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	<title>सामयिकी - हिन्दी वेबपत्रिका &#124; Samayiki - Hindi Webzine &#187; subLead</title>
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	<description>बदलती दुनिया की साक्षी</description>
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		<title>नटाल: माइक्रोसॉफ़्ट  का नया गेमिंग आविष्कार</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2010/01/microsoft-project-natal/</link>
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		<pubDate>Thu, 14 Jan 2010 19:01:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>विनय जैन</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रौद्योगिकी]]></category>
		<category><![CDATA[gaming]]></category>
		<category><![CDATA[microsoft]]></category>
		<category><![CDATA[natal]]></category>
		<category><![CDATA[Nintendo]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>
		<category><![CDATA[Wii]]></category>
		<category><![CDATA[xbox]]></category>

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		<description><![CDATA[अगर आपके विडियो गेम से गेम नियंत्रक या वायरलेस रिमोट कण्ट्रोल हटा दें या फिर ये गेम खेलना मैदान में खेलने जैसा ही बन जाये तो कैसा हो? पढ़ें <b>विनय जैन</b> का आलेख।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="aligncenter" title="Project Natal" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/01/natal_story.jpg" alt="" width="460" height="276" /></p>
<div class=dropCap>वि</div>
<p>डियो गेम! यह सुनकर आपके दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? और जो भी आता हो, अपने हाथ में आपको कुछ न कुछ ज़रूर दिखता होगा। जैसे कि कोई मोबाइल गेमिंग यंत्र, या फिर तारों और बटनों वाला गेम नियंत्रक, या कम से कम एक वायरलेस रिमोट कण्ट्रोल।</p>
<div id="boxR">
<h2>बच्चों का खेल नहीं ये!</h2>
<p>विडियो गेम कोई छोटा-मोटा बाज़ार नहीं है। टेलीग्राफ अखबार की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में पिछले साल लोगों ने फ़िल्मों से ज़्यादा पैसे विडियो गेमों पर खर्च किए। जाहिर है कि ये अब महज़ लड़कपन के खेल नहीं रहे बल्कि मनोरंजन के स्रोतों की मुख्याधारा का हिस्सा बन चुके हैं। इन गेमों के प्रति आम राय यह है कि ये हिंसा को बढ़ावा देते हैं, बेहद बिकने वाले &#8220;कॉल आफ ड्यूटी&#8221; जैसे गेमों की इस कारण काफी निंदा हुई है। जानकार मानते हैं कि निंतेंडो ने यह साबित कर दिखाया है कि छोटे बच्चे, औरतें और उम्रदराज़ भी इन गेमों का मज़ा उठा सकते हैं।</p></div>
<p>भले ही इंटरनेट-पीढ़ी के लिए, जो हाथ में माउस के साथ बड़ी हुई है, यह कोई अजीब या दुविधा वाली बात न हो पर दुनिया के ज्यादातर बाशिंदों के लिए खेल में हाथ का बँधा होना एक झंझट-सा ही है। कुछ सालों पहले निंतेंडो ने सेंसरयुक्त वीमोट (एक तरह का रिमोट नियंत्रक) के जरिए तारों के साथ-साथ बटनों से खिलाड़ियों को आज़ादी दी। निंतेंडो के इस गेमिंग प्लेटफ़ॉर्म वी (Wii) ने क्रांतिकारी रूप से विडियो खेलों को आम ड्राइंग रूमों तक पहुँचा दिया। और खिलाड़ियों को सोफ़े-कुर्सी से उठाकर खड़ा कर दिया।</p>
<p>माइक्रोसॉफ़्ट के खेल वैज्ञानिक अब वहाँ से इसे आगे बढ़ाने की कोशिश में हैं, एक नये, लगभग चमत्कारी, आविष्कार <strong>प्रोजेक्ट नटाल</strong> के साथ।</p>
