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	<title>सामयिकी - हिन्दी वेबपत्रिका &#124; Samayiki - Hindi Webzine &#187; Unicode</title>
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	<description>बदलती दुनिया की साक्षी</description>
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		<title>ओपनऑफ़िस एनाफ्रेसियज़ से करें तेज़, उन्नत अनुवाद</title>
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		<pubDate>Mon, 19 Oct 2009 04:59:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रौद्योगिकी]]></category>
		<category><![CDATA[Computer Aided Translation]]></category>
		<category><![CDATA[OpenOffice.org]]></category>
		<category><![CDATA[Translation]]></category>
		<category><![CDATA[Translation memory]]></category>
		<category><![CDATA[Unicode]]></category>

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		<description><![CDATA[रवि रतलामी बता रहे हैं अनुवाद कार्यों में अनुवादकों की सहायता करने वाले ओपनऑफ़िस.ऑर्ग ऑफ़िस सूट के इस उम्दा प्लगिन का उपयोग का सरल तरीका।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_logo.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-154" title="anphraseus_logo" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_logo.jpg" alt="anphraseus_logo" width="325" height="110"  style="border:none"/></a>ओपनऑफ़िस.ऑर्ग ऑफ़िस सूट</strong> के लिए बहुत से उम्दा प्लगइन उपलब्ध हैं जिनकी सहायता से विशिष्ट किस्मों के उत्पादकता संबंधी कार्यों को बख़ूबी, त्वरित तरीके से निपटाए जा सकते हैं। <a href="http://www.openoffice.org/" target="_blank">ओपनऑफ़िस.ऑर्ग</a> राइटर के लिए एक ऐसा ही उम्दा प्लगइन है <strong>एनाफ्रेसियज़</strong> जो अनुवाद कार्य में बेहद सहायक है। एनाफ्रेसियज़ प्लगइन कम्प्यूटर की सहायता से <em><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Translation_memory" target="_blank">ट्रांसलेशन मेमरी</a> डाटाबेस</em> के आधार पर अर्ध-स्वचालित अनुवाद कार्यों में अनुवादकों की सहायता करता है। आइए, इसके सरल प्रयोग के बारे में जानें।</p>
<p>डाउनलोड किए एनाफ्रेसियज़ प्लगइन फ़ाइल  को ओपनऑफ़िस.ऑर्ग राइटर में संस्थापित करने हेतु <em>फ़ाइल  &gt; ओपन</em> कमांड से खोलें। इससे एनाफ्रेसियज़ प्लगइन आपके ओपनऑफ़िस.ऑर्ग राइटर में संस्थापित हो जाएगा। आपको ओपनऑफ़िस.ऑर्ग के मेन्यू में एनाफ्रेसियज़ का मेन्यू कुछ इस तरह से दिखाई देगा -</p>
<div id="attachment_151" class="wp-caption aligncenter" style="width: 450px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_1.jpg"><img class="size-full wp-image-151" title="anphraseus_1" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_1.jpg" alt="ओपनऑफ़िस.ऑर्ग में एनाफ्रेसियज़ का मेन्यू " width="440" height="464" /></a><p class="wp-caption-text">ओपनऑफ़िस.ऑर्ग में एनाफ्रेसियज़ का मेन्यू </p></div>
<p>आपका ओपनऑफ़िस.ऑर्ग <em>कम्प्यूटर एडेड ट्रांसलेशन टूल</em> के रूप में आपके अनुवाद कार्य में सहायक के रूप में अब तैयार हो चुका है।</p>
