<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>सामयिकी - हिन्दी वेबपत्रिका &#124; Samayiki - Hindi Webzine &#187; Shiv Sena</title>
	<atom:link href="http://www.samayiki.com/tag/shivsena/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://www.samayiki.com</link>
	<description>बदलती दुनिया की साक्षी</description>
	<lastBuildDate>Thu, 21 Jul 2011 13:38:42 +0000</lastBuildDate>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.org/?v=3.3.1</generator>
		<item>
		<title>निष्कर्षों में फटकार, सिफारिशों में पुचकार</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/11/liberhan-commission-report/</link>
		<comments>http://www.samayiki.com/2009/11/liberhan-commission-report/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 16:00:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सिद्धार्थ वरदराजन</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[Advani]]></category>
		<category><![CDATA[Ayodhya]]></category>
		<category><![CDATA[Babri Masjid]]></category>
		<category><![CDATA[Liberhan]]></category>
		<category><![CDATA[RSS]]></category>
		<category><![CDATA[Shiv Sena]]></category>
		<category><![CDATA[Tadic judgment]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.samayiki.com/?p=171</guid>
		<description><![CDATA[बाबरी मस्जिद मामले की तफ़्तीश कर रही लिब्रहान आयोग की 17 साल बाद जारी रपट ने साजिश का पर्दाफाश तो किया पर देश को साम्प्रदायिक प्रलय की ओर ढकलने के लिए दोषी पाये गये 68 व्यक्तियों को सजा देने की बात पर चुप्पी साध ली।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="aligncenter size-full wp-image-164" title="baabri_masjid_story" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/baabri_masjid_story.jpg" alt="baabri_masjid_story" width="565" height="300" /></p>
<div class="dropCap">हि</div>
<p>न्दुस्तानी में एक कहावत है &#8211; खोदा पहाड़ निकली चुहिया &#8211; लम्बे तथा कठिन रियाज के बाद जब नतीजा अपेक्षाकृत बहुत कम निकलता हो, उन हालात में इस मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है।</p>
<p>न्यायमूर्ती एम.एस.लिब्रहान ने 17 साल अथक परिश्रम किया जिस दरमियान शुरुआती तीन माह की नियुक्ति के उनके कार्यकाल को 40 बार बढ़ाया गया, उन्होंने 1029 पृष्टों की एक रिपोर्ट तैयार की जो उन तमाम हकीकतों और हालात का तफ़सील से ब्यौरा देती है जिनके के कारण 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाया गया। उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले नहीं है बल्कि स्पष्ट तथा बुलन्द हैं: यह विध्वंस एक सोची समझी साजिश का नतीजा था &#8211; एक  &#8220;संयुक्त सामान्य उद्यम&#8221; &#8211; जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, शिव सेना तथा भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा रचा गया था, इनमें से अन्त में उल्लिखित संगठन को रिपोर्ट ने जायज तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का &#8220;मोहरा&#8221; बताया है।</p>
<p>दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन निर्भीक तथ्यान्वेषणों के बावजूद जो सिफारिशें दी गई हुई हैं वे इतनी कायराना हैं कि उनकी रपट के प्रारंभ में दिये स्पष्टवादी निष्कर्षों से कोई समानता ही नहीं है। देश को साम्प्रदायिक महाविपदा के मुहाने पर ढकलने के लिए 68 व्यक्तियों को दोषी पाए जाने के बावजूद श्री लिब्रहान न तो विध्वंस-मामले में अब तक आरोपित होने से बच रहे लोगों के खिलाफ़ आरोप दाखिल करने की संस्तुति करते हैं, ना ही वे आपराधिक कार्रवाई को तेजी से निपटाने की बात करते हैं।</p>