<p>प्रोजेक्ट नटाल कूटनाम है माइक्रोसॉफ़्ट के एक नये गेमिंग आविष्कार का। इस पर अभी काम चल रहा है। यह माइक्रोसॉफ़्ट के XBoX 360 प्लेटफ़ॉर्म के साथ काम करेगा। एक्सबॉक्स के इस एड-ऑन के जरिये खेलने वाले बिना किसी बाहरी नियंत्रक के खेल और मनोरंजन को नियंत्रित कर सकेंगे। कैसे? अपने शरीर की स्वाभाविक नियंत्रण प्रक्रिया से &#8211; यानी बोलकर या हाथ-पैर हिलाकर।</p>
<p>यह एड-ऑन दरअसल संवेदकों (Sensors) का एक समूह होगा। एक लगभग 9-इंच चौड़ी पट्टी, जिसे आपके टीवी या कम्प्यूटर स्क्रीन के ऊपर या नीचे रखा जा सकेगा, के भीतर एक कैमरा, एक गहराई-संवेदक, और बहु-व्यूही (Multiarray) माइक्रोफ़ोन होंगे। बाक़ी काम सॉफ़्टवेयर करेगा। इसके जरिये पूरे शरीर का त्रिआयामी चित्रण, चेहरे की पहचान, आवाज़ की पहचान आदि संभव होंगे।</p>
<p>चीज़ ऐसी है कि बिना देखे यकीन आना मुश्किल है। इसकी एक झलक नीचे दिये विडियो पर देखें।</p>
<p><center><object classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="500" height="315" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="align" value="center" /><param name="allowFullScreen" value="true" /><param name="allowscriptaccess" value="always" /><param name="src" value="http://www.youtube.com/v/I9tmr8VDqN8&amp;hl=en_US&amp;fs=1&amp;rel=0&amp;color1=0x3a3a3a&amp;color2=0x999999&amp;border=1" /><param name="allowfullscreen" value="true" /><embed type="application/x-shockwave-flash" width="500" height="315" src="http://www.youtube.com/v/I9tmr8VDqN8&amp;hl=en_US&amp;fs=1&amp;rel=0&amp;color1=0x3a3a3a&amp;color2=0x999999&amp;border=1" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" align="center"></embed></object></center></p>
<p>ताज़ा अनुमानों के अनुसार, प्रोजेक्ट नटाल इस साल के नवंबर तक ख़रीदने के लिए उपलब्ध हो जाएगा। इसे वर्तमान एक्सबॉक्स कन्सोलों के साथ जोड़ कर इस्तेमाल किया जा सकेगा।</p>
<p>तो खिलाड़ियो! माउस छोड़िये, उस रिमोट को उधर फेंकिये और अपने हाथ-पैर खोलने को तैयार हो जाइए। और ज़रा एक शाबासी माइक्रोसॉफ़्ट के लिए भी हो जाए (अब ऐसी भी क्या नाराज़गी)। विडियो गेमों की दुनिया में अगली क्रांति का सेहरा उन्हीं के माथे है।</p>
<p class="note">अधिक जानकारी के लिये <a href="http://www.xbox.com/projectnatal" target="_blank">प्रोजेक्ट नटाल की वेबसाइट</a> भी देखें।</p>
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		<item>
		<title>ग्रामीण भारत की बदलती नारी</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/12/sarpanch-sahib-review/</link>
		<comments>http://www.samayiki.com/2009/12/sarpanch-sahib-review/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 28 Dec 2009 16:00:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[Panchayat]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>

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		<description><![CDATA[बीते 20 सालों में कुछ ग्रामीण औरतों ने घर के दायरे से बाहर निकल, पंचायती राजनीति में कदम रख ग्रामीण भारत को बदलने की कोशिश की है। उन्हीं की कथायें है "सरपंच साहिब" में। पढ़िये <b>डॉ सुनील दीपक</b> की समीक्षा।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>&#8220;दीपांजलि बात करती है कि धीरे धीरे पंचायत और पंचायत समिति के पुरुष सदस्य उससे कटते जा रहे हैं, विषेशकर धनुर्जय पटेल जो कि सरकारी नौकरी में हैं, जिसकी वजह से उनके पास बहुत ताकत है। जब किसी बात पर उनके विचार नहीं मिलते तो धनुर्जय पटेल उसका कड़ा विरोध करते हैं। पटेल के अपने विचार हैं, वह कहते हैं &#8211; पुरुष सरपंच बेहतर होते हैं क्योंकि उन्हें मालूम होता कि किस तरह से काम किया जाये। महिला सरपंचों को कुछ अधिक नहीं आता। हमें उन्हें सिखाना पड़ता है। कभी कभी वह चालाकी दिखाती हैं और कैसे काम किया जाये इस बात के निर्देश ही भूल जाती हैं।</p>