<p>अब आप जिस फ़ाइल को अनुवादित करना चाहते हैं उसे ओपनऑफ़िस.ऑर्ग में खोलें। उदाहरण के लिए, अंग्रेज़ी की कोई फ़ाइल खोलें। इसके पश्चात एनाफ्रेसियज़ मेन्यू में जाकर ट्रांसलेट (<em>आल्ट + डाउन </em>कुंजी शॉर्टकट) मेन्यू पर क्लिक करें। आप देखेंगे कि अंग्रेजी में लिखे पहले वाक्य को एक अलग रंग से चमकाया गया है, तथा उसका अनुवाद करने के लिए नीचे एक अलग लाइन बना दी गई है, जिसमें संकेतक टिमटिमा रहा है।</p>
<div id="attachment_152" class="wp-caption aligncenter" style="width: 407px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_2.jpg"><img class="size-full wp-image-152" title="anphraseus_2" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_2.jpg" alt="एनाफ्रेसियज़ का प्रयोग" width="397" height="218" /></a><p class="wp-caption-text">एनाफ्रेसियज़ का प्रयोग</p></div>
<p>अब आप अपना अनुवाद पूरा कर लें। अनुवाद पूरा कर लेने के बाद फिर से ट्रांसलेट मेन्यू पर क्लिक करें। आपका संकेतक अगले वाक्य को जिसे अनुवादित करना है, उसे चमकाएगा तथा आपको उसका अनुवाद करने के लिए एक अलग, संपादन योग्य लाइन प्रस्तुत कर देगा।</p>
<p>यहाँ पर (जैसा कि ऊपर चित्र में वर्णित है) आप देखेंगे कि यदि एनाफ्रेसियज़ की ट्रांसलेशन मेमरी में आपके द्वारा पूर्व में किया गया अनुवाद उपलब्ध है, अतः उसे एनाफ्रेसियज़ ने स्वचालित रूप से उसे वहां टाइप कर दिया है। यदि अनुवाद डाटाबेस में उपलब्ध नहीं है, तो आपके लिए कोई विकल्प नहीं दिया जाएगा और आपको अनुवाद स्वयं टाइप करना होगा। एनाफ्रेसियज़ की ख़ूबी यह है कि यह प्रयोग करते करते स्वतः ही अपना अनुवाद डाटाबेस बनाता जाता है। आपके पुराने अनुवाद के डाटाबेस इसमें सुरक्षित रहते हैं, और एक जैसे अनुवाद कार्यों में इससे अनुवाद में एकरूपता बनाए रखने और त्वरित अनुवाद करने में अच्छी खासी सहायता मिलती है।</p>
<p>फ़ाइल में अनुवाद का कार्य पूर्ण होने के बाद मेन्यू में <em>एनाफ्रेसियज़  &gt;  ट्रांसलेशन </em>मेन्यू पर क्लिक करें। अब आप  फ़ाइल को चाहें तो द्विभाषी रूप में सहेज सकते हैं या फिर इसकी अनुवादित फ़ाइल को अनुवाद की भाषा वाली फ़ाइल में सहेज सकते हैं। यदि आपको लगता है कि फ़ाइल का  अनुवाद परिपूर्ण है, और इसे अनुवाद की भाषा वाली फ़ाइल के रूप में प्रयोग हेतु सहेजा जा सकता है तो आपको एनाफ्रेसियज़ का फ़ाइल क्लीन कमांड चलाना होगा। इसके लिए <em>एनाफ्रेसियज़  &gt; क्लीनअप</em> मेन्यू क्लिक करें। आप देखेंगे कि ओपनऑफ़िस.ऑर्ग राइटर में आपकी फ़ाइल की अंग्रेज़ी की तमाम प्रविष्टियाँ मिट गई हैं और फ़ाइल में अब सिर्फ हिन्दी का अनुवादित पाठ ही दिखाई दे रहा है।</p>
<div id="attachment_153" class="wp-caption alignright" style="width: 197px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_3.jpg"><img class="size-full wp-image-153" title="anphraseus_3" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/10/anphraseus_3.jpg" alt="एनाफ्रेसियज़ द्वारा अनुवादित फाईल" width="187" height="120" /></a><p class="wp-caption-text">एनाफ्रेसियज़ द्वारा अनुवादित फाईल</p></div>
<p>इस फ़ाइल को नए नाम से सहेज लें। बस, आपका अनुवाद कार्य पूरा हो गया। एनाफ्रेसियज़ के सेटअप मेन्यू में विविध पैरामीटरों को सेट किया जा सकता है &#8211; उदाहरण के लिए, यदि आपके पास पहले से ही कोई ट्रांसलेशन मेमरी है तो आप उसका प्रयोग कर सकते हैं, इत्यादि।</p>
<p>एनाफ्रेसियज़ कुछ कुछ अनुवाद औजार ट्रेडोस के टैग-एडीटर के जैसा काम करता है। हालांकि यह उतना उन्नत किस्म का नहीं है, मगर फिर भी मुफ़्त में उपलब्ध यह औजार छोटे मोटे अनुवाद परियोजनाओं पर बख़ूबी काम में लिया जा सकता है।</p>