<div id="attachment_172" class="wp-caption alignright" style="width: 260px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/liberhan.jpg"><img class="size-full wp-image-172" title="liberhan" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/liberhan.jpg" alt="न्यायमूर्ती एम.एस.लिब्रहान ने 17 साल के परिश्रम से 1029 पृष्टों की रिपोर्ट तैयार की जो 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाये जाने की घटना का पूर्ण विवेचन करती है।" width="250" height="165" /></a><p class="wp-caption-text">न्यायमूर्ती एम.एस.लिब्रहान ने 17 साल के परिश्रम से 1029 पृष्टों की रिपोर्ट तैयार की जो 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाये जाने की घटना का पूर्ण विवेचन करती है।</p></div>
<p>यह बात इसलिये भी चौंकाने वाली लगती है क्योंकि उन्होंने षड़यंत्र का विवरण देने के लिये बार बार ’संयुक्त सामान्य उद्यम’ (joint common enterprise) का जुमला दोहराया है। 1999 में तत्कालीन युगोस्लाविया की बाबत <a title="1999 Tadic judgment of the International Criminal Tribunal for the former Yugoslavia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bosnian_Genocide" target="_blank">टैडिक फैसले</a> के बाद से सीधी भागीदारी न होने के बावजूद जिन लोगों ने जानबूझकर इन कृत्यों को बढ़ावा दिया हो तथा जो लोग इन कृत्यों में लिप्त संगठनों के शीर्ष पर होते हैं उन पर दायित्व डालने की अन्तर्राष्ट्रीय फौजदारी कानून में सामूहिक अपराधों के ऐसे मामलों की बाबत बाद के वर्षों में एक धारणा विकसित हुई है।</p>
<p>यदि श्री लिब्रहान ने अपनी सिफारिशों में उपरोक्त विचार को लागू किया होता तथा इस बात पर जोर दिया होता कि राजनेता, पुलिस अफ़सर और नौकरशाह जिस व्यापक दण्डाभाव का लाभ लेते आए हैं उस का अन्त हो तो यह मुल्क उनका एहसान मानता। परन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है। धर्म तथा राजनीति को अलग रखने तथा अन्य कुछ अन्य ढीले ढाले सुझाव देने के अतिरिक्त, इस रिपोर्ट ने विध्वंस मामले में तात्कालिक न्याय सुनिश्चित करने अथवा देश को इस त्रासदी की पुनरावृत्ति से बचाने के लिए संस्तुति देने से पल्ला झाड़ लिया है।</p>
<p>शायद श्री लिब्रहान अथवा उनके कमीशन की यह इतनी कमी नहीं है जितनी हमारी पुलिस तथा न्याय प्रणाली द्वारा उन्हीं नतीजों पर पहुंच कर फिर त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करने की अक्षमता का दोष है।</p>
<div id="pullQuoteL">&#8220;कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उनके दामन पर दाग न लगे और भविष्य में राजनैतिक इस्तेमाल हेतु उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखा जा सके।&#8221;</div>
<p>दसवें अध्याय में न्यायमूर्ति लिब्रहान अभियोज्यता की बाबत एक स्पष्ट बयान देते हैं:  &#8220;इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं कि  &#8216;संयुक्त-सामान्य-उद्यम&#8217; विध्वंस की पूर्व नियोजित कार्रवाई थी जिसकी तात्कालिक रहनुमाई विनय कटियार, परमहंस रामचन्द्र दास, अशोक सिंघल, चम्पत राय, स्वामी चिन्म्यानंद, एस.सी. दीक्षित, बी.पी.