<p>&#8230;वह लोग अफवाह फ़ैला रहे हें कि दीपांजलि का नये बीडीओ के साथ चक्कर है, क्योंकि वह उसकी बात सुनता है, औरों की नहीं। उसके पति को मालूम है कि लोग बातें कर रहे हैं। वह कहते हैं कि उसका चक्कर है&#8230;! इस नये शोषण का अर्थ दीपांजलि अच्छी तरह समझती है। उसके घावों में घुसा कर चाकू घुमाने वाली बात है। वह सरपंच है पर साथ ही पत्नी, माँ, स्त्री भी तो है &#8211; शरीर, सेक्स और लिंग।&#8221;</p></blockquote>
<div id="pullQuoteR">गरीब, जन जातिय, दलित परिवारों से आयी बहुत सी महिलाएँ अनगिनत कठिनाईयों के बीच भी सदियों से परम्पराओं की रूढ़ियों में जकड़े ग्रामीण भारत को धीरे धीरे बदल रहीं हैं।</div>
<div class="dropCap">भा</div>
<p>रतीय समाज में नारी के स्थान की बात हो तो अक्सर गार्गी, दुर्गा, शक्ति से ले कर विज्ञान, तकनीकी, शौध, गणिकी जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली युवतियों से हो कर, इंदिरा गाँधी, मायावती जैसी नेताओं के उदाहरण दे कर हम अपना गर्व व्यक्त करते हैं कि भारत ने इस दिशा में कितनी तरक्की की है, कैसे हर क्षेत्र में नारियाँ पुरुषों से कदम से कदम मिला कर बढ़ रही हैं। इस बदलते भारत में जहाँ एक ओर नारी विकास और प्रगति की बात होती है, वहीं दूसरी ओर दहेज के लिए पीड़ित होने वाली या जला दी जाने वाली औरतों की बात भी होती है। <em>अल्ट्रासाउंड </em>जैसी आधुनिक तकनीकों की मदद से होने वाली भ्रूण हत्याओं की बात भी होती है। लेकिन यह सब बातें अधिकांश छोटे बड़े शहरों में रहने वाली औरतों की होती है। भारत के गाँव कितना बदल रहे हैं और गांवों में रहने वाली औरतों की स्थिति क्या है, इस पर बात या तो कम होती है या फिर बिल्कुल नहीं होती।</p>
<p>गाँवों में रहने वाली इन्हीं औरतों की बात करती है 2009 में हार्पर कॉलिंस द्वारा प्रकाशित व मंजिमा भट्टाचार्य द्वारा संपादित पुस्तक &#8220;सरपंच साहिब ‍ चेंजिंग द फेस आफ इंडिया&#8221;। पिछले दो दशकों में कुछ औरतों ने घर के दायरे से बाहर निकल कर पंचायती राजनीति में कदम रखा है और चुनावों में सफलता भी पायी है, और सरपंच बन कर ग्रामीण भारत को बदलने की कोशिश कर रही हैं। उन्हीं औरतों की कुछ जीवन कथाएँ हैं इस किताब में।</p>
<p><img class="size-full wp-image-175 alignleft" style="margin: 8px;" title="sarpanch_sahib" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/12/sarpanch_sahib.jpg" alt="sarpanch_sahib" width="350" height="317" />1993 में भारतीय संसद ने राष्ट्रीय संविधान में 73वाँ सँशोधन किया जिसमें पंचायती राज के लिए चुनावों की बात थी और इन चुनावों में एक तिहाई सीटें स्त्रियों के लिए आरक्षित की गयी थीं। इस बदलाव को &#8220;मौन क्रांति&#8221;, &#8220;हमारे समय का सबसे बड़ा सामाजिक प्रयोग&#8221; और &#8220;जनता के स्तर पर होने वाले जनतंत्र का दुनिया का सबसे बेहतरीन नवप्रयोग&#8221; आदि कहा गया है। इस कानून की वजह से 30 लाख महिलाएँ राजनीति में आयी हैं जिसमें से करीब दस लाख से अधिक महिलाएँ चुनाव में जीत कर पंचायती राज का हिस्सा बनी हैं। दूसरी ओर, इस प्रयोग को &#8220;दिखावा&#8221; भी कहा गया है और आरोप लगाया गया है कि असली ताकत तो पतियों, पिताओं व ससुरों के हाथों में है जिनके हाथों में यह चुनी हुई महिलाएँ केवल कठपुतलियाँ भर होती हैं।</p>