<p><strong>एनाफ्रेसियज़ प्लगइन की फ़ाइल  anaphraseus_latest.oxt को <a href="http://nchc.dl.sourceforge.net/project/anaphraseus/Daily%20Snapshot/Snapshots/anaphraseus_latest.oxt" target="_blank">यहाँ से डाउनलोड करें</a>।</strong></p>
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		<title>सब तक बात पहुंचाने का माध्यम है हिन्दी</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/01/harsh-kumar-interview/</link>
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		<pubDate>Sat, 17 Jan 2009 18:27:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सामयिकी दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
		<category><![CDATA[font]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Railways]]></category>
		<category><![CDATA[susha]]></category>
		<category><![CDATA[TTF]]></category>
		<category><![CDATA[Unicode]]></category>
		<category><![CDATA[Vakil]]></category>

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		<description><![CDATA[भारतीय रेल में कार्यरत अधिकारी हर्ष कुमार द्वारा निर्मित निःशुल्क ट्रू टाईप फाँट शुषा खासा लोकप्रिय फाँट है जिसने भारतीय भाषाओं को इंटरनेट व डेस्कटॉप प्रकाशन तक पहुंचाने में योगदान दिया। हर्ष से सामयिकी की बातचीत।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser"><span class="dropCap">इं</span>टरनेट का संसार बड़ा अनोखा है। यहाँ असंख्य स्वयंसेवियों द्वारा निःस्वार्थ भाव से हौले हौले संचित ज्ञान का अकूत व मुफ्त भंडार तो है ही, इंटरनेट को समाज से जोड़ते अनेकों औजारों का भी सृजन यहाँ हुआ है। ऐसे ही एक स्वयंसेवी हैं भारतीय रेल में कार्यरत अधिकारी <strong>हर्ष कुमार</strong> जिन्होंने एक निःशुल्क ट्रू टाईप फाँट उपलब्ध करा कर भारतीय भाषाओं को इंटरनेट तक पहुंचाने व डेस्कटॉप प्रकाशन सहज बनाने में महती योगदान दिया।</p>
<p><img class="alignright" style="margin:5px" title="हर्ष कुमार" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/harsh-kumar-pp.jpg" alt="Harsh Kumar" width="200" height="240" />इंटरनेट से जुड़े पुराने लोग &#8216;<strong>सुशा</strong>&#8216; नाम से अपरीचित न होंगे। 1997 में हर्ष द्वारा निर्मित इस फाँट की सहायता से हिंदी, मराठी, गुजराती, गुरुमुखी व बांग्ला भाषाओं में कंप्यूटर पर आसानी से कार्य किया जा सकता था। इसका कुंजीपटल विन्यास बेहद आसान था, जिसे हम आजकल फोनेटिक विधि के नाम से जानते हैं। सुशा का प्रयोग कर इन भाषाओं में तंत्रांश भी बनाये जा सकते थे, जिनका एक प्रूफ आफ कंसेप्ट तंत्रांश हर्ष मुहैया भी कराते थे। यूनीकोड के पदार्पण के बाद सुशा जैसे फाँट की उपयोगिता भले कम हो गई हो पर शुरुवाती दौर में भारतीय भाषाओं के प्रादुर्भाव में इसकी भूमिका सदा प्रशंसनीय रहेगी।</p>
<p>हरियाणा के मूल रहवासी हर्ष सूचना प्रोद्योगिकी से संबद्ध रहे हैं, उन्होंने हंबरसाईड विश्वविद्यालय, ब्रिटेन से मास्टर्स उपाधि प्राप्त की है। वे कोंकण रेलवे जैसी परियोजनाओं से जुड़े रहे व संप्रति मंत्रालय में कार्यकारी निदेशक (वित्त व्यय) के पद पर आसीन हैं।  वे कवि भी हैं और उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।</p>
