ई चौपाल हैं। फिलहाल हमने 10 जिलों में प्रायोगिक चरण के रूप में रोज़गार दुनिया की शुरुवात की है। हमारा जल्द ही उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के 80 जिलों के 5000 ई चौपालों में इसका विस्तार करने का इरादा है।&#8221;</p>
<p>दूसरी ओर SREI के नेपथ्य में, सामान्य सेवा केंद्र (CSCs) का एक नेटवर्क है जिसकी केन्द्र और सात राज्य सरकारों के साथ सार्वजनिक निजी भागीदारी है। तकरीबन 15,000 CSCs पहले से ही कार्यरत हैं, यानि 27,000 के लक्ष्य का आधा रास्ता तक किया जा चुका है। प्रत्येक CSC एक उद्यमी द्वारा संचालित है जिसे लगभग सवा लाख रुपये की शुरूवाती लागत का 25 प्रतिशत निवेश करना होता है। SREI बुनियादी संचार ढांचा उपलब्ध कराता है। &#8220;प्रारंभ में रेलवे आरक्षण, बैंकिंग व बीमा सेवायें और प्रीपेड मोबाइल खातों के रीफिल जैसी अनेक बिज़नेस टू कंज्यूमर (B2C) सेवायें तैयार की जाएगी,&#8221; अज़ीम ने बताया। &#8220;अगले चरण में, हम जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने जैसी गवर्मेंट टू कंज़्यूमर सेवायें शुरू करेंगे।&#8221; SREI ने उद्यमियों को वित्तीय सलाह व ऋण प्रदान करने के लिये बैंकों के मदद की व्यवस्था की है।</p>
<p>जो दो बातें इन पोर्टलों को चलाये रखेंगी वे हैं मांग और यह तथ्य कि वे मुनाफा कमाने के लिये इस व्यवसाय में उतरे हैं। अज़ीम बताते हैं कि अगर लाभ कमाने पर ध्यान केंद्रित न हो तो, जैसा कि अक्सर सरकारी कार्यक्रमों के साथ होता है, लोगों का उत्साह गुल हो सकता है। &#8220;हमारी हर गतिविधि लाभदायक होनी ही चाहिये। ऑफ़लाइन मुनाफा उद्यमियों द्वारा कमाया जाता है, जबकि SREI ऑनलाइन गतिविधियों से लाभ कमाता है। कई सहज केन्द्र प्रति महीने चालीस हज़ार रुपये से अधिक कमाते हैं।&#8221; SREI की प्रारंभिक योजना के अंतर्गत 60 करोड़ डॉलर का निवेश किया जाना था, जिसका आधा शेष हिस्सा इस समय खर्च किया जा रहा है। अगले तीन वर्षों में कम से कम और 1 करोड़ डॉलर का निवेश किया जायेगा।</p>
<p>नतीजें प्रभावशाली हैं। SREI में, अब तक करीब 25000 ग्रामीण युवाओं को शहरों में नौकरियों दिलायी गयी हैं। भले ही काफी बड़ा लगे पर यह व्यवसाय अभी शुरुवाती चरण में हैं।</p>
<h2>&#8216;अविकसित क्षेत्र&#8217; का विकास</h2>
<p>&#8220;चाकरी.इन जैसी पहल से रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं,&#8221; वैश्विक मानव संसाधन कंपनी <a href="http://www.adecco.co.in/" target="_blank">एडेक्को इंडिया</a> के प्रबंध निदेशक सुधाकर बालकृष्णन बताते हैं। &#8220;इस पहल में ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के लक्ष्यों में शामिल हैं &#8211; बढ़ई, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, सुरक्षा गार्ड, राजमिस्त्री और नाई। ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार के लक्ष्य हो सकते हैं &#8211; ग्रामीण कंप्यूटर ऑपरेटर, डाटा एंट्री ऑपरेटर, ब्यूटिशन और स्वास्थ्य कर्मी।&#8221; अज़ीम के अनुसार: &#8220;सब से पहली नौकरी एक नाई के लिए हासिल की गई, जिसे कलकत्ता के एक महिलाओं और पुरुषों हेतु त्वचा-व-केश-संवर्धन सैलून आइकैचर्स में नौकरी मिली।&#8221;</p>
<p>पोर्टल कंपनियों को बढ़ती प्रतिस्पर्धा की चिंता नहीं हैं। &#8220;आज का ग्रामीण रोजगार व्यवसाय अभी पाषाण युग में है, जबकि इसमें सूचना प्रौद्योगिकी के युग तक पहुँचने की क्षमता है,&#8221; रूरल नौकरी के गुप्ता कहते हैं। &#8220;भारतीय ग्रामीण प्रसार के विशाल आकार को देखते हुए, यह क्षेत्र अभी तक &#8216;प्रतिस्पर्धा&#8217; नाम की आर्थिक शब्दावली से अनजान है। यहां तक कि ई-चौपाल जैसी बड़ी परियोजनाएँ भी सागर में केवल एक बूंद हैं। इसलिए, रोज़गार दुनिया सरीखे प्रकल्प हर स्तर पर, चाहे वह सरकारी सहायता की बात हो या उम्मीदवारों और कॉर्पोरेट नियोक्ताओं को तैयार करने की बात हो, निष्क्रियता को कम कर संभवतः एक दूसरे की मदद ही करेंगे। इस अविकसित क्षेत्र को उपजाने के लिए खिलाड़ियों की एक बड़ी संख्या दरकार होगी।&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">शहरी बाज़ारों में संतृप्ति के कारण अब ग्राम की ओर ध्यान जा रहा है। स्थानीय कर्मचारी बेहतर परिणाम ला सकते हैं क्योंकि वे कम कीमत पर और असीमित संख्या में उपलब्ध हैं।</div>
<p>गुप्ता के अनुसार, ग्रामीण रोजगार के क्षेत्र में तेज़ गतिविधि के तीन कारण हैं। &#8220;एक का संबन्ध है शहरी बाज़ारों की बहुचर्चित संतृप्ति से, जिसके कारण अब ध्यान ग्रामीण बाजारों की ओर जा रहा है। इन बाजारों की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए स्थानीय कर्मचारी ही बेहतर परिणाम ला सकते हैं क्योंकि वे कम मूल्य पर और असीमित संख्या में उपलब्ध हैं। तीसरा पहलू कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के माध्यम से एक अभिनव व्यापार मॉडल के उद्भव से संबंधित है, जिसमें एक मॉडल दूसरे को बढ़ने में मदद करता है।&#8221;</p>
<p>हैदराबाद स्थित इंडियन स्कूल आफ बिज़नेस (ISB) में वित्त विभाग में सहायक प्रोफेसर राजेश चक्रवर्ती इस बढ़त को एक अलग नज़र से देखते हैं। &#8220;अव्वल तो पोर्टल शुरू करना एक कम निवेश का कारोबार है जिसमें जोखिम कुछ हद तक कम होता है&#8221; वे कहते हैं। &#8220;अधिकांश खर्च के पोर्टल का प्रचार करने पर ही होता है। दूसरी, ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रामीण भारत के बारे में सोच बदल रही है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय गांवों के मध्यम वर्ग में कुछ हल्कों में खासी समृद्धि है। इसके अलावा, बुनियादी ढांचे के विकास से अर्द्ध ग्रामीण कस्बे, देहातों से पहले से बेहतर तरीके से जुड चुके हैं और अलगाव कम हो रहा है। ग्रामीण युवाओं के बीच वेब पोर्टलों के बारे में चर्चा और कनेक्टिविटी की बदौलत कई लोग अब रोज़गार और नौकरियों के बारे में जानकार हो चुके हैं। इसके साथ ही शहरी केन्द्रों में कम और मध्यम कौशल के रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं और इस मांग की आपूर्ति ग्रामीण क्षेत्रों से ही की जा सकती है।</p>