<p>सन 2006-07 की पंचायती राज की स्थिति की रिपोर्ट में पाया गया था कि विभिन्न राज्यों में पंचायत सदस्यों में महिलाओं की संख्या आरक्षित सीटों को पार कर चुकी है, पंचायतो़ में 37 से 54 प्रतिशत सदस्य महिलाएँ हैं। 2008 में लिखी एक अन्य जाँच में पाया गया कि इनमें से अधिकतर महिलाएँ निर्णय लेने के लिए अपने पति या अन्य पुरुषों पर निर्भर नहीं हैं, अपने निर्णय स्वयं लेती हैं। लेकिन इन रिपोर्टों के बारे में जनसामान्य में कुछ न कुछ शंका ही रहती है, न जाने सरकारी जाँच कितना सच बताती हैं और कितना झूठ।</p>
<p>मंजिमा की किताब में ऐसी ही कुछ महिला सरपंचों की कहानियाँ है जिन्हें लिखा है जानी मानी लेखक, पत्रकार या अन्य क्षेत्रों से प्रमुख महिलाओं ने, जिनमें शामिल हैं इंदिरा माया गणेश, तिशानी दोषी, मंजु कपूर, अभिलाषा ओझा, <a href="http://soniafaleiro.blogspot.com/" target="_blank">सोनिया फलेरो</a> और कल्पना शर्मा। यह जीवन कथाएँ उड़ीसा, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, असम, बिहार, कर्नाटक आदि विभिन्न राज्यों में संविधान के 73वें संशोधन के असर की जटिलता को समझने में सहायता करती हैं। साथ ही यह कहानियाँ यह भी बताती हैं कि ग्रामीण सामाजिक बदलाव इतना आसान नहीं है, लेकिन हो सकता है।</p>
<p>तमिलनाडू की चिन्नप्पा की जीवन कथा को तिशानी दोषी ने लिखा है। इस कहानी से महिला सरपंचों की कुछ कठिनाईयों को समझ सकते हैं:</p>
<blockquote><p>&#8220;नम्बर चिन्नप्पा की कमजोरी हैं। अनपढ़ होने की वजह से उसके मन में गणित विषय के लिए भय है। जब ललिता ने उससे पूछा कि पंचायत के बजट में कितने पैसे हैं तो वह बता नहीं पायी, बोली, &#8216;रजिस्टर में लिखा होगा&#8217;। नरसिंहा, पंचायत का कलर्क बताने लगा कि छः लाख रुपये थे बजट में, कितना खर्च हुआ और किस चीज़ पर, और किस बात पर कितना खर्च होगा।</p>
<p>ललिता ने डाँटा कि &#8216;तुम्हें यह सब बातें पता होनी चाहिये। और तुम शीला, तुम्हारा अधिकार है कि तुम इन सब बातों के बारे में पूछो और जानो। तुम जब चाहो इन रजिस्टरों को जाँच सकती हो, क्या तुम्हें समझ नहीं आता?&#8217;</p>
<p>जब वापस चिन्नप्पा के घर की ओर जा रहे थे तो विदा लेने से पहले ललिता हताश हो कर बोली, &#8216;यह बहुत निराशा की बात है। इनको यह जानकारी ही नहीं है। यह कैसे हो सकता है कि यह सरपंच हो कर भी पैसे के बारे में न जाने? यही परेशानी है कि आखिरकार, बड़े फैसले यह अभी भी पुरुषों के हाथ छोड़ देती हैं।&#8217;&#8221;</p></blockquote>
<p>सरपंच होने की क्या ज़म्मेदारी होती है, कैसे काम करना चाहिये, क्या इसकी जानकारी देना आवश्यक नहीं था, इन नये सरपंचों को? कल्पना शर्मा द्वारा लिखी बिहार की वीणा देवी की जीवन कथा में इस प्रश्न का उत्तर मिलता हैः</p>
<blockquote><p>&#8220;क्या राज्य सरकार ने कोई ट्रेनिंग का आयोजन नहीं किया उन महिलाओं के लिए जो ग्राम स्वराज्य की राजनीति में पहली बार चुनी गयी थीं? किया क्यों नहीं, लेकिन दस मिनट की ट्रेनिंग में क्या समझते? उन्हें एक दिन के लिए पटना बुलाया गया था, बस का किराया दिया गया और रजिस्टर में दस्तख्त कराये गये कि वे लोग ट्रेनिंग के लिए आयी थीं। लेकिन हकीकत में उन्हें कुछ सिखाया बताया नहीं गया।&#8221;</p></blockquote>
<p>वीणा को मुखिया के काम बारे में जानकारी मिली एक संवयंसेवी संस्था की सहायता से। उनका साथ दिया पुलिस सुप्रिंटेंडेंट और स्थानीय जिला मजिस्ट्रेट श्रीमति विजय लक्ष्मी नेः</p>
