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	<title>सामयिकी - हिन्दी वेबपत्रिका &#124; Samayiki - Hindi Webzine &#187; subLead</title>
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	<description>बदलती दुनिया की साक्षी</description>
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		<title>हिन्दी फ़िल्मों में बस पैसों के लिये काम किया</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2011/04/aparna-sen-interview/</link>
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		<pubDate>Wed, 13 Apr 2011 07:52:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातचीत]]></category>
		<category><![CDATA[Bengali]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>

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		<description><![CDATA[फ्लोरेंस के "रिवर टू रिवर फिल्म फेस्टिवल" में डॉ सुनील दीपक को लड़कपन से पसंद अभिनेत्री से रूबरू होने का मौका मिला]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2011/04/aparna_sen_story.jpg" alt="Aparna Sen" width="610" height="180" /></p>
<div id="section-teaser">एक अभिनेत्री के रूप में मुझे लड़कपन से ही अपर्णा सेन बहुत अच्छी लगती थीं और विगत दिसम्बर में, फ्लोरेंस के &#8220;रिवर टू रिवर फिल्म फेस्टिवल&#8221; में मुझे इस प्रसिद्ध अभिनेत्री तथा निर्देशक से रूबरू होने का मौका मिला। समारोह में उनकी दो फ़िल्मों को सम्मान मिल रहा था। उनकी नयी बांग्ला फ़िल्म &#8220;इति मृणालिनी&#8221; से फ़िल्म फेस्टिवल का उद्घाटन हुआ और उनकी 2010 की सुन्दर कविता जैसी बिना कहे ही बहुत कुछ कहने वाली अंग्रेज़ी फ़िल्म &#8220;द जेवेनीज़ वाईफ़&#8221; से फेस्टिवल का समापन हुआ। दोनों फ़िल्मों को दर्शकों और आलोचकों से बहुत प्रशंसा मिली, हालाँकि अपर्णा जी के लिए प्रशंसा कोई नयी बात नहीं, करीब तीस साल पहले बनी उनकी निर्देशित पहली फ़िल्म, 36 चौरंगी लेन को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था और फ़िल्म में जेनिफ़र कैंडल के मर्मस्पर्शी अभिनय को आज तक भूलाना कठिन है। प्रस्तुत है फ़िल्म फेस्टिवल के आयोजन स्थल, फ़्लोरेंस के सौ साल से भी अधिक पुराने ओडियन सिनेमा हाल, के नज़दीक स्थित एक कैफे में की गयी बातचीत के अंश।</div>
<p><strong>सुनीलः </strong>मुझे विश्वास नहीं होता कि मैं आप के सामने बैठा बात कर रहा हूँ। आप को पहली बार मेरे विचार में अंग्रेज़ी फ़िल्म &#8220;द गुरु&#8221; में 1970 में देखा था।</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> &#8220;द गुरु&#8221; 1970 की नहीं थी, बहुत बाद की थी &#8230; नहीं, शायद आप ठीक कह रहे हैं, 1970 के आसपास की ही थी।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong> हाँ, मेरे विचार में 1970 की ही बात है। मुझे याद है कि दिल्ली के रिवोली सिनेमा हाल में देखने गया था। खैर यह तो पुरानी बात है। आज मैं आप से कुछ ऐसे प्रश्न करना चाहूँगा जिनके बारे में कम लिखा गया हो या जिन्हें कम लोग जानते हों। तो बात शुरु करना चाहूँगा आप के बचपन से। आप के पिता जाने माने फ़िल्म आलोचक थे, ऐसे वातावरण में बड़े होने का आप पर क्या प्रभाव पड़ा?