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	<title>सामयिकी - हिन्दी वेबपत्रिका &#124; Samayiki - Hindi Webzine &#187; Ayodhya</title>
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	<description>बदलती दुनिया की साक्षी</description>
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		<title>निष्कर्षों में फटकार, सिफारिशों में पुचकार</title>
		<link>http://www.samayiki.com/2009/11/liberhan-commission-report/</link>
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		<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 16:00:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>सिद्धार्थ वरदराजन</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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		<category><![CDATA[Ayodhya]]></category>
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		<category><![CDATA[Tadic judgment]]></category>

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		<description><![CDATA[बाबरी मस्जिद मामले की तफ़्तीश कर रही लिब्रहान आयोग की 17 साल बाद जारी रपट ने साजिश का पर्दाफाश तो किया पर देश को साम्प्रदायिक प्रलय की ओर ढकलने के लिए दोषी पाये गये 68 व्यक्तियों को सजा देने की बात पर चुप्पी साध ली।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="aligncenter size-full wp-image-164" title="baabri_masjid_story" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/baabri_masjid_story.jpg" alt="baabri_masjid_story" width="565" height="300" /></p>
<div class="dropCap">हि</div>
<p>न्दुस्तानी में एक कहावत है &#8211; खोदा पहाड़ निकली चुहिया &#8211; लम्बे तथा कठिन रियाज के बाद जब नतीजा अपेक्षाकृत बहुत कम निकलता हो, उन हालात में इस मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है।</p>
<p>न्यायमूर्ती एम.एस.लिब्रहान ने 17 साल अथक परिश्रम किया जिस दरमियान शुरुआती तीन माह की नियुक्ति के उनके कार्यकाल को 40 बार बढ़ाया गया, उन्होंने 1029 पृष्टों की एक रिपोर्ट तैयार की जो उन तमाम हकीकतों और हालात का तफ़सील से ब्यौरा देती है जिनके के कारण 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाया गया। उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले नहीं है बल्कि स्पष्ट तथा बुलन्द हैं: यह विध्वंस एक सोची समझी साजिश का नतीजा था &#8211; एक  &#8220;संयुक्त सामान्य उद्यम&#8221; &#8211; जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, शिव सेना तथा भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा रचा गया था, इनमें से अन्त में उल्लिखित संगठन को रिपोर्ट ने जायज तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का &#8220;मोहरा&#8221; बताया है।</p>
<p>दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन निर्भीक तथ्यान्वेषणों के बावजूद जो सिफारिशें दी गई हुई हैं वे इतनी कायराना हैं कि उनकी रपट के प्रारंभ में दिये स्पष्टवादी निष्कर्षों से कोई समानता ही नहीं है। देश को साम्प्रदायिक महाविपदा के मुहाने पर ढकलने के लिए 68 व्यक्तियों को दोषी पाए जाने के बावजूद श्री लिब्रहान न तो विध्वंस-मामले में अब तक आरोपित होने से बच रहे लोगों के खिलाफ़ आरोप दाखिल करने की संस्तुति करते हैं, ना ही वे आपराधिक कार्रवाई को तेजी से निपटाने की बात करते हैं।</p>
<div id="attachment_172" class="wp-caption alignright" style="width: 260px"><a href="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/liberhan.jpg"><img class="size-full wp-image-172" title="liberhan" src="http://www.samayiki.com/sam/wp-content/uploads/2009/11/liberhan.jpg" alt="न्यायमूर्ती एम.एस.लिब्रहान ने 17 साल के परिश्रम से 1029 पृष्टों की रिपोर्ट तैयार की जो 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाये जाने की घटना का पूर्ण विवेचन करती है।" width="250" height="165" /></a><p class="wp-caption-text">न्यायमूर्ती एम.एस.लिब्रहान ने 17 साल के परिश्रम से 1029 पृष्टों की रिपोर्ट तैयार की जो 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाये जाने की घटना का पूर्ण विवेचन करती है।</p></div>
<p>यह बात इसलिये भी चौंकाने वाली लगती है क्योंकि उन्होंने षड़यंत्र का विवरण देने के लिये बार बार ’संयुक्त सामान्य उद्यम’ (joint common enterprise) का जुमला दोहराया है। 1999 में तत्कालीन युगोस्लाविया की बाबत <a title="1999 Tadic judgment of the International Criminal Tribunal for the former Yugoslavia" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bosnian_Genocide" target="_blank">टैडिक फैसले</a> के बाद से सीधी भागीदारी न होने के बावजूद जिन लोगों ने जानबूझकर इन कृत्यों को बढ़ावा दिया हो तथा जो लोग इन कृत्यों में लिप्त संगठनों के शीर्ष पर होते हैं उन पर दायित्व डालने की अन्तर्राष्ट्रीय फौजदारी कानून में सामूहिक अपराधों के ऐसे मामलों की बाबत बाद के वर्षों में एक धारणा विकसित हुई है।</p>