<p>एडेक्को के बालकृष्णन बताते हैं कि भारत में इस समय 7.8% बेरोजगारी है। &#8220;पिछली जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 75 करोड़ लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। भारत की 65% से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है; इस कारण देश को अगले पांच वर्षों के दौरान 6 करोड़ नौकरियाँ पैदा करने की ज़रूरत है ताकि बेरोजगारी की दर काबू से बाहर न हो जाए। यह रोजगार सृजन और विकास के लिए एक बहुत बड़ा सुअवसर है।&#8221;  परंतु टीमलीज़ सर्विसेज़ के सहसंस्थापक और अध्यक्ष मनीष सभरवाल को इन पोर्टलों की सफलता पर संदेह है। वे कहते हैं, &#8220;शर्तिया तौर पर यह कह पाना मुश्किल होगा कि रोजगार खोज रहे ग्रामीण सक्रिय रूप से इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं, हो सकता है कि यह अनुमान मात्र हो। उपयुक्त शुरुवाती उपाय शायद सेलफोन या एसएमएस का माध्यम होता जिसकी पैठ गहरी होने पर इसे इंटरनेट पर रूपांतरित किया जा सकता था।&#8221;</p>
<h2>सुधार ही है दीर्घकालिक समाधान</h2>
<p>रोजगार कार्यालय तो नाकाम रहे हैं, पर क्या ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम कामयाब रहा? टीमलीज़ के सभरवाल कहते हैं, &#8220;अपने मौजूदा रूप में NREGA केवल अकुशल श्रमिकों के लिए ही काम का है।&#8221; भारत की ग्रामीण बेरोजगारी की समस्या का संपूर्ण हल अब तक न तो NREGA है और न ही रोजगार पोर्टल। &#8220;हल अर्थव्यवस्था का निरंतर दीर्घकालिक विकास ही है, कुछ और नहीं&#8221;, चक्रवर्ती कहते हैं। &#8220;यदि भारत की बढ़त दर अगले दो दशकों में 9 प्रतिशत से अधिक रही, तो फायदे चहुं ओर फैलेंगे और ग्राम और शहर का फासला 10 से 15 साल में मोटे तौर पर खत्म हो जायेगा। लोगों को तब कृषि से दूर जाना ही होगा, लेकिन यह उद्योग और विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) द्वारा खेती योग्य जमीन हड़पने के बजाय स्वेच्छा से होना चाहिए।&#8221;</p>
<p>सभरवाल मानते हैं कि एकमात्र दीर्घावधि का समाधान है ग्रामीण क्षेत्रों को रोजगार सृजन के लिए बेहतर जगह बनाना। &#8220;अल्पावधि में, हमें लोगों को नौकरियों तक ले जाना है। भारत में केवल 34 शहर हैं पर इनमें दस लाख से ज्यादा लोग बसते हैं। इसके विपरीत, हमारे 6 लाख गांवों में से 2 लाख गाँव ऐसे हैं जिनकी जनसंख्या 200 से भी कम है। नये शहरों के अभाव में नौकरियाँ इन्हीं अटे पड़े शहरों तक सीमित हैं। दीर्घकालिक समाधान यही है कि शिक्षा और रोजगार साथ साथ चलें और यह तभी होगा जब बुनियादी सुविधाओं, शिक्षा, कौशल विकास और श्रम कानूनों की मौजूदा व्यवस्था में भारी सुधार हो।&#8221;</p>
<p class="note"><a href="http://knowledge.wharton.upenn.edu/" target="_blank">Knowledge@Wharton</a> से अनुबंध के अंतर्गत प्रकाशित। हिन्दी अनुवादः देबाशीष व <a href="http://kaulonline.com/" target="_blank">रमण कौल</a>।</p>
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		<title>प्रिंट आन डिमांड से लेखक प्रकाशक भी बने</title>
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		<pubDate>Thu, 26 Mar 2009 20:06:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
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		<description><![CDATA[प्रिंट आन डिमाँड सेवा द्वारा सेल्फ पब्लिशिंग अब केवल व्यक्तिगत वैनिटी प्रकाशन नहीं रहा। ईबुक्स के युग में अब प्रकाशक भी इस तकनीक का महत्व समझने लगे हैं। ]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">ए</div>
<p>क लेखक क्यों लिखता है? जाहिर है, तमाम दुनिया तक अपनी बात पहुँचाने के लिए। वह चाहता है कि लोग उसकी बातें उसके विचार पढ़ें, गुनें। अपनी किताबों के ज़रिये वह दुनिया को अपना अर्जित ज्ञान व अनुभव बांटता है। प्राचीन काल के भोज पत्रों व ताड़ पत्रों से लेकर आधुनिक आफसेट प्रिंटरों, डिजिटल ईबुक्स तक का सहारा वह अपनी रचनाओं को चहुँओर सर्वसुलभ बनाने में लेता आ रहा है। आधुनिक युग में लेखकों की प्रकाशित रचनायें आमजन तक पहुंचाने का परंपरागत माध्यम केवल प्रकाशक रहे हैं। परंतु उन्नत छपाई तकनीक की बदौलत अब प्रकाशन जगत में एक और नए विचार का पदार्पण भी हो गया है वह है <strong>सेल्फ़ पब्लिशिंग</strong> या स्वप्रकाशन। और सेल्फ़ पब्लिशिंग को बढ़ावा देने वाला यह प्रकल्प है<strong> प्रिंट आन डिमांड</strong> या मांग पर छपाई।</p>
<h3>क्या है मांग पर छपाई?</h3>
<p>प्रिंट आन डिमांड या मांग पर छपाई की अवधारणा इंटरनेट की दुनिया के लिये नई नहीं है। 2003 में प्रारंभ <strong><a href="http://www.cafepress.com/" target="_blank">कैफेप्रेस</a></strong> जैसे जालस्थलों के माध्यम से आप कॉफी मग, पोस्टर, टी शर्ट, डेस्क कैलेंडर, जैसी विभिन्न वस्तुयें अपने मनमुताबिक डिज़ाईन में मंगा सकते हैं। ये साईटें आपको अपनी बनाई डिज़ाईन भी इस्तेमाल करने देती हैं और खरीदी की कोई न्यूनतम संख्या नहीं होती, चाहें तो केवल एक मग या टीशर्ट मंगा लें। विगत 2‍ &#8211; 3 वर्षों से मांग पर छपाई सेवा में एक नया आयाम आ जुड़ा है सेल्फ़ पब्लिशिंग या स्वप्रकाशन का जिसके अंतर्गत आप अपनी किताब के प्रकाशक स्वयं बन सकते हैं।</p>
<p>2006 के आसपास जब फ्लिकर जैसी फोटो शेयरिंग सेवाओं की लोकप्रियता आसमान छू रही थी तब <strong><a href="http://www.blurb.com" target="_blank">ब्लर्ब</a></strong> जैसे जालस्थलों ने इन चित्रों को प्रिंट रूप में सहेजने के विचार का सृजन किया। फोटो अल्बम रखने के शौकीन लोगों के लिये यह आकर्षक प्रस्ताव था। <a href="http://www.lulu.com/" target="_blank"><strong>लुलु</strong>.कॉम</a> जैसी सेवाओं ने इसे और भी विस्तार दिया और अन्य किस्म के प्रकाशन भी स्वप्रकाशन के दायरे में शामिल होने लगें। पिछले साल लुलु के जरिए 98 हजार किताबें छापी गईं हैं। ऑनलाइन किताब बेचने वाली बड़ी कंपनी अमेजन.कॉम ने भी <a href="http://www.createspace.com/" target="_blank">क्रियेट स्पेस</a> के माध्यम से स्वप्रकाशन की सेवा  पेश की है। 2007 के उत्तरार्ध से भारतीय कंपनियों ने भी इस ओर रुख किया है, फिलहाल अगस्त 2007 में प्रारंभ <strong><a href="http://cinnamonteal.dogearsetc.com/" target="_blank">सिनामोन टील</a></strong> व जुलाई 2008  में प्रारंभ <strong><a href="http://www.pothi.com/" target="_blank">पोथी डॉट कॉम</a></strong> इस क्षेत्र में अग्रणी हैं। <a href="http://www.depotindia.in" target="_blank">डिपो इंडिया</a> जैसी कुछ अन्य साईटें भी हैं जो कम से कम 25 प्रतियाँ प्रकाशित करती हैं।</p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none;" title="Jaya-Abhay / Leonard-Quennie" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/pothi-cinnamon.jpg" alt="Jaya-Abhay / Leonard-Quennie" width="615" height="326" /></p>