<blockquote><p>&#8220;वह कहती थीं कि जब सब पुरुष बोल  रहे हैं तो किसी महिला को भी बोलना चाहिये। मैं मना कर देती थी, लेकिन वह ज़ोर देती थीं कि मैं कुछ बोलूँ। उन्होंने मुझे सिखाया कि धन दौलत तो कभी तुम्हारे साथ होती है कभी नहीं होती, लेकिन विचारधारा असली चीज़ है। मेरे पास पैसा नहीं है, एक भिखारन, विधवा औरत हूँ लेकिन मैं दो बार चुनाव जीती हूँ, और जिसने एक लाख का खर्चा किया वह नहीं जीत पाया। मैं बस घर घर हाथ जोड़े हुए गयी। तो कौन बड़ा है, पैसा या विचारधारा?&#8221;</p></blockquote>
<p>यह कहानियाँ बताती हैं कि गरीब, जन जातिय, दलित परिवारों से आयी बहुत सी महिलाएँ अनगिनत कठिनाईयों के बीच भी सदियों से परम्पराओं की रूढ़ियों में जकड़े ग्रामीण भारत को धीरे धीरे बदल रहीं हैं। कभी उनकी चेष्ठाएँ सफ़ल होती हैं, कभी असफ़ल। केवल प्रशिक्षण और जानकारी से भ्रष्टाचार और पैशेवर राजनीतिज्ञों के फन्दों को नहीं तोड़ा जा सकता। कई औरतों नें बदलते समाज की हिंसा की कीमत अपनी जान से चुकाई है। लेकिन एक बार यह बदलाव शुरु हुआ है जो किसी नदी की तरह अपना रास्ता निकाल ही लेगा, यही आशा की जा सकती है:</p>
<blockquote><p>&#8220;सिकंदरा के लोगों के पास अपने मुखिया के लिए केवल प्रशंसा के शब्द ही हैं। गाँव के चौक में खड़े हुए तो लोगों नें पक्की सड़क और नालियों की ओर इशारा किया। अब उनके घर पानी से नहीं भरते। मुखिया ने तालाब बनवाया है और नदी से पानी लाने के लिए छोटी सी नहर भी जिससे गाँव में पानी आता है। पहले पानी के लिए दूर जाना पड़ता था। और बिना बिजली के गाँव में अब सूर्य की प्रकाश शक्ति से जलने वाली चार बत्तियाँ लगायी हैं जिससे अँधेरे के बाद सड़कों पर औरतों के लिए चलना आसान हो गया है। दलित बस्ती में भी इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत नये घर बन रहे हैं। गाँव में किसी से कोई शिकायत नहीं सुनने को मिली।&#8221;</p></blockquote>
<p>मैं इस किताब को हर उस भारतीय से पढ़ने को कहुंगा जो यह समझते हैं कि वे भारत को जानते हैं और नये प्रगतिशील भारत का निर्माण कर रहे हैं। उनके मन में उन कंचमाओं और चिन्नप्पाओं के प्रति सम्मान जागेगा जो सुदूर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में, कई बार ऐसे खतरे उठाकर भी जिनसे शायद हम डर जायें, छोटे छोटे बदलाव ला रही हैं।</p>
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		<title>गैस आंदोलन ने दी अपारंपरिक शिक्षा</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/12/bhopal-movement-as-a-school/</link>
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		<pubDate>Wed, 02 Dec 2009 03:30:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>यूरिग स्कैनद्रेत</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[Bhopal]]></category>
		<category><![CDATA[Gas Tragedy]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>
		<category><![CDATA[Union Carbide]]></category>

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		<description><![CDATA[भोपाल गैस त्रासदी के 25 वर्ष पर यूरिग सैनदरेट बता रहे हैं कि किस तरह से गरीब और निरीह जनता ने नित्य प्रति जीवन में दमन के प्रति पहले लचीलापन दिखाया और इसे प्रतिरोध तथा राजनैतिक प्रतिवाद में कैसे बदला।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">पि</div>