सिंघल तथा आचार्य गिरिराज कर रहे थे। ये मौके पर मौजूद वह स्थानीय नेता थे जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघएस द्वारा बनाई गई योजना को क्रियान्वित करना था। अन्य नेता [लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी तथा अन्य] उनके प्रतिनिधिरूप दायित्व के कारण दोषमुक्त नहीं माने जा सकते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा सौंपी भूमिका को स्वेच्छा से निभाया। अयोध्या अभियान को उनका निश्चित समर्थन तथा दीर्घकाल तक चले अभियान के निर्णायक चरण में उनकी सशरीर मौजूदगी से यह तथ्य अकाट्य रूप से स्थापित हो चुका है। मेरा यह निष्कर्ष है कि इस रपट में नामित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा, विहिप, शिव सेना तथा उनके पदाधिकारियों ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के साथ आपराधिक गठजोड़ स्थापित कर विवादित जगह पर मन्दिर निर्माण के लिए एक  &#8216;संयुक्त-समान-उद्यम&#8217; स्थापित कर लिया था। लोकतंत्र को नष्ट करने की सोची समझी कार्रवाई के तहत उन्होंने धर्म और राजनीति के घालमेल करने का काम किया।“</p>
<p>मस्जिद गिराया जाना, &#8220;एक ठोस और सुनियोजित योजना का चरम बिन्दु था जिसमें धार्मिक, राजनैतिक तथा उपद्रवियों का नेतृत्व करने वाला एक पूरा प्रतिष्ठित कुनबा शामिल था&#8221;। न्यायमूर्ति लिब्रहान यह सही कहा कि, &#8220;कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उनके दामन पर दाग न लगे और भविष्य में राजनैतिक इस्तेमाल हेतु उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखा जा सके।&#8221;  इस प्रकार आडवाणी और जोशी, भले ही वे इस &#8216;संयुक्त-सामान्य-उद्यम&#8217; में दूसरे स्तर पर भागीदार रहे हों और संघ परिवार द्वारा प्रदत्त ढाल से लैस हों, राजनैतिक तथा कानूनी दायित्व से नहीं बच सकते।</p>
<p>सत्रह साल बीत जाने के बाद, इस &#8216;संयुक्त-सामान्य-उद्यम&#8217; के भागीदार रहे कई अपराधी मर चुके हैं। परन्तु इनमें से कई इस बिना पर फलते फूलते रहे कि वे कानून के ऊपर थे। भले ही यह देश ढीली ढाली सिफ़ारिशों के कारण न्यायमूर्ति लिब्रहान की निंदा करे,  इस रपट के मर्म में इतनी महत्वपूर्ण जानकारियाँ तो हैं जिनकी मदद से कोई भी दमदार जाँच एजेन्सी षड़यन्त्र का अचूक मामला बना सके। ऐसे कई किरदार जिनकी स्मृति इस आयोग के समक्ष धूमिल हो गयी थी,  हमारी पुलिस की अजकल की पारंगत पूछताछ, जिसमें नार्को परीक्षण शामिल होता है, के समक्ष ज्यादा देर न टिक पायेंगें। इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार यदि वाकई गंभीर हैं तो पूरक आरोप पत्र दाखिल कर सकती है तथा बाबरी मस्जिद ध्वंस किए जाने के मामले को <em>फास्ट-ट्रैक</em> तरीके से नियति तक पहुंचा सकती है ताकि आखिरकार न्याय हो सके।</p>
<p class="note">हिन्दी अनुवाद के लिये <a href="http://samatavadi.wordpress.com" target="_blank">अफलातून जी</a> का शुक्रिया</p>
<img src="http://www.samayiki.com/sam/?ak_action=api_record_view&id=171&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.samayiki.com/2009/11/liberhan-commission-report/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>भइया नक्को, बहिनजी पाहिजे</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/01/bsp-in-maharashtra/</link>
		<comments>http://www.samayiki.com/2009/01/bsp-in-maharashtra/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 07 Jan 2009 11:11:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शशि सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[BJP]]></category>
		<category><![CDATA[Brahmin]]></category>
		<category><![CDATA[BSP]]></category>
		<category><![CDATA[maharashtra]]></category>
		<category><![CDATA[Mayawati]]></category>
		<category><![CDATA[ncp]]></category>