<p>पोथी डॉट कॉम का संचालन कर रही <strong>जया झा</strong> ने बताया कि भारत में प्रिंट आन डिमांड का प्रयोग तो काफी दिनों से हो रहा है, मसलन भारतीय कार्पोरेट जगत सीमित संख्या में ब्रोशर वगैरह छपवाने और सामान्यजन पोस्टर या मग जैसे उपहार देने हेतु इसका प्रयोग करते रहे हैं पर प्रकाशन जगत में यह अभी प्रयोगात्मक दौर में है। वे मानती हैं कि स्वप्रकाशन की संभावनायें तो विशाल हैं परंतु प्रकाशन की नई तकनीक का भरपूर दोहन करने हेतु परंपरागत प्रकाशन जगत के सभी साझेदारों को इसके मुताबिक खुद को ढालना होगा। सिनामोन टील के <strong>लेनार्ड फर्नान्डिस</strong> भी स्वप्रकाशन के उज्जवल भविष्य के प्रति आशावान हैं। &#8220;मुख्यधारा के भारतीय प्रकाशकों द्वारा सालाना 80 हजार से अधिक किताबें प्रकाशित की जाती हैं और यह उद्योग सालाना 10 से 12 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। अगर हम क्षेत्रिय भाषाओं में स्वप्रकाशन को मिला कर देखें तो यह बाजार बेहद बड़ा है।&#8221;, फर्नान्डिस कहते हैं।</p>
<div id="boxR" style="width: 300px; margin-bottom: 0px; padding-bottom: 0px;">
<h2>फ़्यूचर रेडी बन रहा है प्रकाशन</h2>
<p><a target="_blank" href="http://pothi.com/pothi/book/httpwwwsamayikicom-samayiki-january-2009-edition"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin: 0px;" title="Kindle" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/kindle.jpg" alt="Kindle" width="300" height="237" /></a><br />
दुनिया बदल रही है, हमारे पढ़ने लिखने की आदतें भी। बदलते समय के साथ लोगों को अब परंपरागत प्रकाशन व विपणन की खामियाँ भी समझ आ रही हैं। <a href="http://www.last100.com/2008/01/16/reading-between-the-lines-of-jobs-comments-on-kindle-android/" target="_blank">स्टीव जॉब्स ने एक बार कहा</a> कि लोग अब पढ़ते ही कहाँ हैं। और बात कड़वी पर सच्ची भी है। ब्रिटेन में प्रकाशित तकरीबन 50 फीसदी किताबें कभी पढ़ी ही नहीं जातीं। कमोबेश यही हाल अन्य मुल्कों का भी होगा। ये पुस्तकें वापस लुगदी बना दी जाती हैं, हालांकि बेहद कम पुस्तकें <em>रीसाईकल्ड </em>कागज पर छापी जाती हैं। इन अतिरिक्त पुस्तकों, जो कभी पढ़ीं नहीं जातीं, की छपाई में जितना <a href="http://booktwo.org/notebook/books-in-the-landfill/" target="_blank"><strong>कार्बन उत्सर्जन</strong> होता है</a> वह एक लाख कारों द्वारा होते कार्बन उत्सर्जन के बराबर होता है। अगर हम वृक्षों की परवाह न भी करें तो भी पर्यावरण को होते इतने नुकसान को रोकना गैरवाजिब नहीं है। समय आ गया है कि मार्केटिंग के उग्र तेवर त्याग प्रकाशक केवल उतना ही छापें जितना लोग वाकई खरीदते और पढ़ते हैं।</p>
<p>तो यह अच्छा ही है कि ईबुक्स आहिस्ता आहिस्ता परंपरागत पुस्तकें का स्थान ले रही हैं। डिजिटल पुस्तकें सस्ती हैं, कागज बचाती हैं और महज़ आपके कंप्यूटर या मोबाईल पर ही हज़ारों किताबें समा सकती हैं। मांग पर छपाई समेत यह सारी तकनीक फ़्यूचर रेडी हैं। अमेज़ॉन द्वारा निर्मित <strong><a target="_blank" href="http://www.amazon.com/dp/B000FI73MA">किंडल</a></strong>  तथा <strong><a target="_blank" href="http://www.sonystyle.com/webapp/wcs/stores/servlet/ContentDisplayView?cmsId=content/reader/index_reader&#038;hideHeaderFooter=false&#038;storeId=10151&#038;catalogId=10551&#038;XID=F:reader:sony">सोनी ईरीडर</a></strong> जैसे <a target="_blank" href="http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_e-book_readers">ईबुक रीडर</a> यंत्रों के कारण किताबें पढ़ने का तरीका और भी बदल गया है। इनके माध्यम से ईबुक, आनलाईन अखबार और ब्लॉग किताबों की तरह पढ़े जा सकेंगे। ज़ाहिर है लेखक पाठकों के इस एक और वर्ग तक पहुंच सकते हैं।</div>
<p>पारंपरिक छपाई, जहाँ प्रकाशित किताबों को अनुमानित मांग के अनुसार निश्चित संख्या में छाप कर भंडारित कर लिया जाता है,  के विपरीत मांग पर छपाई तकनीक में पुस्तक की डिजाइन, लेआउट, सामग्री इत्यादि डिजिटल रूप में तैयार कर कम्प्यूटर में सहेज ली जाती है और जब भी कभी मांग होती है, तो उसे निश्चित संख्या में छाप उनकी आपूर्ति कर दी जाती हैं। इस विधि द्वारा 1 किताब भी छापी जा सकती है और 1 लाख भी। अनोखी बात यह है कि न तो आपको या प्रकाशक को भारी भरकम राशि का निवेश करना होता हैं,  ना ही छपी किताबों की <em>इनवेंटरी </em>प्रबंधित करना होता है, और न <em>लॉजिस्टिक्स </em>का खरचा वहन करना होता है। साथ ही अनबिकी किताबों को ठिकाने लगाने की समस्या से भी दो-चार नहीं होना पड़ता। सेल्फ़ पब्लिशिंग के प्रति रुझान के पीछे अंधाधुंध छपाई से होती पर्यावरणीय क्षति और पारंपरिक पुस्तकों मे प्रति घटती व ईबुक्स जैसे विकल्पों की बढ़ती लोकप्रियता भी है  (<strong>देखें बॉक्सः </strong><em>फ़्यूचर रेडी बन रहा है प्रकाशन</em>)।</p>
<h3>लेखक भी आप और प्रकाशक भी आप</h3>
<p>यदि आप लेखक हैं, और आप अपनी किताब छपवाना चाहते हैं, तो आपको ऐसे प्रकाशक को खोजना होगा, जो आपकी किताब छापे भी और विक्रय पर रॉयल्टी भी दे। हिन्दी के लेखक आमतौर पर इतने भाग्यशाली नहीं होते। नतीजतन अधिसंख्य हिन्दी लेखक अपनी किताबें स्वयं छपवाते हैं जिनके लिए उन्हें स्वयं खर्च करना होता है और यह राशि न्यूनतम 15 हजार रुपयों से असीमित हो सकती है। यूं प्रकाशित किताबों के विपणन के बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता, क्योंकि अमूमन 500-700 प्रतियों में छपी किताबें साभार भेंट स्वरूप सिर्फ चंद चुनिंदा मित्रों-परिचितों व समीक्षकों के हाथों तक ही पहुँच पाती हैं। पर स्वप्रकाशन तकनीक से यह काम बहुत ही कम लागत में किया जा सकता है। यदि लेखक स्वयं कम्प्यूटर का प्रयोग जानता है, या पाठ डिजिटल सामग्री में उपलब्ध करवाता है तो उसे टाइपिंग-कम्पोजिंग का खर्च भी यहाँ वहन नहीं करना होता है। साथ ही न्यूयार्क हो या बस्तर कहीं से भी कोई इस पुस्तक को मंगवा सकता है, किताबों का आउट आफ स्टॉक हो जाने का कोई भय नहीं। स्वप्रकाशन जालस्थलों के माध्यम से आप बिकी किताबों की संख्या और अपनी रॉयल्टी पर नजर रखी जा सकती है।</p>