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> फ़िल्म आलोचक होने के अतिरिक्त, मेरे माता पिता कलकत्ता फ़िल्म सोसाईटी को बनाने वाले सदस्यों में शुमार थे। इसका असर यह हुआ कि बचपन से ही मुझे दुनिया भर से बढ़िया सिनेमा देखने का मौका मिला। मेरी फ़िल्मों की दिलचस्पी और पसंद तभी बनी। रूसी फ़िल्में जैसे कि &#8220;बेटलशिप पोटेमकिन&#8221;, &#8220;ईवान द टेरिबल&#8221;, या फ्राँससी फ़िल्म &#8220;पैशन आफ़ जोन द आर्क&#8221; मैंने तभी देखीं। इस तरह की फ़िल्में देखते हुए मैं बड़ी हुई।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>अच्छा, मैंने कहीं पढ़ा था कि आप ने दस वर्ष की आयु में पहली बार फ़िल्म में अभिनय किया?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> यह गलत है, मैंने दस साल की उम्र में किसी फ़िल्म में काम नहीं किया।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>यानि 1961 की सत्यजित राय की फ़िल्म &#8220;तीन कन्या&#8221; ही आप की पहली फ़िल्म थी? तब क्या आप को समझ थी कि आप इतने महान फिल्मकार के साथ काम कर रही हैं?</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>बिल्कुल पूरी समझ तो नहीं थी, मुझे मालूम था कि वह बड़े निर्देशक हैं, लेकिन मेरी दृष्टि में वह फ़िल्म निर्देशक से अधिक मेरे पिता के पुराने मित्र थे। मुझे वह कहानी, रवींद्रनाथ टैगौर की &#8220;स्माप्ति&#8221; बहुत अच्छी लगी थी, मैंने उस कहानी को उन्हीं दिनो पढ़ा था, तो कहानी की मृणमयी का किरदार निभाना मुझे बहुत अच्छा लगा। उस फ़िल्म में काम करने के दिन बहुत मज़ेदार थे, लगता था कि पिकनिक हो रही हो। न स्कूल जाना पड़ता या इम्तिहान की चिंता करनी पड़ती। बहुत आनन्द आया।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>जब वह फ़िल्म आयी तो आप सोलह साल की थीं, फ़िल्म की शूटिंग के बाद वापस स्कूल जाना कैसा लगा? क्या आप उस समय प्रसिद्ध हो चुकीं थीं?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> फ़िल्म के बाद स्कूल जाना बहुत बुरा लगा। इतने मजे के दिनों के बाद स्कूल की पढ़ाई करना कठिन था, फ़िर साथ पढ़ने वाली साथियों ने भी मेरा मज़ाक उड़ाया, ताने कसे&#8230;टिप्पणियाँ की। मेरी कुछ परीक्षायें छूट भी गईं, बस दो तीन विषय के इम्तिहान ही दे पायी। मैं उस समय अंग्रेजी, इतिहास जैसे विषयों में बहुत तेज़ थी और यह इम्तिहान भी अच्छे हुए। मेरे विचार में मैं इन विषयों में अव्वल आयी, लेकिन अन्य विषयों में इम्तिहान नहीं दिये थे तो कक्षा में बाकी साथियों से काफ़ी पीछे थी। तब हमारे स्कूल में सब विद्यार्थियों की सभा में सबके परिणाम पढ़े जाते थे, जब मेरी बारी आयी तो हमारी प्रिंसिपल ने कुछ ताना कसा कि &#8220;हमें पढ़ाई से अधिक अभिनय में दिलचस्पी है&#8221;। मुझे बहुत बुरा लगा, रो भी पड़ी।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>आप ने अपने बचपन का कुछ हिस्सा हज़ारीबाग में बिताया, उसके बारे में कुछ बताईये।