<p>यदि श्री लिब्रहान ने अपनी सिफारिशों में उपरोक्त विचार को लागू किया होता तथा इस बात पर जोर दिया होता कि राजनेता, पुलिस अफ़सर और नौकरशाह जिस व्यापक दण्डाभाव का लाभ लेते आए हैं उस का अन्त हो तो यह मुल्क उनका एहसान मानता। परन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है। धर्म तथा राजनीति को अलग रखने तथा अन्य कुछ अन्य ढीले ढाले सुझाव देने के अतिरिक्त, इस रिपोर्ट ने विध्वंस मामले में तात्कालिक न्याय सुनिश्चित करने अथवा देश को इस त्रासदी की पुनरावृत्ति से बचाने के लिए संस्तुति देने से पल्ला झाड़ लिया है।</p>
<p>शायद श्री लिब्रहान अथवा उनके कमीशन की यह इतनी कमी नहीं है जितनी हमारी पुलिस तथा न्याय प्रणाली द्वारा उन्हीं नतीजों पर पहुंच कर फिर त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करने की अक्षमता का दोष है।</p>
<div id="pullQuoteL">&#8220;कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उनके दामन पर दाग न लगे और भविष्य में राजनैतिक इस्तेमाल हेतु उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखा जा सके।&#8221;</div>
<p>दसवें अध्याय में न्यायमूर्ति लिब्रहान अभियोज्यता की बाबत एक स्पष्ट बयान देते हैं:  &#8220;इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं कि  &#8216;संयुक्त-सामान्य-उद्यम&#8217; विध्वंस की पूर्व नियोजित कार्रवाई थी जिसकी तात्कालिक रहनुमाई विनय कटियार, परमहंस रामचन्द्र दास, अशोक सिंघल, चम्पत राय, स्वामी चिन्म्यानंद, एस.सी. दीक्षित, बी.पी.सिंघल तथा आचार्य गिरिराज कर रहे थे। ये मौके पर मौजूद वह स्थानीय नेता थे जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघएस द्वारा बनाई गई योजना को क्रियान्वित करना था। अन्य नेता [लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी तथा अन्य] उनके प्रतिनिधिरूप दायित्व के कारण दोषमुक्त नहीं माने जा सकते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा सौंपी भूमिका को स्वेच्छा से निभाया। अयोध्या अभियान को उनका निश्चित समर्थन तथा दीर्घकाल तक चले अभियान के निर्णायक चरण में उनकी सशरीर मौजूदगी से यह तथ्य अकाट्य रूप से स्थापित हो चुका है। मेरा यह निष्कर्ष है कि इस रपट में नामित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा, विहिप, शिव सेना तथा उनके पदाधिकारियों ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के साथ आपराधिक गठजोड़ स्थापित कर विवादित जगह पर मन्दिर निर्माण के लिए एक  &#8216;संयुक्त-समान-उद्यम&#8217; स्थापित कर लिया था। लोकतंत्र को नष्ट करने की सोची समझी कार्रवाई के तहत उन्होंने धर्म और राजनीति के घालमेल करने का काम किया।“</p>
<p>मस्जिद गिराया जाना, &#8220;एक ठोस और सुनियोजित योजना का चरम बिन्दु था जिसमें धार्मिक, राजनैतिक तथा उपद्रवियों का नेतृत्व करने वाला एक पूरा प्रतिष्ठित कुनबा शामिल था&#8221;। न्यायमूर्ति लिब्रहान यह सही कहा कि, &#8220;कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उनके दामन पर दाग न लगे और भविष्य में राजनैतिक इस्तेमाल हेतु उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखा जा सके।&#8221;  इस प्रकार आडवाणी और जोशी, भले ही वे इस &#8216;संयुक्त-सामान्य-उद्यम&#8217; में दूसरे स्तर पर भागीदार रहे हों और संघ परिवार द्वारा प्रदत्त ढाल से लैस हों, राजनैतिक तथा कानूनी दायित्व से नहीं बच सकते।</p>
<p>सत्रह साल बीत जाने के बाद, इस &#8216;संयुक्त-सामान्य-उद्यम&#8217; के भागीदार रहे कई अपराधी मर चुके हैं। परन्तु इनमें से कई इस बिना पर फलते फूलते रहे कि वे कानून के ऊपर थे। भले ही यह देश ढीली ढाली सिफ़ारिशों के कारण न्यायमूर्ति लिब्रहान की निंदा करे,  इस रपट के मर्म में इतनी महत्वपूर्ण जानकारियाँ तो हैं जिनकी मदद से कोई भी दमदार जाँच एजेन्सी षड़यन्त्र का अचूक मामला बना सके। ऐसे कई किरदार जिनकी स्मृति इस आयोग के समक्ष धूमिल हो गयी थी,  हमारी पुलिस की अजकल की पारंगत पूछताछ, जिसमें नार्को परीक्षण शामिल होता है, के समक्ष ज्यादा देर न टिक पायेंगें। इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार यदि वाकई गंभीर हैं तो पूरक आरोप पत्र दाखिल कर सकती है तथा बाबरी मस्जिद ध्वंस किए जाने के मामले को <em>फास्ट-ट्रैक</em> तरीके से नियति तक पहुंचा सकती है ताकि आखिरकार न्याय हो सके।</p>
<p class="note">हिन्दी अनुवाद के लिये <a href="http://samatavadi.wordpress.com" target="_blank">अफलातून जी</a> का शुक्रिया</p>
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