<p>प्रस्तुत है हर्ष कुमार से सामयिकी की बातचीत के अंश।</p></div>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>हर्ष अपने बारे में कुछ बतायें। आपके परिवार में कौन कौन हैं?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> मैं भारतीय रेल में काम करता हूँ। आजकल मंत्रालय में कार्यकारी निदेशक (वित्त व्यय) के पद पर हूँ। मैं मूलतः हरियाणा का रहने वाला हूँ। मैंने उत्तर प्रदेश में स्कूली शिक्षा प्राप्त की तथा कॉलेज की पढ़ाई दिल्ली से की। मेरे परिवार में मेरी माँ, पत्नी, दो पुत्रियां (सुभाषिनी व शाश्वती) व मेरी सास हैं।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>सुशा फाँट की रचना की बात आपने क्यों सोची? वो क्या समस्या या प्रेरणा थी जिसने आपको सुशा श्रेणी के फाँट डिजाइन करने व उसे आमजन के लिए मुफ़्त जारी करने को प्रेरित किया?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> आपने देखा होगा कि लगभग सभी फाँट का प्रयोग करने के लिये उसी कम्पनी के सॉफ्टवेयर को लेना पड़ता है। मेरा प्रयास था कि यह दिक्कत हटाई जाये और यह सभी के लिये हमेशा मुफ़्त उपलब्ध रहे। वैसे जब हम अंग्रेज़ी के अलग-अलग फाँट इस्तेमाल करते हैं तो कोई अलग से पैसे नहीं देते, फिर हिन्दी के लिये क्यों? बस यही सोच थी! मेरी जरूरतें भी कम हैं &#8211; तनख्वाह व पेंशन का जुगाड़ सरकारी नौकर होने के नाते हो ही रहेगा। अत: यह सुविधा मुफ्त ही उपलब्ध करायी व इसकी निहित डिजाइन में इस बात का ख्याल रखा गया कि कोई इस पर अधिकार कर कोई इस पर न रोक लगा सके न बेच सके।  हाँ, इसका प्रयोग कर यदि कोई अपना सॉफ्टवेयर बनाकर बेचे और अपनी मेहनत के एवज में पैसे कमाये तो इस पर कोई जागिरदारी नहीं है।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>सुशा की निर्माण प्रक्रिया के बारे में बतायें। इस फाँट के डिजाइन में क्या तकनीकी समस्याएं रहीं? </em></p>
<p><span id="pullQuoteR">फाँट के डिजाइन की तकनीकी जानकारी माइक्रोसॉफ्ट की साईट पर सभी के लिये उपलब्ध है, बस शौक व जनून चाहिये।</span><strong>हर्षः</strong> फाँट के डिजाइन की तकनीकी जानकारी माइक्रोसॉफ्ट की साईट पर सभी के लिये उपलब्ध है, बस शौक व जनून चाहिये। सुशा यूनीकोड फाँट नहीं है। वास्तव में यह केवल फाँट नहीं है अपितु कम्पयूटर पर काम करने का तरीका है जिसमें आपको कोई अलग सॉफ्टवेयर नहीं लगाना पड़ता और आप आसानी से काम कर सकते हैं जैसे कि आप अंग्रेज़ी में काम करते हैं और उसका कीबोर्ड भी आसान है। मुझे बहुत खुशी है कि आज सभी भारतीय भाषाओं के सॉफ्टवेयर में सुशा कुंजीपट उपलब्ध है। उस समय यह सुविधा किसी में भी नहीं थी। यह इंटरनेट <em>रेडी </em>भी था। यही बातें इसकी मुख्य पहचान थीं व लोकप्रियता का कारण भी।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>सुशा के शुरुवाती प्रयोग व प्रयोक्ताओं के बारे में कुछ बतायें। क्या उनके प्रतिक्रिया से इसमें बदलाव किये गये?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> एक वास्तविक किस्सा बताता हूँ। मैने गुजराती श्री वकील से सीखी थी और यही कारण है कि सुशा परिवार के गुजराती फाँट का नाम वकील है। उनकी बेटी अपनी पढ़ाई के लिये अमरीका चली गयी। तो उनकी माँ और बेटी के बीच में पत्र व्यवहार व बातचीत बंद हो गयी। उन दिनों फोन <em>कॉल</em> इतने सस्ते नहीं थे और न उनका इतना प्रचलन था। बस पत्र या ईमेल लिखना ही एक मात्र मध्यम था। बेटी को गुजराती मे लिखना नहीं आता था और दादी को हिन्दी पढ़ना नहीं आता था। तो श्री वकील अपनी बेटी के हिन्दी या अंग्रेज़ी के पत्र को गुजराती में माँ को बता देते थे और माँ की बात बेटी को हिन्दी या अंग्रेज़ी में। जब सुशा का गुजराती में &#8216;वकील01&#8242; आया तो बेटी हिन्दी में ईमेल भेज देती थी जिसे श्री वकील गुजराती में &#8216;वकील01&#8242; फान्ट में डाल कर प्रिन्ट कर देते थे। यनी दादी पोती में सीधा संबन्ध फिर से बन गया।</p>