<p>पर क्या स्वप्रकाशन अन्ततः शान दिखाने वाली <strong>वैनिटी पब्लिशिंग</strong> ही नहीं है, छपास पीड़ितों के लिये अपने पैसे से अपने रचना कौशल का दावा करने का प्रयास? लेनार्ड फर्नान्डिस इस बात से सहमत नहीं हैं। &#8220;हम अपने ग्राहकों से कभी भी 500 किताबें आर्डर कर उनकी मार्कटिंग करने के लिये नहीं कहते। अलबत्ता हम यह ज़रूर सुझाव देते हैं कि 5 या कम प्रतियाँ छपवाकर समीक्षकों को भेजें और फिर बाजार के निर्णय की प्रतीक्षा करें। हालांकि हम कुछ वितरकों से संपर्क कर रहे हैं पर मुख्यतः हम इंडियाप्लाज़ा और अपने <a href="http://books.dogearsetc.com/" target="_blank">आनलाईन स्टोर</a> से किताबें बेचते हैं।&#8221;  पर जया झा स्पष्ट कहती हैं कि स्वप्रकाशन आम प्रकाशनों के लिये नहीं है, &#8220;यह बाकी बाजारों जैसा ही है, जो मार्केटिंग कर सकें वह बेचने में भी सफल रहते हैं। पर यह समझना ज़रूरी है कि स्वप्रकाशन मास मार्केट के लिये नहीं है, यह niche यानि आला प्रकाशनों के लिये सही माध्यम है।&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">बड़े प्रकाशक अब पुरानी किताबों के प्रकाशन के लिये तो नये प्रकाशक पारंपरिक प्रकाशन की ऊंची कीमतों से निजात पाने के लिये प्रिंट आन डिमांड तकनीक की शरण ले रहे हैं।</div>
<p>प्रिंट आन डिमांड के वैनिटी पब्लिशिंग की धारा से निकलकर मुख्यधारा के प्रकाशन में पदार्पण के अन्य सबूत भी मिल रहे हैं। <strong>कैंब्रिज युनिवर्सिटी प्रेस</strong> ने हाल ही में 10,000 पुस्तकें<strong> लाइटनिंग सोर्स</strong> द्वारा बेची हैं। बड़े प्रकाशक अब पुरानी, आउट आफ प्रिंट किताबों के प्रकाशन के लिये तो नये प्रकाशक पारंपरिक प्रकाशन, वेयरहाउसिंग और लौटाई गईं किताबों की ऊंची कीमतों से निजात पाने के लिये प्रिंट आन डिमांड तकनीक की शरण ले रहे हैं।</p>
<h3>किनके लिये सही है स्वप्रकाशन</h3>
<p>अगर स्वप्रकाशन वैनिटी पब्लिशिंग नहीं है तो फिर यह किन लेखकों व प्रकाशकों के लिये उपयुक्त होगा? जया बताती हैं कि स्वप्रकाशन का उपयोग थोक प्रकाशन के पहले बाज़ार का जायज़ा लेने के लिये बखूबी किया जा सकता है। और कई प्रकाशक ऐसा कर भी रहे हैं।</p>
<div id="boxL" style="width: 300px;">
<h2>प्रिंट आन डिमांड के अनूठे प्रयोग</h2>
<p><strong><a href="http://www.publicdomainreprints.org" target="_blank">पब्लिकडोमेन रीप्रिंट्स</a></strong> के माध्यम से आप ऐसी किताबों को खास अपने लिये छपवा सकते हैं जो कहीं और नहीं मिलतीं। इस जालस्थल पर इंटरनेट आर्काईव और गूगल बुक्स में <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Public_domain" target="_blank">सार्वजनिक रूप से मुफ्त  उपलब्ध</a> 20 लाख से ज्यादा किताबें मुहैया हैं। आर्डर करने पर यह उन्हें सही प्रारुप में बदल कर प्रकाशित कर देता है।</p>
<p><strong><a href="http://www.faber.co.uk/faberfinds/" target="_blank">फ़ाबर फाईंड्स</a></strong> पर भी आप आउट आफ प्रिंट पुरानी किताबें मंगा सकते हैं।</p>
<p><img class="alignnone" style="border: 0pt none;" title="Book Mobile" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/03/bookmobile.jpg" alt="Book Mobile" width="300" height="211" /></p>
<p><strong><a href="http://www.archive.org/texts/bookmobile.php" target="_blank">बुकमोबाईल सेवा</a></strong> के अंतर्गत एक वैन में सैटैलाईट संपर्क, लैपटॉप, लेज़र प्रिंटर और बुक बाईंडिंग मशीन के द्वारा <a href="http://www.archive.org" target="_blank">इंटरनेट आर्काईव</a> पर मुफ्त उपलब्ध हज़ारों उपलब्ध प्रकाशनों को सिर्फ एक डॉलर प्रति पुस्तक की दर से उपलब्ध कराया जाता है। यह गाड़ी अमरीका के स्कूलों में घुमती रहती है और इसे हाल ही में युगांडा भी भेजा गया। इस प्रकल्प को भारत में भी आजमाया गया है। भारत सरकार द्वारा प्रायोजित व सीडैक द्वारा क्रियांवित यह परियोजना अंग्रेजी व हिन्दी की किताबों को इंटरनेट से पुस्तक आकार में उपलब्ध कराती है। सितंबर 2003 की <a href="http://www.powis.com/solutions/case_studies/use_indiabookmobile.php" target="_blank">इस खबर</a> के अनुसार इस परियोजना को वृहद होना था पर इसकी वर्तमान स्थिति के बारे में सामयिकी अनभिज्ञ है। <a href="http://mobilelibrary.cdacnoida.com/" target="_blank">परियोजना का जालस्थल</a> भी बंद पड़ा है।</div>
<p>&#8220;मूलतः यह उन लोगों के लिये है जो प्रकाशन के बारे में कुछ भी नहीं जानते। पर हमारी साईट पर इस बाबत काफी सामग्री है जो उन्हें जानकारी देती है। जो पहले इस सेवा का उपयोग कर चुके हैं और जो उसके लाभ समझते हैं वो हमारे नियमित ग्राहक होते हैं। इसके अलावा उपहार के तौर पर या अपने माता पिता, किसी संबंधी या मित्र की याद में स्मरणीय प्रकाशन के रूप में इसका उपयोग करते हैं। रचना संकलन की पुस्तकें भी काफी लोकप्रिय हैं&#8221;, जया ने बताया।</p>
<p>स्वप्रकाशन के अनेक और अनूठे प्रयोग भी संभव हैं (<strong>देखें बॉक्स:</strong> <em>प्रिंट आन डिमांड के अनूठे प्रयोग</em>)। लेनार्ड बताते हैं कि पुणे के एक कॉलेज ने कम छात्र संख्या और बदलते पाठ्यक्रम से निबटने के लिये पाठ्यपुस्तकें स्वप्रकाशन द्वारा छपवाईं। इसी तरह बंगलौर के एक सज्जन ने अपने दादा की कविताओं का संकलन प्रकाशित कर अपने परिवार में ही वितरण किया। जब पाठकवर्ग सीमित हो तो स्वप्रकाशन उपयुक्त माध्यम होता है।</p>
<h3>स्वप्रकाशन और विपणन</h3>