</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>मेरे दादा जी वहाँ रहते थे। वह ब्रह्मसमाजी थे, उनकी वहाँ चैरिटेबल डिस्पैंसरी थी जो मुझे बहुत दिलचस्प लगती थी। उनका घर बहुत सुन्दर था, सीधा सादा पर बहुत सुन्दर। हम लोग छुट्टियों में वहाँ जाते थे। हमारी सभी छुट्टियाँ हज़ारीबाग में ही निकलती थीं, विशेषकर सर्दियों की छुट्टियाँ। उस समय की यादें बहुत मुझे प्रिय हैं।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>आप ने अनेक फ़िल्मों में काम किया है। क्या कोई भूमिकायें ऐसी भी थीं, जो आप को अच्छे नहीं लगी या जिन्हें आप अपने आप से बिल्कुल भिन्न महसूस करती थीं?</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>जब अभिनय का क्षेत्र चुना हो काम के लिए तो कई बार ऐसी फ़िल्मों में भी काम करना पड़ता है जो कि आप को पसंद न हों, पर पैसा कमाना है तो करना ही पड़ेगा। मैंने बांग्ला में एक फ़िल्म की &#8220;अभिचार&#8221;, जो मैं नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैंने उनसे बहुत पैसा माँगा, लेकिन वह मान गये और वह फ़िल्म मुझे करनी पड़ी। लेकिन उसे करते हुए मुझे वह बिल्कुल पसंद नहीं थी, बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। उसके निर्देशक थे बिस्वजीत चौधरी।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>आप का अर्थ है अभिनेता बिस्वजीत, आज के अभिनेता प्रसेनजीत के पिता?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> हाँ, वही थे निर्देशक उस फ़िल्म के।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> आप की माँ के परिवार में एक बहुत प्रसिद्ध कवि हैं&#8230;</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> हाँ, जीवानन्दा दास।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> क्या आप ने भी कभी कविता लिखी?</p>
<p><strong>अपर्णाः</strong> नहीं। यानि जैसे छोटी उम्र में सभी कुछ कविता लिखते हैं, वैसे ही मैंने भी लिखीं, लेकिन उनमें कुछ महत्वपूर्ण नहीं था। जबकि जीवानन्दा दास जी, टेगौर के बाद के बांग्ला के बड़े कवियों में गिने जाते हैं, वह मेरी माँ के दूर के कज़न भाई थे। वह मेरे माता पिता के बहुत करीब भी थे।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> क्या आप की माँ भी लिखती थीं?</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>हाँ मेरी माँ सुप्रिया दासगुप्ता कहानियाँ लिखती थीं।</p>
<p><strong>सुनीलः </strong>क्या आप को लगता है कि आप को हिन्दी सिनेमा में अधिक सफ़लता नहीं मिली?</p>
<p><strong>अपर्णाः </strong>(मुस्कराते हुए) मैंने हिन्दी सिनेमा में बहुत कोशिश भी नहीं की, शायद क्योंकि मेरा मन बंगाल में था। जितनी भी हिन्दी फ़िल्में मैंने की, सब गलत कारणों से। कभी टेक्स की किश्त भरनी होती थी या नयी गाड़ी खरीदनी थी, बस इस तरह के कारणों से मैंने हिन्दी फ़िल्में चुनी। ठीक वजह से कोई हिन्दी फ़िल्म नहीं की मैंने।</p>
<p><strong>सुनीलः</strong> इस बातचीत के धन्यवाद अपर्णा जी।</p>
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		<title>रॉकमेल्ट ब्राउज़र : फ़ेसबुकिया वेब की पराकाष्ठा?</title>