<p>छले 25 वर्षों से भोपाल के गैस पीड़ित न्याय के लिए आंदोलनरत हैं। यह आंदोलन अपने आप में विशिष्ट है सिर्फ इस लिए नहीं कि इसमें बहुत से मुद्दों जैसे कि मुआवजा, रोजगार, राशन, पेंशन, स्वास्थ्य सेवा, जल संदूषण तथा वातावरण सुधार को शामिल किया गया है। यह इसलिए भी विशिष्ट है कि इस आंदोलन में प्रमुख तौर पर अल्पशिक्षित गरीब स्त्रियाँ शामिल हैं जो रसायन अभियांत्रिकी, वातावरण प्रदूषण, कानूनी तर्कों तथा चिकित्सा विज्ञान जैसे जटिल मुद्दे उठाए हुए हैं।</p>
<p>द भोपाल सर्वाइवर्स मूवमेंट स्टडी द्वारा इस संघर्ष का दस्तावेजीकरण इस आंदोलन के उत्तरजीवित-कार्यकर्ताओं तथा उनके समर्थकों के साक्षात्कारों के जरिए किया जा रहा है। इस शोध की एक बड़ी मंशा यह भी है कि इस बात की पड़ताल की जाए कि अति अल्प शिक्षित जनता ने इस संघर्ष में किस तरह जुड़ना सीखा।</p>
<div id="pullQuoteR">यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री शहर के उत्तरी दिशा में था। गैस त्रासदी का एक बड़ा प्रभाव गरीब, दिहाड़ी कामगारों तथा अत्यल्प शिक्षित लोगों पर पड़ा था।</div>
<p>1984 में जब गैस त्रासदी हुई, साक्षरता अत्यंत निम्न थी। 1981 की जनगणना के हिसाब से मध्यप्रदेश की साक्षरता 34% थी जिसमें महिलाओं की साक्षरता मात्र 19% थी। यहाँ तक कि स्कूल जाने वाली महिलाओं की सामाजिक रूढ़िवादिता उनके शिक्षा के स्तर पर सीमित थी। भोपाल एक अत्यंत तीव्रगति से फैलता शहर था जिसमें मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन का दर अपेक्षाकृत ऊँचा था। यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री शहर के उत्तरी दिशा में था। गैस त्रासदी का एक बड़ा प्रभाव गरीब, दिहाड़ी कामगारों तथा अत्यल्प शिक्षित लोगों पर पड़ा था।</p>
<p>त्रासदी के समय की अपनी अज्ञानता का बयान बहुत से उत्तरजीवित कार्यकर्ता करते हैं। ट्रेड यूनियन भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन की शुरूआती कार्यकर्ता रेहाना बेगम जिसने त्रासदी से पहले अपनी स्कूली शिक्षा पूर्ण कर ली थी, शिक्षा के भिन्न स्तरों के उत्तरजीवितों के दृष्टिकोण को कुछ इस तरह से बयान करती हैं:</p>
<blockquote><p>“हमें यूनियन, राज्य या फिर राज्य के मुख्यमंत्री इत्यादि की अवधारणा के बारे में कुछ भी नहीं पता था… आमतौर पर हम मुसलमान घरेलू महिलाएँ थीं, जिनके पास बातचीत या प्रचार या किसी भी अन्य बातों का कोई भान ही नहीं था।”</p></blockquote>
<p>बहुत सी ऐसी महिलाएं जो अल्प शिक्षित हैं या अशिक्षित हैं उनकी कहानियाँ बड़ी प्रभावशाली रही हैं जिन्होंने राज्य तथा मल्टीनेशनल कार्पोरेशन के सामने अपनी बातें रखनी सीखीं।</p>
<p>संघर्ष के समय सीखने की पहली तथा संभवत: प्रमुख बात जेम्स सी स्काट ने बताया है &#8211; “कमजोर का शस्त्र” &#8211; उत्पीड़न को दिन पर दिन लचीला रुख बनाकर सह लेना। राबिया बी बताती हैं कि कैसे उन्होंने खुद सीखा और अपने साथी कामगारों को सिखाया कि आर्थिक पुनर्वास के लिए बनाए गए स्वावलंबन ड्रेस निर्माण केंद्रों में फैले भ्रष्टाचार से कैसे फायदा उठाया जाए:</p>
<blockquote><p>“केंद्र का पूरा तंत्र भ्रष्ट था। शीर्ष क्रम के लोग हर तरफ से पैसा बना रहे थे। वे हर स्तर से कमीशन पा रहे थे। जब भी सामानों के लिए टेंडर होते थे तो अराजकता मचती थी, लोगों को बटन जैसे छोटी से छोटी चीज पर भी कमीशन हासिल होती थी। तो मैंने वहाँ काम कर रही महिलाओं के लिए अतिरिक्त कमाई के तरीके जुगाड़े। मैंने उन्हें बताया कि वे किस तरह से अतिरिक्त आय के लिए कपड़े के चिंदों की बचत कर सकती हैं। उस समय ढेरों घोटाले होते थे &#8211; केंद्र के लिए जारी कपड़े के थान रास्ते में ही चोरी हो जाते थे। जब ऊपर बैठे सभी लोग पैसा बना रहे थे तो फिर हम भी क्यों न कुछ पैसे बना लें?”</p></blockquote>