<p>जब प्रकाशक भी आप हों तो स्पष्टतः अपने प्रकाशन की मार्केटिंग की ज़िम्मेवारी भी आप के ही कंधों पर रहती है। लेनार्ड बताते हैं, &#8220;किताब का विपणन पाठकवर्ग के मुताबिक ही किया जा सकता है। जैसे कि हमने एक शिक्षण संस्थान के पूर्व छात्रों की स्मारिका का प्रकाशन किया। ज़ाहिर तौर पर यह समारिका उन पूर्व छात्रों के अलावा किसी और को बेच पाना असंभव होगा।&#8221;  जया का मानना है कि प्रिंट आन डिमांड पुस्तकों को बेचने का स्वाभाविक स्थान आनलाइन है। &#8220;पुस्तक का विपणन उसके लेखक की आनलाईन उपस्थिति का ही विस्तार होता है। वह अपने ब्लॉग, सोशियल नेटवर्क जैसे माध्यमों का प्रयोग कर पुस्तक के बारे में उत्सुकता बढ़ा सकता है। विपणन का एक मूल सिद्घांत हैः सही पाठक या श्रोता वर्ग तक पहुंचना। यह न हो कि लो एक और किताब बाजार में आ गई। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह स्पष्ट किया जाय कि इस नई किताब में ऐसा क्या है जो पूर्व प्रकाशनों में नहीं था।&#8221;</p>
<p>हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा &#8211; मांग पर छपाई की सुविधा के संबंध में यह कहावत सटीक बैठती है। यह तकनीक आकर्षित करती है, और अंग्रेजी भाषी लेखकों में यह खासी लोकप्रिय भी होने लगी है। और लगता है कि इस विचार को हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों के बीच प्रचलन में आने में अधिक समय नहीं लगेगा। तो फिर देर किस बात की? छाप डालिए अब तक की अपनी सारी की सारी अप्रकाशित पुस्तकें, या फिर लिख डालिए दर्जनों किताबें सांय सांय जिन्हें आप प्रकाशक के इंतजार में अपने मन में तैयार किए बैठे हैं।</p>
<p class="note"><strong>अतिरिक्त सामग्री व साक्षात्कार:</strong> देबाशीष चक्रवर्ती। रवि रतलामी की कुछ पुस्तकें पोथी डॉट कॉम पर क्रय हेतु उपलब्ध हैं। विवरण हेतु <a target="_blank" href="http://raviratlami.blogspot.com/2008/08/blog-post_05.html">यहाँ देखें</a>। सामयिकी का <a target="_blank" href="http://pothi.com/pothi/book/httpwwwsamayikicom-samayiki-january-2009-edition">जनवरी 2009 का प्रिंट अंक</a> भी पोथी डॉट कॉम पर उपलब्ध है।</p>
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		<title>ज़माना स्ट्राइसैंड प्रभाव का</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/01/living_with_the_streisand_effect/</link>
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		<pubDate>Fri, 09 Jan 2009 08:03:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>इवगेनी मोरोज़ोव</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतर्जाल]]></category>
		<category><![CDATA[censor]]></category>
		<category><![CDATA[IWF]]></category>
		<category><![CDATA[Streisand Effect]]></category>
		<category><![CDATA[The scorpions]]></category>
		<category><![CDATA[Wikipedia]]></category>

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		<description><![CDATA[तकनीकी रूप से सक्षम लोगों की भीड़ पर सैन्यवादी रवैया अख़्तियार करने से कुछ हासिल नहीं होता। जितना उन्हें चुप कराने की कोशिशें की जाएँ संवेदनशील सूचनाएँ उतनी ही अधिक फैलती हैं।]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><span class="dropCap">ब्रि</span>टेन स्थित इंटरनेट वाच फाउंडेशन (आई.डब्लू.एफ) का लक्ष्य बहुत महान है &#8211; इंटरनेट पर बाल-उत्पीड़न के चित्रों की रोकथाम करना। इस तरह की तस्वीरों के प्रसार पर रोक लगाने के लिए वे ब्रितानी इंटरनेट सेवा प्रदाताओं, सरकार, और पुलिस के साथ नियमित रूप से संपर्क में रहते हैं।</p>
<div class="wp-caption alignright" style="width: 210px"><img src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/scorpion_album_cover.jpg" alt="Streisand Effect" width="200" height="200" /><p class="wp-caption-text">विकिपीडिया के लेख पर प्रकाशित विवादित चित्र (परिवर्तित)</p></div>
<p>चुनाँचे, जब एक वेबसाइट ने जर्मनी के एक हेवी-मेटल बैंड, द स्कॉर्पियन्ज़, के एक सत्तर के दशक के अल्बम के कवर पर एक नग्न बालिका का चित्र छापा, तो आई.डब्लू.एफ के उस वेबसाइट के पीछे पड़ने के फैसले में कोई असाधारण बात नहीं थी।</p>
<p>समस्या बस यह थी कि जिस साइट की बात हो रही है, वह है विकिपीडिया &#8212; विश्व की सब से लोकप्रिय साइटों में से एक। कई ब्रितानी इंटरनेट सेवा प्रदाताओं ने फाउंडेशन की मांगों को मान कर विकिपीडिया के उस पृष्ठ को अपने ग्राहकों तक पहुँचने से रोका। पर इस प्रतिबंध के कारण साइट के प्रबन्धकों का काम काफी पेचीदा हो गया है &#8212; वैध प्रयोक्ताओं और जालसाज़ों के बीच अन्तर करें तो कैसे।</p>
<p>विकीपीडिया वालों की सैद्धान्तिक और अडिग प्रतिक्रिया आने में देर नहीं लगी। उन्होंने केवल एक पृष्ठ नहीं, बल्कि उन छः इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (आईएसपी) के लिए अपनी पूरी साइट को ही अनुपलब्ध करा देने का निश्चय किया।</p>
<p>इस विवाद के चलते इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के भविष्य, और विकीपीडिया जैसे सामुदायिक जालस्थलों पर बढ़ते हुए आत्म-अनुशासन के उत्तरदायित्व जैसे मुद्दों पर महत्वपूर्ण बहसों के पुनः छिड़ जाने की पुरी संभावना है। परन्तु इस से रोचक बात यह है कि आई.डब्लू.एफ की ज़ोरदार तदबीरें क्यों उल्टी पड़ गईं और स्कॉर्पियन के विवादास्पद चित्रों से जनता का ध्यान कम करने के उनके लक्ष्य पर पानी क्यों फिर गया। फाउंडेशन की आशाओं के विपरीत, वह भूला बिसरा अल्बम कवर रातों रात इंटरनेट की सनसनी बन गया।</p>
<div id="pullQuoteL">इंटरनेट पर कानूनी धमकियों से कोई असर नहीं होता। अनगिनत लोग और न्यायिक अधिकार क्षेत्र &#8212; किस किस पर और कहाँ कहाँ मुकदमा चलाएँगे?</div>
<p>आई.डब्लू.एफ इंटरनेट से जुड़ी जिस अद्भुत घटना की शिकार हो गई है, उसे स्ट्राइसैंड प्रभाव कहा जाता है, यानी जब आप इंटरनेट पर किसी सूचना को दबाना या हटाना चाहते हैं, तो उस का असर उल्टा हो जाता है, और सूचना दबने की जगह और फैल जाती है। इस प्रभाव का नाम गायिका, अभिनेत्री बार्बरा स्ट्राइसैंड पर पड़ा है, जिन्होंने अपने मालिबू वाले बंगले के चित्रों को छपने से रोकने के लिए कानूनी दाँव पेंच लगाए, पर असफल रहीं; उल्टा इससे उन का व्यक्तिगत जीवन इंटरनेट पर और अधिक चर्चों में आ गया। स्ट्राइसैंड प्रभाव के हाल के अन्य शिकार हैं साइंटॉलोजी चर्च (जिन्होंने अभिनेता टॉम क्रूज़ के उस वीडियो को दबाने की कोशिश की जिस में वे इस चर्च के बारे में बात कर रहे थे), स्विस बैंक जूलियस बेयर (जिन्होंने ऐसे दस्तावेज़ों को दबाने की कोशिश की जिन में बैंक पर संपत्ति छिपाने और हवाला में शामिल होने का आरोप था), और रूसी कुलीन अलीशर उस्मानोव (जिन्होंने ब्रितानी चिट्ठों में छपने वाली अपनी आलोचना और अपने अतीत की मसालेदार खबरों को दबाने की कोशिश की)।</p>