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		<comments>http://www.samayiki.com/2011/01/rockmelt-browser/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 18 Jan 2011 23:05:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[अंतर्जाल]]></category>
		<category><![CDATA[Browser]]></category>
		<category><![CDATA[Chrome]]></category>
		<category><![CDATA[Facebook]]></category>
		<category><![CDATA[Rockmelt]]></category>
		<category><![CDATA[Social]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>

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		<description><![CDATA[सोशियल ब्राउज़र की शुरूआत मोजिल्ला आधारित फ्लॉक ब्राउज़र से हुई थी जिसमें ब्राउज़र में ही ब्लॉगिंग की तमाम सुविधाएँ मौजूद थी। सामयिकी संपादक रविशंकर श्रीवास्तव मानते हैं कि रॉकमेल्ट ब्राउज़र उससे भी एक कदम आगे है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2011/01/rockmelt.jpg" alt="Rockmelt Social Browser" width="610" height="243" /></p>
<div class="dropCap">ल</div>
<p>गता है जैसे कि पूरा का पूरा इंटरनेट फ़ेसबुक-मय हो गया हो। सालेक भर पहले दुनिया गूगल-गूगल और ओरकुट-ओरकुट कहते पगलाती थी और साल बीतते न बीतते इंटरनेटिय जनसंख्या पूरी फ़ेसबुकिया गई सी लगती है। और, कोढ़ में खाज यह कि अब तो ब्राउज़र भी फेसबुक-मय हो गया है!</p>
<p>रॉकमेल्ट एक ऐसा नया, ताज़ा, बीटा स्वरूप में जारी किया गया ब्राउज़र है जिसे सोशियल ब्राउज़र श्रेणी में रखा गया है। सामाजिक ब्राउज़र की शुरूआत मोजिल्ला आधारित फ्लॉक ब्राउज़र से हुई थी जिसमें ब्राउज़र में ही ब्लॉगिंग की तमाम सुविधाएँ मौजूद थी। रॉकमेल्ट ब्राउज़र एक कदम आगे है। यह गूगल क्रोम ब्राउज़र के आधार पर बनाया गया है, और – जी, हाँ, आपने ठीक समझा – इसमें फ़ेसबुक को सम्मिलित कर दिया गया है।</p>
<p>रॉकमेल्ट अभी बीटा संस्करण में  जारी किया गया है, परंतु इसे सार्वजनिक प्रयोग के लिए जारी नहीं किया गया है। आपको याद होगा, जब गूगल ने अपना जीमेल जारी किया था तो निमंत्रण के जरिए खाता खोलने का विकल्प दिया गया था। इसी तरह से रॉकमेल्ट का प्रयोग करने के लिए भी आपको एक अदद निमंत्रण की आवश्यकता होगी – जिसके जरिए आप रॉकमेल्ट का इंस्टालर डाउनलोड कर सकेंगे और इसका प्रयोग कर सकेंगे।</p>
<p><img class="alignright" style="margin: 20px;" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2011/01/rockmelt_logo.jpg" alt="Rockmelt Logo" width="180" height="190" />जब आप रॉकमेल्ट का इंस्टालर चलाते हैं, तो पहले पहल चालू होने से पहले रॉकमेल्ट आपके फेसबुक खाते से जुड़ने के लिए कहता है। यदि नहीं जुड़े हैं तो आपको एक फेसबुक खाता खोलने  के लिए कहता है। है न किसी ब्राउज़र की फेसबुकिया इंतिहा?</p>