		<category><![CDATA[Shiv Sena]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.samayiki.com/?p=67</guid>
		<description><![CDATA[महाराष्ट्र की राजनीति में दलित मुद्दे का मराठी-गैर मराठी मुद्दे से महत्त्व कम नहीं है। बसपा यहाँ पवार, ठाकरे, चव्हाण जैसों का दबदबा खत्म कर सकती है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span class="dropCap">भ</span>इया नहीं चाहिये मगर बहिनजी का स्वागत है। महाराष्ट्र में कुछ इसी तर्ज़ पर शिवसेना अपनी राजनीति की बिसात बिछाती दिख रही है। विश्लेषकों की मानें तो कांग्रेस और एनसीपी ने राज ठाकरे को आगे कर जो बाउंसर शिवसेना की तरफ फेंका था उसके जवाब में शिवसेना मायावती से दोस्ती गांठकर गुगली डाल सकती है।</p>
<p>महाराष्ट्र की राजनीति की तनिक भी समझ रखने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि दलित राजनीति के लिए महाराष्ट्र की धरती देश के किसी अन्य राज्य के मुकाबले कम उर्वर नहीं है। दलित मुद्दे का यहां की राजनीति में मराठी-गैर मराठी मुद्दे से महत्त्व कतई कम नहीं है। या यूं कहें कि दोनों मुद्दों का आपस में गहरा जुड़ाव है तो गलत नहीं होगा।</p>
<div id="pullQuoteL">महाराष्ट्र की राजनीति में दलित मुद्दे का मराठी-गैर मराठी मुद्दे से महत्त्व कतई कम नहीं है।</div>
<p>इसे समझने के लिए आइये समय से थोड़ा पीछे चलते हैं। बाबा साहेब अंबेडकर के प्रभाव के कारण इस प्रदेश का दलित किसी और प्रदेश के दलितों के मुकाबले अधिक शिक्षित है। इस शिक्षा ने इनके जीवन में काफी गुणात्मक प्रभाव डाला, इनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति में बेहतरी हुई है। सामर्थ्य और संख्याबल में वे यहां के किसी भी दूसरे प्रभावशाली समुदाय के लगभग बराबरी पर ठहरते हैं। कांग्रेस हमेशा से इसका फायदा अपने हित में करती आई है। दलितों के बीच मजबूत नेतृत्व भी उभरता रहा मगर एक सीमा के बाद कांग्रेस उसका बधिया कर दिया करती है, या तो उस नेतृत्व को कांग्रेस में मिला लिया जाता या फिर उसकी ऐसी घेराबंदी कर दी जाती जिससे वो खुद ही कांग्रेस की गोद में जा बैठता। नतीजतन मराठी दलित यहां की राजनीति में अपने वाजिब हक से हमेशा महरूम रहे।</p>
<div class="wp-caption alignright" style="width: 260px"><img style="padding: 5px;" title="कार्टून: कीर्तिश भट्ट" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/01/mayawati-article.jpg" alt="Mayawati: PM in waiting?" width="250" height="209" align="right" /><p class="wp-caption-text">कार्टून: कीर्तिश भट्ट (http://bamulahija.blogspot.com)</p></div>
<p>महाराष्ट्र की राजनीति में शीर्ष पर हमेशा से पाटिल, पवार, भोंसले, ठाकरे, चव्हाण जैसों का ही दबदबा बना रहा है। इस दबदबे को खत्म करने के लिये दलितों यह भलीभांति समझ चुके हैं कि उन्हें एकजुट होना है। जमीनी स्तर पर आये दिन होने वाले आपसी टकराव इसका सबूत हैं। पिछले दशक में ये टकराव ज्यादा तेजी से बढ़ें हैं। उधर उत्तर भारत में हो रहे बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के विस्तार ने इनमें आत्मविश्वास फूंकने का काम किया।</p>
<p>इस बनी बनाई जमीन को बसपा ने पहचान लिया और पिछले आम चुनावों में खासे आक्रमक रूप के साथ मैदान में उतरी। हालांकि पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली मगर उसके खाते में गये चार प्रतिशत वोट ने सबको सकते में डाल दिया। खासकर कांग्रेस के लिए ये बड़े खतरे की घंटी थी।</p>