<p>शुरू में तो मेरी पत्नी व कुछ दोस्तों की प्रतिक्रिया से काम चलाया गया बाद में जब अन्य लोगों की प्रतिक्रिया भी मिली तो उसका भी ध्यान रखा गया। एक बात मैंने ध्यान में रखी कि जब एक key यानी कुंजी किसी अक्षर के लिये आवंटित कर दी गयी तो फिर उसकी जगह नहीं बदली गयी, ठीक वैसे ही जैसे कि यूनीकोड में ध्यान रखते हैं।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>क्या आपको उम्मीद थी कि यह फाँट हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय फाँटों में से एक बन जाएगा? खासकर जालस्थलों के लिए?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> क्योंकि यह मुफ्त में था और आसानी से उपलब्ध था, काम करना आसान था, कीबोर्ड को याद रखने में आसानी थी। शायद यही कारण था कि जालस्थलों में यह फाँट हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय फाँटों में से एक बन पाया। मैं इसके लिये जालस्थलों के चलाने वालों का आभारी रहुंगा &#8211; विशेषकर <em>अभिव्यक्ति </em>व <em>काव्यालय </em>वेब पत्रिकाओं का। यहाँ पर इसके प्रयोग से अधिक से अधिक लोगों को इसकी जानकारी मिली।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>सुना है कि दिल्ली के किसी तकनीकी मेले में पहली दफ़ा सुशा फाँट का प्रदर्शन किया गया तो लोग इसकी प्रति प्राप्त करने के लिए लोग फ्लॉपियाँ लेकर टूट पड़े थे। आपके ऐसे पहले पहले के अनुभवों को जानना चाहेंगे।</em></p>
<div class="wp-caption alignleft" style="width: 310px"><img title="प्रगति मैदान, दिल्ली में आई टी एशिया मेले 1997 में भारत भाषा के स्टॉल का दृश्य" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/harsh-kumar-fair.jpg" alt="IT Asia fair at Pragati Maidan, Delhi" width="300" height="203" /><p class="wp-caption-text">प्रगति मैदान, दिल्ली में आई टी एशिया मेले 1997 में भारत भाषा के स्टॉल का दृश्य</p></div>
<p><strong>हर्षः</strong> जी यह सही है। दिल्ली में 1997 में प्रगति मैदान में चल रहे &#8216;आई टी एशिया&#8217; मेले में MAIT तथा NASCOM के सौजन्य से एक स्टॉल मिल गया था जहाँ पर इसका मुफ्त में वितरण किया जा रहा था। लोग फ्लॉपी लेकर आते थे और इसकी कॉपी ले जाते थे। हमारे पास फ्लॉपी तो नहीं थीं, लोगों को एक फ्लॉपी भी बमुश्किल मिलती थी तब प्रश्न आया कि क्या करें। लोगों ने सुझाव दिया कि 220 रु में 10 फ्लॉपी का डिब्बा मिलता है तो 22 या 25 रु लेकर बाँटो। मैंने कहा कि मैं इसके पैसे को हाथ नहीं लगाऊंगा। तब कुछ लोगों ने पूरा डिब्बा खरीदा और अपनी 1 या 2 फ्लॉपी रख कर बाकी वहीं खड़े-खड़े बेच दी या लोगों को मुफ्त में बांट दी। भीड़ इतनी थी कि किसी किसी दिन तो खाना खाने की फुर्सत भी नहीं मिल पाती थी। उन दिनों इंटरनेट से डाउनलोड करने में कभी-कभी दिक्कत आती थी, अत: लोग मौका नहीं गंवाना चाहते थे।</p>