<p>रॉकमेल्ट को इंटरनेटी इतिहास के सबसे पुराने और प्रसिद्ध ब्राउजरों में से एक नेटस्केप नेविगेटर के निर्माता मार्क एंड्रीसन का समर्थन हासिल है। और रॉकमेल्ट के डेवलपरों में से एक, टिम होव्स का कहना है कि पिछले वर्षों में 50 करोड़ प्रयोक्ताओं ने अपने ब्राउज़र बदले। तो, यदि आप बेहतर उत्पाद देंगे तो लोग अपनी आदतें – यानी ब्राउज़र बदलने में देरी नहीं करेंगे। यानी इसके डेवलपर मुतमईन हैं कि रॉकमेल्ट जारी होते ही एक बड़ा प्रयोक्ता वर्ग खींचने में कामयाब होगा – और क्यों न हो – इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या के लिहाज से फेसबुक पहले ही अमरीका में गूगल को पछाड़ कर पहले नंबर पर कब्जा जो कर चुका है।</p>
<h2>नया क्या है रॉकमेल्ट ब्राउज़र में?</h2>
<p>रॉकमेल्ट चालू करते समय आपको अनिवार्य रूप से फेसबुक और वैकल्पिक रूप से ट्विटर खाते में  लॉगइन करना पड़ता है। जैसे ही आप फ़ेसबुक में लॉगिन करते हैं, रॉकमेल्ट सामाजिक ब्राउज़र का विशिष्ट रूप से डिजाइन किया विंडो खुल जाता है जहाँ आप पारंपरिक ब्राउज़र की जगह रंगबिरंगा, फ़ेसबुकिया ब्राउज़र पाते हैं।</p>
<p>रॉकमेल्ट के दाएँ बाजू पट्टी में आपके फेसबुकिया मित्र मंडली  कब्जा जमाए मिलेंगे, और उनका स्टेटस वहाँ बदस्तूर दिखता रहेगा कि वे लॉगिन हैं या नहीं और वे फेसबुक में क्या कारस्तानियाँ करते फिर रहे हैं। उनकी कारस्तानियों की लाइव स्टेटस रिपोर्ट आपको वहाँ से मिलती रहेगी। जब भी आपका कोई फेसबुकिया मित्र कोई स्टेटस मैसेज देता है अथवा अपने या किसी दोस्त के वाल पर पोस्ट करता है अथवा कोई चित्र लोड करता है, वो तमाम चीजें पॉपअप के रूप में रॉकमेल्ट आपके सामने प्रस्तुत करता रहता है। आप चाहें तो रॉकमेल्ट को फ़ेसबुक में अपने मित्र-मंडली की खोजबीन के लिए भी बढ़िया तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं। रॉकमेल्ट में सर्च को ज्यादा आकर्षक, ज्यादा रेलेवेंट और ज्यादा तेज बनाया गया है – जैसे कि आप किसी पत्रिका के पन्ने पलट रहे हों। हिंदी में रचनाकार के लिए सर्च किया गया तो परिणाम बेहद सटीक तो रहे ही, फ़ालतू की चीजें भी नहीं दिखीं।</p>
<p>वैसे तो बहुतों का मानना है कि रॉकमेल्ट को फेसबुक के लिए ही विशेष रूप से डिजाइन किया गया है। मगर ऐसा भी नहीं है कि रॉकमेल्ट सिर्फ फेसबुक के भरोसे जिंदा है या रहेगा। इसमें बहुत सी दूसरी सुविधाएँ भी जोड़ी जा रही हैं जो आपके ऑनलाइन सोशल नेटवर्क को ज्यादा जीवंत बनाने की क्षमता रखती हैं। उदाहरणार्थ, रॉकमेल्ट का आरएसएस फ़ीड पाठक आपको लाइव फ़ीड पठन की सुविधा ब्राउज़र के भीतर ही देता है। आपके पसंदीदा फ़ीड के इंटरनेट पर प्रकाशित होने की सूचना प्राप्त होते ही रॉकमेल्ट आपको उसे प्रस्तुत कर देता है।</p>
<h2>भविष्य का ब्राउज़र?</h2>
<p>सवाल ये है कि क्या रॉकमेल्ट को भविष्य का ब्राउज़र कह सकते हैं? फ़ायरफ़ॉक्स में जब एक्सटेंशन और एडऑन जैसी नई विशिष्टताओं को लाया गया था तब उसे भी भविष्य का ब्राउज़र कहा गया था। पर अब सभी जानते हैं कि फ़ायरफ़ॉक्स भारी भरकम हो गया है और उसके नए संस्करणों में पुराने एक्सटेंशनों के समर्थन की समस्या और तमाम दीगर असुविधाओं के चलते प्रयोक्ता उसका दामन छोड़ क्रोम व ऑपेरा ब्राउज़र की ओर बढ़ने लगे हैं।</p>
<div id="pullQuoteL">रॉकमेल्ट में अंतर्निर्मित सोशल नेटवर्किंग सुविधाओं के नेपथ्य में गूगल क्रोम ब्राउज़र का ठोस आधार भी है।</div>