<p><a href="http://www.rediff.com/news/2007/nov/23maya.htm" target="_blank">याद कीजिये</a>, नवम्बर 2007 में मुम्बई में आयोजित मायावती की रैली में पांच लाख से ज्यादा की भीड़ इकट्ठा हुई थी जिसने कांग्रेस को यह अहसास करा दिया था कि वे अब सिर्फ उत्तर प्रदेश की नेता की रैली नहीं है। इस रैली ने कांग्रेस और एनसीपी में मानो भूचाल ला दिया था। तब आनन फानन इस तूफान को रोकने के लिए हाल में अपने चाचा से अलग हुये राज ठाकरे को कांग्रेस और एनसीपी ने इस्तेमाल करने का निर्णय लिया। इसके पीछे गणित यह था कि कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो रही भीम शक्ति को मराठी-गैर मराठी मुद्दे पर मायावती से जुड़ने से रोका जाय साथ ही राज ठाकरे को मजबूत कर शिवसेना को कमजोर किया जाये।</p>
<div id="pullQuoteL">हो सकता है कि मायावती अपनी दलित ब्राह्मण भाईचारा नीति पर आगे बढ़ भाजपा के बैंक में ही सेंघ लगा बैठें</div>
<p>लेकिन कांग्रेस का ये दाँव उस पर ही उल्टा पड़ सकता है। राज ठाकरे के मुद्दे पर कार्रवाही करने में पार्टी ने जितनी शर्मनाक देरी दिखाई उससे उत्तर भारतीय समुदाय पूरी तरह से कांग्रेस एनसीपी गठबंधन से बिफर गया है। गौर करने वाली बात है कि कम-से-कम मुम्बई के कुछ इलाकों में उत्तर भारतीय समुदाय निर्णायक स्थिति में हैं। लेकिन उनके सामने विकल्प हीनता की स्थिति है। ऐसे में शिवसेना मायावाती से हाथ मिलाकर एकजुट दलितों को अपने पाले में करने की पुरजोर कोशिश करेगी।</p>
<p>विकल्प तो कई हैं। हो सकता है कि उत्तर भारतीयों की नाराजगी को पूरी तरह राज ठाकरे की ओर कर दिया जाय। इस काम में इसकी मदद कर सकती है, उत्तर प्रदेश में बसपा की विपक्षी, भाजपा, जिसे सिद्धांत रूप में कभी बसपा से परहेज नहीं रहा है। ऐसा होने पर भाजपा को बिहार में भी यहां की शिवसेना से अपनी दोस्ती का बचाव मौका मिल जायेगा। यह भी हो सकता है कि मायावती अपनी दलित ब्राह्मण भाईचारा नीति पर आगे बढ़ भाजपा के बैंक में ही <a href="http://timesofindia.indiatimes.com/India/Mayawati_pins_hopes_on_Brahmin-dalit_combo_for_LS_polls/articleshow/3939204.cms" target="_blank">सेंघ लगा बैठें</a>, आगामी 24 जनवरी को तय बहु भाषिक ब्राह्मण महा अधिवेशन में आडवाणी,  शरद पवार, कलमाडी के अलावा मायावती भी ब्राह्मणों को <a href="http://www.expressindia.com/latest-news/getting-ready-to-woo-brahmins/407436/" target="_blank">रिझाने आ सकती हैं</a>।</p>
<p>तरीका जो भी हो, उत्तर प्रदेश से बाहर निकलने को आतुर मायावती के लिए भी यह एक बढ़िया मौका साबित हो सकता है, लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के बाद काँग्रेस के कायम रहने से भाजपा सन्न तो रह ही गई थी, बहनजी का भी लेफ्ट और भाजपा के सहयोग के बल पर दलित प्रधानमंत्री का <a href="http://www.hindu.com/thehindu/holnus/000200812241021.htm" target="_blank">सपना सच होते होते रह गया था</a>। वे यह मंसूबा पूरा ज़रूर करना चाहेंगी, भले इस बार उन्हें पीएम इन वेटिंग की सूची में आडवाणी के <a href="http://www.indianexpress.com/news/advani-marches-into-09-eyes-set-on-pol.../405082/" target="_blank">पीछे खड़े होना पड़े</a>। मगर एक की अधिक और दूसरे के कम उम्र को देखते हुये इस इंतजार से मायावती को शायद ही कोई परेशानी हो।</p>
<p>आप तो जानते ही हैं, राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं। लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने तक देखते जाइये कौन किसके साथ खड़ा होता है।</p>
<img src="http://www.samayiki.com/sam/?ak_action=api_record_view&id=67&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.samayiki.com/2009/01/bsp-in-maharashtra/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>