<p>जैसे जैसे स्ट्राइसैंड प्रभाव किसी भी जनसंपर्क शास्त्र के छात्र के लिए पाठ्यपुस्तक जितना महत्वपूर्ण बनता जा रहा है, यह बात हैरानी की बात है कि कुछ संगठन और व्यक्ति अभी भी स्ट्राइसैंड से पहले के ज़माने में अटके हुए हैं और उसी ज़माने की धमकियों और न्यायिक आदेशों से काम ले रहे हैं। इसे अच्छा कह लीजिए या बुरा, इंटरनेट पर कानूनी धमकियों से कोई वाजिब असर नहीं होता। इतने सारे बेनाम लोग, और इतने सारे न्यायिक अधिकार क्षेत्र &#8212; किस किस पर और कहाँ कहाँ मुकदमा चलाएँगे।</p>
<div class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><img style="border: medium none;" title="गायिका, अभिनेत्री बार्बरा स्ट्राइसैंड ने अपने मालिबू वाले बंगले के चित्रों को छपने से रोकने के लिए कानूनी दाँव पेंच लगाए, पर असफल रहीं; उल्टा इससे उन का व्यक्तिगत जीवन इंटरनेट पर और अधिक चर्चों में आ गया। " src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/streisand_home.jpg" alt="Striesand Effect" width="300" height="297" /><p class="wp-caption-text">गायिका, अभिनेत्री बार्बरा स्ट्राइसैंड ने अपने मालिबू वाले बंगले के चित्रों को छपने से रोकने के लिए कानूनी दाँव पेंच लगाए, पर असफल रहीं; उल्टा इससे उन का व्यक्तिगत जीवन इंटरनेट पर और अधिक चर्चों में आ गया। </p></div>
<p>अन्तर्जाल पर सीधे सामना करने से क्यों काम नहीं चलता, इस का एक कारण यह भी है कि डिजिटल मसौदे को इंटरनेट से बाहर निकाल फेंकना असंभव है। उल्टे, आप जितना इसे दबाने की कोशिश करेंगे, उतना वह और उछलेगा। जैसा कि बार्बरा स्ट्राइसैंड को तजुर्बा हुआ, एक तकनीकी रूप से जानकार जनाधिकार समर्थकों की भीड़ से सैन्यवादी रुख रखने से कुछ हासिल नहीं होता। कइयों के अपने सर्वर होते हैं, ब्लॉग होते हैं &#8211; और सामाजिक जालपृष्ठों पर उनके हज़ारों मित्र होते हैं &#8211; इस कारण उन्हें चुप कराने की ज़्यादा ज़ोरदार कोशिशें की जाएँ तो संवेदनशील सूचनाएँ और अधिक फैलती हैं।</p>
<p>इस से प्रभावित लोगों के पास दो ही विकल्प बचते हैं &#8212; चु्प्पी या वार्तालाप। मीडिया के आज के युग में चुप्पी साधना भी एक हथियार हो सकता है, खासकर यदि आप का बीता हुआ कल दाग़दार है, उस रूसी अरबपति की तरह। ब्लॉगरों पर मुकद्दमेबाजी करोगे तो आपका ही नाम सुर्खियों में उछलेगा, और बदनामी ही होगी कि आप ने मुक्त अभिव्यक्ति पर रोक लगाने की कोशिश की है।</p>
<p>पर आई.डब्लू.एफ जैसे संगठनों का क्या, जो भले कामों के लिए लड़ते हैं? स्ट्राइसैंड प्रभाव के ज़माने में उनकी मूल युक्ति होनी चाहिए कि इस तरह का अप्रिय मसौदा छापने वाली इंटरनेट कंपनियों से बातचीत करें, न कि झगड़ें &#8211; खासकर जब ऐसी कंपनियाँ लोकप्रिय और अन्यथा विवादरहित हों। विकिपीडिया में कमियाँ भले ही हों, पर उन के यहाँ एक भला चंगा नियन्त्रण तन्त्र भी लागू है; यदि आप ने कभी विकिपीडिया की डाक सूचियों पर होने वाली चर्चाओं को पढ़ा हो तो आप को मालूम होगा कि उस के मध्यस्थक और प्रबन्धक खुले तौर पर विवादास्पद मुद्दों पर नियमित बात करते रहते हैं।</p>
<p>इंटरनेट कितना भी क्रान्तिकारी हो, उस में मानवीय संवाद के मूल नियम अभी भी बरकरार हैं। यानी, कोई भी सौदेबाज़ी शुरू करने का बेहतर तरीका यह है कि संभाषियों से विनम्रता से पेश आया जाए, खासकर जब सीनाज़ोरी एक साइबर-युद्ध को बुलावा भेजने के बराबर हो।
<p class="note">मूल अंग्रेज़ी लेख से अनुवादः <strong><a href="http://www.kaulonline.com/" target=_blank>रमण कौल</a></strong>। न्यूयॉर्क टाईम्स की पूर्वानुमति से प्रकाशित।</p>
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		<title>दस चीजें जो विकिपीडिया नहीं है</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2009/01/10-things-wikipedia-is-not/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 06 Jan 2009 03:30:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
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		<description><![CDATA[कुछ लोग विकिपीडिया की आत्मस्वीकृति के बावजूद इसमें लोकशाही की झलक देखते हैं तो कुछ यह मानते हैं कि लोकतंत्र के सिद्धांतों के विपरीत यहाँ बहुमत से काम नहीं होता।]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser"><img class="alignright" style="margin-left:10px;padding:5px" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/wikipedia-intro.jpg" alt="" width="250" height="188" /><span class="dropCap">अ</span>गस्त 2006 में, जब हिन्दी विकिपीडिया को शुरु हुये 3 साल हो चुके थे, निरंतर में हमनें <a title="विकिपीडिया: हिन्दी की समृद्धि की राह" href="http://www.nirantar.org/0806/nidhi/wikipedia" target="_blank">विकिपीडिया पर योगदान का आह्वान</a> किया था। आज हिन्दी विकिपीडिया पर 24,000 से ज्यादा पृष्ठ हैं और 9,700 से अधिक प्रयोक्ता। यह शायद उपयुक्त समय हैं जब हम विकिपीडिया पर चर्चा को आगे बढ़ायें।</p>
<p>आधुनिक इंटरनेटिय युग में विकिपीडिया ने एक ऐसी जानकारी के स्रोत और सामाजिक आंदोलन का आकार लिया है जो ज्ञान एकत्र करने की तमाम पारंपरिक रीतियों को चुनौती देता नज़र आता है। विकिपीडिया पर नीतिबद्ध स्वशासन बेहद पेचिदा है और कुछ लोग विकिपीडिया की आत्मस्वीकृति, कि विकिपीडिया कोई लोकतंत्र नहीं है, के बावजूद इसमें लोकशाही की झलक देखते हैं तो कुछ यह मानते हैं कि लोकतंत्र की भावना के उलट यहाँ हर चीज बहुमत से काम नहीं करती।</p>
<p>प्रस्तुत लेख विकिपीडिया की आत्मस्वीकृति पर ही आधारित है। ये नियम विकिपीडिया के ही <a title="What wikipedia is not" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Wikipedia:What_Wikipedia_is_not" target="_blank">इस पृष्ठ</a> से लिये गये हैं। पर यर्थाथ में सारे नियम माने जा रहे हों यह सच नहीं है क्योंकि, और जैसा आप इस लेख में आगे पढ़ेंगे, ये नियम मात्र हैं, विधान नहीं।</div>
<p><strong><span class="dropCap">1</span> विकिपीडिया शब्दकोश नहीं है</strong></p>