<p>रॉकमेल्ट अपने अंतर्निर्मित सोशल नेटवर्किंग सुविधाओं के साथ नया क्या दे रहा है जो इसे विशिष्ट  बनाता है जबकि अन्य दूसरे सभी ब्राउज़रों में ब्राउजर एडऑन और प्लगइन के जरिए ऐसी सुविधाएँ बखूबी प्राप्त की जा सकती हैं?</p>
<p>इस सवाल का सही जवाब तो यही होगा कि यह तो समय ही बताएगा कि प्रयोक्ता रॉकमेल्ट को हाथों हाथ लेते हैं या नहीं। मगर यह अपने बीटा स्वरूप में खास  निमंत्रण मिलने पर इंस्टाल हो सकने की सीमितता के उपरांत भी इंटरनेट पर कुछ हलचल मचाने की शक्ति दिखा रहा है तो कहा जा सकता है कि इस नए विचार युक्त ब्राउज़र में कुछ बात तो है। और, रॉकमेल्ट के नीचे ठोस गूगल क्रोम ब्राउज़र का आधार तो वैसे भी है।</p>
<p>कुल मिलाकर, फेसबुक के निवासी जिनका खाना-पीना-उठना-बैठना फेसबुक में ही होता है, रॉकमेल्ट का दिली तौर पर स्वागत करेंगे यह तो तय है। मगर रॉकमेल्ट के आधे घंटे के प्रयोग के दौरान मेरे 500 से अधिक फेसबुक-मित्रों के संदेश, स्टेटस रपट, वाल-पोस्टें, चित्र अपलोड करने की खबर और न जाने क्या-क्या हर दूसरे क्षण पॉप अप के रूप में ब्राउज़र के दाएँ निचले कोने में प्रकट होते रहे जो मुझे भारी डिस्टर्ब करते रहे। इस लिहाज से मैं तो रॉकमेल्ट के बगैर ही ठीक हूं – मुझे तो पारंपरिक, सादा ब्राउज़र ही सुहाएगा। पर यदि आप फेसबुक के गंभीर प्रयोक्ता हैं, फ़ार्मविले में आपका बहुत सा वक्त बढ़िया गुजरता है, तब तो रॉकमेल्ट आपके लिए सचमुच रॉकिंग है! आपका क्या कहना है?</p>
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		<title>फेसबुक और एमएस आफिस बने दोस्त</title>
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		<pubDate>Wed, 24 Nov 2010 23:08:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
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		<description><![CDATA[डॉक्स.कॉम एमएस ऑफ़िस सूट 2010 के तहत उपलब्ध ऑफ़िस लाइव वेब एप्स की तरह ही है, मगर इसे बेहद लोकप्रिय सामाजिक नेटवर्क साइट फ़ेसबुक से जोड़ने के लिहाज से डिजाइन किया गया है। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="margin: 10px;" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2010/11/docs-dot-com-story.jpg" alt="Docs.com" width="610" height="235" /></p>
<div class="dropCap">ह</div>
<p>मारी कंप्यूटिंग की दुनिया तेजी से क्लाउड की ओर अग्रसर है &#8211; मतलब ये कि वो पूरी तरह ऑनलाइन होने जा रही है। इसके प्रत्यक्ष प्रमाण रूप में जब माइक्रोसॉफ़्ट ने अपने ऑफ़िस सूट 2010 (जिसमें तमाम आफिस तंत्राँश जैसे कि वर्ड, एक्सेल, पॉवर प्वाइंट आदि शामिल होते हैं) को जारी किया तो उसमें न केवल ऑनलाइन दस्तावेज़ों के संपादन व साझा करने की सुविधा मुहैया कराई बल्कि ऐसे प्रयोक्ताओं के लिए जो ऑफ़िस सूट ख़रीद कर प्रयोग करने की कतई श्रद्धा नहीं रखते थे, डॉक्स.कॉम-बीटा नाम से ऑफ़िस सूट 2010 का ऑनलाइन संस्करण भी फ़ेसबुक के रास्ते जारी किया।</p>