<p>परंतु रोज का यह लचीलापन शोषण के मुकाबले पूरी तरह अपर्याप्त था। लचीलापन अंतत: प्रतिरोध में परिवर्तित होता चला गया। राजनैतिक विरोध के लिए कौशल और रणनीति को सामान्य ज्ञान, ट्रायल एंड एरर, दोस्ताना सलाह, भरोसेमंद समर्थकों के मार्गदर्शन और थोड़ी सी अक्लमंदी से प्राप्त किया गया।</p>
<p>हमीदा बी, जिसकी शादी 11 वर्ष की उम्र में ही कर दी गई थी, और जो 14 वर्ष की उम्र में मां बन गई थी, पारंपरिक रूप से अत्यल्प शिक्षित थी। परंतु भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन में उनकी अपनी सक्रियता के चलते उनके लिए ज्ञान के अनेक कपाट खुलते गए। वे जोर देती हैं -</p>
<blockquote><p>“हम अपनी बैठकों में स्त्रियों के अधिकारों से जुड़ी समस्याओं जैसे कि दहेज प्रथा, उत्पीड़न इत्यादि मुद्दे उठाते थे। हमने अन्य आंदोलन जैसे कि नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) का भी समर्थन किया है। शंकर गुहा नियोगी के भिलाई आंदोलन को बीजीपीएमयूएस से समर्थन मिला”</p></blockquote>
<p>कुछ समूहों के लिए आंदोलन में सीखना एक तरह से अंतरराष्ट्रीय आंदोलनों के संपर्क में जुड़ना रहा है। भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी यूनियन की रशीदा बी अंतरराष्ट्रीय समूहों जैसे कि ग्रीनपीस के साथ काम कर चुकी हैं। वे कहती हैं:</p>
<blockquote><p>“यूनियन कार्बाइड की दीवार के आसपास बहुत से लोग थे जो बीमार हो गए थे। वे क्यों बीमार हो रहे थे? 1999 की रपट के बाद यह साबित हो गया कि पानी संदूषित है। जल संदूषण के बारे में सुन सुनकर इतने वर्षों में जो मैंने जाना और सीखा उससे मैंने पाया कि यह तो दुनिया को बचाने जैसा काम है। मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि जो संदूषण फैलाते हैं, कानूनन उन्हें इसका मुआवजा देना ही चाहिए।”</p></blockquote>
<p>अनौपचारिक शिक्षा संकीर्ण नहीं है। यह सिर्फ संघर्ष के लिए लागू नहीं है, और न ही इस बात के लिए कि इसके लिए क्या सर्वोत्तम है, बल्कि इस लिए भी कि अन्य मुद्दे भी उत्तरजीवितों के मन में हैं। हमारे साक्षात्कारों से कुछ दिलचस्प बहसें उजागर हुईं। हिन्दू और मुसलिम दोनों ही अपने धार्मिक कर्मकाण्डों को नए सिरे से पारिभाषित करते नजर आए जिसमें दमनकारी तत्वों को नकारने का भाव रहा था।</p>
<p>उदाहरण के लिए राबिया बी बुरका पहनने की प्रथा की आलोचना कुछ इस तरह करती हैं:</p>
<blockquote><p>“मैं संगठन में बुरका पहनकर ही पहली मर्तबा शामिल हुई क्योंकि मेरे पति एक मौलवी थे, और मैं बहुत ही रूढ़िवादी परिवार से थी। जल्द ही मैंने बुरका पहनना छोड़ दिया क्योंकि समाज में बुरकानशीं औरतों को बहुत ही निम्न नजरों से देखा जाता है। उन्हें मूर्ख, अनपढ़ और अशिष्ट माना जाता है। जब हम बुरका पहनकर शासकीय कार्यालयों में जाते थे तो अफसर हमसे बहुत ही बुरी तरह से पेश आते थे। जबकि साड़ी पहन कर जाने पर वे सम्मान पूर्वक व्यवहार करते थे। यह कोई सांप्रदायिक बात नहीं है, बल्कि यह सामाजिक अनुकूलन जैसा है।”</p></blockquote>
<p>आईसीजेबी की हाजरा बी धार्मिक प्रथा के पीछे इन नवसुधार पर विचार करती हैं:</p>
<blockquote><p>“बुरका का उद्देश्य है पर्दा। किसी औरत के लिए जो बुरका ओढ़ती है, उसके लिए बुरका एक पर्दा है। बुरका का अर्थ ये है कि चेहरे पर घूँघट डाल लिया जाए जिसे अपरिचित पुरुषों के सामने नहीं उठाया जाए। इस संसार में हर किस्म की पर्दा प्रथा है और कई मुश्किल परिस्थितियों में पर्दानशीं महिलाओं को बेहद कठिनाई का सामना करना पड़ता है। बहुत सी महिलाएँ कामगार हैं जो सिलाई, कढ़ाई, बुनाई का काम करती हैं या दिहाड़ी काम करती हैं या घरों में झाड़ू-बर्तन-पोंछा का काम करती हैं। वो अपने घर से बुरके में निकलती है, काम पर बुरका फेंक निकालती है, और जब वो अपना काम खत्म कर फिर वापस घर के लिए निकलती है तो बुरका ओढ़ लेती है।</p>