<p>जी हाँ, आधिकारिक रूप से विकिपीडिया कोई शब्दकोश नहीं है। इसमें शब्दों के अर्थ, व्याख्या या प्रयोग जोड़ना मना है। इसका कारण है कि विकिपीडिया की भगिनि प्रकल्प विक्शनरी एक विकि शब्दकोश है। विकिपीडिया को शब्दकोश का रूप देने से बचाने के लिये एक नियम यह भी है कि किसी लेख में विषय की केवल परिभाषा ही नहीं, अन्य विवरण भी साथ होना ज़रुरी है। हालांकि हिन्दी विकिपीडिया पर ऐसे लेखों की भरमार है (कई लेख शायद स्वचालित बॉट द्वारा बनाये गये हैं) इनका उद्देश्य लेखों की संख्या बढ़ाने के लिये भले किया गया हो सिद्धांतः ये विकिपीडिया नहीं <a title="Wiktionary" href="http://en.wiktionary.org/wiki/Main_Page" target="_blank">विक्शनरी</a> का हिस्सा होने चाहिये।</p>
<p><strong><span class="dropCap">2</span> विकिपीडिया मौलिक विचारों का प्रकाशक नहीं है</strong></p>
<p>विकिपीडिया पर आप अपने विचार या विश्लेषण या कोई ऐसी जानकारी जो पूर्व में सर्वथा अप्रकाशित हो सम्मिलित नहीं कर सकते। हिन्दी विकीपिडिया पर इस तरह के कई लेख, जो सीधे ब्लॉग से लिये गये हैं और लेखक की राय भर रखते हैं, इस पैमाने पर खरे नहीं उतरते। विकिपीडिया पर निम्नलिखित किस्म के लेख शामिल करना वर्जित है:</p>
<ul>
<li>मौलिक शोध, विचार, शब्द निर्माण (जब तक कि ये किसी जर्नल या प्रतिष्ठित जालस्थल पर प्रकाशित व प्रचारित न हुये हों)</li>
<li>मौलिक आविष्कार (जब तक इसे अनेक, स्वतंत्र और विश्वसनीय स्रोतों ने जाँच परख कर इसके बारे में खबर प्रकाशित न की हो)</li>
<li>किसी विषय पर निजी निबंध (जहाँ किसी व्यक्ति की राय का ज़िक्र करना ज़रुरी हो वहाँ भी यह ज़रूरी है कि लेख किसी और का लिखा हो)</li>
<li>किसी विषय पर बहस या परिचर्चा</li>
<li>पत्रकारिता: विकिपीडिया पर मौलिक रपटें या ब्रेकिंग न्यूज़ प्रकाशित नहीं हो सकतीं क्योंकि यह खुद को खबरों का मूल स्रोत नहीं मानता। इसके लिये विकिपीडिया का एक और प्रकल्प है <a title="Wikinews" href="http://www.wikinews.org/">विकीन्यूज़</a>। इसके बावजूद मुंबई हमलों के दौरान विकिपीडिया के इस ताबड़तोड़ बने पृष्ठ को सामान्य पाठकों के अलावा मुख्यधारा के मीडिया ने भी मूल स्रोत मान कर इसका अनेकों बार ज़िक्र किया।</li>
</ul>
<p><strong><span class="dropCap">3</span> विकिपीडिया विज्ञापनबाजी, प्रचार व अटकलबाजी के लिये नहीं है</strong></p>
<p>विकिपीडिया आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक या किसी भी प्रकार से किसी की वकालत या प्रचार नहीं करता। किसी लेख में ऐसे मुद्दों के बारे में रपट हो सकती है पर इसे पूरी तरह तटस्थ दृष्टकोण से लिखा जाना चाहिये। इसी तरह सामयिक विषयों पर टीका टिप्पणी भी वर्जित है। जीवित व्यक्तियों की निजता की सुरक्षा व मानहानी जैसी दिक्कतों से बचने की लिये चुगलखोरी, स्कैंडल और गॉसिप (मसलन, फिल्म अभिनेत्री रेखा की उम्र का अनुमान लगाना) भी मना है। कंपनियों व उत्पादों के बारे में लिखे लेख निष्पक्ष होने चाहियें। भविष्य का अनुमान लगाने वालें लेख शामिल करना भी मना है, अर्थात आप तृतीय विश्व युद्ध में इस्तेमाल होने वाले हथियारों की सूची या पाकिस्तान द्वारा मुबंई आतंकवाद मुद्दे पर उठाये जाने वाले कदमों का कयास लगाता लेख विकिपीडिया पर नहीं बना सकते। भविष्य के बारे में लिखने के लिये हालांकि एक और प्रकल्प <a title="Future Wikia" href="http://future.wikia.com/" target="_blank">फ्यूचर विकिया</a> मौजूद है।</p>
<div id="boxR">
<h2>बहुमत की जीत, या अपनी?</h2>
<p><img style="border:none;padding:2px" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/wikipedia-box-story.jpg" alt="Wikipedia is controlled by a few" /><br />
<em>यदि लोकतंत्र का मतलब लोकशक्ति है तो इस पैमाने पर विकिपीडिया निःसंदेह लोकतंत्र है। पर लोकतंत्र की तईं यहाँ हर चीज बहुमत से काम नहीं करती।</em></p>
<p><em>स्लेट पत्रिका ने अपने एक <a href="http://www.slate.com/id/2184487">विवादास्पद लेख</a> में लिखा:</em></p>
<p>&#8220;विकिपीडिया का विरोध करना मुश्किल है। प्रयोक्ताओं द्वारा बनाया और संपादित विश्वकोश, जहाँ अंशदाता का पंजीकृत होना भी अनिवार्य न हो, नेचर पत्रिका के एक शोध के अनुसार परिशुद्धता के मामले में एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका से भी लोहा लेता है। वो भी कई गुना अधिक सामग्री के साथ। इसके बावजूद जहाँ लोग विकिपीडिया को एक अच्छा प्रकल्प मानते हैं इसकी सफलता का कारणों के बारे में अब भी भारी भांतियाँ हैं। विकिपीडिया भले ही आनलाईन समुदायों की सर्जनात्मक शक्ति का द्योतक हो पर यह मान लेना भूल होगी कि विकिपीडिया की सफलता के पीछे सामूहिक अक्लमंदी (<em>विज़डम आफ क्राउड</em>) है।</p>
<p>डिग व विकिपीडिया सदृश <em>सोशियल मीडिया</em> जालस्थल अंतर्जालिय लोकशाही के शानदार उदाहरण के रूप में पेश किया जाते हैं, जिनमें करोड़ों लोग लेखक, संपादक या मतदाता की भूमिका निभाते हैं। पर वास्तविकता यह है कि ये जालस्थल मुट्ठी भर लोग ही चला रहे होते हैं। पालो एल्टो के शोधकर्ताओं के अनुसार विकिपीडिया पर आधे से ज्यादा संपादन की ज़िम्मेदारी महज़ 1 फीसदी विकि प्रयोक्ताओं पर होती है। इस के अलावा विकिपीडिया स्वचालित बॉट का भी इस्तेमाल करता है जो मानकों का अनुसरण सुनिश्चित करता है, बर्बरता यानी पृष्ठों पर ऊलजलूल संपादन हटाता है और अश्लील सामग्री डालने वाले प्रयोक्ताओं की खबर लेता है। अतः यह <em>विज़डम आफ क्राउड</em> नहीं है। यह दरअसल <em>विज़डम आफ चैपेरोन्स</em> यानी संरक्षकों की अक्लमंदी है।&#8221;</div>
<p><strong><span class="dropCap">4</span> विकिपीडिया चित्र, फाईलें, कड़ियाँ, किसी जालस्थल की प्रतिलिपी इत्यादी रखने की जगह नहीं है</strong></p>