<p>हालांकि माइक्रोसॉफ़्ट फ्यूज लैब्स द्वारा जारी <strong>डॉक्स.कॉम</strong> अब अभी अपने बीटा संस्करण में ही है और इसमें संपूर्ण ऑफ़िस सूट की सुविधाएँ शामिल नहीं की गई हैं, मगर इस पर त्वरित नजर डालने से इसकी संभावनाओं सुविधाओं के बारे में मालूमात किए जा सकते हैं और ये भी कयास लगाए जा सकते हैं कि भविष्य में क्लाउड कंप्यूटिंग का बिज़नेस मॉडल किस तरह आकार ग्रहण करेगा। यकीनन व्यक्तिगत या घरेलू प्रयोग करने वाला प्रयोक्ता आने वाले समय में बेहद फायदे में रहेगा क्योंकि उसे भारी भरकम राशि खर्च कर महंगे सॉफ़्टवेयर उत्पाद खरीदने नहीं पड़ेंगे। आमतौर पर सभी प्रमुख ऑनलाइन उत्पाद उसे मुफ़्त या अत्यंत किफायती कीमतों में और पूर्णतः कानूनी तरीके से हासिल होंगे। पर्सनल कंप्यूटिंग के संदर्भ में यह बहुत महत्वपूर्ण बात होगी।</p>
<div id="pullQuoteL">यदि आपने ऑफ़िस 2007 या 2010 पर काम किया हुआ है तो डॉक्स.कॉम पर काम करना बेहद आसान है। हालांकि ऑनलाइन प्रयोग के लिहाज से सिर्फ बेहद उपयोगी मेन्यू को ही रखा गया है। </div>
<p>यूं तो डॉक्स.कॉम एमएस ऑफ़िस सूट 2010 के तहत उपलब्ध ऑफ़िस लाइव वेब एप्स की तरह ही है, मगर इसे बेहद लोकप्रिय सामाजिक नेटवर्क साइट फ़ेसबुक से जोड़ने के लिहाज से डिजाइन किया गया है। वस्तुतः आपको डॉक्स.कॉम का प्रयोग करने के लिए माइक्रोसॉफ़्ट लाइव आईडी खाते से नहीं बल्कि फ़ेसबुक खाते से ही लॉगइन करना होता है। प्रथम पंक्ति के व्यावसायिक सॉफ़्टवेयर निर्माताओं के ये कदम चौंकाने वाले हैं कि वे अपने उत्पादों के मुफ़्त संस्करण जारी कर रहे हैं और उसका प्रचार प्रसार करने के लिए फ़ेसबुक जैसे लोकप्रिय प्लेटफ़ॉर्मों के कंधे पर सवार हो रहे हैं। हालांकि इन आनलाइन अनुप्रयोगों में तमाम सुविधाओं का होना लगभग नामुमकिन ही होता है ओर एक तरह से यह ग्राहक को असली उत्पाद बेचने की परोक्ष विपणन नीति का ही नतीजा होते हैं।</p>
<h2>डॉक्स.कॉम में आप क्या कर सकते हैं?</h2>
<p>फ़ेसबुक खाते से लॉगिन (जी हाँ यदि आपके पास फ़ेसबुक खाता नहीं है तो आप डॉक्स.कॉम का प्रयोग नहीं कर सकते) करने के बाद डॉक्स.कॉम को ऑनलाइन माइक्रोसॉफ़्ट ऑफिस की तरह प्रयोग कर सकते हैं। आप नए दस्तावेज़ बना सकते हैं, अपने कंप्यूटर से दस्तावेज़ों (वर्ड, एक्सेल, पॉवर प्वाइंट, पीडीएफ़ इत्यादि) अपलोड कर सकते हैं और साथ ही अपने फ़ेसबुक मित्रों द्वारा साझा किये दस्तावेज़ देख सकते हैं,  ओर यदि अनुमति रही तो उनमें संपादन इत्यादि भी कर सकते हैं।</p>
<p>वस्तुतः डॉक्स.कॉम पर काम करना बेहद आसान है। यदि आपने ऑफ़िस 2007 या 2010 पर काम किया हुआ है तो डॉक्स.कॉम का कलेवर भी बहुत कुछ उसी तरह का रिबन इंटरफ़ेस युक्त है। हालांकि ऑनलाइन प्रयोग के लिहाज से सिर्फ बेहद उपयोगी मेन्यू को ही रखा गया है, अन्य मेन्यू विकल्पों को हटा दिया गया है। मेन्यू में क्लिक करने पर कुछ फ़ीचर्स पॉप-अप के रूप में प्रकट होते हैं जो कि बहुत से नए ब्राउज़रों में पॉप-अप ब्लॉकर द्वारा रोके गए होते हैं, ऐसे में डॉक्स.कॉम को प्रयोग करने में परेशानी हो सकती है।</p>
<p>इसी प्रकार, चूंकि डॉक्स.कॉम को ऑनलाइन प्रयोग के लिए डिजाइन किया गया है इसीलिए आपको अपने दस्तावेज़ों में पृष्ठ हाशिए, क्रमांकन इत्यादि की सेटिंग के लिए भी सुविधाएँ नहीं मिलेंगी जो कि प्रिंट माध्यम में आवश्यक होती हैं। कुछ ऐसा ही हाल पॉवर प्वाइंट का है जहाँ आप किस भी तरह की मौजूदा फाईल तो अपलोड कर देख सकते हैं पर उन्हें संपादित करते समय चित्र जोड़ना या रिसाईज़ करना मुमकिन नहीं, हालांकि स्लाईडों के क्रम बदलने जैसे साधारण काम संभव हैं।</p>