<p>तो मुझे लगता है कि यदि कोई महिला अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है, या वो अपने परिवार का भरण पोषण करती है या वो अपने बच्चों की देखभाल करती होती है तो उसे बुरका पहनने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। जब वो कमाने धमाने के लिए बाहर निकलती है तो फिर बुरके का प्रश्न ही पैदा नहीं होना चाहिए। मुझे इस तरह के बुरके में कोई विश्वास नहीं है। बुरका या पर्दा वहीं ठीक है जहाँ औरत अपने पति पर निर्भर है और घर की चारदीवारी के भीतर होती है।”</p></blockquote>
<p>कार्यकर्ता जिस तरीके से राजनैतिक संघर्ष में शामिल होकर अपारंपरिक शिक्षा प्राप्त करते हैं, वह हम सब के लिए, जो कि पेशेवराना जिम्मेदारियों में पारंपरिक शिक्षित होते हैं, एक महत्वपूर्ण पाठ है। उनके संघर्ष को समर्थन देने के लिए शैक्षणिक ज्ञान व प्रशिक्षण लाने के लिए सामाजिक आंदोलनों में जुटने के लिए पारंपरिक बुद्धिजीवियों के लिए भूमिकाएँ हैं।</p>
<div id="pullQuoteR">अंग्रेज़ों के समय बुद्धिजीवी महत्वपूर्ण पदों पर होने के कारण स्वतंत्रता आंदोलन के खिलाफ थे। ऐसा ही फ्रांसीसी व रूसी क्रांति के समय हुआ था। बुद्धिजीवी हमेशा शासकों का साथ देते हैं।</div>
<p>हालांकि राबिया बी चेताती हैं,</p>
<blockquote><p>“मैंने जाना है कि अनपढ़ व्यक्ति किसी शिक्षित व्यक्ति के मुकाबले बड़ा खतरा है। शिक्षित सोचते हैं कि वे अपनी विद्वता का प्रयोग दूसरों को उल्लू बनाने में कर सकते हैं।”</p></blockquote>
<p>अब्दुल जब्बार के लिए, पारंपरिक रूप से शिक्षित लोगों से सीखने में बड़ा जोखिम है।</p>
<blockquote><p>“आंदोलन के प्रथम 10 वर्षों में ऐसा लगा था कि नर्मदा बचाओ आंदोलन के तर्ज पर सक्रिय बुद्धिजीवियों को जोड़ा जाना उत्तम विचार है। पर अब ऐसे लोग भोपाल गैस आंदोलन को नकार रहे हैं और वे इसे उपद्रव के रूप में देखने लगे हैं। उनमें इसके संघर्ष का माद्दा ही नहीं है। मुझे लगता है कि वे एक आम आदमी की समस्या से जुड़ नहीं पा रहे चूंकि उनका अनुभव पूरी तरह से किताबी है&#8230;अंग्रेज़ों के राज में आमतौर पर बुद्धिजीवी सिस्टम में महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थ थे और वे स्वतंत्रता आंदोलन की राह में प्रमुख रोड़े थे। ठीक ऐसा ही फ्रांसीसी क्रांति और रूसी क्रांति के समय हुआ था। बुद्धिजीवी हमेशा शासकों का साथ देते हैं। तो मैं यह कह सकता हूं कि अशिक्षित जनता जिसके पास ‘साहित्यिक’ ज्ञान नहीं होता, वही शिक्षित जनता की अपेक्षा ज्यादा न्याय ला सकती है।</p>
<p>मैंने यह महत्वपूर्ण बात अपने गुरु शंकर गुहा नियोगी (छत्तीसगढ़ के भिलाई संगठन आंदोलन के नेता जिसकी हत्या कर दी गई थी) से सीखी थी। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि विश्व की सभी बड़ी समस्याएँ शिक्षित वर्गों द्वारा ही सृजित हैं।”</p></blockquote>
<p class="note"><a href="http://infochangeindia.org" target="_blank">इंफोचेंज इंडिया</a> से पूर्वानुमति से प्रकाशित। हिन्दी अनुवाद के लिये <a href="http://raviratlami.blogspot.com" target="_blank">रवि रतलामी जी</a> का शुक्रिया! यह आलेख प्रकाशित होने वाली पुस्तक &#8211; <em>भोपाल सर्वाइवर्स स्पीक : इमर्जेंट वाइसेस फ्रॉम ए पीपुल्स मूवमेंट</em> के अंश हैं।</p>
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