<p>विकिपीडिया पर किसी लेख के साथ कुछ कड़ियाँ शामिल करना उचित है पर केवल लेख में फक्त कड़ियाँ हीं नहीं हों। सार्वजनिक डोमेन की वस्तुयें जैसे की समूची किताबें या सोर्स कोड, ऐतिहासिक दस्तावेज़, गानों के बोल वगैरह विकिपीडिया नहीं <a title="Wiki source" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Wikisource" target="_blank">विकिसोर्स</a> पर डालने चाहिये। इसी तरह विकिपीडिया को ब्लॉग या सोशियल नेटवर्क जैसे प्रयुक्त करना मना है। अपने किसी मनपसंद जीवित या दिवंगत व्यक्ति, मित्र या रिश्तेदार के लिये आप तब तक पृष्ठ नहीं बना सकते जब तक कि वे विकिपीडिया की <a title="The Notorious Wikipedia Notability Guideline" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Wikipedia:Notability" target="_blank">नोटेबिलिटी मानक</a> (यह बेहद पेचीदा और नकचढ़ा मानक है, जिस से नये विकिपिडियन सबसे ज्यादा तंग होते हैं। <em>बॉक्स आलेख भी देखें</em>) पर खरे न उतरते हों। संक्षेप में कहें तो आपकी दादी के नाम पर तभी पृष्ठ बन सकता है अगर वे रेखा या वहीदा रहमान हों।</p>
<p><strong><span class="dropCap">5</span> विकिपीडिया निर्देशिका नहीं है</strong></p>
<p>विकिपीडिया यलो पेजेस भी नहीं है। यदि आप, उदाहरणतः, प्रसिद्ध उक्तियों का संकलन बनाना चाहते हैं तो विकिपीडिया की बजाय एक अन्य प्रकल्प <a title="Wikiquotes" href="http://www.wikiquote.org/" target="_blank">विकिकोट्स</a> इसकी सही जगह है। इसी तरह किसी रेडियो स्टेशन पर लिखे आलेख में उसके तमाम कार्यक्रमों की फेहरिस्त नहीं दी जा सकती।</p>
<p><strong><span class="dropCap">6</span> विकिपीडिया कागजी विश्वकोश नहीं है</strong></p>
<p>तकनीकी रूप से विकिपीडिया पर कागजी विश्वकोश की तरह स्थानाभाव की समस्या नहीं होती। विकिपीडिया पर शामिल विषयों की संख्या पर कोई बंधन नहीं है। तथापि विकिपीडिया पर जो तकनीकी रूप से संभव है वह तर्कसंगत भी होना चाहिये। विकिपीडिया को धीमे इंटरनेट कनेक्शन पर भी लोग पढ़ते हैं ऐसे में भरपूर सामग्री वाले भीमकाय पृष्ठ लोड होने में समय लेंगे। इन्हें छोटे छोटे आलेखों में बदल देना उपयुक्त माना जाता है। इसके साथ ही विषयों को शामिल करने के अपने बंधन तो हैं ही।</p>
<p><strong><span class="dropCap">7</span> विकिपीडिया पाठ्यपुस्तक, गाईड या नियम पुस्तिका नहीं है</strong></p>
<p>पकवान बनाने की विधि, शिक्षकिय, या कैसे करें नुमा लेख विकिपीडिया पर नहीं दिये जा सकते। विकिपीडिया का उद्देश्य तथ्य बताना और हवाला देना है पर किसी विषय को पढ़ाना नहीं। हालांकि ऐसे लेखों को <a title="Wikihow" href="http://www.wikihow.com/" target="_blank">विकिहाउ</a> या <a title="Wikibooks" href="http://en.wikibooks.org/wiki/Main_Page" target="_blank">विकिबुक्स</a> में शामिल किया जा सकता है। ताज़ महल के विवरण के साथ नज़दीक के होटलों के नाम पते बताता लेख विकिपीडिया पर नहीं चलेगा पर इसे <a title="WikiTravels" href="http://wikitravel.org/" target="_blank">विकीट्रैवल</a> पर लिखा जा सकता है।</p>
<p><strong><span class="dropCap">8</span> विकिपीडिया लोकतंत्र नहीं है</strong></p>
<p>जी हाँ आपने सही पढ़ा। विकिपीडिया पर आम राय वोटिंग से नहीं, संपादन और वार्ता पृष्ठों पर अंतहीन चर्चा के द्वारा होती है। विकिपीडिया के बारे में इस लेख में व विकिपीडिया पर भी वर्णित सेंकड़ों नियम कानून के बावजूद आप यह याद रखें कि ये कोई विधान नहीं हैं, न ही पत्थर पर खीचीं लकीर हैं। यानी आप इन नियमों का हवाला देकर किसी विकिपीडिया एडमिन से कोई सवाल नहीं कर सकते। &#8220;विकिपीडिया के भले के लिये&#8221; वे, और आप भी, इन्हें न मानने को स्वतंत्र हैं। विकिपीडिया बिलाशक स्वतंत्र व मुक्त माध्यम हो पर इसके पनपने में बाधा बनने पर, अराजकता से यथासंभव बचते हुये, इन दोनों गुणों को त्यागा जा सकता है। विकिपीडिया पर बोलने की आजादी भी नियमों के तहत है।</p>
<div id="boxL">
<h2>साईट जाये, पर सेंसर न कर पाये</h2>
<p>हाल ही में ब्रिटेन स्थित इंटरनेट वॉच फाउंडेशन (IWF), जो इंटरनेट पर बच्चों के यौन शोषण के चित्र का विरोध करती है, ने विकीपीडिया पर एक जर्मन हेवी मेटल बैंड &#8220;द स्कॉरपियंस&#8221; के विकिपृष्ठ पर उनके 1970 के एक अल्बम के आवरण चित्र पर आपत्ति की जिसमें एक निर्वस्त्र किशोरी को दर्शाया गया था। IWF की बात मानते हुये अनेक बरतानी ISP ने इस पृष्ठ पर रोक लगा दी। पर विकिपीडियान समुदाय ने अपनी नीतियों पर कायम रहते हुये एक अभूतपूर्व निर्णय लिया। न केवल चित्र को न हटाने का निर्णय लिया गया बल्कि सिर्फ प्रतिबंधित पृष्ठ की बजाय उन्होंने अपनी संपूर्ण वेबसाईट को ही रोक लगाने वाले इन 6 ISP के लिये बंद कर दिया। IWF की धारणा के विपरीत इस सारे काँड ने इस अल्बम कवर को रातों रात इंटरनेट की सनसनी बना दिया। [<a href="http://www.samayiki.com/2009/01/living_with_the_streisand_effect/" target="_self">यह लेख भी देखें</a>]</div>
<p><strong><span class="dropCap">9</span> विकिपीडिया को सेंसर नहीं किया जाता</strong></p>
<p>विकिपीडिया पर ऐसी सामग्री शामिल की जा सकती जो आपत्तिजनक या घृणाजनक हो। चुंकि कोई भी लेख संपादित कर सकता अतः ज़रूरी नहीं कि हर लेख व उसमें प्रयुक्त चित्र सामाजिक व धार्मिक मानदंडों पर खरे उतरें। तथापि अनुपयुक्त सामग्री को हटा दिया जाता है खास तौर पर यदि लेख या चित्र द्वारा अमरीकी कानून का उल्लंघन होता हो। पर केवल आपत्तिजनक होना ही सामग्री को हटाने के लिये नाकाफी होता है, कई लेख जैसे <a title="शिश्न" href="http://hi.wikipedia.org/wiki/शिश्न" target="_blank">शिश्न</a> व <a title="हस्तमैथुन" href="http://hi.wikipedia.org/wiki/हस्तमैथुन" target="_blank">हस्तमैथुन</a> में आपत्तिजनक चित्र हैं।</p>
<p>सेंसर न किये जाने की जिद पर विकिपिडिया ने कई दफ़ा कानूनी अड़चनों का भी सामना किया पर अपनी नीति से वे टस से मस न हुये। 2008 के उत्तरार्ध के एक घटनाक्रम में विकिपिडिया ने ब्रिटेन की इंटरनेट विनियामन संस्था IWF द्वारा एक विकिपृष्ठ पर प्रतिबंध लगाने के निर्देशों का विरोध करते हुये अपनी संपूर्ण साइट ही इन प्रयोक्ताओं को उपलब्ध न कराने का कठोर निर्णय तक ले लिया (<em>बॉक्स देखें</em>) पर विवादास्पद चित्र हटाने से साफ इंकार कर दिया।</p>
<p><strong><span class="dropCap">10</span> विकिपीडिया पर आपकी बनाई सामग्री आपकी नहीं है</strong></p>
<p>विकिपीडिया आपका वेब होस्ट नहीं है। यहाँ तक की आपका प्रयोक्ता पृष्ठ भी विकिपीडिया कि मालकियत है। इसे आप अपने होमपेज या ब्लॉग की तरह नहीं बना सकते। इसका स्वप्रचार के लिये इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।</p>
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