<p>बहुत खुशी होती थी तथा थकान भी &#8211; सारा दिन प्रेजेंटेशन करो, हर बार एक नया समूह। उन्हें फिर समझाओ और फ्लॉपी की प्रतिलिपी वितरित करो। पर बहुत खुशी थी कि लोगों को यह इतना पसन्द आया। बहुत खुशी होती थी जब कोई स्वयंसेवी मिल जाता था और कहता था, &#8220;आप थक गये होंगे। कहें तो मैं प्रेजेंटेशन करूँ और लोगों को समझाऊँ?&#8221;, या कोई कहता, &#8220;लाइये मैं फ्लॉपी की कापी कर देता हूँ&#8221; और अगले तीन-चार घन्टे तक काम करता रहता। प्रेस के लोग भी मेहरबान थे। मैं सबके नाम तो याद नहीं रख पाया पर अक्सर सोचता हूँ तो सूरतें आँखों के सामने आती हैं और मन ही मन मैं उनका शुक्रिया अदा करता हूँ।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>सरकारी नौकरी में आमतौर पर नियमबद्ध कार्य होते हैं। क्या आपको अब लगता है कि सुशा &#8211; का रूप रंग कुछ अलहदा होता यदि यह नियमबद्धता नहीं होती? सुशा के अलावा आपने अन्य कोई तकनीकी ईजाद किये हों तो उनके बारे में हमारे पाठकों को बतायें।</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> सरकारी नौकरी के अपने नियम हैं और हम सब उनको मानते हैं और उनका पालन करते हैं। हाँ सरकारी नौकरी नहीं होती तो शायद इसे मुफ्त में बाँटना मुश्किल होता। सरकारी नौकरी में बंधन तो होता है पर साथ ही यह सुविधा भी होती है कि जनहित में काम करो तो कोई परेशानी नहीं होगी। किसी समस्या के या काम के नये नये तरीके या हल निकालना मुझे अच्छा लगता है। जब कोई हल या नया तरीका सटीक बैठता है तो बहुत अच्छा लगता है। लीनक्स पर हिन्दी लाने में मुझे विशेष खुशी मिली। हाँ पर्याप्त धन व साधन नहीं जुटा पाया कि पूरा लीनक्स ही हिन्दी में हो, इसका मलाल भी रहता है। शायद मैं अगर काम के पैसे लेता तो धन इकठ्ठा कर पाता या किसी वैंचर कैपिटल कंपनी से या साझे में यह कर पाता। एक बार मुझे ऐसा व्यक्ति मिला जिसने मेरी मुफ्त सलाह लेने से इन्कार किया और कहा &#8211; मैं आपकी सलाह पर काम कर के पैसे कमाऊँगा पर यदि आप उसमें से हिस्सा नहीं लेंगे तो मेरे लिये वह चोरी होगी जो मैं नहीं करना चाहता। अत: मैं आपसे सलाह नहीं ले सकता।</p>
<div class="wp-caption alignleft" style="width: 260px"><img title="महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री को मराठी में टंकण के गुर सिखाते हर्ष" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/harsh-kumar-cm.jpg" alt="IT Asia fair at Pragati Maidan, Delhi" width="250" height="228" /><p class="wp-caption-text">महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री को मराठी में टंकण के गुर सिखाते हर्ष</p></div>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>आपकी राय में मंगल जैसे और यूनीकोड हिंदी फॉन्‍ट के विकास व व्यापन में क्‍या समस्‍याएं रही हैं? और इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कार्य क्‍यों नहीं हुआ?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> टीटीएफ फॉन्‍टस बनाना और बात थी तथा यूनीकोड फॉन्‍ट बनाना अलग तरीके का काम है। यदि यूनीकोड या माइक्रोसॉफ्ट की साइट पर जायें और यूनीकोड फॉन्‍ट बनाने के तरीके देखें तो यह आसानी से समझ में आयेगी। और अब तो &#8216;कोडिंग&#8217; का विश्व स्तरीय मानक है। हमें आशा हैं कि कुछ दिन में हिन्दी के बहुत सुन्दर यूनीकोड फॉन्‍ट आने लगेंगे।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>इंटरनेट पर हिन्दी के बढ़ाव को आप कैसे देखते हैं? इस प्रसार को बढ़ाने के लिये और क्या किया जाना चाहिये?</em></p>