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<h2>कौन बेहतर, डॉक्स.कॉम या गूगल डॉक्स?</h2>
<p>डॉक्स.कॉम को एक परिपूर्ण ऑनलाइन ऑफ़िस सूट की तरह डिजाइन नहीं किया गया है, जैसा कि गूगल डॉक्स है। इसीलिए दोनों में तुलना करना दरअसल बेमानी होगी, क्योंकि सुविधा और संपन्नता में गूगल डॉक्स कहीं आगे है। डॉक्स.कॉम को सामाजिक नेटवर्क साइटों में सामान्य किस्म के दस्तावेज़ों के साझा करने के लिहाज से बनाया गया है। इसलिए यदि आप कोई दस्तावेज़ डॉक्स.कॉम में बनाते हैं तो वह तत्काल ही आपके मित्रों को उपलब्ध हो जाता है। आपक मित्रों की सूची तथा दस्तावेज़ में देखने/बदलने/संपादन इत्यादि को भी सेट कर सकते हैं। डॉक्स.कॉम अभी बीटा स्तर पर है इसलिए अभी इसमें बहुत सारे बग भी हैं और बहुत सी सुविधाएँ ढंग से काम ही नहीं करतीं। पर हाँ रूप रंग के मामले में डॉक्स.कॉम शायद बाज़ी मार ले जाये।</p></div>
<p>डॉक्स.कॉम पर कुछ और हल्के फुल्के जुगाड़ भी हैं जो शायद हर तरह के प्रयोक्ताओं के लिये कुछ न कुछ बनाने की नीति से रखे गये हैं। मसलन फेसबुक पर दी जानकारी के आधार पर रेज्यूमे बना सकने, या फेसबुक के चित्रों से फोटो शो या उनकी जानकारी के आधार पर फ्रेंड चार्ट (दरअसल यह दोस्तों की उम्र, लिंग, गृहनगर आदि जानकारी के आधार पर बने एक्सेल ग्राफ भर होते हैं) बना सकने के जुगाड़।</p>
<h2>डॉक्स.कॉम पर भारतीय भाषाओं का प्रयोग</h2>
<p>डॉक्स.कॉम में भारतीय भाषाओं का बढ़िया समर्थन है। हिंदी में काम करने में कोई विशिष्ट समस्या नजर नहीं आई। इसके वर्तनी जाँचक मेन्यू में चुनिंदा भारतीय भाषाओं जैसे कि हिंदी, गुजराती, मलयालम, तमिल इत्यादि में वर्तनी जाँच की सुविधा भी उपलब्ध है, हालांकि हिंदी वर्तनी जाँच में अभी दिक्कतें हैं, यह अभी काफी बगी है &#8211; यानी हिंदी वर्तनी जाँच को अभी डॉक्स.कॉम सही तरीके से अंजाम नहीं दे पाता। डॉक्स.कॉम को भारतीय भाषाओं के लिहाज से परिष्कृत करने की आवश्यकता है, क्योंकि किसी खास भाषा के लिहाज से कोई भी ऑफ़िस सूट एक बढ़िया और उन्नत किस्म के वर्तनी जाँचक के बगैर सदैव बेकार और अनुपयोगी ही बनी रहेगा।</p>
<p>कुल मिलाकर <a href="http://docs.com/">डॉक्स.कॉम</a> काम का प्रकल्प है। यदि आप पहले से ही फ़ेसबुक खाताधारी हैं, तो छोटे-मोटे दस्तावेज़ बनाने (जैसे कि कोई छोटी सी कुकिंग रेसिपि, किसी इवेंट की तैयारी व हिसाब किताब के लिये बनी एक्सेल स्प्रेडशीट या किसी सभा में आपकी प्रस्तुति के स्लाइड) व उसे मित्रों में तुरत-फुरत साझा करने के लिए डॉक्स.कॉम का प्रयोग कर सकते हैं। यदि आपके फ़ेसबुक खाताधारी नहीं हैं, या आपको व्यावसायिक स्तर की या एमएस आफिस के डेस्कटॉप अनुप्रयोग जैसी सुविधाएँ व दस्तावेज़ चाहिये, तो डॉक्स.कॉम में आपके लिए वैसे भी कुछ नहीं है। ऐसे में ऑनलाइन ऑफ़िस सूट के लिए आपके पास अन्य उत्तम विकल्प हैं &#8211; <a href="http://docs.google.com">गूगल डॉक्स</a> या <a href="http://www.zoho.com">जोहो</a>।</p>
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