<p>हिन्दी का प्रचार बढाने के लिये हम सबको एक परिवर्तन लाना पड़ेगा। वह यह है कि हम भी विदेशियों की तरह अपना अनुभव लिखना शुरू कर दें, अपने-अपने ब्लॉग पर या अन्य माध्यमों से अपनी बात दूसरों तक पहुँचाना शुरू कर दें। भारतवर्ष में अगर अपनी बात सभी तक ले जानी है तो हिन्दी ही माध्यम है, जैसा कि टीवी चैनल समझ चुके हैं।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>आप लिखते भी हैं। साहित्‍य और तकनीक की जुगलबंदी कुछ अनोखी लगती है। तकनीक ने साहित्‍य को प्रेरित किया अथवा साहित्‍य ने तकनीक को?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> दोनों का अपना &#8211; अपना स्थान है। मुझे तो दोनों से प्यार है।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>आपको किस तरह का लेखन पसंद है? अपने लेखन व प्रकाशित रचनाओं के बारे में कुछ बतायें।</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> मैं कविता लिखता हूँ । एक छोटी कोशिश कहानी या लेख की भी की है। मेरे दो कविता संग्रह छप चुके हैं और दो की तैयारी है। मैं इन्हें <a href="http://poemsofharshkumar.blogspot.com" target="_blank">एक ब्लॉग</a> में भी डाल रहा हूँ।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>टीवी के दौर में आज कवि व साहित्यकार स्वयम् को कहाँ खड़ा पाते हैं?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> टीवी तो 2 मिनट नूडल्स की तरह है या यह कहिये कि फास्ट फूड की तरह है। हम उसका स्वाद तो चखते हैं और साथ में पूरा खाना भी खाते हैं। विजुअल मीडिया का अपना स्थान है प्रिंट मिडिया का अपना। दोनों साथ में हैं, एक दूसरे के पूरक हैं।</p>
<p><strong>सामयिकीः</strong><em>अपनी कोई पसंदीदा कविता सुनाना चाहेंगे?</em></p>
<p><strong>हर्षः</strong> यह सबसे मुश्किल सवाल है। मुझे तो सभी अच्छी लगती हैं। हाँ एक कविता एक बहुत अहम विषय पर है &#8211; बालिका भ्रूण हत्या पर। आपको भेज रहा हूँ।</p>
<blockquote><p><strong>बालिका भ्रूणहत्या</strong></p>
<p>देखो तुम ये छोटी बच्ची, है कितनी अच्छी<br />
प्यारी-प्यारी बातें इसकी, हैं कितनी अच्छी।<br />
प्यार करूं कितना भी, कम ही कम लगता है<br />
लाड़ लड़ाऊं जितना, पर मन नहीं भरता है ।</p>
<p>मैं सोचता रहता हूं काम इसे कितने हैं<br />
आने वाला कल इस पर ही निर्भर है ।<br />
नई-नई पीढ़ी को दुनिया में ये ही लाएगी<br />
हम इसको जो देंगे दस गुना उन्हें यह देगी ।</p>
<p>सब सीख उन्हें ये देगी, पालेगी-पोसेगी<br />
तकलीफ अगर होगी, तो रात-रात जागेगी ।<br />
इसके दम से ही, हम दम भरते हैं दुनिया में<br />
इसके दम से ही, तुम दम भरते हो दुनिया में ।</p>
<p>पर दुर्भाग्य हमारा देखो, अकल के कुछ अंधे हैं<br />
दुनिया में आने से पहले ही, जो मार इसे देते हैं ।<br />
वो भी क्या कम हैं, जो तंग इसे करते हैं<br />
दहेज की वेदी पर, जो बलि इसकी देते हैं ।</p>
<p>अगर नहीं यह होगी, तो कल भोर नहीं होगी<br />
यह संसार नहीं होगा, यह सृष्टि नहीं होगी ।<br />
हम भी नहीं होंगे, तुम भी नहीं होगे<br />
विश्वास मुझे है तब वो भी नहीं होगा ।</p>
<p>जिसके दम से हम दम लेते हैं दुनिया में ।<br />
जिसके दम से तुम दम लेते हो दुनिया में<br />
तब वो भी नहीं होगा<br />
तब वो भी नहीं होगा।</p></blockquote>
<p><em>[साक्षात्कार के सवाल जुटाने में मदद के लिये सामयिकी संजय करीर, अतुल जैन, शशि, तरुण व रविशंकर की शुक्रगुज़ार है।]</em></p>
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